एक अच्छा माहोल बन गया।मे दयानंद शाखा का नियमित स्वयं सेवक बन गया।तभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की धर्म जागरण मंच ईकाई के अंतर्गत चलने वाली मेरठ प्रांत की गुर्जर समाज साझी विरासत समिति के संयोजक का दायित्व प्राप्त हुआ। संगठन में पुरुषों के साथ कुछ गुर्जर महिलाओं को भी जोड़ने का निर्देश मिला। ध्यान इतना रखा जाना था कि जो भी संगठन से जुड़े वह समझदार हो।जब मेने आसपास नजर दोडाई तथा पूछताछ की तो बात सामने आई कि सेक्टर 5 में श्रीमती रीमा सिंह नाम की एक महिला रहती है।जो बातचीत करने मे होशियार व समझदार है,वो संगठन के लिए उपयोगी हो सकती है। फिर पता चला कि उनके पति की मृत्यु हो चुकी है जो एयर फोर्स में थे।उनकी एक बेटी है जो पढ लिखकर सर्विस करती है। सतेंद्र भडाना जी का निवास और रीमा सिंह का निवास आसपास था।मेने सतेंद्र भडाना जी से आग्रह किया कि वो रीमा सिंह जी से बात करें।मेरे आग्रह पर सतेंद्र भडाना जी ने कोई खास रूचि नहीं दिखाई,शायद मे संगठन की गम्भीरता समझाने में विफल रहा। फिर मेंने स्वयं प्रयास किया।रीमा सिंह जी के मकान में विपिन नाम का एक स्वय सेवक किराए पर रहता था।मे विपिन के पास पहुंच गया। मैंने विपिन से आग्रह किया कि वो रीमा सिंह जी से संगठन में शामिल होने का निवेदन हमारी ओर से करें। विपिन ने मुझसे कहा कि आप ही आग्रह कर लिजिए, में आपकी मुलाकात रीमा सिंह जी से कराये देता हूं।मेने विपिन के साथ जाकर रीमा सिंह जी से मुलाकात की। बात करने पर पता चला कि वो मेरी पत्नी की मृत्यु होने पर सतेंद्र भडाना जी के परिवार की महिलाओं के साथ हमारे घर गई थी।वो तो मुझे पहचानती थी, परंतु में उनको नही देख पाया था।रीमा सिंह जी ने मेरा निवेदन स्वीकार कर लिया।मेने रीमा सिंह जी को संघ की दृष्टि से बने सरधना जिला की सह संयोजिका नामित कर दिया।उस समय रीमा सिंह जी अपनी बेटी की शादी की तैयारी कर रही थी,जो 2 फरवरी सन् 2025 की थी।वो अकेली महिला अपने कर्तव्य पथ पर मजबूती से बढ़ रही थी। उनके चेहरे पर चिंता व दबाव नही था बल्कि एक विजय भरी मुस्कान थी।मेरी जान पहचान बहुत नई थी, फिर भी मेरा मन चाह रहा था कि उनकी कुछ मदद करु।मेने फोन करके निवेदन भी किया। लेकिन उन्होंने मदद लेने से इंकार कर दिया। शायद रीमा सिंह के स्वाभिमान ने ऐसा निर्णय लेने के लिए विवश किया हो। परन्तु एक फरवरी सन् 2025 को जब रीमा सिंह जी की बेटी का लगन जाना था,तब 31 जनवरी को उनका मेरे पास फोन आया कि मुझे भी लगन देने के लिए साथ जाना है। मैंने जो सहयोग का आग्रह उनसे किया था,शायद इतना सहयोग करना ही मेरे हिस्से में आया था। में लगन सगाई दिलवाने के लिए चला गया तथा दो फरवरी को शादी में भी शामिल हुआ। सतेंद्र भडाना जी से रीमा सिंह जी के विषय में ओर जानकारी प्राप्त हुई। भड़ाना जी ने बताया कि रीमा सिंह जी मुजफ्फरनगर जिले के ढासरी गांव की बेटी है जो जानसठ कस्बे के पास है। ढासरी गांव में श्री खचेडू सिंह नाम के किसान थे,जिनके दिले सिंह नाम के एक पुत्र है जो मुजफ्फरनगर के खतोली ब्लाक के बुआडा नाम के गांव में श्रीमती गैंदी देवी के साथ विवाह संस्कार में बंधें थे।इन दिले सिंह जी के ही रीमा नाम की एक पुत्री ने 10-03-1975 को जन्म लिया,रीमा के कृष्ण पाल नाम के एक भाई भी है जो अध्यापक का कार्य करते हैं।रीमा जी की शादी 04-02-1995 को जिला मेरठ के दौराला ब्लाक मे शाहपुर जदीद गांव के जितेंद्र सिंह से सम्पन्न हुई। जितेन्द्र सिंह एयरफोर्स में कार्यरत थें। शादी के समय रीमा जी इंटर तक शिक्षित थी, शादी के बाद जितेन्द्र सिंह के सहयोग से रीमा जी ने जीवाजी यूनिवर्सिटी ग्वालियर से ग्रेजुएशन किया।समय बीत रहा था,रीमा सिंह जी अब एक पुत्री पूर्णिमा तथा एक पुत्र आशीष की माता भी बन गई थी। अचानक ही समय ने करवट बदली तथा जितेन्द्र सिंह व रीमा सिंह का इकलौता पुत्र आशीष 12 वर्ष की अवस्था में 23-08-2010 को इस नश्वर संसार को छोड़कर चला गया।कुदरत की मार यही पर ही नही रूकी,19-10-2016 को रीमा सिंह जी के पति जितेन्द्र सिंह भी स्वर्गवासी हो गये।अब रीमा सिंह जी व उनकी पुत्री पूर्णिमा परिवार में थे। पूर्णिमा की पढ़ाई लिखाई व भविष्य के लिए सम्पत्ति की व्यवस्था अकेली रीमा सिंह जी के ही भरोसे थी।रीमा सिंह ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभायी।
एक महिला के लिए पति और पुत्र का असमय चले जाना, दुनिया का सबसे बड़ा दुःख है।उस परिस्थिति में भी जिस प्रकार रीमा सिंह अपना कर्तव्य निभा रही थी,वह सामान्य कार्य नही था।भडाना जी से जानकारी मिली कि रीमा सिंह जी के ससुर ने अपने बेटे अर्थात रीमा सिंह जी के पति की मृत्यु के बाद उनके हिस्से की जमीन अपनी पुत्रवधू तथा पोती को न देकर अपने दूसरे पुत्र को दे दी। जो एक अन्याय ही था। कल्पना किजिए यदि रीमा सिंह जी को अपने पति की पेंशन न मिलती तो जीवन कितना कष्ट भरा हो सकता था। शायद सुशांत सिटी मे बना मकान रीमा सिंह जी के पति ने रीमा सिंह जी के नाम ही करा दिया होगा या उनके पति के नाम होगा। वर्ना वह भी उनको ना मिलता।यह कैसे खून के रिश्ते है जो अपनों को ही समाप्त करने पर तुले हैं। बेटी की शादी के बाद मुझे ऐसी जरूरत महसूस हुई कि मैं श्रीमती रीमा सिंह जी की साहसी जीवन यात्रा के विषय में लिखू।इस क्रम में मैंने रीमा सिंह जी को एक पत्र लिखकर वाट्स एप के माध्यम से भेजा जो निम्न है -
श्रीमती रीमा सिंह जी
सादर प्रणाम
आपने अपनी बिटिया की शादी का निमंत्रण मुझे देकर शादी में सहभागी बनाने की कृपा की, इसके लिए मेरी ओर से आपको बहुत बहुत धन्यवाद।
जिस समय बेटी की शादी का निमंत्रण प्राप्त हुआ।उसी समय में घर में बैठकर प्रयाग/इलाहाबाद मे चल रहें कुम्भ में सनातन धर्म की ओर से जो प्रस्ताव सनातन धर्म में सुधार के लिए धर्माचार्य ने किये है,उनको पढ़ रहा था।उन सुधारों में एक सुधार यह भी था कि शादी दिन में होनी चाहिए। हमारे समाज में शादी दिन में होती है, मैंने भी उनमे भागीदारी की है। परंतु शहर के अंदर अच्छे बारात घर में नही की जाती। परन्तु जब आपकी बेटी की शादी का निमंत्रण पढ़ा तो शादी दिन में थी।मन में बडी प्रसन्नता हुई,कि आप संगठन के रूप में गुर्जर समाज के जिस संगठन से जुड़ी हुई है वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिस्सा है तथा प्रयाग में जो सुधार धर्म संसद में पारित किए गए हैं, उनके पीछे संघ की बडी भूमिका है। कहने का अर्थ यह है कि जाने -अनजाने में जो दिन में शादी करने का निर्णय आपने लिया है। उससे आपके द्वारा धर्म संसद में पारित प्रस्ताव को बल मिला है।इस कार्य के लिए में आपका संगठन का मेरठ प्रांत का मुखिया होने के नाते बहुत बहुत आभार व्यक्त करता हूं।
रीमा जी आप एक बहादुर महिला है। अनेक कष्ट मन में छुपाकर आप हमेशा मुस्कुराते हुए ही मिली है। संसार में मनुष्य के लिए दो कष्ट सबसे बडे बतायें गये है।इन दो मे सबसे बड़ा कष्ट माता-पिता के सामने संतान की मृत्यु हो जाने का है। इसमें भी माता का कष्ट, पिता के कष्ट से अधिक होता है। क्योंकि माता अपनी संतान को नो महिनें गर्भ में रखती है? पति -पत्नी के बाद यदि कोई सबसे अधिक जुडाव का सम्बन्ध किसी का होता है तो वो माता का है।दूसरा बड़ा कष्ट यदि संसार में है ।तो वह जीवन साथी के बिछुड जाने का होता है। इसमें भी महिला को सबसे अधिक कष्ट होता है। क्योंकि मर्द तो पूरा दिन बाहर घूम कर अपना ध्यान बाट लेता है। लेकिन भारतीय समाज में महिला के लिए ऐसा सम्भव नहीं है। मैं खुद इस दूसरे दुःख से रुबरु हो चुका हूं।
जब मुझे सतेंद्र भडाना जी ने आपके विषय में बताया,तब में अपने जिस दुःख से परेशान था।उसको कम करने की प्रेरणा आप से मिली।बरबस ही एक कवि की दो लाईने याद आ गई। जिसमें लिखा है -
दुनिया मे कितना गम है, उसमें मेरा गम कितना कम है।
परंतु आप इन दोनों दुःख की भुक्तभोगी है।इस के बावजूद भी जिस निडरता से आप जीवन जी रही है। उसके लिए आपको बारम्बार साधुवाद है। ईश्वर से प्रार्थना है कि वो आपका मनोबल ऐसे ही बरकरार रखें। हमें अपने और अपनों के जीवन में आने वाली परेशानियों को दूर करने का हर संभव प्रयास करना चाहिए। सकारात्मक रहना चाहिए।
हम संसार का हिस्सा है या संसार में हमारा हिस्सा है ।इन दोनों विचार मे जीवन की धारा चलती है।जब हम इस विचार से जीवन जीते हैं कि हम संसार का हिस्सा है तब हम कभी भी अपने को अकेला महसूस नही करते। स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, सुभाष चन्द्र बोस,भगत सिंह जैसे लोग इसी विचार पर चलकर ऐसा कार्य कर गये कि मृत्यु हो जाने के बाद भी ऐसा लगता है कि वो हमारे बीच में ही है।
लेकिन जो संसार में अपना हिस्सा मानकर जीते हैं वो ताउम्र अपने सुख के लिए सम्भावना ही तलाशते रहते हैं तथा अपने रक्त सम्बन्धी के बिछड़ने पर अवसाद/डिप्रेशन में चले जाते हैं।
अच्छा बनना है या श्रेष्ठ/टाप बनना है ।इनमे श्रेष्ठ बनने के चक्कर में व्यक्ति न जाने क्या -क्या साजिश रचने लगता है? दुनिया में निंदा का पात्र बन जाता है। लेकिन यदि आदमी अपने जीवन में अच्छा/उत्तम बनने के लिए जीवन जीता है तो न जाने कितनी बार श्रेष्ठ बन जाता है तथा अपने से जुड़े लोगों को सुख पहुंचाने का कारण बनता है।
रीमा जी आप आयु में मुझसे छोटी है,उस नाते आपके प्रति मेरे हृदय में असीम आदर व सम्मान है।
तुलसी इस संसार में सबसे मिलिए भाय।
क्या मालूम किस भेष में नारायण मिल जाए?
यहां नारायण का अर्थ भगवान से है, अर्थात दुख दूर करने वाला ।
इन्हीं शब्दों के साथ आपके श्री चरणों में प्रणाम करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं और पुनः आपको अपने जीवन की बडी जिम्मेदारी (बेटी की शादी) को पूर्ण करने की बारम्बार शुभकामनाएं देता हूं।आने वाले समय में आप अपने कीमती समय में से कुछ समय आप उस संगठन के लिए भी देंगी, जिस संगठन में आपको हमारे द्वारा नामित किया गया है।ऐसा निवेदन आपसे करता हूं।
आपका सहयोगी/ शुभचिंतक/मित्र
अशोक चौधरी
मेरठ प्रांत संयोजक।
सभी एहले दुनिया ये कहते हैं हमसे,आता नही कोई मुल्क ए अदम से।
अर्थात जब जीव दुनिया छोड देता है तो वापस नही आता। वह अपने चाहने वालों की स्मृति में जरूर रहता है। इसलिए सनातन धर्म में वर्ष में 15 दिन श्राद्ध मनाने का चलन है, अपने प्रिय जन को स्मरण करने के लिए।
दूसरी ओर यह भी विद्वान कहते हैं कि मृतक की आत्मा हमारे आसपास ही घूमती है, अतः जब उससे प्यार करने वाला प्रसन्न रहता है तो वह आत्मा भी प्रसन्न होती हैं।जब दुखी होता है तो वह भी दुःखी होती है। जिस प्रकार यदि हमें अपने प्रियजन के बारे में पता चले कि वो कष्ट में है तो मन अपने आप ही दुःख मे डूब जाता है।
अतः हमें अपनों को स्मरण तो रखना चाहिए परन्तु दुख का प्रकटीकरण नही करना चाहिए।
अगर मर गया रूह आया करेगी,तुझे देखकर गीत गाया करेगी।
मुझे याद कर तुम ना आंसू बहाना,बस इतनी गुजारिश है सदा मुस्कुराना।
07-03-2025 को महिला दिवस की पूर्व संध्या पर मेरठ के आईएमए भवन में धन सिंह कोतवाल शोध संस्थान के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में रीमा सिंह को मेरठ की मुख्य विकास अधिकारी श्रीमती नूपुर गोयल आईएएस के द्वारा नारी शक्ति सम्मान से सम्मानित किया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के धर्म जागरण मंच के द्वारा संचालित गुर्जर परियोजना के अंतर्गत रीमा सिंह जी मेरठ प्रांत की सह संयोजिका के पद पर शोभायमान होकर समाज को शक्तिशाली बनाने में अपना सकारात्मक योगदान दे रही है। जीवन यात्रा अभी चल रही है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें