रविवार, 17 मई 2026

पदम श्री 2

1- पुरस्कारों के अतिरिक्त, उन सर्वोच्च सम्मानों, प्रमाणपत्रों (सर्टिफिकेशन्स), फैलोशिप, प्रतिष्ठित पदों, या मान्यता के अन्य रूपों की सूची दें जो नामांकित व्यक्ति को प्राप्त हुए हैं।
(क)  6 जुलाई सन् 2025 को फ्लेवर फेस्टा मेरठ मे आयोजित कार्यक्रम में "नेशनल काउंसिल ऑफ पीस एजुकेशन एंड रिसर्च" के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में डाक्ट्रेट अवार्ड से सम्मानित किया गया। 
(ख)"1857 के क्रांतिनायक शहीद धन सिंह कोतवाल शोध संस्थान मेरठ" द्वारा कोतवाल धन सिंह की जयंती 27 नवम्बर सन् 2025 को चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के नेता जी सुभाष चन्द्र बोस एडोटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रुप में हरियाणा सरकार के राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार श्री राजेश नागर जी के कर कमलों द्वारा सम्मान प्राप्त हुआ।  
(ग)"1857 के क्रांतिनायक शहीद धन सिंह कोतवाल शोध संस्थान मेरठ" द्वारा आयोजित क्रांति दिवस के अवसर पर मेरठ में आयोजित कार्यक्रम में 10 मई सन् 2025 को उत्तर प्रदेश के केबिनेट मंत्री श्री आशीष पटेल द्वारा शाल ओढ़ाकर व प्रतीक चिन्ह देकर सम्मान किया गया 
(घ) अखिल भारतीय साहित्य परिषद द्वारा 11 अप्रैल सन् 2026 को हस्तिनापुर के निकट जय विलास पैलेस हंसापुर में आयोजित कार्यक्रम में बिहार और उड़ीसा के पूर्व राज्यपाल श्री आरिफ मोहम्मद खान के कर कमलों द्वारा "हस्तिनापुर सम्मान" नामक प्रतिक चिन्ह देकर सम्मानित किया गया 
(ड)13-08-25 को अखिल भारतीय साहित्य परिषद जिला अमरोहा के द्वारा धनौरा मंडी के  वैकंट हाल में आयोजित कार्यक्रम में अमरोहा जिले के एसपी अमित कुमार आनंद और रामपुर रजा लाइब्रेरी के निदेशक डा पुष्कर सिंह मिश्रा के कर कमलों से सम्मानित प्रतीक चिन्ह प्राप्त हुआ।
2- नामांकित व्यक्ति के अपने क्षेत्र में किए गए कार्यों के प्रभाव का वर्णन करें, जो उनकी व्यक्तिगत उत्कृष्टता से परे हो।* (अधिकतम 400 शब्दों की अनुमति है)**

अशोक कुमार के द्वारा अपने क्षेत्र मेरठ जिले में कोतवाल धन सिंह जी के कार्यक्रम प्रारम्भ करने का सन् 1998 में यह प्रभाव पडा कि क्षेत्र के नवयुवकों में देश भक्ति का ज्वार उठने लगा।मेरठ में 10 मई सन् 1998 को पांचली खुर्द गांव में जो एक छोटा सा कार्यक्रम आयोजित किया गया,उसके अगले वर्ष 10 मई सन् 1999 को मेरठ शहर के अंदर तीन बड़े कार्यक्रम हुए तथा पूरा मेरठ क्रांतिमय हो गया। समाज आई इस चेतना के फलस्वरूप सन् 2002 में उत्तर प्रदेश सरकार के सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा मेरठ के कमिश्नर चौराहे के निकट कोतवाल धन सिंह जी की आदमकद प्रतिमा स्थापित हो गयी।
सन् 2010 में पांचली खुर्द गांव में "शहीद धन सिंह कोतवाल मंडलीय प्रशिक्षण केन्द्र होमगार्ड्स मेरठ" उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा स्थापित हो गया।
10 मई सन् 2010 को पांचली खुर्द गांव में एक शहीद स्मारक व कोतवाल धन सिंह जी की प्रतिमा स्थापित कर दी गई।
3 जुलाई सन् 2018 को मेरठ के थाना सदर बाजार में कोतवाल धन सिंह जी की प्रतिमा स्थापित हो गई।
12 जुलाई सन् 2018 को चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय में "शहीद कोतवाल धन सिंह गुर्जर समुदायिक केंद्र" स्थापित हो गया।
26-09-2021 को मेरठ से किला परिक्षत गढ़ रोड जेल चुंगी पर "अमर शहीद राजा कदम सिंह मार्ग" के नाम का पत्थर जो कई वर्ष पूर्व टूट गया था, प्रताप राव गुर्जर स्मृति समिति के अध्यक्ष अशोक कुमार/अशोक चौधरी ने पुनः स्थापित करवा दिया।
11 मार्च 2023 को "कोतवाल धन सिंह गुर्जर पुलिस प्रशिक्षण विद्यालय मेरठ" मेरठ में स्थापित हो गया।
15 मार्च 2024 को मेरठ के शहीद स्मारक पर कोतवाल धन सिंह जी की एक प्रतिमा स्थापित हो गई।
इस बीच पांचली खुर्द में बने इंटर कालेज का नाम "क्रांतिनायक धन सिंह कोतवाल इंटर कालेज पांचली खुर्द"कर दिया गया।
समाज हुए इस बदलाव का प्रभाव यह हुआ कि मेरठ ही नहीं मेरठ के आसपास ग्रामीण क्षेत्रों में भी देशभक्ति का ज्वार बहने लगा,जिस कारण मेरठ के आसपास कस्बे मवाना,पूठी,सरधना आदि में क्रांतिकारियों की स्मृति में कार्यक्रम आयोजित किए जाने लगे। मवाना किसान इंटर कालेज में एक भव्य कार्यक्रम के दौरान कोतवाल धन सिंह की प्रतिमा स्थापित की गई।इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने सहभागिता की।
गांव पूठी में कोतवाल धन सिंह की प्रतिमा स्थापित की गई, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री ने सहभागिता की।
गांव पूठी में अमर क्रांतिकारी राव कदम सिंह के नाम का द्वार गांव पंचायत ने बनवाया।
मेरठ के पास गगोल तीर्थ पर एक शहीद स्मारक का निर्माण हो गया। सम्पूर्ण मेरठ,मेरठ के क्रांतिकारी महापुरुषों के सम्मान से ओतप्रोत हो गया।
यहाँ दोनों प्रश्नों का हिंदी अनुवाद दिया गया है:

 3- बड़े पैमाने पर समाज में नामांकित व्यक्ति के कार्यों के प्रभाव का वर्णन करें, जिसमें उनके द्वारा की गई सभी प्रकार की निःस्वार्थ सेवा / सामाजिक कार्य शामिल हों। (अधिकतम 400 शब्दों की अनुमति है)**

चौधरी रघुवीर नारायण सिंह - मेरठ में रघुबीर नारायण सिंह नाम के एक स्वतंत्रता सेनानी हुए हैं,उनका गांव आज हापुड़ जिले में है।वो  महात्मा गांधी के आव्हान पर आजादी की लडाई में शामिल हो गए थे। अंग्रेजों की यातना सहन करने के साथ उन्होंने क्षेत्र के आम आदमी की जरूरत पूर्ति हेतु अपनी सम्पत्ति को  दान कर दिया ,मेरठ में सैकड़ों एकड़ में बना गांधी आश्रम उनके ही द्वारा दान की हुई जमीन पर बना है।मेरठ में गढ रोड पर कैलाश पुरी कालोनी में "कुमार आश्रम" के नाम से छात्रों के पढ़ने हेतु एक हास्टल का अपनी निजी जमीन देकर दलित छात्रों हेतु छात्रावास उन्होंने बनवाया।जो उस समय एक बडा कार्य था।
श्री कैलाश प्रकाश - कैलाश प्रकाश जी मेरठ के जाने-माने व्यक्ति रहें,वो मेरठ के पास किला परिक्षत गढ़ कस्बे के रहने वाले थे, उन्होंने महात्मा गांधी जी के साथ भारत की आजादी के आंदोलन में भाग लिया था।वो सन् 1952 में हुए पहले चुनाव में विधायक बने तथा 1977-79 तक लोकसभा के सदस्य रहें। उन्होंने मेरठ में मेडिकल कालेज,मेरठ में विश्वविद्यालय के निर्माण में अहम भूमिका निभाई,आज भी मेरठ में स्पोर्ट्स स्टेडियम का नाम उनके नाम पर है।मेरठ के आम जनमानस में उनका बडा सम्मान है।
चौधरी चरण सिंह - चौधरी चरणसिंह जी का पेतृक गांव भी उनके समय मेरठ जिले में ही था जो आज हापुड़ जिले में है। चौधरी चरणसिंह जी महात्मा गांधी जी के लिए आजादी के आंदोलन में रहें।  वो सन् 1937 मे हुए पहले विधानसभा चुनाव में छपरौली से विधायक रहें। उत्तर प्रदेश में जमींदारा समाप्त कर आम किसान को जमीन का मालिकाना हक दिलवाने में उनकी बडी भूमिका रही, मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने यह कानून बना दिया कि सरकारी पैसे का अनुदान किसी जाति के नाम पर बनी संस्था को नही मिलेगा, उनके इस आदेश के बाद ही उत्तर प्रदेश में जाट कालिज, गुर्जर कालिज आदि संस्थाओं के नाम जाति से बदल कर दूसरे रखे गये।
वो देश के प्रधानमंत्री रहे तथा भारत रत्न से सम्मानित भारत सरकार द्वारा किए गए।
मेरठ मे विश्वविद्यालय का नाम चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय है तथा जेल का नाम भी चौधरी चरणसिंह जेल है।
श्री रामचन्द्र विकल - रामचंद्र विकल जी मेरठ के पास स्थित बुलंदशहर जिले के निवासी थे,वो महात्मा गांधी जी के साथ भारत छोड़ो आंदोलन में गांधी जी के सहयोगी रहे। सन् 1952 में बुलंदशहर के अंतर्गत सिकंदरा बाद पश्चिम से विधायक रहें।
सन् 1962 में चीन के युद्ध के बाद जब उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों पर लगान बढाया,तब रामचंद्र विकल जी ने अपनी ही पार्टी का विरोध कर विधानसभा से स्तीफा दे दिया।वो किसान और गरीब हित के लिए संघर्षरत रहें, उत्तर प्रदेश सरकार मे 1967-69 तक उप मुख्यमंत्री रहें।1984-1990 तक सांसद रहें, उसके बाद राज्य सभा सदस्य रहें।


शनिवार, 16 मई 2026

पदम श्री

1. **Specify the profession / expertise of nominee? (maximum 50 word are allowed)**
**Hindi Translation:** नामांकित व्यक्ति के पेशे / विशेषज्ञता का उल्लेख करें? (अधिकतम 50 शब्दों की अनुमति है)
2. **Position(s) held by the nominee (with designations where possible)**
**Hindi Translation:** नामांकित व्यक्ति द्वारा धारित पद (जहां संभव हो पदनामों के साथ)
3. **Name of Organisation where the nominee has worked / is working**
**Hindi Translation:** उस संगठन का नाम जहां नामांकित व्यक्ति ने काम किया है / काम कर रहे हैं
4. **What is the overall geographical reach of nominee's work?**
**Hindi Translation:** नामांकित व्यक्ति के कार्य की समग्र भौगोलिक पहुंच (विस्तार) क्या है?
5. **Name and details of the geographical reach**
**Hindi Translation:** भौगोलिक पहुंच का नाम और विवरण
6. **Describe any achievements in which the nominee was the first, the only one or have done uniquely? (maximum 100 word are allowed)**
**Hindi Translation:** किसी ऐसी उपलब्धि का वर्णन करें जिसमें नामांकित व्यक्ति प्रथम थे, एकमात्र थे या उन्होंने कुछ विशिष्ट रूप से किया हो? (अधिकतम 100 शब्दों की अनुमति है)
7. **How have the accomplishments been adopted or expanded? (maximum 100 word are allowed)**
**Hindi Translation:** इन उपलब्धियों को किस प्रकार अपनाया या विस्तारित किया गया है? (अधिकतम 100 शब्दों की अनुमति है)
8. **Number of years, the nominee has worked in his / her field *(maximum 2 character are allowed)***
**Hindi Translation:** उन वर्षों की संख्या, जितने वर्ष नामांकित व्यक्ति ने अपने क्षेत्र में काम किया है *(अधिकतम 2 वर्णों (कैरेक्टर) की अनुमति है)*
9. **Describe the work done by the nominee *(maximum 800 word are allowed)***
**Hindi Translation:** नामांकित व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य का विस्तार से वर्णन करें *(अधिकतम 800 शब्दों की अनुमति है)*
10. **In which major way does the nominee's contributions stand out from others? *(maximum 100 word are allowed)***
**Hindi Translation:** नामांकित व्यक्ति का योगदान किस प्रमुख रूप से दूसरों से अलग (विशिष्ट) है? *(अधिकतम 100 शब्दों की अनुमति है)*

1-नामांकित व्यक्ति के पेशे / विशेषज्ञता का उल्लेख करें? (अधिकतम 50 शब्दों की अनुमति है)
कार्य कृषि और प्रोपर्टी डीलिंग है। समाज हित के कार्य करना तथा लेखन मेरा शौक रहा है।
 महापुरुषों के जीवन पर लिखना,कार्यक्रम कर उनका प्रचार करता रहा हूं।
समाज में जागरूकता पैदा करने के लिए भ्रमण करना  तथा समाचारपत्रो  में लेख व  पत्रिकाओं में  लेख लिखता रहा हूं।
2- नामांकित व्यक्ति द्वारा धारित पद (जहां संभव हो पदनामों के साथ)
समाजिक क्षेत्र में विभिन्न पदों पर कार्यरत रहा हूं 
(क) अध्यक्ष "प्रताप राव गुर्जर स्मृति समिति रजि मेरठ"- छत्रपति शिवाजी महाराज के सेनापति प्रताप राव गुर्जर की स्मृति में एक समिति "प्रताप राव गुर्जर स्मृति समिति रजि मेरठ" 
(ख) गुर्जर हिंदू - मुस्लिम संवाद संयोजक मेरठ प्रांत - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दृष्टि से मेरठ प्रांत जिसके अंतर्गत 14 सरकारी जिले है में " हमारे पुरखे न्यास" के अन्तर्गत  मेरठ प्रांत के संयोजक का दायित्व निभा रहा हूं।
(ग) अध्यक्ष "अखिल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सम्मान मंच" व महासचिव"अखिल भारतीय गुर्जर विकास मंच मेरठ"-  मंच के माध्यम से अनेक स्वतंत्रता सेनानीयों के बलिदान दिवस व जन्मदिवस पर कार्यक्रम आयोजित कर समाज मे जनजागरण करना।
(घ) अखिल भारतीय गुर्जर महासभा के प्रदेश महासचिव (सन् 2002-2014)का दायित्व रहा है।
3-उस संगठन का नाम जहां नामांकित व्यक्ति ने काम किया है / काम कर रहे हैं
(क) हमारे पुरखे न्यास संगठन के अन्तर्गत "मेरठ प्रांत संयोजक हिंदू - मुस्लिम गुर्जर संवाद के रुप में वर्तमान में कार्य कर रहा हूं।
(ख) "प्रताप राव गुर्जर स्मृति समिति रजि मेरठ " के अध्यक्ष पद पर(सन् 2002 से आज तक)वर्तमान में कार्यरत हूं।
(ग) अखिल भारतीय गुर्जर विकास मंच का महासचिव( सन् 1998-1999)व अखिल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सम्मान मंच का अध्यक्ष(सन् 1999-2002)।
(घ) राजनीतिक दल भाजपा के जिला मेरठ महानगर के महामंत्री के पद पर कार्य कर चुका हूं सन् 2013-2016 तक।
(ड) अखिल भारतीय गुर्जर महासभा के प्रदेश महासचिव (सन् 2002-2014)
4-नामांकित व्यक्ति के कार्य की समग्र भौगोलिक पहुंच (विस्तार) क्या है?
 वर्तमान उत्तराखंड प्रदेश का मैदानी भाग व उत्तर प्रदेश, दिल्ली में भौगोलिक दृष्टि से कार्य का विस्तार रहा है।
5- भौगोलिक पहुंच का नाम और विवरण-
उत्तराखंड के अंतर्गत रूडकी से सहारनपुर, मुज्जफर नगर,मेरठ बिजनौर रामपुर, मुरादाबाद व बरेली 
समस्त दिल्ली तथा हरियाणा में गुरू ग्राम, कुरूक्षेत्र आदि 
 6- किसी ऐसी उपलब्धि का वर्णन करें जिसमें नामांकित व्यक्ति प्रथम थे, एकमात्र थे या उन्होंने कुछ विशिष्ट रूप से किया हो? (अधिकतम 100 शब्दों की अनुमति है)-
मेरठ 1857 की क्रांति का उदगम स्थल है। लेकिन मेरठ से क्रांति का प्रारंभ करने वाले महापुरुष का नाम किसी को ज्ञात नही था,नाही मेरठ में उनका प्रचार था,मेरठ से हजारों किलोमीटर दूर कलकत्ता की बैरकपुर छावनी में रहें और वही बलिदान हुए मंगल पांडे को मेरठ से जोड कर आम जनमानस में देखा जाता था, मंगल पांडे जी को 8 अप्रैल सन् 1857 को बैरकपुर में फांसी हो गई थी,जबकि मेरठ में क्रांति का प्रारंभ 10 मई 1857 को हुआ था।
सन् 1997 को जब मुझे इस विषय में ज्ञात हुआ,तब मेने व्यक्तिगत प्रयास कर मेरठ देहात में चल रहे एक संगठन " जन सेवा पंचायत गगौल" के अध्यक्ष से वार्ता कर मेरठ से क्रांति के जनक कोतवाल धन सिंह के गांव पांचली खुर्द में 10 मई 1998 को एक कार्यक्रम का आयोजन किया तथा गांव में शहीद स्मारक बनाने के लिए पांच ईटे रखी, मेने मेरठ के "लाला के बाज़ार घंटाघर" में रह रहे भारद्वाज पेंटर से कोतवाल धन सिंह जी का एक काल्पनिक चित्र बनवा कर समाज को समर्पित किया, इससे पहले कोई चित्र कोतवाल धन सिंह जी का समाज में नही था।
7- इन उपलब्धियों को किस प्रकार अपनाया या विस्तारित किया गया है? (अधिकतम 100 शब्दों की अनुमति है)
 10 मई सन् 1998 को कोतवाल धन सिंह  का चित्र सबसे पहले जनता के सामने आया, उसके  विस्तार के लिए 27 फरवरी सन् 1999 को कोतवाल धन सिंह,विजय सिंह पथिक और सरदार पटेल के संयुक्त चित्र का एक पोस्टर तैयार किया गया तथा कार्यक्रम में आये  जन समूह में विमोचन कर  वितरित किया गया।
मेरठ के जिलाधिकारी के माध्यम से पांचली गांव मे शहीद स्मारक बनाने के लिए धन राशि दिलवा दी गई।
 अगले चार वर्षों तक कोतवाल धन सिंह व अन्य देश भक्तों के सांझे चित्रों का एक पोस्टर बनवाकर,उसे कलेंडर के रूप में परिवर्तित कर देश के 12 राज्यों में  में अखिल भारतीय गुर्जर महासभा के संगठन के माध्यम से वितरित किया गया। 09-05-2022 को प्रताप राव गुर्जर स्मृति समिति के अध्यक्ष के नाते एक ज्ञापन जिलाधिकारी मेरठ के माध्यम से उत्तर प्रदेश सरकार को दिया, जिसमें शहीद स्मारक पर कोतवाल धन सिंह जी की मूर्ति लगवाने की मांग रखी।तब मूर्ति 15 मार्च 2024 को शहीद स्मारक पर स्थापित हुई।

8- उन वर्षों की संख्या, जितने वर्ष नामांकित व्यक्ति ने अपने क्षेत्र में काम किया है *(अधिकतम 2 वर्णों (कैरेक्टर) की अनुमति है)*
1- प्रताप राव गुर्जर स्मृति समिति रजि के अध्यक्ष के रुप में सन् 2000 से लेकर आज तक करीब 26 वर्षों से कार्यरत 
2- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयं सेवक के रुप में स्वदेशी जागरण मंच, हमारे पुरखे न्यास के कार्यकर्ता के रुप करीब 40 वर्ष से कार्यरत 
9- नामांकित व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य का विस्तार से वर्णन करें *(अधिकतम 800 शब्दों की अनुमति है)*

मेरा नाम अशोक कुमार है, समस्त कागजों में।परंतु मेरे एक अत्यंत प्रिय साथी श्री कृष्ण गोपाल उर्फ चाचा,जो एक सामाजिक कार्यकर्ता भी थे ने समाज में स्थापित करने के लिए आपस में बोलचाल के लिए मेरा नाम सन् 1997-98 में अशोक चौधरी कर दिया था। अतः मेरे द्वारा किए गए सामाजिक कार्यों के समाचार की सूचना समाचार पत्रों में अशोक चौधरी के नाम से ही छपी हुई है।
 में सन् 1992 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक था,इस कारण समाज में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उभार हो इसके लिए सदा ही प्रयत्नशील रहा हूं। अतः जब मुझे यह ज्ञात हुआ कि मेरठ से 1857 की क्रांति का प्रारंभ मेरठ की तत्कालीन सदर कोतवाली के कोतवाल धन सिंह के द्वारा किया गया तथा इसके परिणामस्वरूप उनके गांव को अंग्रेजों ने तोप के हमले से समाप्त कर दिया था।तब से ही मैंने कोतवाल धन सिंह के द्वारा किए गए कार्य के प्रचार के लिए प्रयास प्रारम्भ कर दिए। मैंने 10 मई सन् 1998 को कोतवाल धन सिंह के गांव पांचली खुर्द में एक छोटे से कार्यक्रम का आयोजन अपने साथियों और गांव वासियों के सहयोग से किया।इस कार्यक्रम में कोतवाल धन सिंह का चित्र और शहीद स्मारक के लिए पांच ईटे रख दी गई।27 फरवरी सन् 1999 को शहीद धन सिंह कोतवाल के चित्र का पोस्टर सामान्य जन में वितरित किया। मुझे प्रारम्भ से ही लेखन का शोक रहा है। कोतवाल धन सिंह के प्रचार के लिए लगातार प्रत्येक वर्ष कार्यक्रम करने के साथ मेरे द्वारा लिखित तत्कालीन विषय पर मेरठ के दैनिक जागरण और अमर उजाला समाचार पत्र में सन् 2001-2002 तक 64 के करीब पत्र छपें। मैंने निम्नलिखित वीर और वीरांगनाओं पर लेखन किया तथा लिखित सामग्री को आम जनमानस में प्रचार हेतु वितरित किया-
1. भारतीय संस्कृति के रक्षक गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज
2. कत्र्तव्य पथ पर बलिदान वीर घोघा बापा और सोमनाथ मन्दिर 
3. वीरता और चातुर्य का प्रतिबिम्ब रानी नायकी देवी सौलंकी  
4. अन्तिम हिन्दू सम्राट गुर्जर राज-मरू गुर्जर राज पृथ्वीराज चैहान/  राय पिथोरा 
5. ईश्वर का प्रकोप और सेनापति जोगराज सिंह 
6. महादानी पन्ना
7. राणा प्रताप के अग्रगामी मारवाड़ का योद्धा राच चन्द्र सेन राठौड़ 
8. स्वराज की राह में शहीद मराठा सेनापति प्रताप राव गुर्जर 
9. अमर बलिदानी गोकुला 
10. कुर्बानी की राह का पथिक वीर राजाराम 
11. कुर्बानी की राह में एक और शाहदत राजा सूरजमल 
12. राव जेत सिंह नागर तथा किला परीक्षितगढ़ 
13. 1857 की क्रान्ति के अमर क्रान्तिकारी कोतवाल धन सिंह गुर्जर  
14. सन् 1857 के अमर क्रान्तिकारी एवं किला परीक्षितगढ़ केअन्तिम राजा राव कदम सिंह 
15. 1857 के महान क्रान्तिकारी अमर शहीद चैधरी तोता सिंह कसाना 
16. 1857 में सीकरी का बलिदान 
17. आऊआ का सन् 1857 की क्रान्ति में योगदान 
18. भारत में किसान आन्दोलन के जनक महान क्रान्तिकारी विजय सिंह पथिक (भूप सिंह)
19. 22 जनवरी भगवान राम जी की अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा पर विशेष 
20. भारत की न्याय व्यवस्था कल और आज 
21. भारत में कमजोर और दलित वर्गों के लिए संघर्ष 
22. आरक्षण क्या और क्यों? 
23. भारत का किसान और वर्तमान सरकार द्वारा लाये गये कृषि बिल और उनकी वास्तविकता  
24. भारत का किसान आन्दोलन और सरकार
25. आपात काल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका 
26. भारतीय समाज में व्याप्त भेदभाव को दूर करने के लिए आरक्षण,दवा है या बीमरी 
27. पारिवारिक परिवेश एवं बचपन
28. प्रतिनिधित्व/आरक्षण और भारत 
29. भारत की सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था में धर्म, जाति व वंश का योगदान (अंग्रेज शासक के रूप में सन् 1757-1947) 
30. भारत की सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था में धर्म, जाति व वंश का योगदान (प्रारम्भ से मुगल शासन के पतन तक) 
31. क्या जरूरी है घर वापसी?  
32. सनातन संस्कृति एवं भारत रक्षक शिव भक्त वराह उपासक 
33. भारत का कश्मीर
34. कैराना का (जिला शामली यूपी) बीता कल और आज
35. संसार में भारतीयों का सैनिक चरित्र
मेरे द्वारा संचालित सन् 2002 से प्रताप वार्षिकी पत्रिका में उपरोक्त लेख समय समय पर छपते रहे।
प्रत्येक वर्ष धन सिंह कोतवाल जी की स्मृति में हुए कार्यक्रमो का यह प्रभाव मेरठ मे पड़ा की कोतवाल धन सिंह जी की 10 प्रतिमाए मेरठ जनपद के विभिन्न स्थानों पर लग गई।
इन दस प्रतिमाओं मे से पांचली खुर्द में सन् शहीद स्मारक,सदर कोतवाली व शहीद स्मारक में लगी प्रतिमा मे मेरा प्रयास प्रथम श्रेणी का रहा है।तीन जून सन् 2018 में सदर कोतवाली में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन डीजीपी श्री ओपी सिंह जी के द्वारा प्रतिमा अनावरण के अवसर पर मेरठ पुलिस की ओर से जो पत्रिका छपी उसमे मेरा एक लेख भी छपा।
मेरे द्वारा "1857 की क्रांति के अमर क्रांतिकारी कोतवाल धन सिंह गुर्जर" नामक पुस्तक जिसका ISBN No: 978-81-910498-7-9 है , लिखी गई जो मेरठ विश्वविद्यालय तथा शाकुम्भरी विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश में मिडिया डिपार्टमेंट में कोतवाल धन सिंह जी को छात्रों को पढाने के लिए प्रयोग मे आ रही हैतथा दूसरी पुस्तक जसका नाम "हमारे पूर्वज और हमारे जीवन मूल्य" है,जिसका ISBN No : 978-81-910498-8-6 है ।
मेरे प्रयास से मेरठ मे किला परिक्षत गढ़ रोड के प्रारंभ में जेल चुंगी पर स्वतंत्रता सेनानी राव कदम सिंह मार्ग का शिलालेख भी लगवाया गया,जिस पर मेरा नाम अंकित है।
मेरे द्वारा "सन् 1857 के अमर क्रांतिकारी एवं किला परिक्षत गढ़ के अंतिम राजा राव कदम सिंह" लेख लिखकर जनता मे वितरित किया गया,उसका प्रभाव यह पडा कि आज राव कदम सिंह के नाम का एक गेट उनके गांव पूठी में गांववासियों ने लगा दिया तथा मेरठ मेट्रो के मेरठ साउथ स्टेशन पर कोतवाल धन सिंह और राव कदम सिंह के चित्र भारत सरकार द्वारा बनाए गए। 
मेरे द्वारा मुस्लिम गुर्जर मे सम्पर्क कर सैकड़ों बैठके की गई तथा हिंदू गुर्जर और मुस्लिम गुर्जर महिला और पुरुष को एक साथ बैठाकर परिवारिक मिलन,होली मिलन व रक्षाबंधन के नाम से पिछले दो वर्षो में बीस के करीब सम्मेलन किये जा चुके हैं। 
10-नामांकित व्यक्ति का योगदान किस प्रमुख रूप से दूसरों से अलग (विशिष्ट) है? *(अधिकतम 100 शब्दों की अनुमति है)*
अमर शहीद धन सिंह कोतवाल पर आयोजित प्रचार में कोतवाल धन सिंह का चित्र बनवान, पोस्टर बनवाना तथा कोतवाल धन सिंह जी के चित्र का कलेंडर बनवाना एवं कोतवाल धन सिंह जी व अन्य क्रान्तिकारियों पर पुस्तक लिखने का कार्य अन्य व्यक्तियों से अलग (विशिष्ट) रहा है।
आज के माहौल में हिंदू मुस्लिम के मध्य जो तनाव बढ रहा है,उसको कम करने के लिए हिंदू गुर्जर व मुस्लिम गुर्जर के गांव में व्यक्ति गत रूप से जाकर, दोनों समुदायों को परिवारिक मिलन,होली मिलन और रक्षा बंधन के पर्व मनाने के लिए आपसी सहमति बनाने मे मेरा योगदान अन्य से अलग रहा है।
उपरोक्त कार्य के लिए मुझे विभिन्न संस्थाओं द्वारा समय समय पर सम्मानित किया गया है।



शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

भारत की विरासत हमारे तीर्थ - डा अशोक कुमार चौधरी मेरठ

तीर्थ किसी भी समाज व धर्म के प्रेरणा स्थल होते हैं। भारतीय जनमानस मे तीर्थों का विशेष महत्व है। भारतीय समाज खासतौर से हिंदू समुदाय में तीर्थो की भरमार है।यू जो तीर्थ प्रत्येक धर्म में होते हैं। जैसे मुस्लिम समुदाय में मक्का मदीना येरूशलम, यहूदी धर्म में येरुशलम, ईसाई धर्म में येरूशलम और वेटिकन सिटी।
हिंदू धर्म में सोमनाथ, उज्जैन, अयोध्या,काशी, बद्रीनाथ, केदारनाथ आदि जहां बड़े प्रसिद्ध तीर्थ है वही क्षेत्रीय स्तर पर भी अनेको तीर्थ मौजूद है,जिनका समाज में विशेष महत्व है। में मेरठ में निवास करता हूं,मेरठ के आसपास गगौल तीर्थ,मेरठ का औघड़नाथ का मंदिर,पुरा महादेव मंदिर, ब्रजघाट गंगा, शुक्रताल जैसे तीर्थ प्रसिद्ध है, जहां प्रत्येक वर्ष लाखों श्रद्धालु जाते हैं।
मेरठ के गगौल तीर्थ के विषय में ऐसी मान्यता है कि यहा ऋषि विश्वामित्र ने तप किया था,यहा एक पानी का तालाब है,इसमे स्नान करने से चर्म से सम्बंधित रोग दूर हो जाते हैं।
वहीं औघड़नाथ का मंदिर बडा प्रसिद्ध है, यह शंकर भगवान का मंदिर है,शंकर भगवान युद्ध के देवता हैं,जिस समय अंग्रेजों के शासन में सूर्य अस्त नही होता था उस समय सन् 1857 में भारत के रणबांकुरों ने इसी औघड़नाथ के मंदिर से युद्ध के देवता शंकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त कर ब्रिटिश सत्ता को वो चुनौती पेश की थी,वैसी चुनौती अंग्रेजों को विश्व में कही से भी नही मिली।
मेरठ से बागपत रोड पर स्थित पुरा महादेव का मंदिर है।इस मंदिर पर सावन मास की शिव चोदस पर लाखों का संख्या में कांवड़िए शंकर भगवान पर हरिद्वार से गंगाजल लाकर जलाभिषेक करते हैं।इस मंदिर की स्थापना लंढौरा की रानी लाडकौर ने करवाई थी।
ऐसी मान्यता है कि जब समुद्र मंथन के बाद विष निकला था और उस विष को शंकर भगवान ने पी लिया था,कंठ मे रोक लेने के कारण वह विष शरीर में गले से नीचे तो नही जा सका, परंतु मस्तिष्क में गर्मी पैदा कर रहा था,तब देवताओं ने भगवान शंकर के शीष पर जिस दिन से लगातार जल डालना शुरू किया था,उस दिन को शिव रात्रि कहा गया।जो प्रतीक के रूप में प्रत्येक वर्ष जल अर्पण कर मनाई जाती है।
इसी प्रकार गंगा के किनारे ब्रजघाट का तीर्थ है।यह मुक्ति का स्थान बताया जाता है।
राजा सकट के पुत्रों सहित 60000 समर्थक जब इस स्थान पर समाप्त हो गये थे, उनकी आत्माओ के तर्पण के लिए राजा सकट के वंशज भगीरथ ने अपनी तपस्या के फलस्वरूप ब्रह्मा जी के कमंडल से गंगा जी को भूमि पर लाये थे।तब अपने पुरखों का तर्पण किया था।ये मुक्ति का तीर्थ गढ़ मुक्तेश्वर अर्थात ब्रज घाट कहलाता है।
 शुक्रताल ऐसा पवित्र स्थान है जहां शुकदेव गोस्वामी ने 5000 साल पहले अभिमन्यु के पुत्र महाराज परीक्षित को पवित्र श्रीमद-भागवतम (भागवत पुराण) की कथा सुनाई थी । यह उत्तर भारत का एक प्रसिद्ध पवित्र स्थान और मुज़फ्फरनगर से लगभग 28 किलोमीटर दूर पवित्र गंगा किनारे स्थित है । हर साल बहुत से तीर्थयात्री कार्तिक पूणिमा के दिन पवित्र नदी ‘गंगा’ में स्नान करने के लिए आते हैं।

शुक्रताल के अन्य दर्शनीय स्थान:
अक्षयवट (अनन्त वृक्ष): अक्षयवट एक पहाड़ी पर  स्थित है पुराणिक कथा के अनुसार इस अक्षयवट (बरगद का पेड़) के नीचे, ऋषि शुकदेव ने श्रीमद्भगवतीत कथा को राजा परीक्षित को सुनाया था। इस पेड़ की विशिष्टता यह है कि यह पेड़ कभी अपने पत्ते नहीं छोडता है ।

शुक्देव मंदिर: इस भव्य मंदिर में खूबसूरती से नक्काशी की गई ऋषि शुकदेव और राजा परीक्षित की मूर्तियां स्थापित है ।
 हनुमान मंदिर- शुकदेव मंदिर के नजदीक में ही हनुमान जी का एक विशाल मंदिर है । इस मंदिर के ऊपर हनुमान जी की 75 फुट ऊंची मूर्ती स्थापित है।

गणेश मंदिर- हनुमान जी के मंदिर के पास ही एक बेहद दर्शनीय गणेश मंदिर है जहाँ 35 फुट ऊँची भगवन गणेश जी की मूर्ती स्थापित है ।

इसके अतिरिक्त यहाँ भगवान शंकर मंदिर, स्वामी चरनदासजी मंदिर, भगवान राम मंदिर, देवी शाकंभरी मंदिर, नीलकंठ महादेव मंदिर, गंगा मंदिर स्थापित हैं।

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

नागरिक कर्तव्य बोध की संस्कारशाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा - लेखक डा अशोक कुमार चौधरी मेरठ

*नागरिक कर्तव्य बोध की संस्कारशाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा*
भारतीय लोकतंत्र केवल अधिकारों की संरचना नहीं है, वह कर्तव्यों की जीवंत परम्परा भी है। यदि अधिकार नागरिक को शक्ति प्रदान करते हैं, तो कर्तव्य उसे संस्कार देते हैं। अधिकार व्यक्ति को माँगना सिखाते हैं, जबकि कर्तव्य उसे देना सिखाते हैं। यही संतुलन भारतीय संविधान की आत्मा है। 
भारत का संविधान दुनिया का विलक्षण संविधान है।यह बहुमत और न्याय का संगम है।भारत के संविधान को संरक्षित और सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट पर है। बहुमत से बनने वाली सरकार पर नहीं है।भारत में सुप्रीम कोर्ट को इतनी शक्ति प्राप्त है कि वो बहुमत से बनाए किसी कानून को भी खारिज कर सकता है। सन् 2015 में भारत की संसद द्वारा कोलोजियम को समाप्त करने के लिए बने कानून को समाप्त कर देना इसका उदाहरण है।वही दूसरी ओर भारत की संसद को भी इतना अधिकार प्राप्त है कि यदि सुप्रीम कोर्ट कोई ऐसा फैसला दे दे, जिससे जनजीवन पर नकारात्मक प्रभाव पडता हो,तो संसद उस फैसले को भी पलट सकती है। जैसे संसद द्वारा सन् 2018 में एससी-एसटी एक्ट पर संसद ने न्यायपालिका द्वारा दिए फैसले पर रोक लगा दी है।
भारतीय संविधान की यह विशेषता, जहां सुप्रीम कोर्ट या संसद कोई भी निरंकुश होने की स्थिति में नहीं है। संविधान की इस अवस्था को दुनिया में अनूठा बनाती है।
संविधान के भाग–4(क) में वर्णित मूल कर्तव्य भारतीय नागरिक के चरित्र, आचरण और सामाजिक उत्तरदायित्व की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। इन्हीं कर्तव्यों को जीवन में उतारने की संस्कारपरक प्रक्रिया को यदि किसी संगठन ने सतत् और मौन साधना के रूप में आगे बढ़ाया है, तो वह है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ—एक ऐसी संस्कारशाला, जहाँ शाखा के माध्यम से नागरिक कर्तव्य बोध केवल पढ़ाया नहीं जाता, जिया जाता है।
भारतीय संविधान का प्रथम नागरिक कर्तव्य है—संविधान, उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान के प्रति आदर। संघ की शाखा में दिन का आरंभ ही ध्वज प्रणाम से होता है। केसरिया ध्वज केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और राष्ट्रनिष्ठा का साकार रूप है। यहाँ स्वयंसेवक संविधान की भावना को नारे नहीं, अनुशासन और शिष्टाचार के माध्यम से आत्मसात करता है। राष्ट्रगान और देशभक्ति, गीतों के माध्यम से राष्ट्र के प्रति सम्मान भाव बाल्यकाल से ही मन में अंकुरित हो जाता है।
1- 'देश हमे देता है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखे',
2- शत-शत नमन भरत भूमि को अभिनंदन भारत माँ को, 
3- चंदन है इस देश की माटी तपोभूमि हर ग्राम है,
4- देश की जय चेतना का गान वन्देमातरम, जैसे गीत प्रत्येक भारतीय की रग- रग में राष्ट्रभक्ति का संचार करते है।
दूसरा कर्तव्य है — स्वतंत्रता संग्राम की उच्च आदर्श परंपराओं का पालन और अनुसरण।
संघ की स्थापना ही भारत माँ को परतंत्रता की बेड़ियों से स्वतंत्र करने के लिए हुए थी।1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव राव बलिराम हेडगेवार जी ने हिंदुत्व की रक्षा व मा भारती को अंग्रेजों से स्वतंत्र करने के लिए संघ की स्थापना की ।
उसके पश्चात उनकी परंपरा को डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय व वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी ने संघ की परिपाटी को जारी रखा। संघ के बौद्धिक वर्गों में क्रांतिकारियों, संतों, समाजसुधारकों और राष्ट्रनायकों के जीवन प्रसंग केवल इतिहास नहीं, प्रेरणा बनकर प्रस्तुत होते हैं। यहाँ भगत सिंह का साहस, सुभाष का संगठन कौशल, गांधी का सत्याग्रह और विवेकानंद का आत्मविश्वास एक साझा विरासत के रूप में संस्कारित किया जाता है। स्वयंसेवक समझता है कि स्वतंत्रता केवल प्राप्त करने का विषय नहीं, उसे सतत् चरित्र और कर्म से सुरक्षित रखना भी उतना ही आवश्यक है।
संविधान का तीसरा कर्तव्य है—भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा। संघ का मूल मंत्र ही “राष्ट्र सर्वोपरि” है जिसे संघ की शाखा में कूट- कूट कर भरा जाता है।
देश की एकता व अखंडता पर सर्वस्व न्योछावर करने का सर्वोत्तम उदाहरण है कश्मीर को एक करने के लिए डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान जो हमे अपने देश की एकता, अखंडता व संप्रभुता पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने की प्रेरणा देता है। यह मूल मंत्र भाषा, प्रांत, जाति या पंथ से ऊपर उठकर भारत को एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में देखने का दृष्टिकोण शाखा में विकसित करता है। सीमावर्ती क्षेत्रों में सेवा कार्य, आपदाओं में राहत, और सामाजिक समरसता के प्रयास राष्ट्रीय एकता को केवल विचार नहीं, व्यवहार बनाते हैं। यहाँ राष्ट्र की रक्षा हथियार से पहले चरित्र और एकजुटता से होती है—यह बोध गहराई से बैठता है।
चौथा कर्तव्य है—देश की रक्षा और आह्वान पर राष्ट्रसेवा। संघ स्वयंसेवकों का जीवन स्वयंसेवा का पर्याय है। बाढ़, भूकंप, महामारी या किसी भी संकट में संघ कार्यकर्ता बिना नाम-यश की आकांक्षा के उपस्थित रहता है। यह तत्परता किसी आदेश से नहीं, संस्कार से जन्म लेती है। शाखा में खेल, दंड, योग और सामूहिक अभ्यास के माध्यम से शारीरिक-मानसिक तैयारी की जाती है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर नागरिक राष्ट्र के लिए सक्षम और सजग रहे।
संविधान नागरिकों से सामाजिक समरसता और भाईचारे की भावना विकसित करने का आह्वान करता है तथा स्त्रियों की गरिमा के प्रतिकूल प्रथाओं का त्याग करने को कहता है। संघ की संस्कारशाला में “सबका सम्मान” जीवनमूल्य है। जाति-भेद, ऊँच-नीच या अस्पृश्यता के लिए यहाँ कोई स्थान नहीं। सहभोज, सामूहिक खेल और सेवा कार्य सामाजिक दूरी को स्वतः मिटाते हैं। मातृशक्ति के सम्मान का भाव संघ में “नारी तू नारायणी” की भावना से पोषित होता है—जहाँ नारी पूजनीय, सक्षम और समाजनिर्माण की सहभागी है।
पाँचवाँ महत्वपूर्ण कर्तव्य है—भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण। संघ भारतीय संस्कृति को संग्रहालय की वस्तु नहीं, जीवंत परंपरा मानता है। पर्व, लोकसंस्कृति, योग, संस्कृत के श्लोक, लोकगीत और जीवनमूल्य—सब मिलकर सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करते हैं। यहाँ आधुनिकता और परंपरा में संघर्ष नहीं, संवाद होता है। स्वयंसेवक सीखता है कि जड़ों से जुड़कर ही आकाश की ऊँचाइयों को छुआ जा सकता है।
प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और प्राणिमात्र के प्रति करुणा भी संविधान का कर्तव्य है। संघ के सेवा आयामों में वृक्षारोपण, जल-संरक्षण, स्वच्छता अभियान और ग्राम विकास के प्रयास निरंतर चलते हैं। प्रकृति को “उपभोग की वस्तु” नहीं, “माता” के रूप में देखने का दृष्टिकोण पर्यावरणीय संतुलन की चेतना जगाता है। स्वयंसेवक समझता है कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति उत्तरदायित्व भी राष्ट्रभक्ति का ही अंग है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और ज्ञानार्जन की भावना विकसित करना भी नागरिक कर्तव्य है। संघ की बौद्धिक परंपरा प्रश्न करने, तर्क करने और समाधान खोजने को प्रोत्साहित करती है। यहाँ आस्था और विवेक का संतुलन सिखाया जाता है। अंधविश्वास के स्थान पर अनुभव, अध्ययन और प्रयोग को महत्व दिया जाता है, ताकि समाज प्रगति के पथ पर आत्मविश्वास के साथ अग्रसर हो।
सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा और हिंसा से दूर रहना संविधान का स्पष्ट निर्देश है। शाखा का अनुशासन नागरिक शिष्टाचार का अभ्यास है—पंक्ति में चलना, समयपालन, सामूहिक उत्तरदायित्व और नियमों का पालन। यह सब सार्वजनिक जीवन में अनुशासित और शांतिपूर्ण आचरण की नींव रखते हैं। स्वयंसेवक सीखता है कि विरोध भी मर्यादा में हो और परिवर्तन भी रचनात्मक हो।
अंततः संविधान नागरिक से यह अपेक्षा करता है कि वह व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों में उत्कृष्टता के लिए प्रयत्न करे। संघ का आदर्श स्वयंसेवक “मैं” से “हम” और “हम” से “राष्ट्र” की यात्रा करता है। यहाँ उत्कृष्टता पद या पुरस्कार से नहीं, दायित्व और समर्पण से मापी जाती है। छोटा सा कार्य भी यदि श्रेष्ठ भाव से किया जाए, तो वह राष्ट्रनिर्माण की ईंट बन जाता है।
इस प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा केवल व्यायामशाला नहीं, नागरिक कर्तव्य बोध की संस्कारशाला है—जहाँ संविधान के अक्षर जीवन के संस्कार बनते हैं। यहाँ नागरिक अपने अधिकारों से पहले अपने कर्तव्यों को पहचानता है और समझता है कि सशक्त भारत का निर्माण संसद की दीवारों से अधिक, नागरिक के चरित्र से होता है। जब कर्तव्य चेतना जन-जन में जाग्रत होती है, तब लोकतंत्र केवल व्यवस्था नहीं, संस्कृति बन जाता है—और यही भारत की सनातन शक्ति है।

रविवार, 16 नवंबर 2025

ashok

https://youtu.be/YfAYN_dYH_8?si=-zpnvKedWsk4uWq-
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https://www.youtube.com/live/hLxdPhLThZo?si=smBv04TF3t5YZjY1
https://youtu.be/OW85yvwxATw?si=ul7Ps60fZCtle0FG




शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

डा अशोक कुमार चौधरी एक जीवन यात्रा

मेरा जन्म एक किसान परिवार में 23 सितंबर सन् 1965 को हुआ, लेकिन सरकारी कागजों में मेरी जन्म तिथि 31 मार्च सन् 1964 है। मेरे पिता श्री श्री समय सिंह जी जिला मुज्जफर नगर के खतौली ब्लॉग के भटौडा गांव के निवासी थे,मेरे दादा जी का नाम श्री जिले सिंह था।मेरे बाबाजी ने हमें बताया था कि हम आज के उत्तराखण्ड में गुरूकुल -नारसन रोड पर स्थित टिकोला गांव के गुर्जर समाज के पताह गोत्र के है जो किसी कारण वश आज अपने गांव भटौडा मे आ गये थे।मेरी दादी जी हमारे वर्तमान गांव के पास स्थित दाहखेडी गांव की सरोहा गोत्र की थी।मेरी माता जी गढ़ रोड पर स्थित हसनपुर कलां गांव की खटाना गोत्र की थी,मेरी नानी जी किठौर के पास स्थित भडौली गांव की कसाना गोत्र की थी।मेरी धर्मपत्नी मेरठ हरिद्वार रोड पर स्थित दादरी गांव की मोतला गोत्र की थी।मेरी बहन कृष्णा की शादी बागपत रोड पर स्थित नगला जमालपुर गांव में बैसला गोत्र मे हुई तथा भाई महेश की पत्नी बीना मेरठ गढ़ रोड पर स्थित हिरनपुरा गांव की तंवर गोत्र की है।


मेरे पिताजी श्री समय सिंह पुत्र स्व श्री जिले सिंह एक सीधे- साधे ईश्वर मे विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे।उनका जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के खतोली ब्लाक के भटौडा नाम के गांव में 11-05- 1942 में हुआ था।वो एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते थे।हमारी माता स्व श्रीमती श्याम कली देवी जो जिला मेरठ की मवाना तहसील के माछरा ब्लाक के अन्तर्गत गढ़ रोड पर स्थित हसनपुर कलां गांव के स्व श्री रामचन्द्र जी की पुत्री थी।हम अपनी माता-पिता के तीन संतान है।
मेरी बडी बहन कृष्णा, में (अशोक चौधरी/कुमार) और मेरा छोटा भाई महेश कुमार।
हमारे मामा जी का परिवार पढा लिखा परिवार था,हमारे मामा जी श्री निर्भय सिंह व श्री सिब्बू सिंह सरकारी अधिकारी थे तथा शहर में निवास करते थे।ऊनकी जीवन शैली से प्रभावित होकर हमारी माता जी के अथक प्रयास तथा नाना व नानी जी के अथक सहयोग से हम भी सन् 1977 में मेरठ की नेहरू नगर कालोनी की गली नंबर एक मे अपना मकान बनाकर रहने लगे थे तथा शहरी नागरिक बन गये थे।
ग्रामीण से शहरी नागरिक बनने का सफर काफी दिलचस्प व संघर्ष भरा था। मेरे नाना जी का परिवार यूं तो एक किसान परिवार था, परंतु वह किसानों में अगडे थे।मेरे नाना जी के मकान का दरवाजा लखोरी ईंटों का बना हुआ था,जिसे देखकर यह प्रभाव पडता था कि यह पुराना सम्पन्न परिवार है।
मेरै नाना जी के यहां सन् 1972-73 के आसपास घर पर शौचालय बना हुआ था,जो उस समय एक किसान के यहां होना, परिवार की अग्रणिय स्थिति की ओर संकेत करता था।मेरी नानी जी जिनका नाम प्रहलादो देवी था,माछरा ब्लाक के भडोली गांव के निवासी श्री बहादर सिंह कसाना की पुत्री थी।जैसा मेरी नानी जी बताती थी कि उनके पिताजी पशुओं (गाय,भैस) की बीमारी दूर करने की देशी दवाई के जानकार थे।उनके द्वारा ही मेरी नानी जी को भी यह तकनीक ज्ञात थी।मेनै स्वयं देखा कि मेरी नानीजी गम्भीर बीमारी से ग्रस्त पशुओं को कान व पूंछ की नस बींधकर तथा देशी दवाई की दो तीन खुराक मे ही ठीक कर देती थी,इस कारण नानीजी का आसपास के कई गांवों में बड़ा आदर था।नानी जी कोई डिग्री प्राप्त डाक्टर नही थी, परंतु उनकी दवाई डिग्री प्राप्त डाक्टरों पर भारी पडती थी।इस कारण नानीजी उस पुराने समय में एक आर्थिक रुप से सशक्त महिला थी।
यही कारण रहा कि मेरे नानाजी एक माध्यम दर्जे के किसान होने के बावजूद भी अपने आसपास के बड़े किसानों से बहतर थे। हमारे मेरठ में स्थापित होने मे हमारी नानी जी का बहुत बड़ा योगदान था। हमारे पिताजी और दादाजी शहर में रहने के पक्षधर नही थे,वो गांव में ही अपनी खेती किसानी बढाना चाहते थे। परंतु हमारी माताजी शहरी जीवन की पक्षधर थी।इस स्थिति में शहर में सम्पत्ति खरीदने में मेरे पिताजी की कोई रुचि नहीं थी। सन् 1972 में मेरी माता जी ने अपने बल पर मेरठ में 200 वर्ग गज का एक प्लाट गढ़ रोड पर स्थित नेहरू नगर कालोनी में खरीद लिया,जिसके लिए सब धन की व्यवस्था मेरी माता जी ने की थी।मेरी माता जी का कोई व्यवसाय नही था। अतः किसी ना किसी रुप में यह धन मेरे नाना जी व नानी जी की कृपा से प्राप्त था। सन् 1974 में इस प्लाट की नींव भरी गई। उसमें आधा सहयोग हमारे पिताजी ने दिया था, सन् 1976 में इस प्लाट पर बिल्डिंग बनी, जिसमें 20% रुपये पिताजी की ओर से 80% रुपयों का सहयोग मेरी माता जी का रहा था। सन् 1978 में मकान की फिनिशिंग हुई, इसमें पूरा खर्च मेरे पिताजी ने दिया था,इस प्रकार हम शहरी नागरिक बन मेरठ में रहने लगे थे।
मेंने सातवीं कक्षा में रामसहाय इंटर कालेज में एडमिशन ले लिया था,मेरी बडी बहन कृष्णा हाई स्कूल का प्राइवेट फार्म फर दिया था,छोटा भाई महेश प्रथम कक्षा मे पढने लगा था। मैंने सन् 1980 में राम सहाय इंटर कालेज से हाई स्कूल पास कर लिया था, ग्यारहवीं कक्षा बीएबी इंटर कालेज से पास की तथा सन् 1982 में डीएन इंटर कॉलेज मे बारहवीं कक्षा में एडमिशन ले लिया था।
सन् 1983 में मेरी बडी बहन कृष्णा की शादी बागपत रोड पर स्थित नगला जमालपुर गांव में रहने वाले श्री मनबीर सिंह जी से सम्पन्न हो गई।श्री मनबीर सिंह जी आज एडवोकेट है।
बहन कृष्णा के एक पुत्री शालिनी व एक पुत्र विशाल तथा अब विशाल के एक बेटा है।
 
लेकिन कुछ परिवारिक समस्या के कारण मेरी बारहवीं कक्षा की से पढाई छूट गई। मुझे पिताजी के सहयोग के लिए गांव में कृषि कार्य करने के लिए जाना पड़ा। 5 जुलाई सन् 1987 को मेरी शादी मेरठ से हरिद्वार रोड पर स्थित दादरी गांव के जुनियर हाई स्कूल के अध्यापक श्री जबर सिंह की पुत्री ऊषा देवी से हो गई थी।श्री जबर सिंह सन् 1986 में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित हुए थे।
मेरे दादाजी भी स्वर्गवासी हो गये थे,अब हमारा पूरा परिवार एक साथ मेरठ ही रहने लगा था।
इंसान कितना भी पढ लिख ले, परंतु समाज के नियम उसे प्रभावित अवश्य करते हैं।मेरे मामाजी भी समाज की प्रथा से प्रभावित हो गये थे। क्योंकि वह उनको लाभ पहुंचाने वाली थी। भारतीय समाज में उस समय बेटी को पराया धन समझा जाता था। माता-पिता अपनी बेटी की शादी करना ही अपनी जिम्मेदारी समझते थे। परंतु जमाना बदल रहा था।मेरे नाना जी व नानी जी इस बदलाव से प्रभावित होकर बेटी को पराया धन ना मानकर बराबर का अधिकार दे रहे थे। परन्तु इस बदलाव को मेरे मामाजी स्वीकार नही कर रहे थे। अतः परिवार में तनाव बन गया था। जिसमें मेरे नाना जी व नानी जी तथा माता जी एक ओर थे तथा मेरे दोनों मामा जी एक ओर।आपसी मनमुटाव इतना बढ़ा कि हमारी शादियों में भात की रस्म मे भी परेशानियां बनी। परंतु समय के मरहम ने सब ठीक कर दिया था।हम तीनों भाई बहन तथा हमारे मामा जी के बीच रिश्ते सहज ही थे।
जब सन् 1977 में हम गांव से मेरठ में आ गये।तब मेरे पिताजी को गांव में ही रहकर खेती करानी पडी, क्योंकि मेरे दादाजी शहर में रहने के पक्षधर नही थे। उन्होंने मेरठ में रहने के लिए साफ मना कर दिया था।इस कारण मेरे पिताजी को सात-आठ वर्ष तक गांव में ही दादाजी के पास रुकना पडा।मेरी छोटी बुआ जी श्रीमती शिमला देवी का इस समयावधि में बहुत सहयोग रहा।बुआ जी वर्ष में करीब छः महीने पिताजी और दादाजी के पास गांव में रह जाती थी।कभी कभी कोई आपदा भी रास्ता आसान कर देती है।मेरा गांव मेन रोड से बहुत अंदर था, वहां बाजार से कुछ भी लेने की कोई व्यवस्था नहीं थी।नमक या माचिस जैसी चीजें लेने के लिए भी गांव से सात किलोमीटर दूर मंसूरपुर या तीन किलोमीटर दूर सिखेड़ा आना पडता था।ऐसी परिस्थिति में पिताजी और बाबाजी के खाना बनाने की व्यवस्था कैसे बनें।यह एक गंभीर प्रश्न था। कुटुम्ब के लोग सहयोगी थे परंतु लगातार सहयोग बने रहना सम्भव नहीं था।मेरी छोटी बुआ जी कुछ क्रोधी स्वभाव की थी।उनकी जहां शादी हुई (वर्तमान में उत्तराखंड में रूड़की के पास देवपुर गांव) वहां उनकी सासूजी भी क्रोधी स्वभाव की थी।मेरी बुआ जी के दो संतान एक बेटा व एक बेटी पैदा हो गई थी। लेकिन तभी मेरे फूफाजी का देहांत हो गया था। परिस्थिति ऐसी बनी कि मेरी बुआ जी और उनकी सासूजी के मध्य जो टकराव हो जाता था तो कोई शांत करने वाला नही था। बुआ जी के ससुर फूफाजी की मृत्यु के कुछ माह बाद ही स्वर्ग वासी हो गये थे।इन परिस्थितियों में मेरी बुआ जी वर्ष भर करीब आठ महिने पिताजी के पास गांव अपने बच्चों सहित आ जाती थी,वो छ महीने रहती फिर दो महिने को अपनी ससुराल चली जाती थी। वहां मुश्किल से दो महिने रह पाती थी फिर पिताजी के पास आ जाती थी। क्योंकि गांव में मेरी माताजी भी नही थी, इसलिए वहां उनका किसी से कोई टकराव नही होता था।इस प्रकार मेरे दादा जी की मृत्यु तक यही क्रम बना रहा।मेरी बुआ जी के बच्चे भी बडे हो गये थे,उनकी सासूजी की भी मृत्यु हो गई थी।समय की शक्ति ने सब सामान्य कर दिया था तथा दोनों परिवारों की समस्या का समाधान भी कर दिया था।
मे सन् 1992 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में जाने लगा था,जो भरत शाखा के नाम से सूरजकुंड के पार्क में लगती थी,वही से मे राजनीतिक दल भाजपा से जुड गया था तथा सन् 1994 में भाजपा युवा मोर्चा के वार्ड नंबर 27 का अध्यक्ष बन गया था।
सन् 1997-98 में में भाजपा किसान मोर्चा मेरठ महानगर का अध्यक्ष बन गया था। 
 16-10-1998 को उत्तर प्रदेश सरकार मे पिछड़ा वित्त एवं विकास निगम में जिला मेरठ में सदस्य नामित हुआ।
सन् 2003-4 में में राम मंदिर आंदोलन में तीन दिन तक विश्व हिन्दू परिषद के नेतृत्व में चल रहे राम मंदिर आंदोलन में मेरठ कारागार में रहा।
सन् 2003 में में मेरठ जिला मे भाजपा जिला मिडिया प्रभारी के पद पर रहा। सन् 2009 में मे मेरठ दक्षिण विधानसभा का भाजपा विधान सभा का प्रभारी बना। सन् 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा की ओर से मेरठ दक्षिण विधानसभा का सह चुनाव संयोजक तथा 2014 के लोकसभा चुनाव में मेरठ दक्षिण विधानसभा का संयोजक तथा सन् 2012 के विधानसभा चुनाव व 2017 के विधानसभा चुनाव में मेरठ दक्षिण विधानसभा के भाजपा प्रत्याशी का सह संयोजिक रहा। सन् 2013-2016 तक भाजपा जिला मेरठ महानगर का महामंत्री रहा।
सन् 1998 से ही में सामाजिक कार्य के नाते अखिल भारतीय गुर्जर विकास मंच मे महासचिव, अखिल भारतीय गुर्जर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मंच मे अध्यक्ष तथा प्रताप राव गुर्जर स्मृति समिति रजि मेरठ के अध्यक्ष पद पर विराजमान रह कर अपने लेखन व महापुरुषों के जन्म दिवस व बलिदान दिवस पर कार्यक्रम का आयोजन कर समाज के प्रति अपना कर्तव्य निभाता रहा हूं।

इसी भागदौड़ में 6 जुलाई सन् 2025 को डाक्टर की मानद उपाधि से विभूषित कर दिया गया।
जीवन चलता रहा।मेरी माता जी वृद्ध हो चली थी।उनका पैर फिसल गया तथा कूल्हा टूट गया।वो बैड पर आ गई। पिताजी ने इस समय माता जी को भरपूर सहारा दिया।वे माता जी के साथ एक परछाईं की तरह रहें।माता जी के नीजि देनिक कार्य में पिताजी ने भरपूर सहायता की।
5 दिसम्बर 2021(रविवार का दिन मार्गशीर्ष मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि ) प्रात: 9 बजे माता जी इस नश्वर संसार को छोड़कर चली गई।
मेरे पिताजी,माता जी की मृत्यु के बाद कुछ समय के लिए असहज से रहें। परंतु हमने पिताजी को अकेला नही छोडा। में और मेरा छोटा भाई महेश, कोई ना कोई उनके पास ही सोता था। लेकिन 12-02-24 की दिन शाम को दूध पीते समय पिताजी के गले में फंदा लग गया।उनको हास्पिटल में भर्ती करना पडा।वो वेंटिलेटर पर आ गए तथा 20 फरवरी 2024 को (माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि ) को अस्पताल में मृत्यु हो गई।वो इस नश्वर संसार को छोड़कर चले गए।
एक सीधे साधे सरल जीवन का अंत हो गया।
व्यक्ति अकेला जन्म लेता है और जब संसार से विदा होता है तब अकेला ही चला जाता है। संसार में आने और जाने के बीच के समय को ही जीवन कहा गया है।इसी बीच व्यक्ति संसार में रहने वाले अन्य जीवों और वस्तुओं से भी सम्बन्ध बनाता है।जो निर्जिव व संजीव दोनों तरह से होते हैं। अपने देश, अपना गांव इसमें प्रमुख हैं। संसार में सजीव/जींदा लोगों मे बना सम्बन्ध जिनमें भाई-बहन,माता पिता,यार दोस्त तथा पति-पत्नि का है।
मेरा भी विवाह-संस्कार के माध्यम से पत्नी के रुप में मेरठ- हरिद्वार रोड पर स्थित दादरी गांव के निवासी राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त अध्यापक श्री झब्बर सिंह की पुत्री ऊषा रानी ( जन्म 05-11-1970, मृत्यु 14-03-2024) सेे 5 जुलाई सन् 1987 को सम्बन्ध बना।ऊषा देवी के तीन छोटे भाई जोगेंद्र सिंह, राजेंद्र सिंह व प्रमेंद्र सिह थे।मास्टर झबर सिंह तीन भाई थे,जिनमे मास्टर झबर सिंह व उनके बडे भाई जयपाल सिंह एक साथ रहते थे।हमारी सासू मा दो सगी बहनें इन दोनो सगे भाईयों की धर्मपत्नी थी, जयपाल सिंह निसंतान थे समय व्यतीत होता रहा, मुझको दो पुत्री पायल व कोमल के रुप में प्राप्त हुई।
मेरी पत्नी ऊषा मृदु भाषी और प्रसन्न दिखने वाली महिला थी।मेरी माता जी सख्त स्वभाव की थी।मेरी बडी बेटी पायल घर पर ही पैदा हुई थी।उसके जन्म लेते समय एक स्थिति ऐसी बनी कि अस्पताल ले जाने की जरूरत आन पडी थी। परंतु डीलिवरी घर पर ही हो गई।मेरी बडी बहन कृष्णा मेरी बडी बेटी के पैदा होने पर ऊषा के साथ रही।
जब दूसरी बेटी के जन्म का समय आया तो मैंने माता जी से कह दिया कि अब घर पर नही, अस्पताल में डिलिवरी होगी।मेरी माता जी इस बात से नाराज़ हो गई।जब मे ऊषा को लेकर सुशीला जसवंत राय अस्पताल ले जाने लगा तो माता जी ने मेरे साथ जाने के लिए मना कर दिया।मे अपनी दूर के रिश्ते की मौसी जो गढ़ रोड पर स्थित किठोर के पास सादुल्लापुर गांव की निवासी थी तथा जिनका नाम धनकौर था ,को ले गया।जब मेरी छोटी बेटी कोमल पैदा हो गई तब ऊषा की माता जी को लेकर आया। अस्पताल में ऊषा की माता जी साथ रही। 
समय गुजरता रहा मेरी बडी पुत्री पायल की सन् 2011 में शादी हो गई। 

सन् 2016 में दूसरी बेटी कोमल की शादी हो गई थी।इस बीच ऊषा को शूगर की बीमारी हो गई थी।पायल के एक पुत्री अराध्या जो पांचवी कक्षा में तथा कोमल के एक पुत्री प्रणवी जो तीसरी कक्षा में आज के समय में पढती है।

 महेश के बेटे लोकेंद्र की शादी हो चुकी है उसके एक बेटा है,एक बेटी शिवांगी है जो चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर रही है।
बहन कृष्णा के एक पुत्र विशाल तथा विशाल के एक बेटा है,एक पुत्री शालिनी जो लंदन में रहती हैं।
31-01-2018 की रात्रि को ऊषा की तबियत खराब हो गयी,बेगमबाग मेरठ में डा अनिल मेहता को दिखाया गया तो पता चला कि निमोनिया हो गया है,ऊषा की जान खतरे में है।मेरे पड़ोस में रहने वाले सतीश वर्मा की पुत्री दिल्ली एम्स अस्पताल में कार्यरत थी, उसके माध्यम से 02-02-2018 को ऊषा को दिल्ली ले गए।जब सुबह में ऊषा को गाड़ी से दिल्ली लेकर चला।तब मेरी माताजी नीचे खडी रो रही थी। उनके मन में यह डर समा गया था कि ऊषा जिंदा वापस आये या ना आये।मेरी माताजी सख्त स्वभाव की महिला थी। परंतु अपनो से प्यार कोन नही करता?
मेरे साथ मेरे छोटे भाई की पत्नी बीना व मेरी बडी बेटी पायल के ससुर रिठानी निवासी डा ज्ञानचंद बैसला थे।ऊषा दिल्ली से ठीक होकर आ गई।
मार्च 2020 में ऊषा फिर बीमार हो गयी। उसके पैर सूजने लगे।16-03-2020 को ऊषा को डा प्रवीण पुंडीर को दिखाया।तब वह ठीक हुई।लेकिन निमोनिया ने ऊषा का जीवन कठिन बना दिया।

जब ठंड का मौसम आता और जाता था,वह कुछ दिन परेशान रहती थी।वह सामान्य आदमी की तरह सीधा लेट नही पाती थी।एक तरफ करवट लेकर तथा सर की ओर से कुछ ऊंचा होने पर ही लेट पाती थी।जीवन चलता रहा।कुछ समय बाद 10-08-2022 को ऊषा को पेरेलाईसिस/फालिस का एक हल्का आघात हुआ।
डाक्टर ने ऊषा को ताजी हवा में घूमने की सुबह के समय सलाह दी। पेरालिसिस होने की वजह से वह अकेले घूमने जाने मे सक्षम नही थी।मे चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के प्रांगण में ऊषा को शाम को घूमाने ले जाने लगा।जिस दिन मुझे काम लग जाता,उस दिन घूमना छूट जाता था।वह अपने आप घूमने लगे,इसकी व्यवस्था के लिए मेने मेरठ बाईपास पर स्थित सुशांत सिटी सेक्टर तीन के अंदर इरीश गार्डन में डी-02-04 नम्बर का एक फ्लैट खरीद लिया। मार्च 2023 से हम इस फ्लेट में रहने लगे।मेरे पिताजी भी साथ में थे।अब ऊषा और मेरे पिताजी आराम से अपने आप फ्लेट के प्रांगण में घूम लेते थे।बाहर का कोई वाहन नही आता था,गेट पर चौकीदार रहता था। अच्छी व्यवस्था थी।शूगर, निमोनिया तथा पेरालिसिस की दवाई ऊषा खाती थी, उसके पास जीवन कम ही बचा था।यह में जानता था। परंतु मेने कभी ऊषा का साहस नही गिरने दिया।मेने उसे भरोसा दिलाया कि वह ठीक है।खूब जीयेगी।एक दिन ऊषा कहने लगी कि यदि उसे कुछ हो गया तो मे कैसे करूंगा? क्योंकि मैं घर के काम में रूचि नही लेता था।कपडे धोना आदि से में हमेशा दूर रहा। लेकिन मेने चाय बनाना सीख लिया था।मे सुबह उठकर पिताजी,ऊषा व खुद को चाय पिलाकर घूमने जाता था।इतना कमजोर होने पर भी ऊषा को मेरी चिंता थी,अपनी नही।मैने मन ही मन सोचा शायद भारत में नारी को देवी इसलिए ही कहा गया है।जिसे अपनी सेहत के बारे में सोचना चाहिए था,वह इस हालत में मेरे बारे में सोच रही थी।जीवन मृत्यु तो ईश्वर के हाथ है,वह कब किसे अपने पास बुला ले,वह उसकी मर्जी। परंतु सामान्य तौर पर तो ऊषा ही कमजोर थी।मेरे पिताजी भी इस बात से चिंतित रहते थे कि कही ऊषा को उनसे पहले ही कुछ ना हो जाए।
में भी ईश्वर से यही चाहता था कि वह मुझसे पहले दुनिया से चली जाय।
जब ऊषा ने मुझसे यह सवाल किया कि मे उसके बाद कैसे रहूंगा।मेने कहा वो मेरी फिक्र ना करें। क्योंकि जिस सेवा व सहारे की उसको जरूरत थी,वह मेरे अलावा कोई दूसरा परिवार का सदस्य ऊषा को नही दे सकता था।
 समय गुजरने लगा।20 फरवरी सन् 2024 को मेरे पिताजी की मृत्यु हो गई।29 फरवरी सन् 2024 को उनकी तेरहवीं थी।मेरे पिताजी की इच्छा पूरी हो गई।जब उनकी मृत्यु हुई ऊषा ठीक थी।
8 मार्च की रात्रि को ऊषा की तबियत खराब हो गई। में मेरी बेटी कोमल तथा मेरे एक मेडिकल लाइन के साथी श्री सुभाष घर पर ही थे,ऊषा ने अपनी बडी बेटी पायल को याद किया।पायल का ससुराल मेरे निवास से मुश्किल से चार किलोमीटर दूर था,मेने फोन कर उसे बुला लिया।अब हम सबने उसको आनंद नर्सिंग होम में भर्ती कर दिया ,मेने ऊषा के पिता जी को सूचित कर दिया,14 मार्च 2024 , फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष, पंचमी तिथि दिन गुरुवार को ऊषा इस नश्वर संसार को छोड़कर परलोक वासी हो गयी।
मेरी भी इच्छा भगवान ने पूरी कर दी।वह मुझसे पहले इस संसार से चली गई।
वह वेंटिलेटर पर थी,जब बेहोश थी,उस समय ऊषा के पिता जी अस्पताल पहुंचे।दादरी से मेरठ 25 किलोमीटर दूर है।ऊषा के पिता जी को यह दूरी तय करने में पांच दिन लगे।
रक्त के सम्बन्ध इतने ढीले भी हो जाते हैं। मुझे पहली बार इसका अनुभव हुआ।
ऊषा ने अपने गृहस्थ जीवन मे सबकी सेवा की।मेरे माता-पिता की,मेरे जीजा श्री मनवीर सिंह का एक्सीडेंट हो गया था,उनका पैर टूट गया था,वह एक वर्ष बेड पर हमारे घर रहें।मेरी बहन उनकी सेवा में लगी रही।उनको देखने आने वालो की चाय पानी की सेवा ऊषा ने की।मेरे भाई की पत्नी बीना के तीन आप्रेशन हुए,एक बेटा होते समय,एक बेटी होते समय तथा एक एप्रेंडिस का।वह जब बेड पर थी उसकी सेवा भी जितना हो सकती थी ऊषा ने ही की।जब ऊषा को जरुरत पडी तो मेरी बहन,भाई की पत्नी बीना,मेरा भाई सब साथ खडे रहे।