बुधवार, 20 मार्च 2019

ईश्वर का प्रकोप और सेनापति जोगराज सिंह -लेखक अशोक चौधरी


हिन्दू जनमानस में संकटों से लड़ने की अपार शक्ति है। हमारे महापुरुषों व ॠषि-मुनियों ने जीवन जीने का जो तरीका यहां के जनमानस को दिया, उसमें उन्होंने कहा कि व्यक्ति समाज के लिए हैं, समाज सृष्टि के लिए हैं और सृष्टि ब्रह्मांड के लिए है। यही जीवन शैली भारतीय जनमानस का आधार रही हैं। अतः भारतीयों ने अपने व्यक्तिगत हितों से पहले समाज हित के लिए संघर्ष किया, सृष्टि में रहने वाले मानव ही नहीं बल्कि पशुओं के लिए भी श्रद्धाभाव प्रकट किया तथा उनके हितों के लिए संघर्ष किये। सूर्य को जल अर्पित कर ब्रह्मांड के प्रति भी अपनी निष्ठा प्रदर्शित की। इस्लाम व ईसाइयत के अनुयायी विश्व में कहीं भी यदि पच्चीस वर्ष तक शासक रहे तो उन्होंने वहां के मूल धर्म को समाप्त कर अपनी धार्मिक, राजनैतिक व सैनिक सत्ता स्थापित कर दी। परन्तु भारत में सैकड़ों वर्षों तक शासन करने के बाद भी भारतीयों को उनके मूल से न उखाड़ सकें। यदि हम अपने देश की तुलना एशिया तथा यूरोप के उन देशों से करें, जिन्होंने अरब व तुर्क आक्रमणकारियों के सम्मुख कायरता पूर्वक आत्मसमर्पण कर दिया तो हमें अपने पूर्वजों के साहस की सराहना, प्रशंसा तथा उन पर गर्व अवश्य ही करना पडेगा, क्योंकि उन्होंने लम्बे समय तक उन शत्रुओं के विरूद्ध, जिन्होंने सरलता और वेग से संसार के तीन महाद्वीपों पर अपना सैनिक, राजनैतिक तथा धार्मिक प्रभुत्व स्थापित कर लिया था, से डट कर संघर्ष किया।
संघर्ष की उन गाथाओं में एक गाथा तैमूर के भारत पर हमले की भी है। 

तैमूर के विषय में हमें जानकारी तैमूर की आत्मकथा "मै हूं तैमूर" व सर्वखाप पंचायत के इतिहास से प्राप्त होती है।

तैमूर जब 70 वर्ष का था,तब उसने अपनी आत्मकथा को लिखना प्रारम्भ किया, परंतु आत्मकथा पूरी होने से पूर्व ही तैमूर की मृत्यु हो गई। तैमूर की मृत्यु के बाद उसकी आत्मकथा को इब्ने अरब शाह नाम के एक व्यक्ति ने पूरा किया। परंतु इब्ने अरब शाह ने तैमूर की आत्मकथा जो "मै हूं तैमूर" नाम से लिखी जा रही थी,का नाम बदलकर "अजायब उल मुकर्दनी बवायक तैमूर" कर दिया।

इस किताब की मूल प्रति यमन के बादशाह जफर पाशा के पास थी।वही पर किसी लेखक ने इस पुस्तक की हस्तलिखित प्रति तैयार की और इसे वह भारत ले आया। भारत में यह किताब एक अंग्रेज अधिकारी के हाथ लग गई।यह अंग्रेज अधिकारी इस किताब को इंग्लैंड ले गया। अंग्रेज अधिकारी ने इस पुस्तक को डेवी नाम के एक अनुवादक को दे दिया।डेवी ने आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर व्हाइट की सहायता से इस पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद किया।इस प्रकार सन् 1783 में पहली बार तैमूर की आत्मकथा "मै हूं तैमूर"आम जनता के सामने आई।

इस किताब का हिंदी में अनुवाद संजना कोल के द्वारा किया गया तथा उर्दू में अनुवाद खलील उल रहमान तथा डॉ हमीद वजदानी ने किया।

इस किताब के अनुसार तैमूर समरकंद से काबुल, काबुल से कंधार के बाद खैबर के दर्रे से होता हुआ 12 मार्गदर्शकों तथा 120000 की सेना के साथ क्वेटा होता हुआ मुल्तान पहुंचा,उस समय मुल्तान का राजा हिंदू था। समरकंद से चलने के बाद मुल्तान के राजा तक सबने तैमूर के सामने समर्पण कर दिया।उस समय हिंदुस्तान की सीमा मुल्तान से शुरू होती थी। मुल्तान के राजा ने दिल्ली तक पहुंचने के लिए चार मार्गदर्शक तैमूर को दिये। मुल्तान से निकलने के बाद तैमूर दिल्ली की ओर बढ़ चला। 

सन् 1398 में समरकंद के शासक तैमूर ने भारत पर हमला कर दिया। दिल्ली में उस समय तुगलक वंश का शासन था। भारतीय इतिहासकारों ने तैमूर के इस हमले को ईश्वर का प्रकोप (खुदा का कहर) कहा है, क्योंकि भारत को जितनी हानि और दुख तैमूर ने पहुंचाया, उतना उससे पहले किसी भी आक्रमणकारी ने एक आक्रमण में नहीं पहुंचाया था। तैमूर के आक्रमण का गंगा-यमुना के मध्य बसे मेरठ, सहारनपुर तथा वर्तमान हरियाणा में जबरदस्त प्रतिरोध यहां कि जनता व स्थानीय नेतृत्व सर्वखाप पंचायत तथा सेनापति जोगराज सिंह व उप सेनापति हरबीर सिंह गूलिया द्वारा किया गया।

इस लेख का उद्देश्य भी पाठकों को स्थानीय नेतृत्व द्वारा विदेशी आक्रांता से ईश्वर प्रदत्त अधिकारों की रक्षा के लिए लडे गये इस युद्ध में दिखाई गई वीरता व बलिदान पर प्रकाश डालना है।
गंगा-यमुना के मध्य  सहारनपुर जनपद में गुर्जर जाति के पंवार (खूबड) वंश की रियासत समय के थपेड़े झेलते हुए तैमूर के आक्रमण के समय भी मौजूद थी। इस रियासत के तत्कालीन स्वामी राजा मान सिंह थे। फिरोज शाह तुगलक के शासन काल में राजा मानसिंह ने इस रियासत को नया आकार प्रदान करते हुए हरिद्वार के निकट मायापुरी नामक राज्य की स्थापना की और कनखल को अपनी राजधानी बनाया। सन् 1373 में राजा मानसिंह के यहां एक पुत्र का जन्म हुआ। यही बालक जोगराज सिंह के नाम से जाना गया। तैमूर के आक्रमण के समय जोगराज सिंह की आयु 26 वर्ष थी। जोगराज सिंह साढ़े सात फुट लम्बा, भीमकाय, बलशाली एवं आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था, शारिरिक बल में उस समय दूर-दूर तक जोगराज सिंह का कोई मुकाबला नहीं था।
मुल्तान से तैमूर पाकपटन, दियालपुर, भटनेर, सिरसा और कैथल होता हुआ, मार्ग में आग लगाता तथा लोगों की हत्या करता हुआआ रहा था कि दिल्ली से पहले वर्तमान हरियाणा में अहरूनी पर हमला करने के विरोध में वहां के अहीरो ने तैमूर का प्रतिरोध किया फलस्वरूप हजारों अहीर संघर्ष में शहीद हो गए और सैकड़ों गिरफ्तार कर लिए गए। तैमूर की सेना ने नगर को जलाकर राख कर दिया।(देखें परिशिष्ट - 1)

 तैमूरी सेना के अत्याचार का तोहाना के जाटों ने प्रतिरोध किया , परन्तु वो भी सफल ना हुए, कुछ जाट इस संघर्ष से जान बचाकर भागने लगे परन्तु तैमूर ने अपनी सेना से उन्हें घेर लिया तथा तैमूरी सेना ने दो हजार जाटों को मार डाला। उनके बीवी-बच्चों को बन्दी बना लिया तथा धन-सम्पत्ति को छीन लिया। इस अत्याचार के विरोध में स्थानीय जनता लामबंद हो गई।
हरयाणा सर्वखाप पंचायत के ऐतिहासिक रिकार्ड, दस्तावेज-43 तथा सर्वखाप पंचायत के तत्कालीन चन्द्रदत्त भट्ट (भाट) के लिखित लेखों (पोथी) के अनुसार तैमूर के सार्वजनिक कत्लेआम, लूट खसोट और सर्वनाशी अत्याचारों की सूचना मिलने पर संवत् 1455 (सन् 1398 ई०) कार्तिक बदी 5 को देवपाल राजा (जिसका जन्म निरपड़ा गांव जि० मेरठ में एक जाट घराने में हुआ था) की अध्यक्षता में  सर्वखाप पंचायत का अधिवेशन जि० मेरठ के गाँव टीकरी, निरपड़ा, दोगटऔर दाहा के मध्य जंगलों में हुआ।पंचायत में सर्वसम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गये -
(1) सब गांवों को खाली कर दो। (2) बूढे पुरुष-स्त्रियों तथा बालकों को सुरक्षित स्थान पर रखो। (3) प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति सर्वखाप पंचायत की सेना में भर्ती हो जाये। (4) युवतियाँ भी पुरुषों की भांति शस्त्र उठायें। (5) दिल्ली से हरद्वार की ओर बढ़ती हुई तैमूर की सेना का छापामार युद्ध शैली से मुकाबला किया जाये तथा उनके पानी में विष मिला दो। (6) 500 घुड़सवार युवक तैमूर की सेना की गतिविधियों को देखें और पता लगाकर पंचायती सेना को सूचना देते रहें।
पंचायती सेना - पंचायती झण्डे के नीचे 80,000 मल्ल योद्धा सैनिक और 40,000 युवा महिलायें शस्त्र लेकर एकत्र हो गये। इन वीरांगनाओं ने युद्ध के अतिरिक्त खाद्य सामग्री का प्रबन्ध भी सम्भाला। दिल्ली के सौ-सौ कोस चारों ओर के क्षेत्र के वीर योद्धा देश रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने रणभूमि में आ गये। सारे क्षेत्र में युवा तथा युवतियां सशस्त्र हो गये। इस सेना को एकत्र करने में धर्मपालदेवजाट योद्धा जिसकी आयु 95 वर्ष की थी, ने बड़ा सहयोग दिया था। उसने घोड़े पर चढ़कर दिन रात दूर-दूर तक जाकर नर-नारियों को उत्साहित करके इस सेना को एकत्र किया। उसने तथा उसके भाई करणपाल ने इस सेना के लिए अन्न, धन तथा वस्त्र आदि का प्रबन्ध किया।
प्रधान सेनापति, उप-प्रधान सेनापति तथा सेनापतियों की नियुक्ति
सर्वखाप पंचायत के इस अधिवेशन में सर्वसम्मति से वीर योद्धा जोगराजसिंह गुर्जर को प्रधान सेनापति बनाया गया।
महिलाएं वीरांगनाओं की सेनापति चुनी गईं उनके नाम इस प्रकार हैं - (1) रामप्यारी गुर्जर युवति (2) हरदेई जाट युवति (3) देवीकौर  युवति (4) चन्द्रो ब्राह्मण युवति (5) रामदेई तगा (त्यागी) युवति। इन सब ने देशरक्षा के लिए शत्रु से लड़कर प्राण देने की प्रतिज्ञा की।
उपप्रधान सेनापति - (1) धूला भंगी (बालमीकी)
 (2) हरबीर गुलिया जाट चुने गये। धूला भंगी जि० हिसार के हांसी गांव (हिसार के निकट) का निवासी था। यह महाबलवान्, निर्भय योद्धा, गोरीला (छापामार) युद्ध में महारथ पाये हुए था।
दूसरा उपप्रधान सेनापति हरबीरसिंह जाट था जिसका गोत्र गुलिया था। यह हरयाणा के जि० रोहतक गांव बादली का रहने वाला था। इसकी आयु 22 वर्ष की थी । यह निडर एवं शक्तिशाली वीर योद्धा था।
सेनापतियों का निर्वाचन - उनके नाम इस प्रकार हैं - (1) गजेसिंह जाट गठवाला (2) तुहीराम  (3) मेदा रवा (4) सरजू ब्राह्मण (5) उमरा तगा (त्यागी) (6) दुर्जनपाल अहीर।
जो उपसेनापति चुने गये - (1) कुन्दन जाट (2) धारी गडरिया (3) भौन्दू सैनी (4) हुल्ला नाई (5) भाना जुलाहा (6) अमनसिंह पुंडीर (7) नत्थू पार्डर  (8) दुल्ला  जाट  (9) मामचन्द गुर्जर (10) फलवा कहार।
सहायक सेनापति - भिन्न-भिन्न जातियों के 20 सहायक सेनापति चुने गये।
वीर कवि - प्रचण्ड विद्वान् चन्द्रदत्त भट्ट (भाट) को वीर कवि नियुक्त किया गया जिसने तैमूर के साथ युद्धों की घटनाओं का आंखों देखा इतिहास लिखा था।
तैमूर दिसंबर के प्रथम सप्ताह में दिल्ली के निकट आ धमका। तैमूर के आगमन का समाचार सुनकर सुल्तान महमूद और उसके प्रधानमंत्री मललू इकबाल ने तैमूर का मुकाबला करने का प्रयत्न किया। तदुपरांत 17 दिसंबर को तैमूर ने तुगलक को युद्ध में पराजित कर दिया। पराजित होने पर तुगलक गुजरात की ओर तथा मललू इकबाल बुलंदशहर को भाग गया। 18 दिसंबर 1398 को तैमूर का दिल्ली पर अधिकार हो गया। उलेमाओं के नेतृत्व में राजधानी के नागरिक विजेता की सेवा में उपस्थित हुए और दया की प्रार्थना की। तैमूर ने नागरिकों को जीवन दान देना स्वीकार कर लिया,इस समय दिल्ली की आम जनता तैमूर की तलवार की नोक पर घुटनों के बल पर आ गई थी।

मेरठ के किले का किलेदार आलाशर नाम का एक मुस्लिम था, तैमूर ने आलाशर से आत्मसमर्पण करने के लिए कहा, परंतु वह नही माना, तैमूर ने मेरठ के किले पर हमला कर अपने अधिकार में ले लिया,आलाशर को एक लोहे के पिंजरे में बंद कर जलती हुई आग के ऊपर रखवा दिया गया। परंतु तभी अचानक तेज बारिश शुरु हो गई।आग बुझ गई। तैमूर ने कहा कि शायद कुदरत अभी आलाशर की मौत नही चाहती।अब तैमूर ने आलाशर को कैद मे डाल दिया।

 सेना के दूसरे भाग को तैमूर ने अपने बेटे सादवकार को देकर लोनी के किले पर हमला करने के लिए भेजा। तैमूर ने लोनी और दिल्ली के बीच स्थित जुंबा के किले पर हमला कर अपने अधिकार में ले लिया।जुंबा के किले में कोई सेना नही थी,इस किले मे सन्यासीनिया रहती थी। तैमूर ने बूढी सन्यासनियो को छोड़ दिया तथा जवान सन्यासनियो को अपने सिपाहियों में बाट दिया।लोनी का किलेदार करतार सिंह एक बहादुर व्यक्ति था, तैमूर ने अपनी आत्मकथा में उसकी जाति तो नही लिखी परंतु सबसे अधिक सम्भावना उसके गुर्जर जाति के होने की है। ऐसी मान्यता गुर्जरों मे बहुत पुराने समय से चली आ रही है कि पृथ्वीराज चौहान के ताऊ बिसल देव जब चौहानों मे भारत के प्रथम सम्राट बने तब दिल्ली के तोमर राजा को अपने सामंत बनाने के बाद सम्राट बिसल देव ने दिल्ली के आसपास के 360 गांवों की जागीर भाटी गुर्जरों को तथा 84 गांव की जागीर केराणा के चौहान गुर्जरों को दी थी।360 गांवों में से 80 गांवों में खुद भाटी गुर्जर बस गये थे,लोनी के आसपास 12-12 गांवों की दो यूनिट भाटियो ने अपने रिश्तेदार कसाना और बैसला गोत्र के गुर्जरों को,दादरी और दनकौर के पास 27-27 गांवों की दो यूनिट नागडी/नागर गुर्जरों को दे दी थी। अतः लोनी के आसपास गुर्जर उस समय से ही मजबूत स्थिति में थे।आगे चलकर मुस्लिम सत्ता पर काबिज हो गये थे, परंतु तैमूर के हमले के समय दिल्ली की मुस्लिम सत्ता अत्यधिक कमजोर थी।इस समय किसी हिन्दू का लोनी के किले का किलेदार होना इस बात की ओर इशारा करता है कि हिंदू शक्तिशाली हो रहें थे। हिंदूओं में गुर्जर लोनी में सर्वाधिक शक्तिशाली थे।

अतः सबसे अधिक विरोध तैमूर का लोनी में ही होना था,वही हुआ भी।जब तैमूर के बेटे सादवकार ने लोनी के किले का घेरा डाला,तो रात में ही करतार सिंह ने एक जोरदार हमला तैमूरी सेना पर किया तथा कुछ तैमूरी सैनिकों को गिरफ्तार कर लिया।उन सैनिकों से पूछताछ करने के बाद अगले दिन करतार सिंह ने अपनी हाथियों की सेना के द्वारा सादवकार पर एक ओर जोरदार हमला किया तथा सादवकार को गिरफ्तार कर लिया। करतार सिंह को तैमूर के द्वारा हिंदूओं पर किए जा रहे अत्याचारों की लगातार सूचना मिल रही थी, अतः करतार सिंह ने तैमूर को सबक सिखाने के लिए तैमूर के बेटे सादवकार को मार कर उसके शव के अंदर भूसा भरवा कर किले की प्राचीर पर टंगवा दिया।जब तैमूर को अपने बेटे की दर्दनाक मौत की सूचना मिली तो वह चित्कार कर उठा। तैमूर को सपने में भी यह आभास नही था कि एक छोटे से किले का किलेदार उसको इतना गहरा जख्म देगा। तैमूर ने अपनी सेना लेकर लोनी पर आक्रमण कर दिया। परंतु करतार सिंह ने आत्मसमर्पण नही किया। करतार सिंह ने अपने किले का दरवाजा खोल कर युद्ध के मैदान में साका कर अपना बलिदान दे दिया।अब तैमूर की समझ में आ गया था कि भारतियों को हराया तो जा सकता है, परंतु वो मन से हार स्वीकार करने वालों में से नही है।

 उसी समय पंचायत सेना के 20000 योद्धाओं ने सेनापति जोगराज सिंह व हरबीर सिंह गुलिया के नेतृत्व में तैमूर की सेना के 52000 सिपाहियों पर आधी रात को आक्रमण कर दिया, इस तरह के हमले का क्रम लगातार तीन रात तक बना रहा। इस हमले में तैमूर की सेना के 9000 सिपाही मारे गए। पंचायत सेना ने तैमूर की सेना के सिपाहियों के शव यमुना में फेंक दिए। दिन निकलते ही पंचायत सेना शहर की सीमा से बाहर चली जाती थी। पंचायत सेना के इस प्रकार के हमलों से तैमूर खीझ गया। क्रुद्ध होकर तैमूर ने लूट तथा नरसंहार की आज्ञा दे दी। जो कई दिनों तक चलता रहा। दिल्ली के हजारों नागरिकों की हत्या कर दी गई और हजारों को बन्दी बना लिया गया।

मेरठ युद्ध - एक जनवरी सन् 1399 को तैमूर ने अपनी बड़ी संख्यक एवं शक्तिशाली सेना, जिसके पास आधुनिक शस्त्र थे, के साथ दिल्ली से मेरठ की ओर कूच किया। 19 जनवरी सन् 1399 को तैमूर मेरठ पहुंच गया। पंचायत सेना के सेनानायक दुर्जन पाल अहीर मेरठ के दिल्ली दरवाजे के निकट तैमूरी सेना से युद्ध करते हुए अपने 200 साथियों के साथ शहीद हो गये। इस क्षेत्र में तैमूरी सेना को पंचायती सेना ने दम नहीं लेने दिया। दिन भर युद्ध होते रहते थे। रात्रि को जहां तैमूरी सेना ठहरती थी वहीं पर पंचायती सेना धावा बोलकर उनको उखाड़ देती थी। वीर देवियां अपने सैनिकों को खाद्य सामग्री एवं युद्ध सामग्री बड़े उत्साह से स्थान-स्थान पर पहुंचाती थीं। शत्रु की रसद को ये वीरांगनाएं छापा मारकर छीन लेती थीं। आपसी मिलाप रखवाने तथा सूचना पहुंचाने के लिए 500 घुड़सवार अपने कर्त्तव्य का पालन करते थे। रसद न पहुंचने से तैमूरी सेना भूखी मरने लगी। उसके मार्ग में जो गांव आता उसी को नष्ट करती जाती थी। तंग आकर तैमूर गंगा के किनारे हरद्वार की ओर बढ़ा।
हरद्वार युद्ध - मेरठ से आगे  सहारनपुर तक पंचायती सेनाओं ने तैमूरी सेना से भयंकर युद्ध किए तथा इस क्षेत्र में तैमूरी सेना के पांव न जमने दिये। प्रधान एवं उपप्रधान और प्रत्येक सेनापति अपनी सेना का सुचारू रूप से संचालन करते रहे। हरद्वार से 5 कोस दक्षिण में तुगलुकपुर-पथरीगढ़ में तैमूरी सेना पहुंच गई। इस क्षेत्र में पंचायती सेना ने तैमूरी सेना के साथ तीन घमासान युद्ध किए।
उप-प्रधानसेनापति हरबीरसिंह गुलिया ने अपने पंचायती सेना के 25,000 वीर योद्धा सैनिकों तथा 2000 पहाड़ी तीरंदाजों के साथ तैमूर के घुड़सवारों के बड़े दल पर भयंकर धावा बोल दिया जहां पर तीरों तथा भालों से घमासान युद्ध हुआ। इसी घुड़सवार सेना में तैमूर भी था। हरबीरसिंह गुलिया ने आगे बढ़कर शेर की तरह दहाड़ कर तैमूर की छाती में भाला मारा जिससे वह घोड़े से नीचे गिरने ही वाला था कि उसके एक सरदार खिज़र खान ने उसे सम्भालकर घोड़े से अलग कर लिया। (तैमूर इसी भाले के घाव से ही अपने देश समरकन्द में पहुंचकर मर गया)। वीर योद्धा हरबीरसिंह गुलिया पर शत्रु के 60 भाले तथा तलवारें एकदम टूट पड़ीं जिनकी मार से यह योद्धा अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ा।
उसी समय प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर ने अपने 22000 मल्ल योद्धाओं के साथ शत्रु की सेना पर धावा बोलकर उनके 5000 घुड़सवारों को काट डाला। जोगराजसिंह ने स्वयं अपने हाथों से अचेत हरबीरसिंह को उठाकर यथास्थान पहुंचाया। परन्तु कुछ घण्टे बाद यह वीर योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गया। जोगराजसिंह को इस योद्धा की वीरगति से बड़ा धक्का लगा।हरद्वार के जंगलों में तैमूरी सेना के 2805 सैनिकों के रक्षादल पर भंगी कुल के उपप्रधान सेनापति धूला  भंगी वीर योद्धा ने अपने 190 सैनिकों के साथ धावा बोल दिया। शत्रु के काफी सैनिकों को मारकर ये सभी 190 सैनिक एवं धूला भंगी अपने देश की रक्षा हेतु वीरगति को प्राप्त हो गये।
तीसरे युद्ध में प्रधान सेनापति जोगराजसिंह ने अपने वीर योद्धाओं के साथ तैमूरी सेना पर भयंकर धावा करके उसे अम्बाला की ओर भागने पर मजबूर कर दिया। इस युद्ध में वीर योद्धा जोगराजसिंह को 45 घाव आये परन्तु वह वीर होश में रहा। पंचायती सेना के वीर सैनिकों ने तैमूर एवं उसके सैनिकों को हरद्वार के पवित्र गंगा घाट (हर की पौड़ी)पर जाने से रोकने का भरसक प्रयास किया ।
इस युद्ध में केवल 5 सेनापति बचे थे तथा अन्य सब देशरक्षा के लिए वीरगति को प्राप्त हुये।
हमारी पंचायती सेना के वीर एवं वीरांगनाएं 35,000, देश के लिये वीरगति को प्राप्त हुए थे।
जब यह सेना हरिद्वार के ओर निकट पहुंची तो उस समय नागा साधुओं का शाही स्नान चल रहा था।(नागा साधुओं का पराक्रम- देखें परिशिष्ट नंबर-2) उन साधुओं और तैमूर की सेना में तुरन्त भिड़ंत हो गई। अतः तैमूर को यहां भी साँस नहीं मिला। वह सेना को शिवालिक की पहाड़ियों में से होता हुआ समरकंद चला गया।
यह शुभ सूचना लेकर संदेशवाहक जब सेनापति जोगराज सिंह के शिविर में प्रविष्ट हुआ। संदेशवाहक के आने से कुछ पल पूर्व ही जोगराज सिंह अपनी नश्वर देह को त्याग चुके थे। नौजवान जोगराज सिंह की शहादत का समाचार जब स्थानीय जनता को मिला, तब सम्पूर्ण क्षेत्र की जनता श्रद्धा के वशीभूत हो नतमस्तक होकर, शोक में हा-हाकार कर उठी।
सेनापति जोगराज सिंह इस क्षेत्र के घोषित राजा नहीं थे, अतः यहां के निवासियों की रक्षा का दायित्व भी सीधे उनपर नहीं था। वह दिल्ली के सुल्तान तुगलक पर था, लेकिन तुगलक यहां की जनता को उसके भाग्य के भरोसे छोड़कर भाग गया था। परन्तु समाज व क्षेत्र के प्रति अपने दायित्व को समझते हुए सेनापति जोगराज सिंह तथा उनके साथियों ने एक ट्रेंड सेना के साथ, सामान्य किसानों को साथ लेकर युद्ध लडा तथा अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनका यह बलिदान अविस्मरणीय है। आज भी मुजफ्फरनगर, सहारनपुर के देहात में लोग जोगराज सिंह के बारे में कहानियां सुनाते रहते हैं। उनकी शहादत को शत-शत नमन।
संदर्भ ग्रंथ
1- भारत का इतिहास -डॉ आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव।
2- स्वतंत्रता की तडप -अभय कुमार योद्धेय (गुर्जर भारती, सितंबर 2005)
3- सत्ता के विरुद्ध दिल्ली एवं आसपास के गुर्जरों का प्रतिरोध -राणा अली हसन चौहान अनुवाद ओमप्रकाश गांधी (आवाज -ए- गुर्जर, जनवरी 2006, जम्मू)।
4- jat History -Dilip Singh ahlawat।

5 - https://youtu.be/-hwmSHT3vUE

परिशिष्ट नम्बर- 1

अहिरूनी  नाम "अहीर की भूमि" के रूप में अनुवादित है। जेई श्वार्ट्ज़बर्ग ने इसे "लोक क्षेत्र" और लुसिया माइकलुट्टी को "सांस्कृतिक-भौगोलिक क्षेत्र" के रूप में वर्णित किया है। .. जिसमें वर्तमान राजस्थान के अलवर, भरतपुर और वर्तमान हरियाणा राज्य में गुड़गांव महेंद्रगढ़ शामिल हैं। अहिरवाल के अहीरो की विदेशी और दिल्ली के शासकों को बार बार टक्कर देने के कारण इस क्षेत्र को "भारत का इस्राइल " भी कहते है।

परिशिष्ट नम्बर-2

नागा साधुओं का पराक्रम

आठवीं सदी के मध्य में आदि शंकराचार्य का जन्म हुआ।यह वह समय था जब भारत पर अरब के द्वारा इस्लामिक हमले शुरू हो गये थे।ये हमलावर मंदिरों को क्षतिग्रस्त कर रहे थे,सम्पदा को लूट रहे थे, निहत्थे और सात्विक पुजारी और भारतियों की हत्या कर रहें थे। सत्ता की ओर से गुर्जर प्रतिहार राजाओं ने सभी स्थानीय शक्तियों को एकत्रित कर इन हमलावरों को रोकने के लिए अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगा रखी थी, परन्तु दूसरी ओर राजनीतिक लाभ के लिए राष्ट्रकूट और पाल शासक या तो उदासीन थे या इन अरब हमलावरों से मिल जाते थे।

इन परिस्थितियों में आदि शंकराचार्य ने धर्म व धार्मिक स्थलों की सुरक्षा के लिए साधुओं में सैन्य पथ की स्थापना की।
साधुओं को शस्त्र चलाने की शिक्षा दी जाने लगी।इन सैन्य पथ के शिविरों को अखाड़ा कहा गया।13 अखाड़े बनाये गये।इन अखाड़ों में साधुओं को घुड़सवारी, तलवार,भाला चलाना आदि का प्रशिक्षण दिया जाता था।इन साधुओं की सबसे शक्तिशाली टुकडी को नागा नाम दिया गया। गुजरात में नागा शब्द का अर्थ लडाका है।
नागा साधु बनने के लिए बडा कठीन प्रशिक्षण दिया जाता है।तीन साल तक प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद कुंभ में 108 डुबकी लगाकर स्नान करने के पश्चात नागा साधु को महापुरुष की पदवी प्राप्त होती है।
इसके बाद साधु स्वयं का पिंडदान करता है,जिस कारण उसका पिछला जीवन समाप्त माना जाता है और वह सिर्फ धर्म का सिपाही रह जाता है। अपने जीवन यापन के लिए सिर्फ एक दिन में सात घर भिक्षा मागता है। यदि सात घर से कुछ नहीं मिला तो भूखा ही रहता है फिर अगले दिन भिक्षा मागता है।आम आदमी की बस्ती से दूर जमीन पर सोना, वस्त्र के रूप में सिर्फ एक लंगोटी ही पहनता है। हवन की भस्म या श्मशान घाट में जले शव की राख को शरीर पर लपेटे रखते हैं।यही राख ही एक तरह से इन साधुओं का वस्त्र है।
यह स्थिति उसे अवधूत की पदवी प्रदान करती है।
इससे आगे की श्रेणी दिगम्बर की होती है जिसमें नागा साधु निर्वस्त्र रहते हैं।
इससे आगे की श्रेणी श्री दिगम्बर की होती है जिसमें नागा साधु के लिंग की नस तोड दी जाती है।
नागा साधु बनने के लिए किसी प्रकार का जाति व क्षेत्र का बंधन नही है।उसका सिर्फ सनातनी हिन्दू होना ही काफी है।
इन साधुओं के अखाड़े हरिद्वार, उज्जैन, ऋषिकेश, प्रयागराज प्रमुख रूप से रहें हैं।
इन नागा योद्धाओं ने जब भारतीय राजाओं की सेना कुछ न करने की स्थिति में पहुंच जाती थी,तब आगे बढ़ कर विधर्मी सेना से अनेक बार संघर्ष किया और अकल्पनीय बलिदान दिये हैं।
तैमूर लंग के हमले के समय जब सर्वखाप पंचायत के नेतृत्व में सेनापति जोगराजसिंह पंवार, हरबीर सिंह गूलिया,धूला भंगी/बाल्मीकि, महिला सेनापति रामप्यारी चौहान के नेतृत्व में असंख्य भारतीयों ने तैमूर को रोकने के लिए बलिदान दिये थे तब तैमूर की सेना से अंतिम लडाई हरिद्वार में इन नागा साधुओं ने लडी तथा तैमूर की सेना को ऐसी मार लगाई कि वो हरिद्वार तीर्थ के मंदिरों को बिना लूटे ही शिवालिक की पहाड़ियों से चला गया।
जब सन् 1757 में अहमद शाह अब्दाली ने भारत पर हमला किया और मथुरा वृंदावन को लूट कर अफगान कमांडर सरदार खां गोकुल की ओर बढा,तब तक गोकुल में चार हजार नागा साधु इकट्ठा हो चुके थे।अफगाग सरदार खां के दस हजार सिपाहियों को चार हजार नागा साधुओं ने भगा भगाकर मारा।एक एक नागा साधु ने 100-100 अफगान सिपाहियों को मार डाला।जब अफगान सिपाही भागने लगे तब सरदार खां ने एक पत्र अहमद शाह अब्दाली को लिखा कि उसकी सेना में हैजा फैल गया है, इसलिए सिपाही मर गए हैं।
अहमदशाह अब्दाली ने बंगाल के एक कानून विद जुगल किशोर को अफगान सरदार खां द्वारा दी गई हैजा फैलने से सिपाहियों के मरने की सूचना की सत्यता की जांच का कार्य सोंपा। लेकिन सरदार खां ने एक बडी रिश्वत देकर जुगल किशोर से अपने मनमाफिक रिपोर्ट तैयार करवा ली। अर्थात जुगल किशोर ने भी रिपोर्ट दे दी कि सिपाही हैजा फैलने से ही मरे है। अहमदशाह अब्दाली ने गोकुल से लूट मे मिले धन की जानकारी चाही। जुगल किशोर और सरदार खां ने कह दिया कि गोकुल में सिर्फ झोपड़ी थी,वहा लूटने के लिए कुछ नही था।
सन् 1664 में कांशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी के समीप औरंगजेब की सेना और नागा साधुओं मैं उस समय भयंकर युद्ध हुआ,जब औरंगजेब ने मंदिर को गिराने के लिए सेना को आदेश दिया था।इस युद्ध को बैटल आफ ज्ञानव्यापी भी कहा जाता है। सन् 1666 में नागा साधुओं ने औरंगजेब की सेना पर पुनः हमला किया।
सन् 1669 में औरंगजेब की सेना ने फिर वाराणसी के मंदिर पर हमला किया। फिर नागा साधु औरंगजेब की सेना के सामने अड कर खड़े गये। कुछ पैसों के लालच में भारतियों के भीतर घात के कारण इस बार औरंगजेब सफल हो गया। वाराणसी के इन दोनों युद्धों में करीब 40000 नागा साधु वीर गति को प्राप्त हुए।
भारतीय इतिहास कार यदुनाथ सरकार ने " द हिस्ट्री ऑफ दसनामी नागा संन्यासी" नामक पुस्तक में"बैटल आफ ज्ञानव्यापी" से वाराणसी के युद्ध का वर्णन  किया है। 
सन् 1947 में देश आजाद हुआ,तब नागा साधुओं ने यह तय किया कि अब वो शस्त्र नही उठायेंगे।






बुधवार, 16 जनवरी 2019

महादानी पन्ना -लेखक अशोक चौधरी

राजनैतिक क्षेत्र सदा साजिशों से भरा रहा है। राजतिलक से पहले राम को वनवास या कौरवों के द्वारा पांडवों के साथ छल करके सत्ता हडपना हो, ऐसे उदाहरणों से संसार भरा पड़ा है। ऐसी ही एक घटना भारत के मध्य काल में घटित हुई। जहां राज्य हड़पने के लिए एक भाई ने रिश्तों को कलंकित कर अपने चचेरे भाई जो अल्प व्यस्क थे को संरक्षण देने के स्थान पर हत्या करने का प्रयास किया। लेकिन दूसरी ओर राजकुमार की धाय ने अपने साहस व शौर्य से उस जटिल परिस्थिति का सामना करते हुए राज्य के वारिस को बचा लिया तथा एक कलुषित मानसिकता के व्यक्ति, जिसके पास राज्य के असिमित साधन थे, उसकी लालची योजना को धराशायी कर दिया। भले ही इस न्याय- अन्याय, सत्य- अस्तय, धर्म- अधर्म की लड़ाई में धाय के इकलौते पुत्र की शहादत हो गई।
सन् 1433 में मेवाड़ के राज्य पर राणा कुम्भा राजा के रूप में आसीन हुए। राणा कुम्भा ने अपने शौर्य व साहस से अपने आसपास के छोटे-छोटे राज्यों को मिलाकर मेवाड़ महा राज्य की स्थापना की तथा भारत की राजनीति को सिसौदिया (गहलौत) प्रशासन के रूप में एक नई दिशा दी। परन्तु राज सिंहासन को  जल्द प्राप्त करने के लालच में राणा कुम्भा के बेटे उदय सिंह प्रथम ने राणा कुम्भा की सन् 1468 में हत्या कर दी। आगे चलकर राणा कुम्भा के पौत्र राणा सांगा मेवाड़ के शासक बने।राणा सांगा ने अपने जीवन में अनेक युद्ध लडे। इन युद्धों में राणा सांगा के अनेक सहयोगी थे। इन सहयोगियों में एक चित्तौड़गढ़ के पास माताजी की पांडोली नामक गांव के गुर्जर जाति के हरचंद हाकला भी थे। इन हरचंद हाकला के पन्ना नाम की एक पुत्री थी । पन्ना धाय का जन्म 8 मार्च 1490 ई० में हुआ था।जो आमेट के ठिकाने के पास कमेरी गांव के हिन्दूजी के पौत्र लाला गुर्जर के पुत्र सूरजमल से ब्याही थी। पन्ना का पति सूरजमल राणा सांगा का अंगरक्षक था, पन्ना युद्ध कौशल में निपुण घुड़सवारी व अस्त्र-शस्त्र चलाने में निपुण निडर स्वभाव की युवती थी। पन्ना के पिता हरचंद हाकला राणा सांगा की ओर से लडते हुए शहीद हो गए थे। पन्ना का पति सूरजमल भी सन् 1527 में मुगल हमलावर बाबर के साथ खानवा के युद्ध में वीर गति को प्राप्त हो गया था। अपने पीहर व ससुराल वालों की राजपरिवार के साथ वफादारी व दी गई कुर्बानी के कारण पन्ना राजपरिवार के अति निकट थी, राणा सांगा की पत्नी रानी कर्मवती जो बूंदी की राजकुमारी थी, पन्ना पर अति विश्वास करती थी। पन्ना के चन्दन सिंह नाम का एक पुत्र था, सन् 1528 में राणा सांगा की मृत्यु हो गई। राणा सांगा के दो पुत्र थे, जिनमें बड़े पुत्र का नाम विक्रम सिंह व छोटे का नाम उदय सिंह था, उदय सिंह पन्ना के पुत्र चन्दन का हम उम्र था। राणा सांगा की मृत्यु के पश्चात  उनके अवयस्क बेटे विक्रम को मेवाड़ का राजा बना दिया गया, रानी कर्मवती ने कार्यवाहक राजा के रूप में शासन को सम्भाल लिया। छोटे बेटे उदय सिंह की देखभाल पन्ना करने लगी। सन् 1535 में गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर हमला कर दिया। खतरे को भांप कर रानी कर्मवती ने अपने दोनों पुत्रों को पन्ना के साथ अपने पीहर बूंदी भेज दिया तथा स्वयं बहादुर शाह का सामना करने के लिए डट गई। इस युद्ध में चित्तौड़ का पतन हो गया, रानी कर्मवती ने जौहर कर आत्मबलिदान कर दिया।चित्तौड़ विजय के बाद बहादुर शाह हुमायूं से लड़ने के लिए रवाना हुआ, मंदसौर के पास मुगल सेना से युद्ध में बहादुर शाह हार गया। इस हार की सूचना मिलते ही 7000 मेवाड़ सैनिकों ने पुनः चित्तौड़ दुर्ग अपने कब्जे में ले लिया। चित्तौड़ पर पुनः राणा सांगा के वंश का शासन कायम हो गया। राजकुमार विक्रम को राजा बना दिया गया, शासन की देखभाल के लिए राणा सांगा के भाई पृथ्वीराज राणा के बेटे बनवीर को कार्यवाहक राजा नियुक्त कर दिया गया, कुंवर उदयसिंह की देखरेख के लिए  पन्ना को राजधाय नियुक्त कर दिया गया।पन्ना उदयसिंह के साथ अपने बेटे चन्दन सहित चित्तौड़ दुर्ग में बने कुम्भा महल में रहने लगी। परन्तु बनवीर के मन में सम्पूर्ण राज्य को हड़पने का षडयंत्र पनपने लगा। इसके लिए वह विक्रम व उदयसिंह को मारने की योजना बनाने लगा। यह सन् 1537 की बात है। बनवीर ने मौका देख एक शाम राजकुमार विक्रम सिंह को मार डाला तथा उदयसिंह को मारने के लिए निकल पड़ा। बनवीर के इस दुष्कर्म की सूचना पन्ना को मिल गई।  उदयसिंह के सर पर खतरा देख पन्ना ने अपने पुत्र चन्दन व उदयसिंह को लेकर तुरन्त सुरक्षित स्थान पर ले जाने की योजना बनाई। उदय सिंह के महल में कौन वफादार है और कौन बनवीर से मिला है यह मालूम नहीं था, अतः पन्ना ने किसी को पता दिये बिना उदय सिंह के शाही कपड़े अपने पुत्र चन्दन को पहनाकर उदय सिंह के कमरे में छोड़ दिया तथा चन्दन के साधारण कपड़े उदयसिंह को पहनाकर अपने वफादार सेवक के साथ महल से सुरक्षित स्थान को निकाल दिया। उदयसिंह की ओर से निश्चिंत होने के बाद पन्ना अपने पुत्र को ले जाने के लिए उदयसिंह के कक्ष की ओर चल दी। परन्तु इतने में बनवीर भी महल में प्रवेश कर गया। बनवीर को उदयसिंह के कक्ष की ओर जाता देख पन्ना सहम गई, वह समझ गई कि खतरा उसके पुत्र के सर पर मंडरा गया है। पन्ना ने ललकार कर बनवीर को रोकने का प्रयास किया, जब बनवीर नहीं रूका तो पन्ना ने कटार फेंककर बनवीर पर मारी जो बनवीर के हाथ को स्पर्श करती हुई निकल गई। बनवीर जल्द से जल्द अपने मकसद को पाना चाहता था। वह नहीं चाहता था कि पन्ना के साथ उलझ कर वह अपने मकसद से दूर हो जाये। अत:वह उदयसिंह के कमरे में प्रवेश कर गया, रात को कक्ष की मंद रोशनी में उदयसिंह के पलंग पर सो रहे चन्दन को वह पहचान ही नहीं पाया, उधर पन्ना ने दीवार पर टंगी तलवार को म्यान से बाहर निकाला तो इधर बनवीर ने अपनी तलवार से पलंग पर सो रहे बालक पर शक्तिशाली वार कर दिया, बालक के दो टुकड़े हो गये, पन्ना ने जो तलवार बचाव के लिए उठाई थी,उसे चलाने का अवसर ही नहीं मिला। वह वहीं जड़ हो गई, उसकी चीख निकल गई, उसका बेटा चन्दन, उदयसिंह को बचाने के बदले में बलि पर चढ़ चुका था, बनवीर भी वहां पल भर भी नहीं रूका , अपने मकसद में अपने को कामयाब मान वह उदयसिंह के महल से निकल गया। 

पन्ना ने अब अपने आप को सम्भाल लिया, जो हानि होनी थी वह हो चुकी थी। उस बहादुर नारी ने अपने बेटे के शव को उठा कर श्मशान घाट ले जाकर रात में ही उसका दाह संस्कार कर दिया, वहां उपस्थित सेवकों व अन्य लोगों की नजरों में उदयसिंह की मृत्यु हो चुकी थी, परन्तु यह सिर्फ पन्ना ही जानती थी कि जिसका दाह संस्कार हुआ है वह उदयसिंह नहीं, उसका पुत्र चन्दन सिंह है। पन्ना रात को ही उदयसिंह को लेकर टोडा के राजा के पास पहुची, लेकिन बनबीर के डर की वजह से उसने शरण देने के लिए मना कर दिया। उसके बाद पन्ना उदय सिंह को लेकर डूंगरपुर के राजा के पास पहुची, उसने भी शरण देने के लिए इंकार कर दिया। कुम्भल गढ किले के किलेदार देवपुरा जाति के आशा शाह तथा रणथम्भौर किले के किलेदार ओसवाल जाति के भारमल कवदिया जो भामाशाह के पिता थे, राणा सांगा के वफादार व्यक्तियों में से थे। अब  पन्ना उदयसिंह को लेकर कुम्भल गढ़ के किले में किलेदार आशा शाह के पास पहुंची। पहले तो आशा शाह ने भी बनबीर के डर से शरण देने के लिए मना कर दिया। परंतु आशा शाह की मां ने आशा शाह को फटकार लगाते हुए अपने राजा के प्रति अपना कर्त्तव्य निभाने के लिए आशा शाह को कहा।तब आशा शाह ने उदयसिंह व पन्ना की पहचान गुप्त रखी तथा उदयसिंह का परिचय अपनी बहन के बेटे के रूप में कराया तथा पन्ना का परिचय अपनी बहन के रूप में। कुछ समय बाद ही बलवीर को यह सूचना मिलने लगी कि राज्य का वारिस उदयसिंह जिन्दा है, उसकी योजना को पन्ना ने धूल में मिला दिया है, जो मारा गया वह पन्ना का बेटा चन्दन सिंह था उदयसिंह नहीं। अब बनवीर ने अपने लोगों के माध्यम से यह प्रचार करवाना प्रारम्भ कर दिया कि पन्ना झूठ बोल रही है, वह अपने बेटे चन्दन सिंह को ही उदयसिंह बता रही है। लेकिन राणा सांगा के वफादार उदयसिंह को अच्छी तरह पहचानते थे। जब उदयसिंह पर बनवीर का षड्यंत्रकारी हमला हुआ, तब उसकी आयु 15 वर्ष की थी, वह इतना छोटा नहीं था कि पहचाना न जा सके। सन् 1539में कुम्भल गढ़ के किले में उदयसिंह का राज्याभिषेक हो गया। अब मेवाड़ के सरदारों ने, जिनमें कोठारिया के रावत खान, केलवा के जग्गा, बागौर के रावत सांगा आदि ने पाली के अखेराज सोनगरा को बुलाया और दबाव बनाया कि वह अपनी बेटी का विवाह उदयसिंह से करे, लेकिन सोनगरा ने कहा : चित्तौड़ के शासक बनवीर ने वास्तविक उदयसिंह का मारा जाना प्रसिद्ध कर रखा है। यदि आप सब सरदार  उदयसिंह का जूठा खाएं तो मैं अपनी पुत्री का विवाह इससे कर दूंगा। अखेराज का संदेह दूर करने के लिए सभी सरदारों ने उदयसिंह का जूठा खाया। इसी पर अखेराज ने अपनी बेटी जिसका नाम जयवंती बाई था, का विवाह उदयसिंह से किया।9 मई 1540 को अखेराज की बेटी जयवंती बाई के गर्भ से महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ । अब सन् 1540में उदयसिंह ने बनवीर से चित्तौड़गढ़ को हस्तगत कर लिया। उदय सिंह ने पन्ना को रहने के लिए अलग महल का निर्माण करवाया। परन्तु पन्ना उसमें नहीं रही। वह अपने गांव चली गई, बाकि का जीवन पन्ना ने अपने गांव में ही व्यतीत किया। उदयसिंह जीवन भर पन्ना का अपनी माँ की तरह ही सम्मान करते रहे। पन्ना की सुरक्षा व भरण-पोषण के लिए  चांदरास गांव में उदय सिंह द्वारा 451 बीघा भूमिदान का ताम्रपत्र, जो साह आसकर्ण देवपुरा को दिया । मेवाड़ में इतने बड़े भूभाग के अनुदान का यही एक मात्र लेख है, जिस पर संवत 1621, सन 1564 ई. आसोज सुदी नवमी अंकित है।   पन्ना को आमेट के पास कमेरी में जहां पन्ना की ससुराल थी, उदयसिंह ने जागीर दी।
चित्तौड़ के राजपरिवार में पन्ना के साथ उसके परिवार का बड़ा सम्मान रहा। उस सम्मान के कारण यह परम्परा बन गई की पन्ना के गांव पांडोली का हाकला गुर्जर परिवार चित्तौड़गढ़ आकर सबसे पहले होली पूजन करता है, तदुपरांत वहां होली दहन किया जाता रहा है देश के आजाद होने तथा भारत में मेवाड़ रियासत के विलय हो जाने तक यह परम्परा निभायी जाती रही। पन्ना के त्याग को  भारत व राजस्थान के इतिहास में राणा प्रताप के संघर्ष की तरह ही  याद किया जाता है।
राजस्थान में पन्ना के नाम से अनेक योजनाएं चलायी गई हैं।
पन्नाधाय जीवन अमृत योजना जो कि (जन -श्री बीमा योजना) के नाम से भी जानी जाती है। यह एक भारत के राजस्थान राज्य की योजना है । इस योजना का शुभारम्भ १४ अगस्त २००६ में जीवन बीमा निगम  के माध्यम से किया गया था। इसमें गरीबी रेखा से नीचे  के परिवार वालों के मुखिया अथवा घर के कमाने वाले सदस्य को नि:शुल्क जीवन बीमा  की सुविधा प्रदान की जाती है।
15 अगस्त सन् 2014के दिन राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने शहीद स्मारक और गोवर्धन सागर तालाब के निकट बोट के आकार में बनाए गए पन्ना बोट म्यूजियम का उद्घाटन किया। यह म्यूजियम पन्ना धाय और मेवाड़ के लिए दिये गये उनके बलिदान को समर्पित है। यहां पर पन्ना का जीवन चरित्र थ्री-डी पिक्चर के द्वारा दिखाया जाता है। 
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ में पन्ना धाय के नाम पर "पन्ना धाय माँ सुभारती नर्सिंग कालेज" बनाया गया है। 
पन्ना धाय के सम्मान में एक राष्ट्रीय अवार्ड "पन्ना धाय अवार्ड" उन लोगों को दिया जाता है जो अपना कर्तव्य निष्ठा पूर्वक निभाते हैं। इस अवार्ड में नकद 25001/00 रुपए,एक शाल तथा एक चांदी का तोरण द्वार प्रतीक स्वरूप दिया जाता है।
सन्दर्भ ग्रंथ 
1-भारत का इतिहास -आशीर्वादी लाल श्री वास्तव। 
2- मोडीलाल बडवे की पोथी (पन्ना का वंश) -मासिक पत्रिका गुर्जर महासभा दिसम्बर 2018पृष्ठ 10,लेखक श्री रामसरन भाटी। 

रविवार, 9 दिसंबर 2018

संसार में भारतीयों का सैनिक चरित्र -लेखक अशोक चौधरी

दुनिया का इतिहास पूछता, मिस्र कहा यूनान कहा है।
घर-घर में शुभ अग्नि जलाता, वो उन्नत ईरान कहा है।।
दीप बुझे पश्चिमी जगत के, व्याप्त हुआ गहरा अंधियारा।
तम की छाती चीर के निकला, फिर से हिन्दुस्तान हमारा।।
-श्री अटल बिहारी वाजपेयी
संसार में मानव सभ्यता का विकास धीरे-धीरे हुआ है। जब मानव समूहों के रूप में संगठित हुआ तथा राजतंत्र की अभिलाषा उत्पन्न हुई तो उसके साथ ही शक्ति के माध्यम से सब चीजें नियंत्रित होने लगी। राजतंत्र के शक्ति के उस युग में शौर्य सेवा सबसे उच्च सेवा के रूप में प्रतिष्ठित हो गई। तब सेना में भर्ती के लिए आज जैसे आधुनिक मापदंड नहीं थे। एक ही वंश या जाति के लोग खून के रिश्ते के आधार पर अपने मुखिया के नेतृत्व में लडते थे, युद्ध में जीत व हार होने पर लाभ व हानि से भी सब लोग ही प्रभावित होते थे। इसी आधार पर ग्राम की संरचना बनी। जो शासन में नेतृत्व करने वाली जातियां थी, गांव की सब जमीन उनके पास होती थी तथा बाकी जातियां सेवा के अन्य कार्य करती थी , जमीन के मालिक ही अन्य लोगों के जीवन की धुरी होते थे।
सम्भवतः भारत ही विश्व में सबसे पहला देश रहा होगा, जहां के मानव ने शक्ति के साथ न्यायप्रिय विचारों को अपने ऊपर स्वीकार किया। इस कारण से ही भारतीय -आर्यावर्त -जम्बू दीप के लोग विश्व के सर्वश्रेष्ठ व चरित्रवान सैनिक के रूप में स्थापित हुए। भारत ने ही ईश्वर की शक्ति को सर्वश्रेष्ठ मानते हुए, भगवान् शिव को अपने आपको समर्पित कर देवो के देव महादेव को मृत्यु का देवता मानते हुए, युद्ध में हर-हर महादेव का नारा लगाकर असंख्य युद्ध लडे।
श्री राम ने विश्वामित्र के साथ वन में तथा वनवास के समय रावण के साथ युद्ध में जिस शौर्य व उच्च सैनिक चरित्र का प्रदर्शन  किया, वह आज तक भी प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। श्री कृष्ण ने महाभारत के युद्ध में कमजोर पक्ष की ओर रहते हुए जो न्याय का मार्ग अपनाया तथा संघर्ष से विमुख हो रहे पांडव सेना के नायक अर्जुन को गीता का उपदेश देकर युद्ध के लिए जिस प्रकार तैयार किया वह आज भी भारत के साथ विश्व के लोगों का मार्गदर्शन कर रहा है।
आज के भारत में जो 2500 वर्ष पूर्व तक का लिखित इतिहास हमारे समक्ष प्रस्तुत है, यदि उसका निष्पक्षता पूर्वक अवलोकन हम करे तो जितना संघर्ष हमारे पूर्वजों ने, अपने जीवन के नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए तथा अपनी सम्पत्ति व सम्मान को बचाने के लिए किया है, शायद ही विश्व में कही हुआ हो।
प्राचीन भारतीय ग्रंथों के अनुसार उत्तर कुरू वर्ष, जिसकी पहचान आज इतिहासकार तारिम घाटी क्षेत्र से करते हैं। इस कुरू वर्ष की पहचान जम्बू दीप से भी करते हैं। प्राचीन भारतीय समस्त जम्बू दीप के साथ एक भौगोलिक व सांस्कृतिक एकता मानते थे। आज भी हवन यज्ञ से पहले ब्राह्मण पुरोहित यजमान से संकल्प कराते समय "जम्बू दीपे भरत खण्डे भारत वर्षे" का उच्चारण करते हैं। अतः जम्बू दीप भारत की पहचान से जुडा रहा है।
ईसा से 500 वर्ष पूर्व जब सिकंदर ने भारत पर हमला किया था, उस समय पौरस ने बड़ी बहादुरी से उसका सामना किया तथा अपने उच्च सैनिक चरित्र से अपने शत्रु सिकंदर को भी प्रभावित किया था। ईसा से 300 वर्ष पूर्व सम्राट अशोक ने अपने जीवनकाल में अनेक युद्ध लडे तथा अपनी सैनिक शक्ति की धाक से विश्व को अवगत कराया। सम्राट अशोक को जम्बू दीप का सम्राट भारतीय अभिधारणा के अनुसार माना जाता है।सन् 74 में सम्राट कनिष्क जम्बू दीप के सम्राट माने गये हैं। सम्राट कनिष्क के साम्राज्य में मध्य एशिया के तत्कालीन बैक्टीया (आधुनिक बल्ख), यारकंद, खोटन एवं कश्गर, आधुनिक अफगानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तरी भारत के क्षेत्र जम्बूदीप में थे। सम्राट कनिष्क अपने साम्राज्य पर चार राजधानियों से शासन करते थे। आधुनिक पेशावर उसकी मुख्य राजधानी थी, मथुरा, त क्षशिला और कपिशा (बे ग्राम) उसकी अन्य राजधानी थी। सम्राट कनिष्क की सैन्य शक्ति का चीन भी उस समय लोहा मानता था। सम्राट कनिष्क के पश्चात भारत में सम्राट हर्षवर्धन, सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, सम्राट मिहिर कुल हूण जैसे शासक हुए जिन्होंने अपनी सैनिक शक्ति का लोहा मनवाया। परन्तु सबसे बड़ा संघर्ष भारत में सन् 730 से प्रारम्भ हुआ, जब अरब से प्रारम्भ इस्लाम की शक्ति ने  अरब, ईरान, ईराक व अफगानिस्तान तक परचम लहरा दिया  और अरब के खलीफा के गवर्नर जुनैद ने सिन्धु नदी को पार कर तत्कालीन गुर्जर देश (वर्तमान राजस्थान व गुजरात) पर हमला कर गुर्जर देश की राजधानी भीनमाल को तहस-नहस कर दिया तथा भारत की सांस्कृतिक एकता के प्रतिक सोमनाथ के मन्दिर को तोड दिया। प्रतिक्रिया में गुर्जर प्रतिहार नागभट्ट प्रथम ने जुनैद को मार डाला तथा उज्जैन को अपनी राजधानी बनायी। सम्राट नागभट्ट द्वितीय ने सन् 815 में सोमनाथ के मन्दिर का पुन:निर्माण कराया तथा अजमेर में पुष्कर तीर्थ का निर्माण कराया और अपनी राजधानी कन्नौज में स्थापित कर गुर्जर प्रतिहार शासन को स्थापित कर दिया जो सम्राट मिहिर भोज के शासन काल में अपने चरम पर था। गुर्जर प्रतिहार राजाओं ने 250 वर्षो तक अरब की सेनाओं को भारत में प्रवेश नहीं करने दिया तथा अरब के हमलों को विफल कर दिया। गुर्जर प्रतिहार शासकों ने अरब की सेनाओं को तो परास्त किया ही, उसके साथ राष्ट्रकूट व पाल राजाओं की सैनिक शक्ति का भी मुकाबला कर अपनी सैनिक सर्वोच्चता का प्रदर्शन किया।
लेकिन सन् 1000 के पश्चात मध्य एशिया में नयी सैनिक तकनीक व हथियारों का निर्माण हुआ। जिसका सफल प्रदर्शन महमूद गजनवी ने किया। उसकी सैनिक शक्ति को रोकने के लिए भारतीयों ने महान त्याग व पराक्रम किया, परन्तु सफलता नहीं मिली महमूद गजनवी हिन्दू कुश के राजा जयपाल, उसके बाद आनंद पाल व गुर्जर प्रतिहार राजा राजपाल को हराकर चला गया। परन्तु भारतीयों ने हिम्मत नहीं हारी, हमारे सैनिक युद्ध के मैदान में मृत्यु का आलिंगन कर वीर गति को प्राप्त तो हो गये लेकिन संघर्ष से विमुख नहीं हुए। गुजरात के रानी नायिका देवी सोलंकी ने सन् 1176 में मोहम्मद गोरी को पराजित कर दिया, सन् 1191 में पृथ्वीराज चौहान ने पुनः मोहम्मद गोरी को तराईन के मैदान में हरा दिया। परन्तु सन् 1192 में मोहम्मद गोरी पृथ्वीराज चौहान को हरा कर दिल्ली में अपना शासन स्थापित करने में कामयाब हो गया।
दिल्ली में विदेशी शासन स्थापित होने के बाद भी भारतीयों ने हार नहीं मानी तथा लगातार अपना संघर्ष जारी रखा। विदेशी सत्ता पर सीधा हमला कर, उसे भगाने का जब कोई रास्ता भारतीयों को नहीं सूझा, तब भारतीय देशभक्तों ने लूट तथा नाश की नीति का अनुसरण किया। जिससे विदेशियों को देश में अपनी सत्ता सुदृढ़ करने का अवसर न मिल सके। इस समय से ही तुर्की व भारतीय सेनानियों में गुरिल्ला युद्ध प्रारम्भ हो गया। सन् 1211 में कुतुबुद्दीन एबक का दामाद इल्तुतमिश दिल्ली का शासक बना। सन् 1228 में इल्तुतमिश ने उच व मुल्तान छीनने के लिए सेना भेजी। रास्ते में सुल्तान की सेना ने व्यास नदी के क्षेत्र में पड़ाव डाला तथा वहाँ की जनता को बहुत तंग किया।शाही सेना के अत्याचार से तंग आकर एक दिन कैथल तथा गहराव के गूजरो ने संगठित होकर सेना के पडाव पर हमला कर दिया तथा शराब के नशे में चूर सेनापति रजि-उल- मुल्क को मार डाला। सन् 1265 से सन् 1287 तक बलबन के शासन काल में भारतीय जनता ने जबर्दस्त संघर्ष किया। विशेषकर दिल्ली के चारों ओर मेवों व गूजरो ने सडकें बंद कर दी। दिल्ली की स्थिति यह हो गई कि भय के कारण मध्याह्न की नवाज के बाद नगर के फाटक बंद हो जाते थे। दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने 28 जनवरी सन् 1303 को चित्तौड़ पर हमला कर अधिकार तो कर लिया। परन्तु इस युद्ध में रावल रतन सिंह गहलोत तथा उनके सेनानायक गोरा-बादल ने जिस बहादुरी का प्रदर्शन किया, उसके किस्से आज तक भी गांव देहात में रागनियों के माध्यम से राजस्थान ही नहीं पूरे उत्तरी भारत में सुनाये जाते हैं। इस युद्ध में लगभग 30000 भारतीय शहीद हुए। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद सन् 1321 में गहलोत वंश के हम्मीर देव ने हमला कर चित्तौड़ सहित पूरे मेवाड़ को आजाद करवा लिया। सन् 1398 में समरकंद के शासक तैमूर ने भारत पर हमला कर दिया। दिल्ली पर इस समय तुगलक वंश का शासन था, भारतीय इतिहासकारों ने तैमूर के हमले को ईश्वर का प्रकोप (खुदा का कहर) कहा है। 17 दिसंबर सन् 1398 को तैमूर ने तुगलक को युद्ध में पराजित कर दिया, पराजित होने पर तुगलक गुजरात तथा उसका प्रधानमंत्री मल्लू इकबाल बुलंदशहर को भाग गया। शाही सेना के परास्त होने के बाद तैमूर के अत्याचार से पीडि़त जनता ने अपनी रक्षा के लिए स्वयं हथियार उठा लिए। वर्तमान हरियाणा में तैमूर के साथ पहला संघर्ष अहीरो ने किया, जिसमें हजारों की संख्या में अहीर शहीद हो गए। जिला रोहतक के बादली गांव के गुलिया खाप के जाट योद्धा हरवीर सिंह गुलिया तथा हरिद्वार के निकट गांव पथरी के जोगराज सिंह गूजर ने दिल्ली मेरठ व हरिद्वार में तैमूर की सेना पर लगातार हमले किए। इस क्षेत्र के रहने वाले जाट व गूजर किसानों ने प्रशिक्षण प्राप्त तैमूर की सेना का डटकर मुकाबला किया तथा अपने नायक जोगराज सिंह गूजर व हरवीर सिंह गुलिया सहित हजारों की संख्या में बलिदान दिया।
सत्ता संघर्ष की इस भगदड़ में भारत के सैनिक इतिहास में एक नया मोड़ सन् 1433 में आया, तब सिसौदिया वंश के राणा कुम्भा मेवाड़ के शासक बने। राणा कुम्भा का भारत के राजाओं में उच्च स्थान है। गुर्जर प्रतिहारो के पतन के बाद के राजा अपनी स्वतंत्रता की जहां-तहां रक्षा कर सके थे। परन्तु राणा कुम्भा ने भारतीय राजाओं को एक शक्तिशाली नेतृत्व प्रदान किया। राणा कुम्भा ने 32 दुर्ग बनवाये। जिसमें कुम्भल गढ़ का विशाल दुर्ग भी है। जिसकी दीवार चीन की दीवार के बाद विश्व में दूसरे नंबर की है। राजा बनने के सात वर्षों के अंदर ही राणा कुम्भा ने सारंगपुर, नागौर, नराणा, अजमेर, मंडोर, बूंदी, खाटू आदि के सुदृढ़ किलो को जीत लिया। मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी को हराकर चित्तौड़ में कीर्ति स्तम्भ बनाया। दिल्ली के सुल्तान सैयद मुहम्मद शाह और गुजरात के सुल्तान अहमद शाह को भी परास्त किया। उन्हें चित्तौड़ दुर्ग का आधुनिक निर्माता भी कहा जाता है वर्तमान में चित्तौड़ दुर्ग के अधिकांश भाग का निर्माण भी कराया। इस प्रकार आधुनिक राजस्थान का अधिकांश और गुजरात, मालवा तथा दिल्ली के कुछ भाग जीतकर राणा कुम्भा ने मेवाड़ को महा राज्य बना दिया ।   परन्तु राणा कुम्भा के बड़े बेटे उदय सिंह प्रथम ने सन् 1468 में उनकी हत्या कर दी। सन् 1526 में बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली पर कब्जा कर लिया। इस समय राणा सांगा मेवाड़ के शासक थे। दिल्ली पर कब्जे को लेकर राणा सांगा व बाबर में युद्ध होना ही था, पहला आमना-सामना बयाना में हुआ, इस युद्ध में राणा सांगा ने बाबर को परास्त कर दिया। सन् 1527 में खानवा का प्रसिद्ध युद्ध हुआ। इस युद्ध में पराक्रम के स्थान पर बाबर की राजनैतिक चतुराई की जीत हुई। रायसीना रियासत का राजा राय सिलहदी  युद्ध प्रारम्भ होते ही अपनी 35000 की सेना लेकर बाबर की ओर चला गया। जिससे युद्ध का रूख ही बदल गया। राणा सांगा युद्ध हार गए। भारत में मुगल सत्ता की नींव पड गई। सन् 1528 में राणा सांगा की मृत्यु हो गई। राणा सांगा का अल्प वयस्क पुत्र कुंवर विक्रम राजा बना, रानी कर्मवती शासन की देखरेख करने लगी। सन् 1535 में गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर हमला कर दिया, राज्य के शुभचिंतकों की सलाह पर रानी कर्मवती ने अपने दोनों पुत्रों विक्रम व उदय सिंह को अपने पीहर बूंदी, अपनी विश्वसनीय पन्ना के साथ भेज दिया। पन्ना का पति व पिता बाबर के साथ खानवा के युद्ध में शहीद हो गए थे। पन्ना बडी बहादुर, घुड़सवारी व शस्त्र चलाने में निपुण व वफादार प्रवृत्ति की गूजर जाति की महिला थी। बहादुर शाह के साथ युद्ध में चित्तौड़ का पतन हो गया। रानी कर्मवती ने जौहर कर आत्मबलिदान कर दिया। बहादुर शाह का कब्जा चित्तौड़ से हटने के बाद विक्रम सिंह पुनः राजा बन गया। अल्प आयु होने के कारण बनवीर कार्यवाहक राजा बन गया। पन्ना बालक उदयसिंह की राजधाय बना दी गई। बनवीर स्वयं मेवाड़ का शासक बनने के लिए षडयंत्र करने लगा। बनवीर ने मौका देख कुंवर विक्रम सिंह को मौत के घाट उतार दिया। वह उदयसिंह को मारने के लिए निकल पड़ा। परन्तु जैसे ही विक्रम की हत्या की सूचना पन्ना को प्राप्त हुईं, वह उदयसिंह की रक्षा के लिए उठ खड़ी हुई, पन्ना का सैनिक चरित्र, उसके धाय के चरित्र पर हावी हो गया। पन्ना ने मेवाड़ के असिमित साधनों के स्वामी बनवीर की योजना को ध्वस्त कर दिया, भले ही इस संघर्ष में उसके बेटे चंदन का बलिदान हो गया। पन्ना ने उदयसिंह पर आंच न आने दी। एक महिला के साहस का ऐसा उदाहरण विश्व के इतिहास में इक्का-दुक्का ही मिलता है।
यह वह समय था जब भारत में शेरशाह सूरी व हुमायूं का सत्ता संघर्ष चल रहा था, भारतीय दोनों ओर से सत्ता में सहायक की भूमिका निभा रहे थे। शेरशाह सूरी ने हुमायूं को भारत से बाहर निकाल दिया था, शेरशाह सूरी के सहयोग में एक भारतीय हेमू जो धूसर जाति का व्यापार करने वाला व्यक्ति था, ने विषेश भूमिका निभाई थी। शेरशाह सूरी की मृत्यु के पश्चात हेमू भारत का बादशाह बन गया था, उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण कर ली थी। लेकिन वह मुश्किल से 15 दिन ही शासक रहा। अकबर के संरक्षक बैरम खां ने पानीपत के युद्ध में हराकर हेमू का वध कर दिया। अब दिल्ली पर पुनः मुगलों का अधिकार हो गया। अकबर भारत पर शासन करना चाहता था, अतः मेवाड़ के शासक राणा उदय सिंह, जो राजधानी चित्तौड़ में थे, से युद्ध आवश्यक था।  अकबर ने चित्तौड़ का घेरा डाल दिया। राणा उदयसिंह के रिश्तेदार जयमल राठौड़ व गल्ला राठौड़ तथा पत्ता सिसोदिया ने युद्ध की कमान सम्भाल ली। राणा उदयसिंह व राणा प्रताप को किले से सुरक्षित बाहर निकाल दिया गया। अकबर ने चित्तौड़ को जीत लिया, परन्तु इस युद्ध में जयमल राठौड़ व गल्ला राठौड़ तथा पत्ता सिसोदिया ने 25 फरवरी सन् 1568 को जो वीरता का प्रदर्शन कर शहादत दी, उससे अकबर भी प्रभावित हुए बिना न रह सका। अकबर की समझ में आ गया कि वह बलपूर्वक भारतीयों को सत्ता से हटा तो सकता है, परन्तु भारत में भारतीयों के बिना सहयोग के शासन नहीं कर सकता। अब दूसरे राजाओं से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर मुगल सल्तनत के साथ सन्धि प्रारम्भ की गई। परन्तु उदयपुर के शासक राणा प्रताप ने अकबर से किसी प्रकार की सन्धि नहीं की। इसी कारण 15 जून सन् 1576 को हल्दीघाटी का प्रसिद्ध युद्ध हुआ। इस युद्ध में राणा प्रताप की अपार हानि हुई। राणा प्रताप के बहनोई शालिवाहन तोमर जो ग्वालियर के राजा थे इस युद्ध में अपने पिता, भाई व पुत्रों सहित शहीद हो गए। राणा प्रताप के 500 रिश्तेदार इस युद्ध में शहीद हुए। परन्तु राणा प्रताप ने भामाशाह द्वारा दी गई आर्थिक मदद (20000 सोने की गिन्नी तथा 25 लाख रूपये) से पुनः सेना बना कर आजीवन युद्ध किया तथा चित्तौड़ को छोड़कर उदयपुर सहित अपना भू-भाग अकबर से वापस छीन लिया। उस समय मे राणा प्रताप भारतीयों के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी के रूप में सामने आए। राणा प्रताप की मृत्यु के बाद उनके बेटे अमर सिंह ने जहांगीर से संधि की। भारतीय राजाओं को मुगल दरबार में उच्च पद दिये गये। अकबर की मृत्यु के बाद मुगल बादशाह जहांगीर जो आमेर की राजकुमारी जोधाबाई/हरकाबाई के पुत्र थे, तथा बादशाह शाहजहां मारवाड़ (जोधपुर) की राठौड़ राजकुमारी जगत गोसाईं के पुत्र थे, भारत के सम्राट बने। इन हालातों में राजपूत राजाओं ने मुगल सल्तनत को भारत में स्थापित करने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई। मुगल सत्ता में भारतीय (राजपूत) एक प्रकार से बराबर के हिस्सेदार बन गए।जहांगीर के समय में गुरू अर्जुन देव के बलिदान की घटना से टकराव बनना प्रारम्भ हो गया, परन्तु औरंगजेब के सम्राट बनने के बाद तथा आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह की मृत्यु के बाद भारत की बहुसंख्यक हिन्दू जनता के साथ मुगल सत्ता का टकराव प्रारम्भ हो गया। औरंगजेब ने समस्त हिन्दू जनता, जिसमें मुगल सत्ता को स्थापित करने वाले राजपूत शासक भी थे, जजिया कर लगा दिया। औरंगजेब सम्पूर्ण भारतीय जनता का इस्लामीकरण चाहता था, बादशाह के ऐसे प्रयास देख, देश की जनता ने जगह-जगह विद्रोह कर दिया। मथुरा के गोकुल जाट ने गूजर व मेव किसानों के सहयोग से मुगल सत्ता पर हमला कर दिया, इस संघर्ष में गोकुल जाट सहित सैकड़ों किसानों का बलिदान हो गया।महाराष्ट्र में शिवाजी के नेतृत्व में भारतीयों ने संघर्ष प्रारम्भ कर दिया। सन् 1672 में सलहेर के युद्ध में शिवाजी के सेनापति प्रताप राव गूजर के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने आमने-सामने की लड़ाई में मुगल सेना को बुरी तरह परास्त कर दिया। सन् 1673 में उमरानी के युद्ध में मराठा सेनापति प्रताप राव गूजर ने आदिलशाह की सेना को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया। 27 फरवरी सन् 1674 को नैसरी के युद्ध में मराठा सेनापति प्रताप राव गूजर का बलिदान हो गया। जून 1674 में शिवाजी का राज्याभिषेक हो गया। सन् 1675 में गुरू तेगबहादुर का बलिदान होने से सिक्ख मुगल सत्ता से दो-दो हाथ करने के लिए मजबूर हो गये।सन् 1680 में औरंगजेब भारी-भरकम सेना के साथ महाराष्ट्र की ओर चल दिया। औरंगजेब के दक्षिण जाते ही मथुरा के जाटों ने राजाराम के नेतृत्व में मुगल सत्ता पर आक्रमण कर मुगल सेनानायक युगीर खां को मार डाला। इस संघर्ष में राजाराम की हजारों किसानों के साथ शहादत हो गई। दक्षिण में पहुँचते ही औरंगजेब ने तीन दिन में ही आदिल शाही व कुतुब शाही को समाप्त कर दिया। परन्तु मराठा सम्भा जी के नेतृत्व में मुगल सेना से जमकर लडे। सन् 1687 में मराठा सेनापति हम्मीर राव मोहिते सतारा के पास युद्ध में शहीद हो गए। सन् 1689 को सम्भा जी भी शहीद हो गए। अब मराठा सेना की कमान शिवाजी के छोटे बेटे राजाराम ने सम्भाल ली। सन् 1699 में गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना कर सिक्खों का सैन्यकरण कर दिया तथा मुगल सत्ता के विरुद्ध खुला संघर्ष छेड़ दिया। सन् 1700 में शिवाजी के छोटे बेटे राजाराम की मृत्यु हो गई। अब मराठों की ओर से युद्ध की कमान राजाराम की पत्नी ताराबाई ने सम्भाल ली। सन् 1707 में औरंगजेब दक्षिण में मराठों से लडते हुए ही मर गया। अब मुगल बादशाह ने शांति कायम करने के लिए भारतीयों से संधि प्रारम्भ कर दी। शिवाजी के पोते साहू जी महाराज को मुगल कैद से आजाद कर छत्रपति की मान्यता दे दी पेशवा का पद पैतृक कर पेशवा को ही प्रधानसेनापति बना दिया गया । भरतपुर के जाट नेता चूडामण से भी सन्धि कर ली गई। औरंगजेब 27 वर्ष दक्षिण में रहा, इतने लम्बे समय तक उत्तर भारत में राजनीतिक शक्ति मुख्य रूप से भारतीयों (राजपूतों) के हाथों में रही। राजपूत स्वयं सम्राट भले ही न रहे हो, परन्तु भारतीय जनता के वे ही शासक रहे। भारतीय जनमानस में राजपूत शब्द की ऐसी छाप पडी कि जो राजपूत जाति के भी नहीं थे वो अपने आगे राजपूत नाम लगाने लगे। जैसे लोधा राजपूत, रवा राजपूत, मेढ राजपूत, कश्यप राजपूत आदि।
सम्राट औरंगजेब की मृत्यु के बाद कुछ शांति हुई, परन्तु सिक्खों के साथ संघर्ष कम नहीं हुआ। गुरु गोविंद सिंह जी की मृत्यु के बाद सिक्खों की कमान बंदा बैरागी ने सम्भाल ली। बंदा बैरागी ने सर हिन्द के नबाब वजीर खा को मार डाला जो गुरु पुत्रों की हत्या का दोषी था।

बन्दा सिंह ने अपने राज्य के एक बड़े भाग पर फिर से अधिकार कर लिया और इसे उत्तर-पूर्व तथा पहाड़ी क्षेत्रों की ओर लाहौर और अमृतसर की सीमा तक विस्तृत किया। 1715 ई. के प्रारम्भ में बादशाह फ़र्रुख़सियर की शाही फ़ौज ने अब्दुल समद ख़ाँ के नेतृत्व में उन्हें गुरुदासपुर ज़िले के धारीवाल क्षेत्र के निकट गुरुदास नंगल गाँव में कई मास तक घेरे रखा। खाद्य सामग्री के अभाव के कारण उन्होंने 7 दिसम्बर को आत्मसमर्पण कर दिया। फ़रवरी 1716 को 794 सिक्खों के साथ वह दिल्ली लाये गए जहाँ 5 मार्च से 12 मार्च तक सात दिनों में 100 की संख्या में सिक्खों की हत्या की जाती रही । 16 जून को बादशाह फ़ार्रुख़शियार के आदेश से बन्दा सिंह तथा उनके मुख्य सैन्य-अधिकारियों की हत्या कर दी गई ।कुछ समय के लिए सिक्ख नेतृत्व विहिन हो गये। उधर मराठा शक्ति बढने लगी। जिस कारण मुगल बादशाह से टकराव की स्थिति बन गई। सन् 1737 में भोपाल के पास युद्ध में पेशवा बाजीराव ने मुगल सेना जो आमेर के राजा जयसिंह द्वितीय के नेतृत्व में थी को हरा कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर दिया। पेशवा जो कि ब्राह्मण थे ने सन् 1750 में अल्प वयस्क छत्रपति पर दबाव बना कर पूरी शक्ति अपने हाथ में ले ली तथा हेडक्वार्टर सतारा से बदल कर पूना में ले आये।
1748 और 1765 के बीच सिक्खों के बुड्ढा और तरुण दलों के पाँचों जत्थों ने द्रुत गति से अपना प्रसार किया और अनेक राज्यसंघ बने जो मिसलें कहलाई। निम्नलिखित 12 मिसलें मुख्य थीं :
(1) भंगी- इसे छज्जासिंह ने स्थापित किया, बाद में भन्नासिंह और हरिसिंह ने भंगी मिसल का नेतृत्व किया। इसके केन्द्र अमृतसर, रावलपिंडी और मुलतान आदि स्थानों में थे।
(2) अहलूवालिया- जस्सासिहं अहलूवालिया के नेतृत्व में स्थापित हुई। इसका प्रधान केंद्र कपूरथला था।
(3) रामगढ़िया- इस समुदाय को नंदसिंह संघानिया ने स्थापित किया। बाद में इसका नेतृत्व जस्सासिंह रामगढ़िया ने किया इसके क्षेत्र बटाला, दीनानगर तथा जालंधर दोआब के कुछ गाँव थे।
(4) नकई- लाहौर के दक्षिण-पश्चिम में नक्का के हरिसिंह द्वारा स्थापित।
(5) कन्हैया- कान्ह कच्छ के जयसिंह के नेतृत्व में गठित इस मिसलश् के क्षेत्र गुरदासपुर, बटाला, दीनानगर थे। यह रामगढ़िया मिसल में मिला जुला था।
(6) उल्लेवालिया- गुलाबसिंह और तारासिंह गैवा के नेतृत्व में यह मिसल थी। राहों तथा सतलुज के उत्तर-दक्षिण के इलाके इसके मुख्य क्षेत्र थे।
(7) निशानवालिया- इसके मुखिया संगतसिंह और मोहरसिंह थे। इसके मुख्य क्षेत्र अंबाला तथा सतलुज के दक्षिण और दक्षिण पूर्व के इलाके थे।
(8) फ़ैजुल्लापुरिया (सिंहपुरिया)- नवाब कपूर सिंह द्वारा स्थापित, जालंधर और अमृतसर जिले इसके क्षेत्र थे।
(9) करोड़सिंहिया- 'पंज गाई' के करोड़ सिंह द्वारा स्थापित। बाद में बघेलसिंह इसके मुखिया हुए। कलसिया के निकट यमुना के पश्चिम और होशियारपुर जिले में इस मिसल के क्षेत्र थे।
(10) शहीद- दीपसिंह इस मिसल के अगुआ थे। बाद में गुरुबख्शसिंह ने उत्तराधिकार ग्रहण किया। दमदमा साहब और तलवंडी साबो इस मिसल के मुख्य केन्द्र थे।
(11) फूलकियाँ- पटियाला, नाभा और जींद के सरदारों के पूर्वज फूल के नाम पर स्थापित।
(12) सुक्करचक्किया- चढ़तसिंह ने अपने पूर्वजों के निवास ग्राम सुक्करचक के नाम पर स्थापित किया।


अब मुगल सत्ता नाम मात्र की ही रह गई थी,दिल्ली के निकट मेरठ के किला-परि क्षत गढ में राजा जैत सिंह नागर तथा हरिद्वार के निकट लंढोरा में राजा मनोहर सिंह को मुगल बादशाह द्वारा राजा की मान्यता देनी पड़ी।

इस संघर्ष के समय में भारत में यह सनातन संस्कृति की मान्यता बनी कि क्षत्रियों के 36 कुलों/जातियों ने जिनके नेतृत्व में समस्त भारतीय थे,ने लगातार विदेशी हमलावरों से संघर्ष किया। भारत के जब आज भी किसी अन्याय के विरोध में खड़े होते हैं तो 36 जातियों का ही नारा लगाते हैं।इन 36 जातियों की तीन सूची अब तक प्राप्त हुई है।जो निम्न है -

प्रसिद्ध इतिहासकार श्री चिंतामणि विनायक वैद्य ने पृथ्वीराज रासो वर्णित पद्य को अपनी पुस्तक 'मिडाइवल हिन्दू इण्डिया' में 36 शाखाओं का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि रवि, राशि और यादव वंश तो पुराणों में वर्णित वंश है, इनकी 36 शाखाएँ हैं। एक ही शाखा वाले का उसी शाखा में विवाह नहीं हो सकता। इसे नीचे से ऊपर की ओर पढ़ने से क्रमशः निम्न शाखाएँ हैः 1. काल छरक्के 'कलचुरि' यह हैहय वंश की शाखा है। 2. कविनीश 3. राजपाल 4. निकुम्भवर धान्यपालक 6. मट 7. कैमाश 'कैलाश' 8. गोड़ 9. हरीतट्ट 10. हुल-कर्नल टॉड ने इसी शाखा को हुन लिख दिया है जिससे इसे हूणों की भा्रंति होती है। जबकि हुल गहलोत वंश की खांप है। 11. कोटपाल 12. कारट्टपाल 13. दधिपट-कर्नल टॉड साहब ने इसे डिडियोट लिखा है। 14. प्रतिहार 15. योतिका टॉड साहब ने इसे पाटका लिखा है। 16. अनिग-टॉड साहब ने इसे अनन्ग लिखा है। 17. सैन्धव 18. टांक 19. देवड़ा 20. रोसजुत 21. राठौड़ 22. परिहार 23. चापोत्कट 'चावड़ा' 24. गुहीलौत 25. गोहिल 26. गरूआ 27. मकवाना 28. दोयमत 29. अमीयर 30. सिलार 31. छदंक 32. चालुक्य 'चालुक्य' 33. चाहुवान 34. सदावर 35. परमार 36. ककुत्स्थ ।


श्री मोहनलाला पांड्या ने इस सूची का विश्लेषण करते हुए ककुत्स्थ को कछवाहा, सदावर को तंवर, छंद को चंद या चंदेल, दोयमत को दाहिमा लिखा है। इसी सूची में वर्णित रोसजुत, अनंग, योतिका, दधिपट, कारट्टपाल, कोटपाल, हरीतट, कैमाश, धान्यपाल, राजपाल आदि वंश आजकल नहीं मिलते। जबकि आजकल के प्रसिद्ध वंश वैस, भाटी, झाला, सेंगर आदि वंशों की इस सूची में चर्चा ही नहीं हुई।


मतिराम के अनुसार छत्तीस कुल की सूची इस प्रकार है:-

1. सुर्यवंश 2. पेलवार 3. राठौड़ 4. लोहथम्भ 5. रघुवंशी 6. कछवाहा 7. सिरमौर 8. गहलोत 9. बघेल 10. काबा 11. सिरनेत 12. निकुम्भ 13. कौशिक 14. चन्देल 15. यदुवंश 16. भाटी 17. तोमर 18. बनाफर 19. काकन 20.रहिहोवंश 21. गहरवार 22. करमवार 23. रैकवार 24. चंद्रवंशी 25. शकरवार 26. गौर 27. दीक्षित 28. बड़वालिया 29. विश्वेन 30. गौतम 31. सेंगर 32. उदयवालिया 33. चैहान 34. पडि़हार 35. सुलंकी 36. परमार। इन्होनें भी कुछ प्रसिद्ध वंशों को छोड़कर कुछ नये वंश लिख दिये है। इन्होंने भी प्रसिद्ध बैस वंश को छोड़ दिया है।


कर्नल टॉड के पास छत्तीस कुलों की पाँच सूचियाँ थी जो उन्होंने इस प्रकार प्राप्त की थी:-

यह सूची उन्होंने मारवाड़ के अंतर्गत नाडौल नगर के एक जैन मंदिर के यती से ली थी। यह सूची यती जी ने किसी प्राचीन ग्रंथ से प्राप्त की थी।

यह सूची उन्होंने अन्तिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चैहान के दरबारी कवि चन्दबरदाई के महाकाव्य पृथ्वीराज रासों से ग्रहण की थी।

यह सूची उन्होंने कुमारपाल चरित्र से ली थी। यह ग्रंथ महाकवि चन्दबरदाई के समकालीन जिन मण्डोपाध्याय कृत हैं। इसमें अनहिलावाड़ा पट्टन राज्य का इतिहास है।

यह सूची खींचियों के भाट से मिली थीं

पाँचवीं सूची उन्हें भाटियों के भाट से मिली थी।


इन सभी सूचियों से सामग्री निकालकर उन्होंने यह सूची प्रकाशित की थी:-

1. ग्रहलोत या गहलोत 2. यादु (यादव) 3. तुआर 4. राठौर 5. कुशवाहा 6. परमार 7. चाहुवान या चैहान 8. चालुक या सोलंकी 9. प्रतिहार या परिहार 10. चावड़ा या चैरा 11. टाक या तक्षक 12. जिट 13. हुन या हूण 14. कट्टी 15. बल्ला 16. झाला 17. जैटवा, जैहवा या कमरी 18. गोहिल 19. सर्वया या सरिअस्प 20. सिलार या सुलार 21. डाबी 22. गौर 23. डोर या डोडा 24. गेहरवाल 25. चन्देला 26. वीरगूजर 27. सेंगर 28. सिकरवाल 29. बैंस 30. दहिया 31. जोहिया 32. मोहिल 33. निकुम्भ 34. राजपाली 35. दाहरिया 36. दाहिमा।

जब हम इन तीनों सूचियों का अध्धयन करते हैं तो देखते हैं कि प्रत्येक सूची में जातियों के नाम अलग है।जो इस बात को प्रमाणित करता है कि भारत के सनातन धर्म में वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित थी, यदि जन्म पर आधारित होती तो प्रत्येक सूची में जातियों के नाम जुड़ तो सकते थे, परंतु हटते नही।


सन् 1757 में प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों ने राजनीतिक साजिश कर मीरजाफर की सहायता से बंगाल पर अधिकार कर भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का प्रारम्भ कर दिया। ऐसी परिस्थिति में दिल्ली में मुस्लिम सत्ता को बनाए रखने के लिए रूहेला सरदार नजीबुद्दोला ने अफगान के शासक अहमदशाह अब्दाली को बुला लिया। सन् 1761 मे मराठो और अब्दाली के बीच पानीपत में घमासान युद्ध हुआ। जिसमें मराठा सेना हार गई। अफगानो का भय ज्यादा समय तक नहीं रहा। सन् 1763 में भरतपुर के राजा सूरजमल तथा उनके बाद उनके बेटे जवाहर सिंह ने होल्कर व सिक्खों को साथ लेकर  दिल्ली पर हमला बोल दिया। सन् 1771 में मराठो ने पुनः अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए महादजी शिंदे (सिंधिया) ने दिल्ली से अफगान शासन का अंत कर मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय को गद्दी पर बैठा दिया। मुगल बादशाह अब नाम का ही शासक था। सन् 1783 में करोड़सिंहिया मिसल के नायक जट सिक्ख बघेल सिंह ने 30 हजार की सेना लेकर दिल्ली पर हमला कर दिया। दिल्ली पहुंच कर जहां बघेल सिंह की सेना रूकी वहां आज तीस हजारी कोर्ट स्थापित है। अहलूवालिया मिसल के जस्सा सिंह अहलूवालिया व बघेल सिंह ने लाल किले पर कब्जा कर खालिस्तानी ध्वज फहरा दिया। बघेल सिंह नौ महीने दिल्ली पर काबिज रहा तथा उसने दिल्ली में सात गुरुद्वारों का निर्माण कराया। जो निम्न है -गुरूद्वारा माता सुंदरी, गुरुद्वारा बंगला साहिब, गुरूद्वारा रकाबगंज, गुरूद्वारा शीशगंज, गुरूद्वारा मजनू का टीला, गुरूद्वारा बाला साहिब, गुरूद्वारा मोतीबाग। रूहेला सरदार नजीबुद्दोला के पोते गुलाम कादिर ने दिल्ली पर कब्जा कर मुगल बादशाह की आंख फोड़ कर अंधा कर दिया। मराठा महादजी शिंदे ने गुलाम कादिर पर आक्रमण कर मार डाला तथा अक्टूबर 1789 में अंधे शाहआलम को पुनः दिल्ली की गद्दी पर बैठा दिया। सन् 1801 में महाराजा रणजीत सिंह पंजाब के राजा बन गए।सन् 1802 में रणजीत सिंह ने सियालकोट पर अधिकार कर लिया। सन् 1803 में द्वितीय मराठा और अंग्रेज़ों के मध्य हुए युद्ध में अंग्रेज जीत गए। दिल्ली के आसपास का इलाका अंग्रेजों के अधीन हो गया। सन् 1806 में महाराजा रणजीत सिंह ने अंग्रेजों से संधि कर ली कि वह सतलज नदी के पार दखल नहीं देंगे। अँग्रेज उनके क्षेत्र में दखल न दे। महाराजा रणजीत सिंह के सेनापति हरि सिंह नलवा ने सन् 1807 में कसूर, सन् 1818 में मुल्तान को जीत लिया। इधर सन् 1818 में अंग्रेजों ने पेशवा को परास्त करने के लिए तत्कालीन छत्रपति प्रताप सिंह को विश्वास में लेकर पेशवा पद को समाप्त करवा दिया। अब संघर्ष के समय गायकवाड़, होल्कर सहित अन्य मराठा पेशवा से अलग हट गए, इन परिस्थितियों में अंग्रेजों ने पेशवा को परास्त कर सम्पूर्ण क्षेत्र अपने अधिकार में ले लिया। राजस्थान की तथा देश की अन्य रियासतों ने ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि कर अधिनता स्वीकार कर ली। मुगल सत्ता का भार उतरा भी न था कि अंग्रेजी सत्ता का अतिक्रमण हो गया। लेकिन भारतीयों ने अंग्रेजी सत्ता का तुरंत विरोध प्रारंभ कर दिया। सन् 1822 में वर्तमान हरिद्वार जिले में स्थित कुंजा-बहादुरपुर के गूजर किसानों ने अपने नेता विजय सिंह - कल्याण सिंह के नेतृत्व में सशस्त्र संघर्ष किया। इस संघर्ष में विजय सिंह - कल्याण सिंह सहित सैकड़ों किसानों की शहादत हो गई। सन् 1834 में हरि सिंह नलवा ने पेशावर सन् 1836 में खैबर हिल्स में जमरूद को जीत लिया। नलवे ने अफगान सेना को खैबर दर्रे के उस पार खदेड़ दिया। जहां से भारत पर सैकड़ों वर्ष से हमले होते आ रहे थे। सन् 1839 में शेरे पंजाब महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई। महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद खालसा सेना में अव्यवस्था फैल गई और सन् 1845 में अंग्रेजों और सिक्खों के बीच युद्ध हुआ। आपसी मनमुटाव के कारण सिक्ख सेना के सेनापति लाल सिंह अपनी सेना लेकर लाहौर चले गए। जम्मू के राजा गुलाब सिंह का झुकाव भी अंग्रेजों की ओर हो गया। अंग्रेज राजनैतिक पेतरेबाजी से युद्ध जीत गये। अंग्रेजों ने सिक्खों पर डेढ़ करोड़ रुपये का युद्ध जुर्माना लगाया। 50 लाख रूपये तो सिक्खों ने दे दिए। कश्मीर व लेह-लद्दाख का क्षेत्र 75 लाख रुपये में जम्मू के राजा गुलाब सिंह को दे दिया गया। अब सम्पूर्ण भारत पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया था। लेकिन अंग्रेज भारतीयों के सैनिक चरित्र से अनजान थे जिसका प्रकटीकरण सन् 1857 की 10 मई को मेरठ में हुआ। मेरठ की छावनी में अंग्रेज सैनिक भारतीय सैनिकों से अधिक थे। हथियार भी अंग्रेज सैनिकों के पास अधिक थे, लेकिन मेरठ के सदर कोतवाली के कोतवाल धन सिंह गुर्जर के माध्यम से पूरी गुर्जर जाति ने मेरठ में सेना का सहयोग कर हमला कर दिया। 27 जून 1857 को किला परि क्षत गढ़ के क्रांतिकारी राव कदम सिंह ने बरेली के क्रांतिकारी नेता बखत खां की सेना को गंगा पार करा कर दिल्ली जाने का मार्ग साफ कर दिया। मेरठ में दो जेल 10 मई की रात को तोड दी गई। नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंस (आधुनिक उत्तर प्रदेश) में 27 जेल तोड दी गई। पूरे भारत में 41 जेल तोड दी गई, भारत में सन् 1857 में एक लाख पचास हजार भारतीय सैनिक थे। 45 हजार अँग्रेज सिपाही थे, 70 हजार भारतीय सैनिकों ने क्रांति में भागीदारी की, लेकिन इन 70 हजार सैनिकों के साथ जब भारतीय जनता ने भागीदारी की तो इस क्रांति पर काबू पाने के लिए एक लाख बारह हजार सैनिक यूरोप से बुलाये गए, तीन लाख चालीस हजार सैनिक भारत से ही भर्ती किए गए।भारत को आजाद कराने के लिए बहादुर शाह जफर द्वितीय, मिर्जा मुगल, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, नाना साहब पेशवा, ब्रिजिश कदर,तात्या टोपे, बेगम हजरत महल, अवध, बाबू कुंवर सिंह, बल्लभगढ़ के नाहर सिंह, राव तुलाराव, शाहमल सिंह, दादरी के उमराव सिंह भाटी जी-जान से लडे, वही कुछ रजवाड़े खुलकर अंग्रेजों के साथ खडे हो गए। जिनमें जयपुर, बीकानेर, मारवाड़ (जोधपुर), रामपुर, कपूरथला, नाभा, भोपाल, सिरोही, मेवाड़ (उदयपुर), पटियाला, सिरमौर, अलवर, भरतपुर, बूंदी, जावरा, बीजावर, अजयगढ, रीवा, केन्दूझांड, हैदराबाद, कश्मीर मुख्य रूप से थे। एक नवंबर सन् 1858 तक चले इस युद्ध में लगभग तीन लाख भारतीय शहीद हुए। भारतीय अंग्रेजों को भारत से तो बाहर ना कर पाए, परन्तु ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से सत्ता निकल कर रानी विक्टोरिया के हाथ में चली गई।सन् 1891 में अंग्रेजी शासन ने एक सेंसस कराया। भारतीयों के सैनिक चरित्र को लेकर सन् 1891 की भारतीय जनगणना  तथा ब्रिटिश भारत काल में प्रचलित ‘यौद्धा जाति सिद्धांत’ ‘मार्शल रेस थ्योरी’ काफी महतवपूर्ण है। सन् 1891 की भारतीय जनगणना में खास बात यह थी की इसमें व्यवसाय के आधार पर जनसख्या की गिनती की गई थी | 1891 की भारतीय जनगणना के उच्च आयुक्त ए. एच. बैंस ने भारतीय जनसख्या को कृषक, पशुपालक, पेशेवर, व्यापारी, कारीगर, घुमंतू आदि 21 वर्गों में विभाजित किया हैं| इसमें प्रथम कृषक वर्ग (Agricultural Class) को पुनः तीन भाग में विभाजित किया गया हैं- 1. सैनिक एवं प्रभू जाति  (Military and Dominant) 2. अन्य कृषक (Other Cultivators) 3. खेत मजदूर (Field Labourers). ए. एच. बैंस लिखते हैं कि जनसख्या का 30% भाग कृषक वर्ग के अंतर्गत आता हैं, जिसके प्रथम सैनिक भाग में वो जातियां और कबीले आते हैं जो इतिहास के विभिन्न कालो में अपने प्रान्तों में शासन किया हैं|1891 की भारतीय जनगणना में  सैनिक एवं प्रभू जातियां जनसख्या का लगभग 10 % थी|
1891 की भारतीय जनगणना की जनरल रिपोर्ट के अनुसार भारत में चौदह सैनिक जातियां और कबीले हैं| 1. राजपूत  (Rajput)
2. जाट (Jat) )
3. गूजर (Gujar)
4. मराठा (Maratha) 
5. बब्बन (Babban)
6. नायर (Nair)
7. कल्ला (Kalla)
8. मारवा (Marwa)
9. वेल्लमा (Vellama)
10.  खंडैत (khandait)
11.  अवान (Awan)
12.  काठी (Kathi)
13.  मेव (Meo)
14. कोडगु (Kodagu)
उन्नीसवी शताब्दी के अंतिम तथा बीसवी शताब्दी के आरभिक दशको में भारतीय सेना के उच्च अधिकारियो का एक वर्ग यह मानता था कि भारत में कुछ जातियां और कबीले अन्यो से अधिक लडाकू योद्धा हैं तथा वो इन्हें ही सेना में भर्ती करने के समर्थक थे| भारतीय सेना के प्रमुख कमांडर फ़ील्ड मार्शल रोबर्ट्स (1885- 1893 ई.) तथा लार्ड किचेनेर (Lord Kitchener) (1902- 1909 ई.) सेना के भर्ती मामलो में इसी योद्धा जाति सिधांत  ‘मार्शल रेस थ्योरी’ के समर्थक थे अतः इनके कार्यकाल में लडाकू योद्धा जातियों की खोजबीन की गई|
इसी क्रम में मेजर ए. एच. बिंगले ने भारत सरकार के आदेश पर जाट और गूजर जातियों का सर्वेक्षण किया और 1899 में “हिस्ट्री, कास्ट्स एंड कल्चर ऑफ़ जाट्स एंड गूजर्स” नामक एक पुस्तक लिखी जिसमे उसने जाट और और गूजरों के भोगोलिक वितरण, धर्म, रीति-रिवाज़, इतिहास और उनके सैनिक चरित्र पर प्रकाश डालते हुए उसने इन्हें बहादुर और श्रेष्ठ सैनिक बताया हैं| भारत सरकार द्वारा मेजर ए. एच. बिंगले से इस पुस्तक को लिखवाने का उद्देश्य जाटो और गूजरों की भर्ती से सम्बंधित सैन्य अधिकारियो के लिए हस्तपुस्तक (Handbook) उपलब्ध कराना था, जिसके आधार पर इन जातियों से सम्बंधित उच्च कोटि के सैनिक भर्ती  किये जा सके| इस पुस्तक के आधार पर ब्रिटिश भारत में जाट और गूजरों को सेना में भर्ती किया गया| मेजर ए. एच. बिंगले ने अपने इस अध्ययन का दायरा बढ़ाते हुए अहीरों को भी इसमें सम्मिलित किया तथा 1904 में “कास्ट हैंडबुक्स फॉर दी इंडियन आर्मी : जाट्स, गूजर्स एंड अहीर्स” पुस्तक लिखी| इसी क्रम में बी. एल. कोले ( B L Cole) ने 1924 में “हैंडबुक्स फॉर दी इंडियन आर्मी : राजपूताना क्लासेज लिखी| इसी प्रकार आर. सी. क्रिस्टी (R C Christie) ने 1937 में हैंडबुक्स फॉर दी इंडियन आर्मी : जाट्स, गूजर्स एंड अहीर्स” पुस्तक का संपादन किया| भारत सरकार के आदेश पर सैन्य अधिकारियो ने इसी प्रकार की हैंडबुक्स राजपूत, डोगरा, मराठा, गोरखा आदि जातियों पर भी लिखी थी। 1857 की जनक्रांति में गूजर, रांघड, बंजारा, लोध समुदायों ने आदि बड़े पैमाने पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष किया था| ब्रिटिशराज के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले इन समुदायों को भी अपराधी जाति अधिनियम, 1871 में निरुद्ध किया गया तथा उनकी अपराधिक छवि प्रस्तुत की गई| ब्रिटिश काल में, इसका विपरीत प्रभाव इन जातियों की सैन्य भर्ती पर भी पड़ा| 28 जुलाई सन् 1914 से प्रथम विश्वयुद्ध प्रारंभ हुआ।जब यह युद्ध आरम्‍भ हुआ था उस समय भारतऔपनिवेशिक शासन के अधीन था। यह काल भारतीय राष्ट्रवाद का परिपक्वता काल था। प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन की भागेदारी के प्रति राष्ट्रवादियों का प्रत्युत्तर तीन अलग-अलग प्रकार का था-
(१)नर्म दल के नेताओं ने इस युद्ध में ब्रिटेन का समर्थन ताज के प्रति निष्ठा का कार्य समझा तथा उसे पूर्ण समर्थन दिया।(२) गर्म दल , (जिनमें तिलक भी सम्मिलित थे) ने भी युद्ध में ब्रिटेन का समर्थन किया क्योंकि उन्हें आशा थी कि युद्ध के पश्चात ब्रिटेन भारत में स्वशासन के संबंध में ठोस कदम उठायेगा।(३) जबकि क्रांतिकारियों का मानना था कि यह युद्ध ब्रिटेन के विरुद्ध क्रांतिकारी गतिविधियों को संचालित करने का अच्छा अवसर है तथा उन्हें इस सुअवसर का लाभ उठाकर साम्राज्यवादी सत्ता को उखाड़ फेंकना चाहिए।
इस युद्ध में भारतीय सिपाही सम्‍पूर्ण विश्‍व में अलग-अलग लड़ाईयों में लड़े। भारत ने युद्ध के प्रयासों में जनशक्ति और सामग्री दोनों रूप से भरपूर योगदान किया। भारत के सिपाही फ्रांस और बेल्जियम , एडीन, अरब, पूर्वी अफ्रीका, गाली पोली, मिस्र, मेसोपेाटामिया, फिलिस्‍तीन, पर्सिया और सालोनिका में बल्कि पूरे विश्‍व में विभिन्‍न लड़ाई के मैदानों में बड़े पराक्रम के साथ लड़े। गढ़वाल राईफल्स रेजिमेण्ट के दो सिपाहियों को संयुक्त राज्य का उच्चतम पदक विक्टोरिया क्रॉस भी मिला था।
युद्ध आरम्भ होने के पहले जर्मनों ने पूरी कोशिश की थी कि भारत में ब्रिटेन के विरुद्ध आन्दोलन शुरू किया जा सके। बहुत से लोगों का विचार था कि यदि ब्रिटेन युद्ध में लग गया तो भारत के क्रान्तिकारी इस अवसर का लाभ उठाकर देश से अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने में सफल हो जाएंगे। किन्तु इसके उल्टा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं का मत था स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए इस समय ब्रिटेन की सहायता की जानी चाहिए और जब 4 अगस्त को युद्ध आरम्भ हुआ तो ब्रिटेन ने भारत के नेताओं को अपने पक्ष में कर लिया। रियासतों के राजाओं ने इस युद्ध में दिल खोलकर ब्रिटेन की आर्थिक और सैनिक सहायता की। कुल 8 लाख भारतीय सैनिक इस युद्ध में लड़े जिसमें कुल 47746 सैनिक मारे गये और 65000 घायल हुए। इस युद्ध के कारण भारत की अर्थव्यवस्था लगभग दिवालिया हो गयी थी।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बड़े नेताओं द्वारा इस युद्ध में ब्रिटेन को समर्थन ने ब्रिटिश चिन्तकों को भी चौंका दिया था। भारत के नेताओं को आशा थी कि युद्ध में ब्रिटेन के समर्थन से ख़ुश होकर अंग्रेज भारत को इनाम के रूप में स्वतंत्रता दे देंगे या कम से कम स्वशासन का अधिकार देंगे किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उलटे अंग्रेज़ों ने जलियाँवाला बाग नरसंहार जैसे घिनौने कृत्य से भारत के मुँह पर तमाचा मार दिया। 11 अक्टूबर सन् 1918 को युद्ध समाप्त हो गया।
द्वितीय विश्व युद्ध 1 सितम्बर सन् 1939 को प्रारम्भ हो गया।       1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सेना में मात्र 200,000 लोग शामिल थे।युद्ध के अंत तक यह इतिहास की सबसे बड़ी स्वयंसेवी सेना बन गई जिसमें कार्यरत लोगों की संख्या बढ़कर अगस्त 1945 तक 25 लाख से अधिक हो गई। 
भारतीय सेना ने इथियोपिया में इतालवी सेना के खिलाफ; मिस्र, लीबिया और ट्यूनीशिया में इतालवी और जर्मन सेना के खिलाफ; और इतालवी सेना के आत्मसमर्पण के बाद इटली में जर्मन सेना के खिलाफ युद्ध किया। हालांकि अधिकांश भारतीय सेना को जापानी सेना के खिलाफ लड़ाई में झोंक दिया गया था, सबसे पहले मलाया में हार और उसके बाद बर्मा से भारतीय सीमा तक पीछे हटने के दौरान और आराम करने के बाद ब्रिटिश साम्राज्य की अब तक की विशालतम सेना के एक हिस्से के रूप में बर्मा में फिर से विजयी अभियान पर आगे बढ़ने के दौरान. इन सैन्य अभियानों में 36,000 से अधिक भारतीय सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी, 34,354 से अधिक घायल हुए  और लगभग 67,340 सैनिक युद्ध में बंदी बना लिए गए।उनकी वीरता को 4,000 पदकों से सम्मानित किया गया और भारतीय सेना के 38 सदस्यों को विक्टोरिया क्रॉस या जॉर्ज क्रॉस प्रदान किया गया।2 सितम्बर सन् 1945 को द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया।
अब भारत के स्वाधीन होने का समय आ गया। लार्ड माउंटबेटन भारत (ब्रिटिश इंडिया) के गवर्नर जनरल थे। भारत में उस समय 17 राज्य थे। विभाजन के समय 11 राज्य भारत को मिले, तीन राज्य पाकिस्तान को मिले। आसाम, बंगाल व पंजाब राज्य का विभाजन कर भारत व पाकिस्तान को दे दिए गए। पाकिस्तान का गवर्नर जनरल जिन्ना को बना दिया गया। इसी अनुपात में सेना का बंटवारा भी कर दिया गया। राजपूत रेजिमेंट में आधे मुसलमान सिपाही थे, जो पाकिस्तान को दे दिए गए। पंजाब रेजिमेंट में से गूजर सिपाही लेकर राजपूत रेजिमेंट में समायोजित कर दिए गए।
विभाजन के बाद के महीनों में दोनों नये देशों के बीच विशाल जन स्थानांतरण हुआ।  सीमा रेखाएं तय होने के बाद लगभग 1.45 करोड़ लोगों ने हिंसा के डर से सीमा पार करके बहुमत संप्रदाय के देश में शरण ली। 1951 की विस्थापित जनगणना के अनुसार विभाजन के एकदम बाद 72,26,000 मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान गये और 72,49,000 हिन्दू और सिख पाकिस्तान छोड़कर भारत आए। इसमें से 78 प्रतिशत स्थानांतरण पश्चिम में, मुख्यतया पंजाब में हुआ।इतना ही नहीं कश्मीर को लेकर भारत व पाकिस्तान में युद्ध हो गया। सन् 1962 में भारतीय सेना को चीन के साथ युद्ध लडना पडा। सन् 1965 में पुनः पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ। सन 1971 में बंग्लादेश को लेकर फिर पाकिस्तान व भारत में युद्ध हुआ। जिसे विजय दिवस के रूप में भारतवासी मनाते हैं।
         विजय दिवस 16 दिसम्बर को 1971 के युद्ध में  पाकिस्तान पर भारत की जीत के कारण मनाया जाता है। इस युद्ध के अंत के बाद 93,000 पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया था। साल 1971 के युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी, जिसके बाद पूर्वी पाकिस्तान आजाद हो गया, जो आज बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है। यह युद्ध भारत के लिए ऐतिहासिक और हर देशवासी के दिल में उमंग पैदा करने वाला साबित हुआ।
देश भर में 16 दिसम्बर को 'विजय दिवस' के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 1971 के युद्ध में करीब 3,900 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे, जबकि 9,851 घायल हो गए थे।
पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी बलों के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी ने भारत के पूर्वी सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था, जिसके बाद 17 दिसम्बर को 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को युद्धबंदी बनाया गया।भारत ने युद्धबंदी सिपाहियों के साथ कोई अपमान जनक व्यवहार नहीं किया। जो भारतीयों के उच्च सैनिक चरित्र को दर्शा गया।
इस लेखन का उद्देश्य भी इसी विषय पर प्रकाश डालना है कि भारत सदा अहिंसा व शांति का समर्थक रहा है परन्तु कायरता से भारतीयों का कोई वास्ता नहीं रहा। कायरता और हिंसा में से यदि चुनाव करना पड़ा तो हिंसा को ही चुना। मुस्लिम व ईसाई धर्म के मानने वालो की विश्व में जहां भी 25 वर्ष तक हुकूमत रही, वहां दूसरी पूजा पद्धति बची नहीं। परन्तु भारत में सैकड़ों सालों के शासन के बाद भी भारतीयों को कोई अपने मूल से नहीं उखाड़ सका, यह सब हमारे पूर्वजों के उच्च सैनिक चरित्र व बलिदान के कारण ही सम्भव हो सका।
समाप्त
संदर्भ ग्रंथ
1- विद्याधर महाजन -प्राचीन भारत का इतिहास।
2- आशीर्वादी लाल श्री वास्तव -भारत का इतिहास।
3- डां सुशील भाटी -गुर्जरों का सैनिक चरित्र।

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2018

On the path Of Swaraj, Shaheed Maratha Senapati Pratap Rao Gurjar - Ashok Chaudhary Meerut Translated to English by Shivangi, Meerut

India is the land of brave warriors, for the country's interest and personal honor, the valiant warriors of India who have given the sacrifice, there is no one of their equipollence  in the world. One such warrior was Shivaji's army chief, Pratap Rao Gurjar.
Pratap Rao Gurjar's contribution to Shivaji and the history of India is realized only by this fact that Pratap Rao Gurjar, was the Chief Commander of Shivaji before the coronation of Shivaji in 1674 for 8 years. The victory of Indian army in the Tarain war of 1191 between Prithviraj Chauhan and Mohamed Gori.And in February 1672, 480 years after the victory of the Indian Army in the Salher battle, he was the hero of the Indian army's victory in the battle of the Mughal-Maratha between the Mughal-Marathas. On the behalf of the Marathas in the Battle of Salher, commander Pratap Rao Gurjar and Peshwa Moropant were the commanders. On the other hand, the world's most powerful Mughal army in which Rajputs, Rohilis and Pathans were in aid. In Mughal Senanayak, Diler Khan (Subedar of South), Bahadur Khan (Manasbadar of Gujarat), Senanayak Ikhlas Khan and Bahalol Khan were prominent. After the victory of this war, Sant Ramdas Shivaji wrote a famous letter to Shivaji.In which Guru Ramdas in his address Shivaji was called Gajpati(Lord of elephants), Haypati (Cavalry Army), Gadpati(Lord of forts) and Jalpati(Master of high seas).After the victory of this war, the path to becoming Shivaji's Chhatrapati became clear.
Pratap Rao Gurjar was a successful planner general, he was the hero of the battles of Singhgarh, Salher and Umraani. It was a trivial matter to go play on life to make the plans of our side successful. He was the gift to Shivaji as the commander. He was a passionate person, his passion was his power as well as weakness.
The real name of Pratap Rao Gurjar was Kadatauji Gurjar. Shivaji gave the title to Pratap Rao Gurjar, after he saw his bravery at the time of war with Aurangzeb's famous army chief Mirza Raja Jai ​​Singh.
Pratap Rao Gujar started his military life as a modest detective in Shivaji's army. Once Shivaji changed his passage and started crossing the border, Pratap Rao stopped him by challenging him, Shivaji offered temptation for his examination, but Pratap Rao did not get a chance. Shivaji Pratap Rao was very pleased with the sincerity of his honesty and duty. As a result of his qualities and valor services, the ladder of success was soon enough to become the Subedar of Rajgarh Cantt.

Meanwhile, Aurangzeb appointed Shaista Khan as the Subedar of the Mughal Empire in the Deccan province in July 1659, till then the Marathas had no clashes with the Mughals, they were running their successful campaign against the Bijapur Sultanate. Aurangzeb was looking at the rise of Shivaji as a rising Maratha state. He ordered Shaista Khan to strip the areas from the Marathas which he won from Bijapur. Under the orders, Shaista Khan took a huge army and conquered Poona and put his camp there in the famous Lal Mahal for Shivaji. He also won the victory by putting a circle of luncheon, he won Kalyan and Bhiwadi in 1661.

As a reaction, Shivaji ordered Peshwa Moro Pant and Pratap Rao to win back their territories. Moropant attacked Junnar in addition to Kalyan and Bhiwadi. Pratap Rao Gujar conducted a successful campaign in the Mughal areas. He, with his cavalry army,intruded the Mughal emporer in the interior areas.
Wasting the villages, towns and cities which supported the Mughals, they reached the Godavari coast. Pratap Rao targeted Balaghat, Parande, Haveli, Gulbarga, Abbas and Udgir and recovered the damages from war and finally he came to Aurangabad, the capital of the Mughals in the Deccan. Mahakub Singh was the guardian general of Aurangzeb in Aurangabad. He proceeded to face Pratap Rao with ten thousand soldiers. Both armies faced a confrontation near Ahmednagar. The Mughal army was badly defeated. Pratap Rao defeated the Mughal commander in the war and killed him. Pratap Rao returned home after taking a lot of money from this military campaign, Pratap Rao's military expedition was a major blow to Shaista Khan's campaign. Being excited, the Marathas decided to attack directly on Shaista Khan.

In the leadership of Shivaji, Marathe organized a pseudo procession and entered his camp and attacked Shaista Khan. Shaista Khan was somehow successful in saving his life, but in the struggle, Shivaji's sword wielded three fingers of his hand. As a result of this incident a Mughal army reached Sinhagad next morning. Marathas gave the Mughal army an opportunity to come near the fort of Sinhagad. As soon as the Mughal army came to the extent of the guns, the Marathas started strongly bombing. At the same time Pratap Rao took his cavalcade and reached Sinhagad and broke down like a hungry lion on the Mughal army, in a moment, Maratha cavalry cut hundreds of Mughal soldiers, a stampede broke in Mughal cavalry, Pratap Rao Gujar took his army and followed them. In this way the Mughal cavalry force was ahead of the cavalry of the Marathas. This was the first time that the Maratha cavalry army followed the Mughal cavalry army. Shivaji was very pleased with Pratap Rao Gujar who gave the introduction of bravery and strategy in the battle of Sinhagad. Pratava Rao, excited by his spectacular success, cut many small army units of the Mughals and forced the Mughals to strengthen their border posts. Shaista Khan was very embarrassed by this defeat and humiliation. The morale of his army fell. The fear of the Marathas stepped in their heart.With the failure of this campaign of Shaista Khan, the prestige of the Mughals got into the mud and their Deccan Suba was in danger. The tension in the Deccan increased so much that it seemed that Aurangzeb would now travel to Deccan but he could not do so due to the rebellion in Kashmir and the Western province. Still, he removed Shaista Khan from the Deccan and replaced him with Shahzada Muazzam as Deccan's Subedar.

The Marathas completely adopted the anti-Mughal policy and in 1664 AD attacked an important economic source of the Mughal state, the famous port and the center of international trade, Surat. In this aggressive attack Shivaji was accompanied by Pratap Rao Gujar and Moro Panthe Pingale and four thousand Mawali soldiers. Marathas received a million rupees (Dinar) from the attack on Surat, using  to get administrative and military strength in Maratha state. Aurangzeb could not bear Surat's robbery. Here Marathas attacked a ship of Haj pilgrims while going to Mecca. This incident worked as ghee in the fire and Aurangzeb got furious with the anger. He immediately sent a large army under the leadership of Mirza Raja Jai ​​Singh and Diler Khan to suppress the Marathas. On reaching the Deccan, Diler Khan put a circle around Purandar, Jai Singh surrounded Sinhagad and sent some of his troops against Rajgarh and Lohagarh. Jai Singh knew that winning Marathas is not easy, so he came with full preparation. There were 80000 selected warriors with him. Given the seriousness of the situation, Shivaji called a meeting of a war council in Raigad for the first time. In this hour of crisis, Netaji Palkar, who was the commander-in-chief at that time, and Shivaji's wife, Putilibai Palkar's family, became a rebel. Shivaji had ordered him to guard against the border of Swarajya, but on the arrival of Jai Singh's army, he went far away with the main army of the Marathas. Shivaji ordered them to return to the army immediately. But Netaji did not come back. Netaji had actually met Jai Singh who had promised to give him a high mansab in the Mughal court. The crisis of Mughal aggression deepened by this conduct of the Senapati. In these moments of crisis, Pratap Rao Gujar gave a lot of support to Shivaji. He achieved success in stopping the supply of the Mughal army to an extent and completely eliminated many Mughal troops. He continued to give news of the stirring movement of the Mughal army to Shivaji. In this moment of crisis, pleased with Pratap Rao's struggle, Shivaji gave him the title of Senapati and the title of Pratap (veer ) Rao.

Shivaji, taking stock of the situation of the war, came to the conclusion that it is not possible to beat Jai Singh in a face-to-face battle. Hence he assigned Pratap Rao Gujar to the execution of Jai Singh. Pratap Rao got together with Jai Singh under a plan and after a night, he made a vigorous effort to kill Jai Singh in his camp but Jai Singh survived due to the intimidation of the bodyguards. Pratap Rao Gujar did not fall in the hands of the enemies and he succeeded in escaping the enemy camp. This daring attempt of Pratap Rao could not even be done for self rule.  Negotiations of the treaty were started with Jai Singh. As a result, the Treaty of Purandar occurred in 1665. Under the treaty, Shivaji had to hand over 23 of his 35 important fortifications to the Mughals. Shivaji's right was accepted on some areas of Bijapur. Shivaji's son Sambhaji was given five thousand Mansabdar in the Mughal army. Shivaji promised to support the Mughals against Bijapur. But the Mughal-Maratha joint operation against Bijapur did not succeed. With the failure of this campaign, the reputation of Jai Singh in the Mughal court deeply shocked. Therefore, to show Aurangzeb his importance, he promised to make Shivaji the South Subedar and sent him to Agra to join the Emperor. Shivaji became angry due to lack of proper respect in the Mughal court and left the Mughal court immediately. Aurangzeb got angry and arrested him. Shivaji was imprisoned in Agra for one year, one day he was caught by the Mughal soldiers and he fled from captivity and reached Raigad in September 1666. As long as Shivaji was in prison, the responsibility of protecting Swarajya was the responsibility of Peshwa and Pradhan Senapati Pratap Rao Gujar. In the absence of Shivaji, both of them defended independence with full devotion and devotion.

After coming back from Agra, Shivaji remained silent for three years. They made a treaty with the Mughals. Through which the Treaty of Purandar was re-approved and Sambhaji was given five thousand Mansabdar . Sambhaji started living in Aurangabad's Mughal capital of Deccan with his five thousand horsemen. But because of his early age, he delivered  the weight of this troop to Pratap Rao Gujr and returned back. Mughal-Maratha peace could not last for long. Aurangzeb suspected that Shahzada Muazzam was associated with  Shivaji. He ordered the princes to arrest the  Pratap Rao Gujar in Aurangabad and destroy his army. But before reaching the emperor's orders, Pratap Rao Gujar got safe from Aurangabad with his five thousand horsemen.

Now Marathas climb on the Mughal territories. They conquered many fortifications entrusted to the Mughals by the treaty of Purandar. In 1670, several important forts including Sinhagad and Purandar were withdrawn. On October 13, 1670, the Marathas attacked Surat again. In the three-day campaign, the hand of the Marathas was worth 66 lakh rupees (Dinar). When Shivaji returned to Vani-Dindori in return, he was confronted by the Mughal army led by Dawood Khan. In such a way, saving the treasure was a difficult task. Shivaji divided his army into four parts. He entrusted the leadership of Pratap Rao with the responsibility of taking the treasure to a secure Konkan and was ready to compete with Dawood Khan himself. Marathas severely defeated the Mughals in this war. On the other hand Pratap Rao took away the treasure safely. Pratap Rao Gujar returned from Surat and attacked Khandesh and Barar. Pratap Rao ruined many towns, towns and villages, including the Kurinja in the Mughal region. The memorable fact of this war campaign of Pratap Rao Gujar is that he was successful in taking written promise from the heads of the villages falling in the way, to make Shivaji an annual 'Chauth' tax. The Marathas used to take the  Chauth tax, in return for saving the people from enemy territory and harm caused by their attack. In this way we can fix the date when the Marathas have recovered chauth tax  from the Mughal areas for the first time. This incident was very important in political terms. With this, there has been a great increase in the status of Marathas in Maharashtra. This incident was a symbol of the fact that the Maharashtra belongs to and not to Mughals.

Finally, the Mughal emperor handed over the responsibility of south to Gujarat's Subedar Bahadur Khan and Diler Khan. Both of them put the circle on fortress of Salheri. And leaving some of the troops there, both of them rushed to Poona and Supa . The fort of Salheri was very important from the strategic point of view. Hence Shivaji was determined to save it in every situation. Shivaji took the army and reached the fort of Shivneri near Salheri. After getting this information, he ran towards Salheri from Poona and defeated two thousand Maratha cavalry sent by Shivaji in a war and defeated him in a war. The situation of the Marathas has worsened very badly. Shivaji ordered Moropant Pingale and Pratap Rao Gujar to reach Salheri with twenty-two thousand horsemen. Seeing these activities of the Marathas, Bahadur Khan sent the main part of his army against Pratap Rao Gujar under the leadership of Ikhlas Khan. Shortly after the war began, Pratap Rao ordered his army to return. The Marathas began to disappear with the speed of the hills and the paths. The spirited Mughals ran behind them. Following, the Mughal army was scattered, Pratap Rao roamed rapidly and organized the Marathas and attacked twice faster. This warlike betrayal of the Mughal army by Pratap Rao remained gloomy. The Mughals became confused and frightened and a panic broke into them. Ikhlas Khan tried to reconstitute the Mughal army, some new Mughal troops also came, the horrifying war started, and  Moro Pant also reached with his army. The Marathas surrounded the Mughals with a horrible gesture and killed them. The Marathas tricked the Mughal army badly It is said that the brave five thousand soldiers of the Mughals were killed,in which 22 were the main commanders. Many major Mughal warriors were injured and some were captured. The success of the Marathas in the Battle of Salheri was a complete victory in itself and it was the supreme leader Pratap Rao Gujar. In the battle of Salheri, the Marathas received 125 elephants, 700 camels, 6 thousand horses, numerous animals and a lot of gold, silver, ornaments and war materials. Salheri's victory was the biggest victory of the Marathas till now. This was the first important victory of Marathas against the Mughals in a face-to-face battle. This victory gave a big rise to the status of Maratha bravery . After this war, the fear of Marathas settled in the South. The first effect of the war was that the Mughals lifted the circle of Salheri and returned to Aurangabad.

At the end of 1672, reunions broke out in Marathas and Bijapur. From the point of view of protecting their southern areas, the Marathas took Panhala from Bijapur. Sultan sent a powerful army under the leadership of Bahalol Khan urf Abdul Karim to get back Panhala. Bahalol Khan put the circle of Panhala. Shivaji sent Pratap Rao Gujar to free Panhala. Pratap Rao Gujar worked with an amazing strategy to free Panhala. Pratap Rao Gujar strongly attacked the Adilshahi capital, Bijapur, instead of crossing Panhala and devastated the surrounding areas. At that time there was no army for the protection of Bijapur, so Bahalol Khan took the circle of Panhala and ran to protect Bijapur. But Pratap Rao got him in the middle of the road near Umrani. Pratap Rao trapped him in his trap by blocking the logistics of Bahalol Khan's army and completely wiped out many of its advance troops. This is the event of April 1673. At that time the heat was at its peak, water was most important at that time. One day, not two days, but on the siege of one month, the condition of Bahalol Khan and his army was that his soldiers and horses would die of thirst. The timing was that either Bahalol Khan died with thirst or in the war. In such a situation, Bahalol Khan, sitting on the knees, prayed to Pratap Rao Gurjar that he would give him and his soldiers just water to drink. Take whatever they have in return. Spare their life. Pratap Rao Gurjar was trapped in a religious crisis. His Hindu heart was not allowing the thirsty and devious enemy to attack. He came to abolish Bahalol Khan, drinking water from thirst to death in the Hindu religion has been considered as the greatest virtue. But there was no ordinary person to die from thirst here, it was his king's biggest enemy. In all, the situation was that Pratap Rao Gurjar could not attack the unarmed and thirsty Bahalol Khan army. He gave him the way to escape. Pratap Rao freed Panhala and wrote his success letter to Shivaji. Shivaji knew that there was no cost of speech like Bahalol Khan. He knew the price of the blood of his sepoys that is shed to build up a state. Therefore, Shivaji wrote a hard letter to Pratap Rao Gurjar. In which he wrote that how could he leave an enemy like Bahalol Khan. Do not show up in Raigad till the end of Bahalol Khan. Pratap Rao Gurjar, when he read the letter, decided what he had to do.
Today, there was a situation in front of Pratap Rao that had once arose due to obstruction of Durvasa in front of Lakshman, when he ignored Ram's orders and had entered the conversation, Ram sacrificed Laxman and Laxman sacrificed his life after being relieved of that sacrifice. History was repeating itself.
He was a soldier of Shivaji's army. In front of the wishes of his king, he did not consider his life worth anything. As soon as Pratap Rao Gujar took his army and ran on the other side. Bahalol Khan took his army and headed towards Panhala. As soon as Pratap Rao got the information. He returned immediately. Now Pratap Rao saw that Shivaji was not wrong. Now the thing was of his personal honor. Pratap Rao retreated his main army and formed a further front with 1200 soldiers. Bahalol Khan was with his 15,000 army. Pratap Rao Gurjar wanted Bahalol Khan to see a low army and attack him. So that face-to-face may be possible. But Bahalol Khan was aware of Pratap Rao's warlike claim and bravery. He kept quiet in his barricade. Pratap Rao, for his personal honor, could not order his 1200 soldiers to attack. In the same diary, on February 24, 1674, Pratap Rao Gurjar was on the inspection of the army with his six brave companions, Beasaji Ballal, Deepaji Rout Rao, Bitthal Pillaji Atreya, Krishnaji Bhaskar, Siddhi Halal and Bithoji Shinde, when a mountaineer appeared. He told Pratap Rao Gurjar that Bahalol Khan is half a mile away. After listening to the name of Bahalol Khan, Pratap Rao's blood was thrown, he fell down, his hand went on his sword and Pratap Rao drove his horse towards the direction of Bahalol Khan. Following their commander, the six followed. When Bahalol Khan's army saw seven horsemen coming in the direction of attack, they immediately gave information to Bahalol Khan. Bahalol Khan saw that the Maratha commander Pratap Rao Gurjar was leading the mounted cavalry. Bahalol Khan immediately ordered his army to attack. On one side were Seven and  on the other hand 15000 soldiers  collide at one place. They were seven brave soldiers fighting bravely in the battlefield. Actually this was not a war, it was a warrior's sacrifice for his personal honor. Historians call it the Battle of Nesri. When this news came to Shivaji, he cried and cried. Shivaji considered himself guilty for the sacrifice of Pratap Rao Gurjar. Shivaji married his daughter Janaki Bai, the only child of Pratap Rao Gurjar, to his younger son, Rajaram, on March 7, 1680, and declared Janaki Bai as Queen. Shivaji died on 3 April 1680. Shivaji's eldest son Sambhaji, who was then interned in Panhala Fort, was freed by then the Commander of Shivaji, Hamir Rao Mohite, and made the king. But in 1681, Aurangzeb took a large army and reached south. He took the seven-year-old son of Sambhaji to  Sahu and wife of Sambhaji and Sukurabai Gaikwad, wife of Shivaji. In 1687, the commander Hamir Rao Mohite was sacrificed in the battle of Satara; In 1689, Shambhaji's brother-in-law Ganoji Shirke met the Mughal army and arrested Sambhaji, and Sambhaji was sacrificed. Rajaram now becomes Chattrapati and Janki Bai becomes queen. Rajaram died in 1700 and Jankibai became a sati with the body of Rajaram.
This incident of Pratap Rao Gurjar and his six companions sacrifice is one of the most heroic events in Maratha history. The famous poet Kusumag Raj has written a poem titled, 'Vedat Marathe Veer Dudale Seven', on this dastardly sacrifice of Prataprao and his companions, which is sung by famous singer Lata Mangeshkar. Pratap Rao Gujar's sacrifice site Nessari (Kolhapur) Maharashtra also has a memorial in his memory.
Pratap Rao Gurjar is not only recognized in South India but also in northern India. In the district of Meerut in Uttar Pradesh, since 2002, under the aegis of "Pratap Rao Gurjar Smriti Samiti", programs have been organized in memory of Pratap Rao Gurjar's sacrifice day. The publication of "Pratap" annuity magazine for twelve years is also done by the committee.
Reference book
1- Nil Kant, s - A History of The Great Maratha Empire, Dehradun 1992
2- Duff Grant -History of Maratha
3- Srivastav, Ashrafadilal - India's Itihas
4- Dr. Sushil Bhati- The founding of the establishment of Hind Swaraj Maratha Senapati Pratap Rao Gurjar