शुक्रवार, 7 मई 2021

गणतंत्र भारत- लेखक अशोक चौधरी।

आज भारत एक गणतंत्र है,जिसे अंग्रेजी में रिपब्लिक इंडिया कहते हैं।भारत एक वेलफेयर स्टेट है। स्टेट दो प्रकार की होती है,एक पुलिस स्टेट तथा दूसरी वेलफेयर स्टेट।
पुलिस स्टेट उसे कहते हैं जहां कानून का कड़ाई से पालन होता है,किसी कमजोर के लिए कानून मे कोई छूट नहीं होती।इसे निगेटिव डिस्क्रिमिनेशन अर्थात नकारात्मक भेदभाव भी कहा जाता है। लेकिन जो वेलफेयर स्टेट होता है,उस राज्य में ऐसे प्रावधान होते हैं जिसमें कमजोर के लिए कुछ छूट होती है,इसे पोजेटिव डिस्क्रिमिनेशन कहते हैं अर्थात सकारात्मक भेदभाव।
जैसे यदि किसी सामान्य परिवार में माता-पिता के दो बच्चे हैं,वो इन दोनों को एक-एक किलो दूध पीने के लिए रोज देता है, परंतु उन बच्चों में से एक बच्चा बीमार हो जाता है और डाक्टर यह सलाह देता है कि इस बीमार बच्चे को एक किलो दूध जो इसे मिल रहा है, से अधिक की आवश्यकता है। माता-पिता के पास इतना बजट नही है कि वो दोनों बच्चों को दो-दो किलो दूध की व्यवस्था कर सके।वह तो एक-एक किलो की ही पूर्ति मुश्किल से कर पा रहा है।तो वह यह व्यवस्था बनाता है कि जो स्वस्थ बच्चा है उसके एक किलो दूध में से आधा किलो दूध बीमार बच्चे को और देने लगता है।इस प्रक्रिया को सकारात्मक भेदभाव कहा गया है।इस नियम को अपनाने वाले स्टेट को वेलफेयर स्टेट कहते है।
वेलफेयर स्टेट भारत का मूल चरित्र रहा है, इसलिए हमारे यहा वसुदेव कुटुम्ब की धारणा रही है। परन्तु सन् 1192 से लेकर जो विदेशी शासन भारत में स्थापित हुआ, उसने पुलिस स्टेट को स्थापित कर दिया। लेकिन सन् 1815 से अंग्रेजों मे पुलिस स्टेट के स्थान पर वेलफेयर स्टेट के प्रयास प्रारंभ हुए, उस कारण अंग्रेजों ने भारत में भी इस ओर कदम बढाये तथा सन् 1829 से भारत में सुधार करने चालू किए।राजा राम मोहन राय की सिफारिश पर उस समय के गवर्नर जनरल ने सती प्रथा जैसी कुरिति को बंद करने के लिए कानून बनाये, सन् 1850 में लार्ड डलहौजी ने ईश्वर चंद्र विद्यासागर की सिफारिश पर अस्पृश्यता के निषेध का कानून बनाया। सन् 1857 की क्रांति के बाद और अधिक इस विषय में काम हुआ तथा सन् 1947 में भारत आजाद हुआ। 
15 अगस्त सन् 1947 से पहले भारत ब्रिटिश राज्य की एक कालोनी था,जिसे उपनिवेश कहते हैं। लेकिन 18 जुलाई सन् 1947 को लंदन की संसद ने यह प्रस्ताव पास कर दिया कि 15 अगस्त सन् 1947 को भारत को आजाद कर दिया जायेगा। तथा ब्रिटिश इंडिया को भारत और पाकिस्तान के रुप में दो डोमेनियन स्टेट में विभक्त कर दिया जायेगा।जिसे द इंडियन इंडिपेंडेंट एक्ट कहते हैं।इसी दिन वायसराय के स्थान पर गवर्नर जनरल का पद अस्तित्व में आ गया।अब भारत व पाकिस्तान की अंतरिम सरकार की कैबिनेट के निर्देश पर दोनों देशों के गवर्नर जनरल ब्रिटिश क्राउन के हस्ताक्षर से बनने थे, अतः भारत की कैबिनेट के निर्देश पर वायसराय माउंट बेटन को भारत का तथा मोहम्मद अली जिन्ना को पाकिस्तान का गवर्नर जनरल नामित कर दिया गया। दोनों देशों के संविधान बनने तक सन् 1935 के संविधान के अनुसार ही शासन चलना था।26 नवम्बर सन् 1949 को भारत का संविधान बनकर डा राजेन्द्र प्रसाद जी को सोप दिया गया, भारत के संविधान को बनाने में डा भीमराव अम्बेडकर तथा बीएन राव का विशेष योगदान रहा।26 नवम्बर सन् 1949 को ही संविधान के चार अनुच्छेद लागू हो गये, जिसमें एक भारत की नागरिकता,दूसरा चुनाव आयोग आदि थे।भारत के संविधान में आधे से अधिक सन् 1935 के संविधान से ही लिया गया है।
भारत का संविधान 26 जनवरी सन् 1950 को लागू हो गया।31 दिसम्बर सन् 1929 को कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पं जवाहरलाल लाल नेहरू ने यह घोषणा की थी कि भारत एक सम्प्रभु राष्ट्र बनेगा तथा 26 जनवरी सन् 1930 से कांग्रेस प्रत्येक 26 जनवरी को भारत की आज़ादी का उत्सव मनाती आ रही थी, इसलिए भारत के संविधान को लागू करने तथा भारत को ब्रिटेन के डोमिनियन स्टेट के स्थान पर एक गणतंत्र देश बनाने की घोषणा कर दी गई। भारतीय संविधान की धारा 395 के अंतर्गत मिले अधिकार से ब्रिटिश सरकार के दोनों एक्ट -
( 1) इंडियन इंडिपेंडेंट एक्ट 1947
(2) गवर्मेंट एक्ट 1935
 को समाप्त कर दिया।
भारत के राष्ट्रपति के पद पर डा राजेन्द्र प्रसाद को नामित कर दिया गया था।अब भारत एक रिपब्लिक देश बन गया था।
आज की दुनिया में
सऊदी अरब, नार्थ कोरिया,वेटेकन सिटी राजतंत्र से चल रहे हैं। राजतंत्र में सम्पूर्ण शक्ति राजा के पास होती है।
जारडन, ओमान निश्चित राजतंत्र से चल रहे हैं। निश्चित राजतंत्र में कुछ शक्ति राजा के पास होती है कुछ कैबिनेट के पास होती है।
इंग्लैंड, नार्वे,स्वीडन, डेनमार्क, भूटान, थाईलैंड, जापान संवैधानिक राजतंत्र से चल रहे हैं। संवैधानिक राजतंत्र में राजा सिर्फ नाममात्र का होता है, सम्पूर्ण कार्य जनता के द्वारा चुनी हुई कैबिनेट देखती है।
ग्रीस, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड,कनाडा आज भी ब्रिटेन के डोमेनियन स्टेट है।
भारत, अमेरिका, ब्राजील, फ्रांस, जर्मनी,इटली, स्वीटजरलैंड, पाकिस्तान, बंग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका सभी रिपब्लिकन देश है।
समाप्त
संदर्भ ग्रंथ
https://youtu.be/clGbdD6SxGo

मंगलवार, 2 मार्च 2021

अंतिम हिन्दू सम्राट गुर्जर राज-मरू गुर्जर राज पृथ्वीराज चौहान/ राय पिथोरा - लेखक अशोक चौधरी मेरठ।

 भारत के इतिहास में अपने पूर्वजों के महान कार्यों को समझने के लिए विद्वानों ने इसे कई कालखंडों में विभाजित किया है।इन कालखंडों में एक काल हिन्दू काल भी है,जो सिंधु के राजा दाहिर से प्रारंभ होकर पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु तक या  इस्लामिक हमलावर मुहम्मद बिन कासिम (सन् 712) से लेकर मोहम्मद गोरी ( सन् 1192) के हमले तक है।इस 480 वर्ष के समयांतराल में राजा दाहिर का संघर्ष,उसके बाद गुर्जर प्रतिहार राजाओं का संघर्ष तथा चौहान राजाओं का संघर्ष अविस्मरणीय है।इस संघर्ष काल को ही मोहम्मद बिन कासिम द्वारा हिन्दूओं से संघर्ष तथा ग्यारहवीं शताब्दी में महमूद गजनवी के साथ आये विद्वान अलबरूनी द्वारा लिखित पुस्तक तहकीक-ए-हिन्द के आधार पर हिंदू काल की संज्ञा दी जा सकती है। इस समयांतराल के संघर्षों में एक संघर्ष सम्राट पृथ्वीराज चौहान का भी है।भारत के इतिहास में इस संघर्ष का महत्व इसलिए भी अधिक है कि पृथ्वीराज चौहान के मोहम्मद गोरी से हार जाने के बाद भारत में विदेशी मुस्लिम शासन की स्थापना हो गई थी।
सम्राट पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु ( सन् 1192) से लेकर भारत के आजाद (सन् 1947) होने तक का 755 वर्ष का समय हिन्दूओं द्वारा अपने अस्तित्व को बचाने के लिए किए गए संघर्ष का काल है।
 भारत की राजनीति में  पटना, कन्नौज और अजमेर के बाद दिल्ली एक राजधानी के रुप में पृथ्वीराज चौहान के मोहम्मद गोरी से हार जाने के बाद ही स्थापित हुई।
भारत के चौहान राजाओं में पांच चौहान सम्राट हुए हैं, सबसे पहले बीसलदेव, दूसरे अमर गंगेय ,तिसरे पृथ्वीराज द्वितीय,चौथे सोमेश्वर चौहान और पांचवें पृथ्वीराज चौहान तृतीय जिनको राय पिथोरा भी कहा गया है।
 चौहान राजाओं में तीन पृथ्वीराज चौहान हुए हैं, पृथ्वीराज चौहान प्रथम(सन्1090-1110), पृथ्वीराज चौहान द्वितीय (सन 1165-1169), पृथ्वीराज चौहान तृतीय(सन्1178-1192)। 
यहां हमारे अध्ययन का केन्द्र  पृथ्वीराज तृतीय है। जिन्हें इतिहास में अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान उर्फ राय पिथोरा तथा पृथ्वीराज चौहान के दरबारी जयानक के द्वारा लिखित पृथ्वीराज विजय में गुर्जर राज व मरू गुर्जर राज कहा गया है।
पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल में चौहानों का राज्य विंध्याचल से हिमालय तक फैला था। दिल्ली, हांसी,थानेश्वर व नगरकोट चौहान राज्य का हिस्सा थे। पृथ्वीराज चौहान के समय दिल्ली अजमेर का एक ठिकाना थी तथा दिल्ली के तोमर और मेवाड़ के गहलोत,  चौहान सम्राट पृथ्वीराज के सामंत थे। गुर्जर प्रतिहार राजाओं के सामंत से सम्राट तक की यात्रा चौहान राजाओं ने किस प्रकार तय की,इसे जानने के लिए देखें-
 परिशिष्ट नंबर- 1
 
   बीसलदेव चौहानों के प्रथम सम्राट थे।बीसलदेव ने ही धार की तरह अजमेर में संस्कृत विद्यालय तथा सरस्वती का मंदिर बनवाया, जिसे अब ढाई दिन का झोपड़ा कहते हैं तथा बीसलसर झील का निर्माण करवाया।बीसलदेव ने  गुर्जर प्रतिहार सम्राटों की तरह परमभट्टारक,महाराजाधिराज, परमेश्वर, श्रीमद् उपाधि धारण की। सन् 1158 के नाहड़ लेख के अनुसार अपने नाम के पीछे देवराज की उपाधि भी बीसलदेव ने प्राप्त की।बीसलदेव का एक शिलालेख अजमेर संग्राहलय में रखा है जिसमे चौहानों को सूर्यवंशी क्षत्रिय कहा गया है।
सम्राट बीसलदेव के साहित्य प्रेम व विद्वता तथा विद्वानों का आदर करने के कारण उन्हें कवि बांधव की उपाधि दी गई थी। 
ऐसा माना जाता है कि बीसलदेव के समय ही सहारनपुर में शाकुम्भरी माता का मंदिर बना, बीसलदेव चौहान तथा पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल के मध्य (सन् 1150-1192) ही दिल्ली के आसपास दादरी दनकौर के क्षेत्र में 360 गांव भाटी गुर्जर तथा कैराना के आसपास 84 गांव चौहान गुर्जरों को चौहान सम्राट द्वारा जागीर देकर बसाया गया है।
सम्राट बिसलदेव की मृत्यु के बाद उसका अल्पव्यस्क पुत्र अमरगंगेय शासक बना, परन्तु अमरगंगेय को जगदेव के पुत्र पृथ्वीराज चौहान द्वितीय ने हटा दिया और खुद सम्राट बन गया। सन् 1169 में पृथ्वीराज चौहान द्वितीय की मृत्यु हो गई।वह निसंतान था।
 सन् 1170 में बिजौलियां शिलालेख में चौहानों को विप्र श्रीवत्स गोतभूते लिखा है,यहा विप्र का अर्थ विद्वान,वत्स का अर्थ पुत्र तथा गोत का अर्थ कुल या वंश है जिसका अर्थ है विद्वान कुल के पुत्र।ऐसा बीसलदेव चौहान के विद्वान होने के कारण लिखा गया है, परन्तु इतिहास कार दशरथ शर्मा ने इसको पढ़कर चौहानों को ब्राह्मण ही लिख दिया।
उस स्थिति में अजमेर के सामंतों ने सोमेश्वर चौहान को सम्राट बनाने के लिए अपना समर्थन दिया। सोमेश्वर चौहान अरणोराज का छोटा पुत्र था। सोमेश्वर चौहान अपने नाना सिद्धराज चालुक्य के पास गुजरात में रह रहे थे। सोमेश्वर चौहान की शादी चेदी देश (वर्तमान में जबलपुर के पास) के कलचूरी राजा की राजकुमारी कर्पूरी देवी के साथ हो गई थी, अपने नाना के यहां ही सोमेश्वर चौहान के दो पुत्र पृथ्वीराज चौहान व हरिराज चौहान तथा एक पुत्री पृथा पैदा हो गई थी। अजमेर में शासन करने के लिए सोमेश्वर चौहान अपने नाना के यहां से नागर वंशी ब्राह्मण स्कंद,बामन तथा सौर नामक योग्य व्यक्तियों को ले आये थे। सन् 1178 में सोमेश्वर चौहान की मृत्यु हो गई थी।18 अगस्त सन् 1178 का आवल्दा नामक स्थान से  सोमेश्वर चौहान का एक अंतिम शिलालेख प्राप्त हुआ है तथा 14 मार्च सन् 1179 का बडल्लया नामक स्थान से पृथ्वीराज चौहान तृतीय का प्रथम शिलालेख प्राप्त हुआ है, इसलिए विद्वानों का ऐसा मानना है कि पृथ्वीराज चौहान उर्फ राय पिथोरा का राजतिलक अगस्त 1178 व मार्च 1179 के समयांतराल में कभी हुआ है। सम्राट बनने के समय पृथ्वीराज चौहान की आयु 12-13 वर्ष थी। अल्पव्यस्क होने के कारण पृथ्वीराज चौहान की माता कर्पूरी देवी ने राजकाज को अच्छी तरह से सम्भाल लिया। कर्पूरी देवी ने राजकाज को सम्भालने के लिए कदम्वास दाहिमा नामक एक योग्य व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त किया तथा अपने सहयोग के लिए चेदि देश से अपने चाचा भुवनमल्ल को भी अजमेर बुला लिया।
पृथ्वीराज चौहान व हरिराज चौहान की शिक्षा दीक्षा की व्यवस्था सरस्वती कंठावरण पाठशाला अजमेर में की गई। पृथ्वीराज विजय के अनुसार पृथ्वीराज चौहान 64 कला व 14 विद्याओं में पारंगत थे। धर्मशास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, संगीत कला, इंद्र जाल, कविता, वाणिज्य विनिमय तथा 6भाषाए  संस्कृत अपभ्रंश, प्राकृत,पेशाची महाघवी एवं सूरसेनी के साथ  अनेक देशी भाषाएं,पक्षी भाषाएं, गणित विद्या के साथ तलवार,भाला, धनुष सहित 36 प्रकार के अस्त्र शस्त्र चलाने व धारण करने में दक्ष थे।
पृथ्वीराज चौहान ने दो वर्ष पश्चात ही अपनी माता से शासन की बागडोर अपने हाथ मे ले ली।शासन को अपने अनुरूप चलाने के लिए पृथ्वीराज चौहान ने अपने मंत्रिमंडल में आमूलचूल परिवर्तन किया। प्रधानमंत्री कदम्वास के स्थान पर पं पद्मनाभ को प्रधानमंत्री नियुक्त किया, सेनापति भुवनमल्ल के स्थान पर गुजरात से आये नागर ब्राह्मण स्कंद को सेनापति बना दिया गया। सेनापति स्कंद के सहयोग के लिए उदयराज,कातिया, गोपाल सिंह चौहान सेना नायक बनाये गये। जयानक, विद्यापति गोंड,वासिश्वर,विश्वरूप,रामभट्ट और प्रताप सिंह को मंत्री बनाया गया। मंत्री जयानक ने ही पृथ्वीराज विजय की रचना की।
पृथ्वीराज चौहान को अपदस्थ करने के लिए सम्राट बिसलदेव के पुत्र  अमरगंगेय ने विद्रोह कर गुड़गांव पर अधिकार कर लिया। पृथ्वीराज चौहान ने अमरगंगेय को परास्त कर मार डाला। अमरगंगेय के छोटे भाई नागार्जुन ने भी विद्रोह का झंडा खडा कर दिया। पृथ्वीराज चौहान के राज्य के उत्तरी भाग में मथुरा, भरतपुर,अलवर के आसपास भडानक (भडाना जो गुर्जर जाति का एक गोत्र है) बडी संख्या में रहते थे जो एक शक्तिशाली तथा लडाका समुदाय के रूप में प्रसिद्ध थे।ये भडानक भी नागार्जुन के सहयोगी बन गए।इस विद्रोह को दबाने के लिए पृथ्वीराज चौहान ने बडी तैयारी के साथ योजना बनाई। पृथ्वीराज चौहान अपनी सेना लेकर जब नागार्जुन से युद्ध के लिए आगे बढ़ा तो नागार्जुन युद्ध से पहले ही भाग गया। नागार्जुन के सेनापति ने पृथ्वीराज चौहान का सामना किया परन्तु वह भी परास्त हो गया। नागार्जुन की माता, स्त्री और बच्चे तथा कुछ सैनिकपकड़ लिए गए। पृथ्वीराज विजय के अनुसार अजमेर लाकर सभी विद्रोहियों को मार डाला गया तथा विद्रोहियों के सर अजमेर के प्रमुख स्थानों पर टांग दिए गए, जिससे कोई आगे विद्रोह करने से पहले उसके परिणाम से परिचित रहें।
सन् 1182 में पृथ्वीराज चौहान ने एक बडी सेना लेकर भडानको  (भडाना)पर हमला किया ।भड़ानक’ मुख्य रूप से  मथुराअलवरभरतपुरधौलपुरकरौली क्षेत्र में निवास करते थे और यह क्षेत्र इनके राजनीतिक आधिपत्य के कारण भड़ाना देश’ अथवा भड़ानक देश’ कहलाता था। सम्भवतः भड़ानकों की बस्तियाँ दिल्ली के दक्षिण में फरीदाबाद जिले तक थींजहाँ आज भी ये बड़ी संख्या में निवास करते हैं। फरीदाबाद जिले में भड़ानों के बारह गांव आबाद हैं। इतिहासकार दशरथ शर्मा के अनुसार जब शाकुम्भरी के राजा पृथ्वीराज चौहान ने भड़ाना देश पर आक्रमण किया, उस समय पर इस राज्य की पूर्वी सीमा पर चम्बल नदी एवं कछुवाहों का ग्वालियर राज्य था पूर्वोत्तर दिशा में इसकी सीमाएँ यमुना नदी एवं गहड़वालों के कन्नौज राज्य तक थी। इसकी अन्य सीमाएँ शाकुम्भरी के चौहान राज्य से मिलती थी। भड़ाना या भड़ानक देश एक पर्याप्त विस्तृत राज्य था। स्कन्द पुराण के विवरण के अनुसार भड़ाना देश में 1,25,000 ग्राम थे। समकालीन चौहान राज्य में भी इतने ग्राम न थे। पृथ्वीराज चौहान ने भडानको की हाथी सेना को परास्त कर उत्तर की ओर धकेल दिया। समकालीन लेखक जिनपथि सूरी ने अपने ग्रंथ में इस हमले का वर्णन किया है।
 पृथ्वीराज चौहान ने अगला हमला मोहबा के चंदेल राजा परमाल देव पर किया। चौहान राज्य की पूर्वी सीमा मोहबा से मिलती थी। चौहान गुर्जर प्रतिहार राजवंश के सबसे अधिक निकट तथा विश्वस्त सहयोगी थे। परंतु चंदेल राजा विद्याधर ने गुर्जर प्रतिहार सम्राट राजपाल को मार डाला था,इस कारण चौहान और चंदेलो के सम्बन्ध में  एक खटास बनी हुई थी। चंदेल राजा ने कन्नौज के राजा जयचंद से सन्धि कर रखी थी।
 मध्य भारत के जेजाभक्ति(सन् 1531 के बाद बुंदेलखंड) क्षेत्र में मोहबा, कालिंजर का प्रसिद्ध दुर्ग तथा राजा पृथ्वीराज चौहान का ननिहाल चेदि देश,जहा कलचूरी राजवंश का शासन था, चंदेलों और कलचूरी राजवंश के राज्य को मिलाकर जो क्षेत्र बनता था,वो सन 1531के बाद बुंदेलखंड कहलाया।   सन् 1182 के मदनपुर शिलालेख के अनुसार पृथ्वीराज चौहान ने जेजाभुक्ति को नष्ट कर दिया तथा चंदेल राज्य पर आक्रमण कर दिया।इस हमले का सामना करने के लिए चंदेल राजा ने अपने प्रसिद्ध योद्धा आल्हा-ऊदल को,जो इस समय कन्नौज में थे को बुलावा भेजा। आल्हा-ऊदल अपनी मात्रभूमि की रक्षा के लिए मोहबा आ गये। मात्रभूमि और राष्ट्र का आशय उस समय,उस स्थान या राज्य से होता था, जिसमें वह निवास करता था, आल्हा-ऊदल चंदेल राजा परमाल के सेनापति जस्सराज के पुत्र थे तथा अहीर जाति की  उप-जाति बनाफर में पैदा हुए थे। आल्हा-ऊदल ने मोहबा को बचाने के लिए भयानक युद्ध किया।जब युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की सेना भारी पडने लगी तो ऊदल ने अपनी पगड़ी में शालिग्राम और मूंह में तुलसी रखकर अपनी सेना के साथ घोड़ों से नीचे उतर कर घमासान युद्ध किया,इस युद्ध में ऊदल पृथ्वीराज चौहान के योद्धा काका कन्ह चौहान के हाथो वीरगति को प्राप्त हो गया,राजा पृथ्वीराज चौहान भी बुरी तरह घायल होकर जमीन पर गिर गया।ऊदल की मृत्यु होते ही चंदेल राजा ने अपनी हार स्वीकार कर ली, चंदेल राजा के हारने के बाद धासान नदी के पश्चिमी भाग सागर,ललकपुर,ओरछा, झांसी,सिरसवा, गढ़ मोहबा का बहुत सा भू-भाग पृथ्वीराज चौहान के हाथो में आ गया। पृथ्वीराज चौहान ने अपने सामंत पंजावन राय को इस क्षेत्र का प्रांतपति बना दिया।इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान भले ही विजयी हो गये, परंतु आल्हा-ऊदल की वीरता आज तक भी भारतीय जनमानस के मन पर छाई हुई है,वो अमर हो गए।आम जनमानस में इस युद्ध में आल्हा-ऊदल ही विजेता माने जाते हैं।
अब पृथ्वीराज चौहान के राज्य की सीमाएं कन्नौज राज्य की सीमा से मिल गई थी।
मोहबा पर विजय के पश्चात सम्राट पृथ्वीराज चौहान के राज्य की सीमाएं उत्तर में जम्मू के राजा, दक्षिण में चालुक्य शासक, उत्तर पूर्व में कन्नौज के गढ़वाल शासक तथा पश्चिम में मुस्लिम शासकों से मिल गयी।इस कारण ये सब पृथ्वीराज चौहान के शत्रु बन गए थे। परन्तु सबसे अधिक खतरा इनमें से चौहान साम्राज्य को होना था,तो वह वह पश्चिम की ओर से था।
पश्चिम में गजनी में इस समय गोर वंश का शासन था, मोहम्मद गोरी भी गजनवी की तरह भारत पर हमला कर,अरब के खलिफाओ से प्रशंसा प्राप्त करना चाहता था। मोहम्मद गोरी महमूद गजनवी के द्वारा बनाए गए अमीरों से राज्य को छीनकर अपने कब्जे में करते हुए आगे बढ़ रहा था। मोहम्मद गोरी ने गजनवी द्वारा स्थापित पंजाब के अमीरों को पराजित कर सन् 1179 में पेशावर,  पंजाब के स्यालकोट, सन् 1182 में मोहम्मद गोरी ने सिंध क्षेत्र के देवल को अपने अधिकार में कर लिया। सन् 1185 में लाहौर  को भी अपने अधिकार में ले लिया। लाहौर पर अधिकार हो जाने के बाद पंजाब के सरहिंद से मोहम्मद गोरी के राज्य की सीमा लग गई। सरहिंद का दुर्ग पृथ्वीराज चौहान के राज्य में था।
सन् 1182 में मोहम्मद गोरी और जम्मू के राजा चक्रदेव के मध्य एक संधि हुई,खोखरो के दमन के लिए। सन् 1185 में मोहम्मद गोरी ने सतलज के किनारे बसे छोटे छोटे हिन्दू राजाओं को अपने अधीन करने के लिए प्रयास किए,ये राजा अपने गुट के नेता राजा चंद्र राज के नेतृत्व में पहले गुजरात के सोलंकियों के पास सहायता के लिए पहुंचे। लेकिन यहा से कोई सहायता ना मिलने के कारण अजमेर में सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पास पहुंचे।सतलज के इन राजाओं ने कभी सम्राट बिसलदेव चौहान की सेना के साथ मिलकर गजनी के शासकों से युद्ध किया था,उसी का वास्ता देकर सम्राट पृथ्वीराज चौहान से मदद की गुहार लगाई। सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने इन सबकी मदद के लिए अपनी सेना को सेनापति चामुण्ड राय तथा भुवनक मल्ल के नेतृत्व में मोहम्मद गोरी से युद्ध के लिए भेजा तथा स्वयं भी साथ चल दिए। सिंधु और सतलज के मध्य किसी स्थान पर भयानक युद्ध हुआ, जिसमें मोहम्मद गोरी पराजित हुआ तथा बंदी बना कर सम्राट पृथ्वीराज चौहान के सामने पेश किया गया। सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने गजनी से हर वर्ष निश्चित कर लेने के संधि प्रस्ताव पर गोरी को छोड दिया।
गजनी से कर लेने के लिए अपने मंत्री प्रताप सिंह को नियुक्त किया।यह प्रताप सिंह धन का लोभी था,गजनी से मिले कर मे से कुछ धन चुरा लेता था, अजमेर की महत्वपूर्ण सूचनाएं भी गोरी को देने लगा था।एक बार पृथ्वीराज चौहान ने प्रताप सिंह के स्थान पर अपने दूसरे सामंत शूर सिंह पंवार को कर लेने के लिए गजनी भेज दिया।जब गोरी को यह मालूम हुआ कि प्रताप सिंह के स्थान पर कोई ओर कर लेने के लिए आया है,तब मुहम्मद गोरी ने शूर सिंह को अपमानित करने की कोशिश की, परन्तु शूर सिंह ने गोरी के भरे दरबार में गोरी के एक सेनानायक सहित 74 दरबारियों को मार डाला तथा वो खुद भी वीरगति को प्राप्त हो गये।गोरी ने दोगुना कर देकर तथा क्षमा का एक पत्र लिखकर सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पास भेज दिया।
अब पुनः प्रताप सिंह ही गजनी से कर लेने के लिए जाने लगा।
सन् 1189 में मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान के अधीन भटिंडा पर हमला कर दिया।इस हमले पर पृथ्वीराज चौहान ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की।
सन् 1191 में मोहम्मद गोरी ने सरहिंद के किले पर हमला कर अपने अधिकार में ले लिया ,अब पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गोरी के विरूद्ध सैनिक अभियान किया। पृथ्वीराज चौहान ने अपने सामंत दिल्ली के राजा गोविन्द राय तोमर/ खांडेराव तोमर(दिल्ली के तंवर,देखे परिशिष्ट नम्बर- 2) को मोहम्मद गोरी पर हमले का आदेश दिया। गोविंद राय तोमर ने थानेश्वर और करनाल के मध्य तराईन के मैदान में गोरी की सेना पर जोरदार हमला किया।इस युद्ध में गोविंद राय तोमर का मोहम्मद गोरी से आमना-सामना हो गया। मोहम्मद गोरी के हमले से गोविन्द राय तोमर के दो दांत टूट गए, परन्तु गोविंद राय तोमर ने मोहम्मद गोरी पर ऐसा जोरदार हमला किया कि वह बुरी तरह घायल हो गया, मोहम्मद गोरी की सेना में भगदड़ मच गई।इस भगदड़ में मोहम्मद गोरी के सेनानायक किसी प्रकार घायल मोहम्मद गोरी को बचा ले गये। पृथ्वीराज चौहान ने आगे बढ़कर सरहिंद के किले पर हमला कर अपने अधिकार में ले लिया तथा मोहम्मद गोरी की ओर से नियुक्त सरहिंद के किलेदार काजी जियाउद्दीन को बंदी बना लिया। पृथ्वीराज चौहान काजी जियाउद्दीन को पकड़ कर अजमेर ले आया।पृथ्वीराज चौहान से काजी जियाउद्दीन ने निवेदन किया कि यदि सम्राट उसके प्राण बख्श दे तथा मुक्त कर दे तो वह सम्राट को विपुल धन देगा। सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने  धन लेकर काजी जियाउद्दीन को छोड दिया।काजी जियाउद्दीन गजनी चला गया।हम ऊपर लिख चुके हैं कि सूफी भी मुस्लिम बादशाह के साथ रहते थे,इस दौरान भी मोहम्मद गोरी के साथ मोहिनुद्दीन चिश्ती नाम के एक सूफी साथ थे। सूफी मोइनुद्दीन चिश्ती वापस नही गया।वह फकीरों का भेष बनाकर अजमेर में ही रहने लगा।मिनाज- उल- सिराज, अबुल फजल तथा मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनि ने अपनी पुस्तकों में मोइनुद्दीन चिश्ती के अजमेर आने के विषय में लिखा है।
ऊधर मोहम्मद गोरी ने स्वस्थ होकर नये सिरे से गजनी में सेना एकत्रित करनी प्रारंभ कर दी। पूरे एक वर्ष तक तैयारी करने के बाद मोहम्मद गोरी एक लाख बीस हजार की सेना लेकर पृथ्वीराज चौहान पर हमला करने के लिए गजनी से चल दिया। सन् 1192 के युद्ध से पहले पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गोरी की सेना के बीच अनेक छोटी बडी झड़पें हुईं।इन झड़पों के बारे में पृथ्वीराज रासो में 21 बार,हम्मीर काव्य में 7 बार, पृथ्वीराज प्रबंध में 8 बार,सुरजन चरित्र में 21 बार, प्रबंध चिंतामणि में 23 बार पृथ्वीराज चौहान की मोहम्मद गोरी पर विजय बताई गई है। प्रबंध कोष में 20 बार पृथ्वीराज चौहान के द्वारा मोहम्मद गोरी को परास्त कर पकड़ कर छोड़ना लिखा है।इन ग्रंथों के प्रचार के कारण पृथ्वीराज चौहान की छवि एक बिल्कुल अनुभव हीन राजनितिक राजा की बन गई है। पृथ्वीराज चौहान एक सम्राट था,वह अपने दुश्मनों से निपटना जानता था, कौन सा दुश्मन उसके लिए कितना हानिकारक है वह भली-भांति समझता था। पृथ्वीराज चौहान ने अपने रिश्ते के भाई अमरगंगेय व नागार्जुन के परिवार को भी गिरफ्तार कर जिंदा नही छोडा था तो मोहम्मद गोरी को कैसे छोड देता। वास्तविकता यही है कि  छोटी बडी कुछ झड़पों में पृथ्वीराज चौहान का पलडा भारी रहा। मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान के पास अपना दूत अजमेर भेजा और कहा कि या तो पृथ्वीराज चौहान इस्लाम स्वीकार कर ले,या गम्भीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार हो जाये। पृथ्वीराज चौहान ने जबाव दिया कि या तो गजनी वापस लौट जाओ, वर्ना भेट युद्ध के मैदान में होगी।
गोरी ने पृथ्वीराज चौहान का उत्तर सुनकर छल करने का निर्णय लिया। गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को लिख भेजा कि वह अपने बड़े भाई जो कि सुल्तान है, से पूछ कर निर्णय लेगा। गोरी ने कहा वह भी युद्ध नही चाहता। यदि मेरे बडे भाई जो कि गजनी का सुल्तान है, की सहमति मिलने पर वापस चला जायेगा। परन्तु पृथ्वीराज चौहान पंजाब, मुल्तान व सरहिंद पर गजनी का अधिकार मान ले।
पृथ्वीराज चौहान तुरन्त अजमेर से एक सेना लेकर तराईन की ओर चल दिया। पृथ्वीराज चौहान की सेना का मुख्य भाग, सेनापति स्कंद के साथ था,वह साथ नही चल सका तथा पिछे रह गया।दूसरा सेनापति उदयराज भी समय से अजमेर से रवाना ना हो सका। पृथ्वीराज चौहान का मंत्री सोमेश्वर जो पृथ्वीराज चौहान के द्वारा पहले दंडित किया जा चुका था, चुपके से अजमेर से निकल कर मोहम्मद गोरी से जा मिला। जम्मू का हिंदू राजा भी अपनी सेना लेकर गोरी से जा मिला।
तराईन के द्वीतिय युद्ध के समय पृथ्वीराज चौहान की आयु कुल 26 वर्ष थी। पृथ्वीराज चौहान का प्रमुख सेनापति स्कंद, मंत्री प्रताप सिंह एवं सोमेश्वर तीनों ही पृथ्वीराज चौहान के वफादार नहीं थे। सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती भी पल-पल की सूचना मोहम्मद गोरी को दे रहा था। पृथ्वीराज चौहान की अन्य सेनाएं पृथ्वीराज चौहान से कितनी दूर थी इसकी सम्पूर्ण जानकारी  मोहम्मद गोरी को थी। पृथ्वीराज चौहान के साथ दिल्ली का राजा गोविन्द राय तोमर अपनी सेना के साथ था। पृथ्वीराज चौहान ने अपनी सेना का खेमा सरस्वती नदी के एक किनारे पर  लगा दिया, मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को धोखा देने के लिए अपनी सेना की छोटी सी टुकडी का एक खेमा सरस्वती नदी के दूसरे किनारे पर लगा दिया तथा सेना के मुख्य भाग को पीछे छिपाकर रखा। पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गोरी को सूचना भेजी कि या तो वह युद्ध करें वर्ना भाग जाये। मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज से निवेदन किया कि उसने अपना दूत अपने बड़े भाई के पास भेजा है,वह तो सिर्फ सेनापति है सुल्तान तो उसका बडा भाई ही है, इसलिए कुछ समय दें। पृथ्वीराज चौहान गोरी के द्वारा प्रयोग किए गए  झांसे में आ गया । मोहम्मद गोरी ने अपनी सेना के पांच भाग किये। पांच जगह दस-दस हजार घुड़सवार रखें।चार टुकड़ियों को पृथ्वीराज चौहान की निंद्रा में पडी सेना पर चारों ओर से हमला करने के लिए एक मार्च,दिन रविवार सन् 1192 की प्रातः काल में भेज दिया। युद्ध की यह तिथि दिल्ली के तोमर ग्रंथ के लेखक हरिहर निवास द्विवेदी ने अपनी पुस्तक में लिखी है। मोहम्मद गोरी के साथ रहें हसन निजामी ने हिजरी 581, रमजान महीने के प्रारम्भ होने से पहले युद्ध का समाप्त होना लिखा है,जो 10 सितम्बर सन् 1192 है। अजमेर, नागौर आदि स्थानों पर अप्रैल और मई 1192 के शिलालेख लगें हैं, जिनमें तराईन के युद्ध में बलिदान हुए योद्धाओं की पत्नियों के सती होने का उल्लेख है। अतः हरिहर निवास द्विवेदी की तिथि 1 मार्च सन् 1192 बिल्कुल ठीक है।
 दुष्ट मोहम्मद गोरी ने अचानक हमला कर  पृथ्वीराज चौहान की सेना का कत्लेआम शुरू कर दिया। हजारों सैनिक मार डालें गये।यह युद्ध नही था एक भयंकर दुर्घटना थी।इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की सेना के ना तो रण गजो पर होदे चढ़े ,ना घोड़ों पर जीन कसी,ना सैनिक कवच धारण कर घोड़ों पर सवार हो सकें।ना कुमकुम का तिलक लगा सकें,ना अपने चारणो और भाटो द्वारा अपने पूर्वजों की बहादुरी का बखान सुन कर शत्रु से दो-दो हाथ कर सके।अचानक हुए इस हमले से पृथ्वीराज चौहान की सेना में भगदड़ मच गई। तराईन के प्रथम युद्ध के विजेता गोविंद राय तोमर ने साहस दिखाते हुए अपनी गज सेना को तैयार कर मोहम्मद गोरी की सेना का सामना किया। गोविंद राय तोमर ने अपनी सेना के दाहिने ओर की कमान पदमशाह रावल को तथा बायी ओर की कमान भोला उर्फ भुवनेक मल्ल के नेतृत्व में लेकर युद्ध प्रारम्भ कर दिया।इस संकट की घड़ी में गोविंद राय तोमर ने अदम्य साहस का प्रदर्शन किया, उसने अपने सम्राट पृथ्वीराज चौहान को एक हाथी पर बैठाकर भयंकर युद्ध किया। युद्ध का परिणाम अपने विरूद्ध जाता देख एक दिशा में आक्रमण कर सम्राट को युद्ध के मैदान से निकालने का रास्ता बना दिया। अब पृथ्वीराज चौहान हाथी से नीचे उतर कर घोड़े पर सवार हो गया। पृथ्वीराज चौहान की सेना को एक ओर से निकलते देख गोरी ने अपने पांचवें दस्ते को उस पर हमले का आदेश दिया।दूसरी ओर इस घमासान युद्ध में गोविंद राय तोमर वीर गति को प्राप्त हो गया।  गोरी के सैनिकों ने पृथ्वीराज चौहान को चारों ओर से घेर लिया।इस पर पृथ्वीराज चौहान अपने को घिरा देख शत्रु पर प्राणघातक आक्रमण करने के लिए सैनिकों सहित घोड़े से नीचे उतर कर  युद्ध करने लगा। परन्तु तुर्की सैनिक अधिक होने के कारण निकलने का रास्ता ना मिल सका।एक तुर्की सैनिक ने युद्ध कर रहे पृथ्वीराज चौहान के गले में लोहे की सिंहनी डाल दी और पृथ्वीराज चौहान को गिरफ़्तार कर लिया।इस प्रकार तराईन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की पराजय हो गई।17 मार्च सन् 1192 को दिल्ली पर मोहम्मद गोरी का अधिकार हो गया।
मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को अजमेर में अपने अधीन बना कर शासन चलाना प्रारंभ किया।
 मोहम्मद गोरी ने कई प्रकार के सिक्के चलवाये, जिनमें एक ओर पृथ्वीराज चौहान तथा दूसरी ओर मोहम्मद गोरी का नाम अंकित था।
भारतीय ग्रंथ पृथ्वीराज प्रबंध तथा मोहम्मद गोरी के समकालीन मुस्लिम लेखक हसन निजामी के द्वारा रचित ग्रंथ ताज - उल - मासिर के अनुसार
अजमेर में ही गोरी ने अपने विरूद्ध षड्यंत्र रचने का आरोप लगा कर पृथ्वीराज चौहान की हत्या कर दी।
हसन निजामी ने पृथ्वीराज चौहान को  इस्लाम का शत्रु उसी प्रकार कहा है। जिस तरह सम्राट मिहिर भोज के शासनकाल में सन् 851 ई. में सुलेमान नाम का अरब भूगोलवेत्ता और व्यापारी भारत आया। उसने अपने ग्रन्थ ‘सिलसिलात-उत तवारीख’ में गुर्जर प्रतिहारो को  अरबों का सबसे बड़ा शत्रु कहा है। 
मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान के अल्पव्यस्क पुत्र  को विपुल कर लेकर अजमेर का शासक नियुक्त कर दिया।
इस प्रकार भारत के एक युग का दुखद अंत हो गया।
मोइनुद्दीन चिश्ती ने अजमेर में अपना एक खानगाह (मठ) बनाया। मोहम्मद गोरी ने मोइनुद्दीन चिश्ती को सुल्तान-ए-हिंद की उपाधि प्रदान की।
समाप्त

नोट- पृथ्वीराज रासो सन् 1676 ई में मेवाड़ के राणा राज सिंह प्रथम को अजमेर से प्राप्त हुई थी। पृथ्वीराज रासो में पृथ्वीराज चौहान की माता कमला देवी को दिल्ली के राजा अनंगपाल तोमर की पुत्री  बताया गया है जो गलत है, पृथ्वीराज चौहान और जयचंद को मौसेरे भाई तथा दुश्मनी का कारण दिल्ली के राज का पृथ्वीराज चौहान को मिलना बताया गया है, जबकि दिल्ली के तोमर तो पहले से ही अजमेर के चौहान राजाओं के सामंत थे। फिर जयचंद को दिल्ली कैसे मिल सकती थी। मोहम्मद गोरी को धीर सिंह पुंडीर द्वारा गिरफ्तार कर लिया जाना लिखा है जो सत्य नही है। तराईन के दूसरे युद्ध की तिथि संवत 1158 अर्थात सन् 1101 लिखी है,वह भी गलत है,इस प्रकार पृथ्वीराज रासो ग्रंथ एतिहासिकता से दूर हो गया है। क्योंकि पृथ्वीराज विजय का लेखक जयानक तराईन के युद्ध में अपने स्वामी की हार होते ही अजमेर को छोड़कर कश्मीर चला गया था।इस कारण पृथ्वीराज चौहान पर कोई लिखित ग्रंथ नही था। परन्तु सन् 1876 में जयानक द्वारा लिखित पृथ्वीराज विजय नामक ग्रंथ मिल गया।
संस्कृत भाषा में विरचित जीवनीपरक ऐतिहासिक महाकाव्यों की श्रृंखला में काश्मीर निवासी महाकवि श्री जयानक द्वारा प्रणीत पृथ्वीराजविजय महाकाव्यम् शीर्षक ग्रन्थ अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। भूर्जपत्र पर लिखित इस ग्रंथ की पाण्डुलिपि की पहली खोज डॉ. जी. बूह्लर द्वारा सन् 1876 में की गई थी, जब वे संस्कृत की प्राचीन पाण्डुलिपियों का पता लगाने के लिए काश्मीर गये थे। उन्होंने तत्सम्बद्ध सम्पूर्ण सामग्री ‘डेक्कन कॉलेज, पुना’ को सुपुर्द कर दी, जिनका विवरण उस कॉलेज की सन् 1875-76 की 150वीं संख्या पर उल्लिखित है। डॉ. बूह्लर ने अपनी शोधयात्रा का विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत करते समय इस बात पर हार्दिक दुःख प्रकट किया है कि संस्कृत के अमर ग्रन्थों की पाण्डुलिपियों की वर्तमान दुर्दशा निस्संदेह हमारे लिए दुर्भाग्य की सूचक है।
डॉ. बूह्लर की समग्र रिपोर्ट का गम्भीर अध्ययन करने के पश्चात् स्वर्गीय पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने और पूर्वतः म.म.पं. गौरीशंकर ओझा ने तदनंतर ‘पृथ्वीराजविजय महाकाव्य’ का सुसम्पादित संस्करण वि. संवत् 1995 अर्थात सन् 1938 में वैदिक यंत्रालय, अजमेर से प्रकाशित कराया।
परिशिष्ट नंबर-1
अरब हमलावरों से भारत को बचाने के लिए गुर्जर प्रतिहार नागभट प्रथम के नेतृत्व में बप्पा रावल, देवराज भाटी व अजयराज चौहान (प्रथम) ने भारी संघर्ष किया।  गुर्जर प्रतिहार
 नागभट द्वितीय (सन् 816-833)  ने अपने शासन काल में कई महत्वपूर्ण सफलताएं अर्जित की। नागभट द्वितीय ने चित्तौड़ के गहलोत व सौराष्ट्र के बाहकधवल के सहयोग से उणियारा (वर्तमान में टांक राजस्थान में)नामक स्थान पर पाल शासक धर्मपाल को पराजित कर दिया तथा सांभर के चौहान राजा गुवक प्रथम की सहायता से मत्स्य देश (वर्तमान अलवर राजस्थान में) के निकुंभ राजा को भी पराजित कर दिया। नागभट द्वितीय ने प्रसन्न होकर चौहान राजा गुवक प्रथम को "वीर" की उपाधि से विभूषित किया। गुर्जर प्रतिहार अपनी राजधानी कन्नौज मे स्थापित हो गए थे, इसलिए पुरानी राजधानी जालौर के क्षेत्र में चौहान उनके सबसे विश्वसनीय और प्रमुख प्रतिनिधि थे, इसलिए चौहान राजा गुवक प्रथम को दी गई "वीर" उपाधि को सम्पूर्ण क्षेत्र में रहने वाले गुर्जर आज भी धारण किए हुए हैं तथा गुर्जर बाहुल्य गांव में जगह जगह गांव में अंदर जाने  के रास्ते पर आज भी "वीर गुर्जर" द्वार लिखा मिल जायेगा। चौहान राजा गुर्जर प्रतिहार राजाओं के लिए कितने महत्वपूर्ण थे,इस बात का पता इस एक रिश्तें से ही चल जाता है कि चौहान गुवक द्वितीय की बहन कलावती गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज की रानी थी। 
सम्राट मिहिर भोज के पोत्र सम्राट महिपाल  (सन् 914-943) के अंतिम दिनों में गुर्जर प्रतिहार राजाओं की शक्ति क्षीण होने लगी थी,इस कारण महोबा के चंदेल,सांभर के चौहान, चित्तौड़ के गुहिल तथा ग्वालियर के कच्छपघट(कछवाहे) एक तरह से स्वतंत्र शासक बन गए थे। सम्राट महिपाल के समय सांभर के चौहान वाक्पतिराज प्रथम (सन् 917-944)शासक थे।इसके बाद सिम्ह राज (सन्944-971),विग्रह राज द्वीतिय (सन् 971-998)शासक बनें।
चौहान राजा दुर्लभ राज द्वीतिय (सन् 998-1012) ने मुस्लिम सेनापति शाहबुद्दीन को परास्त किया और गोविंद राज तृतीय (सन् 1012-1026),वाक्पतिराज द्वितीय (सन् 1026-1040) चौहान शासक रहें।
यह ग्यारहवीं शताब्दी का वह समय था जब बगदाद के खलीफा भारत को दारूल हरब से दारूल इस्लाम बनाने के प्रयास में नाकाम हो चुके थे। अतः भारत को दारूल इस्लाम बनाने के लिए किये जाने वाले संघर्ष की कमान सैनिक कार्यवाही के लिए अफगानिस्तान के तुर्क शासको पर तथा शांति मार्ग से इस्लाम को फैलाने की जिम्मेदारी सूफी सम्प्रदाय पर आ गई थी। ग्यारहवीं शताब्दी में इमाम गज्जाली ने सूफी मत को इस्लाम के एक हिस्से के रूप में मान्यता दे दी थी। ये सूफी अरब व बगदाद के मुस्लिम व्यापारियों के साथ भारत में आ गए तथा भारत के आम जनमानस में घुल-मिल कर रहने लगे थे।
अरबी शासकों ने अपने तुर्क गुलामों को इस्लाम में दिक्षित कर अपने अंगरक्षक बनाने प्रारंभ कर दिए थे।जो तुर्क गुलाम अधिक काबिल होते थे वो सेनानायक भी बनने लगे थे तथा उच्च पदों पर जाने लगे थे।ये गुलाम तुर्क सरदार अपने महलों व अपने अंगरक्षक के रूप में तुर्की गुलाम ही नियुक्त करते थे।
गजनी में एक दुर्ग था जिसका निर्माण कभी भाटी राजाओं ने करवाया था।यह दुर्ग अल्तगीन तुर्क के अधीन था,इस अल्तगीन का वंश ही गजनी वंश कहलाया।अल्तगीन एक तुर्की गुलाम था,अल्तगीन के बाद सुबुक्तगीन शासक बना, सन् 997 में सुबुक्तगीन की मृत्यु के बाद सुबुक्तगीन का छोटा बेटा गजनी का शासक बना, परन्तु सुबुक्तगीन के बड़े बेटे महमूद ने अपने छोटे भाई की हत्या कर के गजनी की सत्ता पर कब्जा कर लिया।यही महमूद, महमूद गजनवी के नाम से जाना गया। महमूद गजनवी ने खलीफा से यह आग्रह किया कि यदि खलिफा उसे सुल्तान घोषित कर दे तो वह जब तक जीवित रहेगा तब तक भारत पर हमला करता रहेगा तथा कुफ्र का सफाया कर देगा,खलीफा को लूट की सम्पत्ति में भी हिस्सा देगा।खलीफा की समझ में महमूद गजनवी की बात आ गई और महमूद गजनवी एक गुलाम से सुल्तान बन गया।खलीफा अलकाहिदे बिल्लाह ने महमूद गजनवी को यामिनीद्दोला अर्थात साम्राज्य का दाहिना हाथ और अमीनउलमिल्लत अर्थात मुसलमानों का संरक्षक नामक उपाधियां प्रदान की।यामिनीद्दोला उपाधि के कारण ही महमूद गजनवी का वंश यामिनी वंश कहलाया।अपनी बात को सत्य सिद्ध करते हुए महमूद गजनवी ने भारत पर सन् 1000 से लेकर सन् 1027 तक लगातार 17 हमले किए।
महमूद गजनवी के द्वारा किए गए इन 17 हमलों में तीन हमले बडे महत्वपूर्ण है।
वो सन 1008 में हिंदू शाही के राजा जयपाल, सन् 1018 में कन्नोज के गुर्जर प्रतिहार राजा राजपाल तथा सन्1025 में सोमनाथ पर प्रमुख रूप से किये गये हमले है। जिनके कारण भारत की राजनीतिक व सामाजिक प्रतिष्ठा को गहरा आघात लगा। सन् 1030 में महमूद गजनवी की मृत्यु हो गई। महमूद गजनवी के उत्तराधिकारियों में सत्ता संघर्ष शुरू हो गया। अतः उपयुक्त अवसर का लाभ उठाते हुए
वीर्य राम चौहान (सन् 1040) ने गजनी की सेना को परास्त कर दिया। चौहान राजा विग्रह राज तृतीय (सन् 1070-1090) ने दिल्ली के तोमरो के सहयोग से हांसी,थानेश्वर व नगर कोट को गजनवी के उत्तराधिकारियों के शासन से मुक्त करा लिया। विंध्याचल से हिमालय तक विदेशी मुस्लिम शासकों को भगा दिया गया। पृथ्वीराज प्रथम ने गजनी के सेनापति तुगस्दीन को युद्ध में हरा दिया।
चौहान राजा अजयराज द्वीतिय (सन् 1110-1135) ने अजमेर को अपनी राजधानी बनाया।अब चौहान राजधानी सांभर के स्थान पर अजमेर हो गई। अजयराज चौहान के शासनकाल में नागौर पर गजनी के शासकों का कब्जा हो गया था। परन्तु अजयराज चौहान के उत्तराधिकारी अरणोराज(सन् 1135-1150) उर्फ आना जी ने नागौर दुर्ग को पुनः अपने अधिकार में ले लिया तथा गजनी के शासकों को यहां से मार कर भगा दिया।अरणोराज के समय मुस्लिम सेना पुश्कर तक पहुंच गई थी,अरणोराज ने तारागढ़ क़िले से कुछ दूरी पर इस तुर्की सेना को युद्ध में समाप्त कर दिया तथा पुश्कर की पहाड़ियों से निकलने वाली चंद्रा नदी के पानी को लाकर युद्ध स्थल पर एक झील का निर्माण करवाया, जिसे आनासागर झील कहते हैं।अरणोराज ने परमभट्टारक,महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।अरणोराज की उसके बड़े पुत्र जगदेव ने हत्या कर दी तथा अजमेर की गद्दी पर अधिकार कर लिया। परंतु अरणोराज के छोटे भाई विग्रह राज चतुर्थ उर्फ बीसल देव(सन् 1150-1164) ने पिता के हत्यारे जगदेव को गद्दी से हटा दिया।अब बीसलदेव अजमेर के शासक बन गए।बीसलदेव बड़े ही शक्तिशाली चौहान शासक हुए।इन बीसलदेव के समय में गजनी की मुस्लिम सेना वर्तमान राजस्थान में शेखावाटी में स्थित भवेरा गांव तक आ पहुंची थी। लेकिन बीसलदेव ने अपनी सेना तथा सहयोगियों की मदद से इन मुस्लिम सेनाओं को अटक नदी के पार खदेड दिया तथा हिमालय से लेकर विंध्याचल तक का क्षेत्र विदेशी मुस्लिम हमलावरों से खाली करा लिया।बीसलदेव का दिल्ली में एक शिलालेख 9 अप्रैल सन् 1163 का प्राप्त हुआ है,जिसको शिवालिक स्तम्भ लेख भी कहते हैं।इस शिलालेख में बीसलदेव के द्वारा किए गए कार्यों का वर्णन है।बीसलदेव ने दिल्ली के राजा अनंगपाल तोमर को भी अपने अधीन कर लिया।बीसलदेव साहित्य प्रेमी, साहित्यकारों का आश्रय दाता था,बीसलदेव को कवि बांधव की उपाधि प्राप्त थी,वह हरि वेली नाटक के रचनाकार थे। इस समय चौहान राज्य की सीमा शिवालिक पहाड़ी सहारनपुर उत्तर प्रदेश से लेकर अटक नदी तक थी। 
परिशिष्ट नम्बर- 2
दिल्ली के तंवर -
दिल्ली के शासक अनंगपाल तोमर प्रथम ने सन् 735 के आसपास दिल्ली की सत्ता सम्भाली। अनंगपाल तोमर प्रथम का वास्तविक नाम राजा जाऊ था,वो ऐशो के राजा थे। दिल्ली को केंद्र बनाकर हस्तिनापुर तक के क्षेत्र में जब उनका राज स्थापित हो गया,उस समय इस क्षेत्र को अनंग देश के नाम से जाना जाता था।इस अनंग देश के राजा होने के कारण उनको अनंगपाल तोमर प्रथम के नाम से जाना गया। योगमाया माता तंवरो की कुल देवी है।राजा अनंगपाल तोमर प्रथम ने दिल्ली में योगमाया माता का मंदिर बनवाना। योगमाया माता का वाहन चील होने के कारण इनको चिलाय माता भी कहा जाता है।
अनंगपाल तोमर प्रथम के समय भारत पर अरबों के हमले हो रहे थे। दिल्ली के तंवरो ने गुर्जर प्रतिहार राजाओं के साथ सहयोग कर इस संघर्ष में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
सन् 1081 तक राजा अनंगपाल तोमर द्वीतिय का शासन रहा है।
राजा अनंगपाल तोमर द्वीतिय ने ही दिल्ली में लालकोट किले का निर्माण कराया था तथा विष्णु स्तम्भ को बनवाया था। दिल्ली के तंवर गुर्जर प्रतिहार नागभट्ट प्रथम के सहयोगी रहे तथा तब गुर्जर प्रतिहार सम्राट बने, पहले सम्राट वत्सराज के  सामंत रहें, जब सन् 1036 में गुर्जर प्रतिहार सम्राट समाप्त हो गये,तब दूसरे सामंतो की तरह दिल्ली के तंवर भी स्वतंत्र हो गये। परन्तु अजमेर के प्रथम चौहान सम्राट बिसल देव के समय फिर दिल्ली के तंवर चौहान सम्राट के सामंत बन गए थे।राजा अनंगपाल तोमर द्वीतिय के वंशज मदन पाल तंवर की पुत्री का विवाह सम्राट बिसल देव के साथ हो गया था। सम्राट बिसल देव, सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय/राय पिथोरा/गुर्जर राज मरू गुर्जर राज पृथ्वीराज चौहान के सगे ताऊ थे। इसलिए दिल्ली के तंवर पृथ्वीराज चौहान के भी मामा थे। पृथ्वीराज चौहान के समय दिल्ली का राजा मदन पाल तंवर का पुत्र पृथ्वीराज तंवर था।
सन् 1190 में मदन पाल तंवर की मृत्यु के बाद गोविन्द राय तोमर दिल्ली का राजा बन गया था।यही गोविन्द राय तोमर तराईन के प्रथम युद्ध का विजेता था ।यही गोविन्द राय तोमर तराईन के द्वीतिय युद्ध में शहीद हो गया था।इन दोनों युद्धों में गोविंद राय तोमर पृथ्वीराज चौहान का सेनापति था।
आज भी दिल्ली में तंवर गुर्जरों के प्रसिद्ध आठ गांव है।
1- फतेहपुर बेरी
 पूर्व सांसद कंवर सिंह तंवर, छतरपुर के पूर्व विधायक ब्रहम सिंह तंवर और विधायक करतार सिंह तंवर इसी गांव से है।
2- असौला
3- चंदन होला
पूर्व विधायक बलराम सिंह तंवर इसी गांव से है।
4- डेरा
5- मांडी
6- भाटी कला
7- भाटी खुर्द
8- बांस
समाप्त
संदर्भ ग्रंथ-
1- भड़ना देश एवं वंश- डां सुशील भाटी।
2- दिल्ली की दर्द भरी दास्तां (36,37,38,39)- यूट्यूब,डा मोहनलाल गुप्ता।
https://youtu.be/-roFAyzJNhQ
3- अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान (7,10,11,12,18,23)- डा मोहनलाल गुप्ता यूट्यूब।
https://youtu.be/ryLT9J7tgJU
4-https://youtu.be/g6Bl9vifK1o
5-https://youtu.be/0kxsDcHZWAk

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

प्रार्थना-पत्र

सेवा में
श्रीमान प्रधानमंत्री जी/ग्रह मंत्री जी/कृषि मंत्री जी
भारत सरकार।
विषय- भारत सरकार द्वारा लागू किए गए कृषि कानूनों में सुधार हेतु सुझाव।
मान्यवर
भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र में सुधार हेतु तीन कानून बनाए हैं,इन कानूनों का भारत के किसानों द्वारा विरोध किया जा रहा है।इन तीनों कानूनों में कुछ सुधार किसान हितों के लिए आवश्यक है,जो निम्न हैं-
1- कृषि विवाद को सुलझाने के लिए इन कानूनों में एसडीएम और डीएम को नियुक्त किया गया है। इन दोनों पदों में राजनीतिक हस्तक्षेप अधिक होता है। इसलिए न्यायालय जाने का किसी भी पक्ष को अधिकार देना बेहद जरूरी है, अतः एसडीएम और डीएम के साथ न्यायालय जाने का भी अधिकार सरकार दे।
2- ऐपीएमसी (मंडी) में जब किसान फसल विक्रय करने के लिए जाता है तो मंडी का टैक्स किसान को देना होता है।
परन्तु नये बने कानूनों में किसान अपनी फसल कही भी बेच सकता है, जिस पर कोई टैक्स नहीं होगा,इस कारण कोई किसान मंडी के अंदर अपनी फसल बेचने क्यों जायेगा?
अत भारत सरकार को मंडी टैक्स को भी शून्य कर देना चाहिए।
3- (क)कांट्रैक्ट फार्मिंग के अंतर्गत किसान के साथ जो एग्रिमेंट किया जाय,उसका फार्मेट भारत सरकार के द्वारा एक जैसा ही बनना चाहिए, किसान के साथ तय की गई फसल की दर, जमीन का क्षेत्रफल तथा खसरा नंबर तथा कितने समय के लिए एग्रिमेंट किया गया और किसान के हस्ताक्षर का कालम ही किसान और कांट्रेक्टर द्वारा भरा जाना चाहिए।
(ख)नये बने क़ानून में किसान की फसल किस न्यूनतम दर से एग्रिमेंट होगी,इसकी कोई व्यवस्था सरकार ने नही की है, फसल की न्यूनतम दर के लिए या तो सरकार एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य)को कानूनी मान्यता प्रदान करें या एग्रिमेंट के समय अंतराष्ट्रीय बाजार में जो फसल की दर हो, उससे नीचे किसान की फसल का एग्रीमेंट नही होना चाहिए।
4- भारत सरकार प्रत्येक किसान को 6000 रूपए प्रति वर्ष किसान सम्मान निधि के रुप में दे रही है,ना होने से कुछ होना अच्छा है।
यह राशि बहुत कम है, भारत में 86% छोटी जोत वाले किसान है,इन 86% किसानों को किसान सम्मान निधि 50000 रूपए प्रति किसान सरकार को देनी चाहिए।
5- दुग्ध उत्पादन के लिए जो नागरिक गाय- भैंस पाल रहै है तथा दुग्ध बेचते हैं,उनका रजिस्ट्रेशन होना चाहिए तथा इन कार्य में लगे नागरिकों को भी दुग्ध सम्मान निधि के रुप में प्रत्येक वर्ष कोई निश्चित राशि सरकार को देनी चाहिए।
इसमें भी छोटी जोत वाले किसान की तरह दो से अधिक तथा अधिकतम 20 गाय या भैंस तक की सीमा रेखा तय की जा सकती है।
 भारत के एक जागरूक नागरिक के नाते मेरी ओर से  उपरोक्त सुझाव आपके सामने प्रस्तुत है।
भवदीय
अशोक चौधरी (अध्यक्ष प्रताप राव गुर्जर स्मृति समिति मेरठ, पूर्व महासचिव गुर्जर महासभा उत्तर प्रदेश)
108/1 नेहरू नगर गढ रोड़ मेरठ(उत्तर प्रदेश)।
मोबाइल नंबर- 9837856146

रविवार, 3 जनवरी 2021

भारत का किसान और वर्तमान सरकार द्वारा लाये गये कृषि बिल और उनकी वास्तविकता - अशोक चौधरी मेरठ

भारत का किसान सैकड़ों वर्षों से प्रताड़ित रहा है, दिल्ली में सन् 1192 में विदेशी तुर्क शासन स्थापित हो गया था।जब भारत में भारतियों का शासन था तब किसान से फसल का छठवां हिस्सा यानि 16% लगान शासक द्वारा लिया जाता था।यदि किसान इस लगान को देने में कभी कभी असमर्थ हो जाता था तो शासक वर्ग किसान की समस्या पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करता था,उसकी समस्या को दूर करने की कोशिश करता था, परंतु तुर्की शासन अपने सैनिक बल पर ही स्थापित था, अतः तुर्की शासकों ने भारतीय किसानों से फसल का आधा यानि 50% लगान वसूल किया,लगान बडी निर्दयता से वसूला जाता था, भारत की हिन्दू जनता के प्रति उनके मन में कोई दयाभाव नही था,उनका न्याय सिर्फ मुस्लिमों तक ही सीमित था, अतः लोग मुसलमान बनने लगे, सुल्तान ग्यासुद्दीन तुगलक के समय (सन्1320-1325) तक यानि तुर्की शासनकाल जो 125 वर्ष से चल रहा था, काफी संख्या में भारतीय मुसलमान बन गए थे। अतः सुल्तान ने कृषि नीति बनाई, जिसमें हिन्दू किसानों पर तो लगान फसल का आधा ही रखा गया, परन्तु मुस्लिम किसानों पर लगान फसल का सातवां और दसवां भाग अर्थात 14%व 10% लगाया गया। फिरोजशाह तुगलक (सन् 1351-1388) ने चार नेहरे बनवायी तथा लगान का पुनः निर्धारण किया।नेहर का पानी प्रयोग करने वाले मुस्लिम किसानों पर 25%लगान तथा हिंदू किसानों पर 60%लगान लगा दिया गया, अकबर(सन् 1570-1605) के शासनकाल में भारतीयों को सत्ता में साझेदार तो बना लिया गया परन्तु लगान की दर फसल का आधा हिस्सा ही रही,अंतर सिर्फ इतना रहा कि हिंदू और मुस्लिम दोनों किसानों से लगान की दर समान कर दी गई। औरंगजेब(सन् 1658-1707) के शासनकाल में फिर मुस्लिम किसानों से लगान की दर फसल का चौथाई हिस्सा यानि 25% रखी गई।उससे आगे चलकर अंग्रेज भारत के शासक बने, किसान पर लगान अंग्रेजी शासन में भी कम नहीं हुआ,उसी शोषण के कारण 1857 की क्रांति हुई,जब रानी विक्टोरिया के हाथ में शासन चला गया,तब भी भारत में किसान आंदोलन चलते रहे, अंग्रेजों के शासन में दो प्रकार का भारत था,एक वह भारत, जिसका शासन सीधा अंग्रेजों के हाथ में था,दूसरा वह भारत जिसका शासन,भारतीय राजाओं के माध्यम से अंग्रेजों के हाथ में था, अतः अंग्रेजों के सीधे हाथ में जो भारत था उसमें भी किसान आंदोलन हुए, परंतु अंग्रेज अपने सीधे शासन के भारत में हुए आंदोलनों को जल्दी ही हल कर लिया करते थे, जैसे चम्पारण का आंदोलन जिसका नेतृत्व महात्मा गांधी जी ने किया तथा गुजरात में खेड़ा का आंदोलन,जिसका नेतृत्व सरदार पटेल ने किया था।वही पर मेवाड़ रियासत में बिजौलियां का किसान आंदोलन जिसका नेतृत्व विजय सिंह पथिक ने किया था,वो 43 वर्ष चला।
किसान लूटता पिटता आ रहा था, सन् 1947 में देश आजाद हुआ,देश का संविधान बना,तब यह भरोसा दिलाया गया कि भारत एक कृषि प्रधान देश है अतः किसानों के हित प्राथमिकता पर रहेंगे।भूमि सुधार के प्रयास किए गए,लगान की दर बहुत कम कर दी गई,खेती की आमदनी को इंकमटैक्स के दायरे से बाहर कर दिया गया।
आजाद भारत में कृषि के लिए कानून बनाने का संवैधानिक अधिकार राज्यों को दिया गया, परंतु भारत की केंद्र सरकार को बहुत जल्द ही यह अहसास हो गया कि कृषि का अधिकार यदि सिर्फ राज्यों पर ही रहा तो सुधार होना मुश्किल है, इसलिए सन् 1954 में संविधान में तिसरे संशोधन के द्वारा  संविधान की समवर्ती सूची की धारा 33 के अंतर्गत केंद्र सरकार को भी अधिकार दिया गया कि वह भी किसानों के लिए कानून बना सकती है।
सन् 1947 से लेकर सन् 2014 तक संसद में 1274 बार किसानों की समस्याओं पर चर्चा हुई है, आजादी के बाद 21 वी सदी के प्रारम्भ सन् 2000 तक 56 किसान आंदोलन हुए हैं,56 बार ही किसानों की समस्या पर प्रस्ताव पास किए गए।प्रस्ताव पर हुई चर्चा के समय संसद में 28 बार 15% से भी कम सांसद संसद में उपस्थित रहे हैं,बाकि 28 में 15% सांसद संसद में उपस्थित रहें हैं।15% की उपस्थिति संसद में प्रस्ताव पर बहस का कोरम पूरा करने के लिए आवश्यक है।जो इस बात को दर्शाता है कि भारत के सांसदो की किसानों की समस्या के हल मे कोई रूचि नहीं है।
देश के आजाद होने के बाद महात्मा गांधी जी ने कहा था कि क्या हम देश के किसान को उपज का वह मूल्य निर्धारण कर सकते हैं जो देश के चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी की नौकरी की बढ़ोत्तरी से तालमेल खा जाये? 
डा राजेंद्र प्रसाद जी ने कहा था कि क्या हम देश के उन लोगों को गरीबी की उस रेखा से ऊपर उठा सकते हैं जो अपने लिए बाजार भाव से अनाज खरीद सके ? यदि देश का प्रत्येक आदमी जिस दिन बाजार भाव से अनाज खरिदने में सक्षम हो जाएगा, उस दिन हम किसान को मुक्त बाजार के हवाले कर सकते हैं।
सरदार पटेल ने रियासत के राजाओं से कहा था कि वो यह न समझें कि उनके पास धन व सेना है तो वो मनमानी कर लेंगे,यह देश गरीबों और किसानों का है।
 सन् 1955 से लेकर आज तक 16 बार किसानों और गरीबों के कल्याण का नारा देकर चुनाव लडा गया।
सन् 1966-67 में जब जगजीवन राम जी भारत के कृषि मंत्री थे,तब उन्होंने कहा था कि हरित क्रांति जिन राज्यों के आधार पर की जा रही है वो भारत की आवश्यकता की पूर्ति लायक अन्न तो पैदा कर ही देंगे।
पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश इस हरीत क्रांति का मुख्य आधार थे। क्योंकि पूरे देश में सिंचाई की बेहतर व्यवस्था यही पर थी।
 सन् 1965 में करीब 30 करोड लोग राशन की दुकान से सस्ता राशन लेते थे,आज भी 80-82 करोड़ बीपीएल कार्ड से सस्ता राशन ले रहें हैं।
21 वी सदी के प्रारम्भ में मनमोहन सरकार के कार्यकाल में जब शरद पवार देश के कृषि मंत्री थे,तब विदेश से गेहूं सस्ते मे खरीद कर एफसीआई के गोदामों में रख दिया गया, व्यापारियों ने किसानों से सस्ते मे गेहूं खरीद कर एमएसपी रेट पर एफसीआई को बेच दिया गया।21 वी सदी की शुरुआत भ्रष्टाचार से हुई।
आज भारत सरकार द्वारा लाए गए कृषि बिल का किसानों द्वारा विरोध किया जा रहा है।आइये देखते हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ? जो इतना विरोध हो रहा है। क्या है कृषि कानूनों की वास्तविकता?
सन् 1991 में उद्योगों के लिए भारत में भारत सरकार द्वारा बाजार खोल दिया गया था।ये जो तीन बिल सरकार लाई है,इनकी औपचारिक सिफारिश पहली बार भानू प्रताप सिंह की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने सन् 1990 में की थी।तब से ही यह लम्बित पडी थी। सन् 2016 में मोदी जी ने किसानों की आय दोगुना करने के लिए कहा था,जब तक बाजार नही खुलेगा,आय कैसे दोगुना हो। अतः भारत सरकार ने 5 जून सन् 2020 में आर्डिनेंस के माध्यम से कृषि बिल ला कर 20 सितंबर सन् 2020 को कानून बना दिया।आज जो किसान आंदोलन भारत में किया जा रहा है,उसको भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए इन बिलो की समीक्षा एकेडमिक स्तर पर होनी बडी जरुरी है।
इस कृषि बिल में चार मुद्दे प्रमुख रूप से दिखाई पड़ते हैं।जो निम्न हैं-
1- संवैधानिकता
2- एक्ट 1
3- एक्ट 2
4- एक्ट 3
सबसे पहले एक्ट की संवैधानिकता पर विचार करते हैं।जब भी कोई एक्ट संसद में पारित किया जाता है तो उसकी संवैधानिकता के दो पहलू हैं।
1- एक्ट की विषय वस्तु
2- प्रक्रिया
1- क्या विषय वस्तु में समस्या है-
विषय-वस्तु में तीन बातें आती है।
 A- फंडामेंटल राइट्स
B- बेसिक स्टरक्चर
C- राज्य(धारा 246,254) और केंद्र की विधायी शक्ति या धारा।
भारत सरकार संविधान में संशोधन तो कर सकती हैं परन्तु उसका पुनर्लेखन नही कर सकती अर्थात बेसिक स्टरक्चर को नही हिला सकती। कुछ मामलों पर राज्य सरकार ही कानून बना सकती है, कुछ मामलों पर केंद्र सरकार ही कानून बना सकती है। कुछ मामले ऐसे हैं कि दोनों कानून बना सकते हैं, यदि किसी कानून पर राज्य सरकार व केंद्र सरकार में टकराव हो तो केंद्र सरकार का कानून माना जाता है।कृषि कानून राज्य और केंद्र सरकार दोनों बना सकती है।
कानून की प्रक्रिया इस प्रकार है-
संसद में सरकार के साथ बहुमत है।
राज्यसभा में भी बहुमत है,यदि राज्य सभा में बहुमत ना भी हो तो संयुक्त अधिवेशन बुला कर सरकार कानून पास करा सकती है।
सरकार ने वोईस वोटिंग से कानून राज्यसभा में इसलिए पास कराया,क्योकि सदस्य कोरोना के कारण दूरी लिए बैठे थे, अपनी सीट पर नही थे, इसलिए वोटिंग सम्भव नहीं थी।
बिल संसद की सलेक्ट कमेटी को सोपा जाना चाहिए था, परन्तु इस बात का फैसला भी बहुमत के आधार पर होता है।आम सहमति बन नही पा रही थी,यदि बिल राज्यसभा में पास ना होते तो निरस्त हो जाते। इसलिए सलेक्ट कमेटी को नही भेजें गए।
भारत की आज़ादी के बाद से ही राज्य सरकार और केंद्र सरकार कृषि क्षेत्र में सुधार करते रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में सन् 1991 में जब कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे तब किसानों का गन्ना भुगतान बैंकों के माध्यम से किया गया था,यानि गन्ना भुगतान किसान के बैंक खाते में जायेगा। उससे पहले सोसायटी के माध्यम से भुगतान होता था, ताकतवर किसान कमजोर किसान की गन्ने की पर्ची डाल कर, पेमेंट ले लिया करते थे, किसान को पता भी नहीं चलता था, बैंक से भुगतान होने के बाद पर्ची यदि कोई दूसरा किसान डाल भी दे तो भुगतना तो उसी किसान के खाते में जाना है जिसके नाम की पर्ची होगी। कमजोर किसान के शोषण पर रोक लग गई।
अगस्त 1998 में किसानों के लिए अटल जी की केंद्र सरकार ने किसान क्रेडिट कार्ड की योजना लागू की। 
सन् 2003 में अटल बिहारी वाजपेई जी ने सभी राज्यों को चिट्ठी लिखी कि वो किसानों को अपनी फसल बेचने की छूट मंडी के बाहर भी प्रदान करें।तब से किसान अपनी फसल बाहर बेचने के लिए स्वतंत्र है।
मनमोहन सरकार ने आम चुनाव से एक साल पहले वर्ष 2008 में 65 हजार करोड़ रुपये की किसान ऋण माफी योजना का ऐलान किया था।
सन् 2013 के अंत में मनमोहन सरकार ने नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट पास किया। जिसके अन्तर्गत मीड-डे-मिल तथा राशन की दुकानों पर गरीबों को सस्ता अनाज सरकार देने के लिए बाध्य है।
1 दिसम्बर सन् 2018 से किसान सम्मान निधि योजना मोदी जी द्वारा चालू की गई,जिसके अन्तर्गत 6000 रुपए प्रत्यक वर्ष देश के प्रत्येक किसान को दिया जा रहा है।
देश के आजाद होने से लेकर आज तक किसान की आय 21 गुणा बढी है जबकि सरकारी कर्मचारी की नौकरी 180 और 200 गुणा बढी है।
विश्व स्तर की तीन एजेंसी द्वारा जैसे WHO द्वारा 58%, दूसरी एजेंसी द्वारा 62% और तीसरी एजेंसी द्वारा 72% आबादी भारत की कृषि पर निर्भर है।86% रोजगार कृषि क्षेत्र से निकलता है। कारपोरेट सेक्टर में भारत का कुल 5-6% रोजगार निकलता है। लेकिन पिछले 15 वर्षों में 42 लाख करोड़ रुपए का कर्जा भारत सरकार द्वारा कारपोरेट सेक्टर का माफ कर दिया गया है।  20 सितंबर सन् 2020 को सरकार ने जो कृषि कानून पास किये वो निम्न हैं-
1- कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य(the farmers trade and commerce(promotion and facilitation Bill 2020)
2- The farmers(Empowerment and protection) argument on price Assurance and farm service Bill 2020
3- The Essential Commodities(Amendment) Bill 2020
1- कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (the farmers trade and commerce(promotion and facilitation Bill 2020)।
उद्देश्य-A-( Farmer produes)जो किसान उत्पादन करते हैं जमीन व पशु से सम्बंधित व्यवसाय
Trade and commerce (लेना बेचना व व्यापार)
promotion and facilitation(आगे बढाना और सहूलियत देना)
मुख्य प्रावधान-
(क) ट्रेड एरिया आऊट साइड ऐपीएमसी (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग कमेटी)
खेत के बाहर,फूड प्रोसेसिंग यूनिट, भंडारण घर,कोल्ड स्टोरेज, निर्यात करने की छूट
2- पहले कानून के अनुसार किसान अपने एरिया में ही फसल बेच सकता था,अब कही भी बेच सकता है।
3- आन लाइन ट्रेडिंग किसान कर सकता है।
4- कोई स्टेट टेक्स नही, कोई राज्य का कानून नही लगेगा।
5- किसी विवाद को सुलझाने के लिए जिले के एसडीएम और डीएम 60 दिन में विवाद सुलझायेंगे।
अच्छाईयां- (क)बिजनेस से बिजनेस,अंतर राज्य, अच्छा कम्पटीशन,
(ख)बुरा होने की सम्भावना- एपीएमसी समाप्त हो सकती है।
(ग)न्याय की आजादी नही है, कोर्ट का रास्ता बंद है।
(घ)खरिदने वाले के लिए कोई नियम नही है।
(च) एक नया अल्प तंत्र बन सकता है।
उपाय- (क) एपीएमसी के बराबर ही बाहर खरीदार पर भी टैक्स लगने चाहिए।
(ख) न्याय की सुविधा मे कोर्ट का रास्ता मिलना चाहिए। कृषि न्याय प्राधिकरण बनना चाहिए।
(ग) रजिस्ट्रेशन होने चाहिए।
2- The farmers(Empowerment and protection) argument on price Assurance and farm service Bill 2020
कांटेक्ट फार्मिंग होगी। किसान किसी से भी कांटेक्ट कर सकता है।
उद्देश्य-
(क) किसान को ताकतवर व सुरक्षा
(ख) एग्रीमेंट
(ग) मूल्य व कृषि सेवा
मुख्य प्रावधान-
(क) एग्रिमेंट कर सकते हैं।दो पार्टी में एक किसान और दूसरा समझौता करने वाला।
2- समय सीमा (क) एक फसल सीजन से लेकर पांच साल तक या पशु के लिए एक ब्यात से लेकर पांच साल तक।
3- माडल कांटेक्ट- माडल कांट्रैक्टर बना सकते हैं।, केंद्र सरकार गाइड लाइन जारी कर सकती हैं।
4- मूल्य निर्धारण कैसे होगा- कांट्रैक्ट करते समय जो मूल्य निर्धारण हुआ,यदि फसल कटते समय रेट घट या बढ गए तो-(क) पहले से फिक्स रेट तय हो सकता है।
(ख)या तो एक ही रेट रहेगा या उतार चढ़ाव का प्रतिशत तय किया जा सकता है।
5- पेमेंट नकद या ज्यादा से ज्यादा एक दिन।
6- (क)किसान की जमीन को एग्रिमेंट में कोई कंडीशन नही बनाया जायेगा।
(ख) जिससे एग्रिमेंट होगा,वह किसान की जमीन में कोई स्थायी निर्माण नही करेगा, यदि किसान की सहमति से स्थायी निर्माण कर भी लिया है तो कांट्रैक्ट समाप्त होने पर हटाना पड़ेगा। यदि कांट्रेक्टर नही हटाता है तो वह निर्माण किसान का हो जायेगा।
7- रजिस्ट्रेशन- हर राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह एक एथोरिटी बना सकती है।
8- फोर्स मेजर- (क)यदि कोई ऐसी घटना घट जाय,जिसकी वजह से कांट्रेक्ट की शर्तों का पालन करना सम्भव न हो,तब कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी।
(ख)यदि किसान किसी ऐसी हालत में शर्त पूरी ना कर पाए तो वह भी इसका लाभ उठायेंगे।
9- झगड़ा होने पर-(क) आपसी समझौता (ख) एसडीएम और डीएम
कोर्ट नही।
10- दंड-(क) यदि गलती कांट्रेक्टर की है तो डेढ़ गुणा देना होगा।
(ख) किसान पर पेनल्टी नहीं लगेगी, किसान को वही पैसा देना होगा,जितना कांट्रेक्टर खर्च करेगा।
11- एग्रिमेंट का तरिका-एफपीओ, फर्टिलाइजर,बीज, कीटनाशक
अधिनियम की अच्छाईया-
(क)अच्छे किसान बढ़ेंगे
(ख)फसल का पेटर्न बदलेगा
(ग)एफपीओ (फार्म प्रोड्यूसर आर्गेनाइजेशन) बनेंगे।
अधिनियम की चिंताएं-
(क) कोर्ट की हिस्सेदारी नही है
(ख) मार्केट रेट का बेनिफिट ना मिलने का खतरा
(ग) एग्रिमेंट का माडल सरकार बनाये
(घ) रेगुलेशन कमजोर है
3- The Essential Commodities(Amendment) Bill 2020
सन् 1955 में यह एक्ट बना था,एक सीमा से अधिक भंडारण नही कर सकते थे। उसमें संशोधन किया गया है कि अब भंडारण कर सकते हैं। युद्ध,अकाल व महमारी, बाढ़, भूकंप जैसी विपदा आने पर भंडारण नही होगा।
फल, फूल,सब्जी पर रेट 100% बढ गया हो एक साल या पांच साल में तो भंडारण नही होगा।
अनाज या तेल का रेट 50% बढ़ गया हो तो भंडारण नही होगा।
यदि कोई डेरी एक दिन में दस हजार लीटर दूध की दही या अन्य उत्पाद बना लेती है तो वह उसका एक दिन का भंडारण कर सकते हैं। यदि किसी ने निर्यात का जितना आर्डर ले रखा है,उतना भंडारण कर सकता है।
चिंताएं- आर्टिफिशल डिमांड पैदा की जा सकती है।
रेट बढ़ाए जा सकते हैं।
एमएसपी- 
न्यूनतम समर्थन मूल्य,यह केंद्र सरकार की ओर से होता है सीएसीपी व सीसीइए विभाग तय करता है, बिक्री एपीएमसी तथा एफसीआई के माध्यम से खरीद होती है।
23 फसलों पर सरकार एमएसपी घोषित करती है।
फल सब्जी डेरी फिशरी, फूल पर एमएसपी घोषित नही होता।
स्वामीनाथन आयोग ने दिसंबर 2004, अगस्त 2005, दिसंबर 2005 और अप्रैल 2006 में क्रमश: चार रिपोर्ट सौंपी थी और अंतिम रिपोर्ट चार अक्टूबर 2006 को सौंपी गई थी, जिसमें फसलों का समर्थन मूल्य बढ़ाने समेत किसानों की दशा सुधारने के लिए किए जाने वाले उपायों के सुझाव दिए गए थे।जो इस प्रकार है-
1- A2 इसमें किसान की लागत का डेढ़ गुणा।
2- A2+FL इसमें लागत+ परिश्रम की किमत का डेढ़ गुणा।
3- C2 इसमें लागत+परिश्रम+जमीन का रेंट+लागत के धन का ब्याज का डेढ़ गुणा।
स्वामीनाथन आयोग ने अन्य सुझाव भी दिए थे, जैसे भूमि सुधार, किसान पर कर्ज कम हो,कृषि भूमि में सिंचाई की व्यवस्था।
देश के आजाद होने से आज तक भारत में कृषि भूमि में सिंचाई की व्यवस्था में कुल 5-6% की बढ़ोत्तरी हुई है, जिसमें वर्तमान मोदी सरकार के छः साल में यह बढ़ोतरी 0.75% है। बाकि कृषि वर्षा पर आधारित है।
सन् 2014 के चुनाव में भाजपा की ओर से स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का वादा किया गया था। परन्तु जब सरकार बन गई तब सरकार ने अपने को तिसरे नम्बर को लागू करने में असमर्थ पाया। और दूसरे नम्बर को लागू कर दिया है सन् 2018-19 के बजट में।
पंजाब और हरियाणा का 88%चावल और 70% गेहूं एमएसपी पर जाता है। पूरे भारत का 35%चावल,62% गेहूं,50% मोटा अनाज पंजाब और हरियाणा से प्राप्त होता है।
आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश से 44% चावल तथा उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से 23% गेहूं एमएसपी पर जाता है।
लेकिन जो अनाज किसान का बाहर बाजार में बिक रहा है वह आज से 10 वर्ष पहले जो एमएसपी रेट था,उस पर बिक रहा है।
एमएसपी पर जो सरकार का विभाग एफसीआई (फूड कारपोरेशन आफ इंडिया) खरीदारी करता है,उसकी आज हालत यह है कि उस पर 2018-2019 के साल में तीन लाख पन्द्रह हजार करोड़ का कर्ज है, जो 2013-14 में 91401 करोड था।यानि एफसीआई खुद दिवालिया होने के कगार पर है।
इन कानूनों को लेकर किसानों मे भ्रम पैदा हो गया है या कर दिया गया।लाभ हानि तो समय के गर्भ में हैं। परन्तु किसी विद्वान व्यक्ति ने कहा है-
शक की कैची के फलके जब, अनजाने भी चल जाते हैं।
सच कहता हूं विश्वासों के चंदन वन भी जल जाते हैं।।
संदर्भ- यू ट्यूब
 डां विकास दिव्य कीर्ति- कृषि कानून (विवाद और वास्तविकता।
https://youtu.be/YcqVWFZXyaE
यू ट्यूब-पुण्य प्रसून बाजपेई।


मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

भारत का किसान आंदोलन और सरकार-अशोक चौधरी मेरठ।

भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र में उन्नति के लिए तीन बिल पास किये -
 (1) आवश्यक वस्तु अधिनियम (भंडारण निमन)
(2) मूल्य आश्वासन पर बंदोबस्त और सुरक्षा समझौता
(3)कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य
ये जो तीन बिल सरकार लाई है,इनकी औपचारिक सिफारिश पहली बार भानू प्रताप सिंह की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने सन् 1990 में की थी।तब से ही यह लम्बित पडी थी। वर्तमान मोदी सरकार ने इसे लागू कर दिया है।
इन सिफारिशों को अक्षरशः लागू करना किसान हित में हो, ऐसा जरूरी नहीं है।ऐसा विद्वान लोगों का मानना है।इनको किसान के लिए लाभकारी बनाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को एक गारंटी के तौर पर सरकार को देना चाहिए तथा अनुबंध खेती यानि कांट्रैक्ट फार्मिंग से उपजने वाले विवाद के लिए ब्लाक स्तर, जनपद स्तर,राज्य स्तर और केंद्र स्तर पर अलग-अलग ट्रिब्यूनल बनें,जिनको न्यायिक अधिकार मिलने चाहिए।
भारत के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों में 50%के पास जमीन नही है। बाकी 50% में से 25% के पास एक एकड़ से कम जमीन है।वो कही दूर जाकर अपनी फसल नही बेच सकते।बाकि 25% में से 10% ही ऐसे हैं जो अपनी फसल को दूर ले जाकर तथा मंडियों में बेचते हैं, बाकि बचे 10% किसान सी एमएसपी का लाभ लेने की स्थति में है।
सरकार को एक चौथा बिल लाकर जिसमें एमएसपी से नीचे खरीद ना हो, किसानों को न्यायिक अधिकार देना चाहिए।
एमएसपी और किसान सम्मान निधि दोनों व्यवस्था साथ साथ चलनी चाहिए। एमएसपी केवल 23 फसलों पर मिलती है।जो 80% फसलों को कवर करती है। सरकार यदि एमएसपी पर फसल खरीद को संवैधानिक अधिकार बना देती है (एक अलग बिल लाकर)तो देश के 40% किसान की समस्या समाप्त हो जायेगी। इनके अलावा बचे किसानों की खाई भरने के लिए किसान सम्मान निधि योजना है ही।
सरकार अपने कानून को अमल में उस तारीख से  लाया जायेगा,जब उसका नोटिफिकेशन होगा।  नोटिफिकेशन जारी करने की तारीख हर राज्य की अलग भी हो सकती है।
राज्य सरकार पर केंद्र सरकार के द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करने की जिम्मेदारी छोड दी जाय।
पंजाब, हरियाणा में इन कानूनों का सबसे अधिक विरोध हो रहा है,जब दूसरे राज्यों के किसान केंद्र सरकार के कानून से लाभान्वित होंगे तो पंजाब और हरियाणा के किसान भी अपने आप मान जायेंगे।
उपरोक्त विचार पूर्व कृषि मंत्री श्री सोमपाल शास्त्री जी, आलोक सिन्हा जी पूर्व चेयरमैन फ़ूड कारपोरेशन आफ इंडिया (2006-2008), देवेंद्र शर्मा कृषि विषेषज्ञ,एन सी सक्सेना पूर्व फूड कमिश्नर सुप्रिम कोर्ट (2002-2017) जैसे विद्वान और अनुभवी लोगों के लेखो से सम्बंधित है।
समाप्त

सोमवार, 12 अक्टूबर 2020

धाकड़ और किराड (किरार ) और गुर्जर जाति में सम्बन्ध- लेखक अशोक चौधरी मेरठ

धाकड़ एवं किरार जाति की उत्पत्ति के संबंध में परिपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी एवं साक्ष उपलब्ध नहीं है, कुछ विचारों एवं लेखकों का मत है कि धाकड़ और किरार चौहान गुर्जर क्षत्रिय जाति की उपजाति है या छत्रिय वंशजों में से बने हुए एक समूह का नाम है, इस समूह की कुलदेवी मां अन्नपूर्णा को माना गया है, सोलिया का सविस्तार विवरण देने के पूर्व #नागरचार (चार्या) की पोथी जो प्राचीन डिंगर लिपि में लिपिबद्ध है, के तथ्यों का उल्लेख करना चाहूंगा, नागरचार  की पोती का विवरण-
 गुर्जर चौहान क्षत्रियों की 24 शाखाओं में से एक शाखा दाईमां चौहान मे  राजा धरणीधर हुए, उन्होंने शस्त्र छोड़कर कृषि का कार्य करना प्रारंभ किया, श्री धरणीधर से ही धाकड़ समाज का नामकरण हुआ, राजा धरणीधर के 4 पुत्र थे
 1. सारपाल
 2. वीरपाल
 3. विशु पाल
 4. बावनिया,
  जिनके उत्तरोत्तर वंश से चार शाखाएं हुई
  1.1. शारपाल – सौलिया मेवाड़ा धाकड़ 2. वीर पाल – नागर धाकड़ (नागर चार) 3. विशुपाल – मालवी धाकड़ 4. बावनिया – पुरवीया धाकड़ (किरार) गौ्त्र विवरण – चार शाखाओं की कुल 444 गौत्र है नागर की 144 गौत्र क्षत्रिय कुलों के नाम से हैं। ऐतिहासि‍क तथ्यों एवं पोथियों के विलेखों से इतना तो निर्विवाद है कि धाकड़ जाति की उत्पत्ति स्थाान राजस्थांन का मेवाड़ क्षेत्र है। कृषि व्यवसाय को अपनाकर वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर बसते रहे। विशेष का भी नामकरण पर प्रभाव पड़ा जैसे – जो समूह नागर चाल – बुंदी की सीमा व नागौर में जाकर बसे वे ‘नागर’ कहलाये। मालवा में बसे ‘मालवी’ एवं पूर्व-उत्तगरांचल में जाकर बसे वे ‘किरार’ (किराड़) कहलाये। इस तरह समाज के पूर्वजों, कुल ऋषियों एवं स्थान के अनुसार गौत्र एवं शाखाओं का नामकरण होता रहा।

किराड एक खेती करने वाली मेहनत कश जाति है,जो मध्यप्रदेश और राजस्थान तथा नर्मदा नदी तक बसी हुई है।किराड जाति का गुर्जर जाति से बडा गहरा नाता रहा है,बल्की यू कहिए कि किराड जाति गुर्जर जाति का ही एक हिस्सा रही है।
कन्नोज के गुर्जर प्रतिहार राजाओं के पतन के बाद विदेशी तुर्क आक्रमणकारियों का सामना अजमेर के चौहान शासको ने किया।इन चौहान शासको में सम्राट बिसलदेव(सन् 1150-1164) सबसे पहले चौहान सम्राट हुए हैं। बीसलदेव के समय में गजनी की मुस्लिम सेना वर्तमान राजस्थान में शेखावाटी में स्थित भवेरा गांव तक आ पहुंची थी। लेकिन बीसलदेव ने अपनी सेना तथा सहयोगियों की मदद से इन मुस्लिम सेनाओं को अटक नदी के पार खदेड दिया तथा हिमालय से लेकर विंध्याचल तक का क्षेत्र विदेशी मुस्लिम हमलावरों से खाली करा लिया।बीसलदेव का दिल्ली में एक शिलालेख 9 अप्रैल सन् 1163 का प्राप्त हुआ है,जिसको शिवालिक स्तम्भ लेख भी कहते हैं।इस शिलालेख में बीसलदेव के द्वारा किए गए कार्यों का वर्णन है।बीसलदेव ने ही दिल्ली के राजा अनंगपाल तोमर को अपने अधीन कर लिया।बीसलदेव साहित्य प्रेमी, साहित्यकारों का आश्रय दाता था,बीसलदेव को कवि बांधव की उपाधि प्राप्त थी,वह हरि वेली नाटक के रचनाकार थे।  इस समय चौहान राज्य की सीमा शिवालिक पहाड़ी सहारनपुर उत्तर प्रदेश से लेकर अटक नदी तक थी। 

सम्राट बीसलदेव ने तुर्क हमलावरों से लडने के लिए अपने क्षेत्र के संघर्षशील किसान समूहों को एकत्रित किया था,  क्योकि अजमेर के चौहान गुर्जर ही थे अतः किराड़ लोग भी गुर्जरों की एक शाखा कहलाते रहें हैं। गुर्जर राज-मरु गुर्जर पृथ्वीराज चौहान अथवा पृथ्वीराज चौहान तृतीय अथवा राय पिथोरा की राज्यसभा में 30 प्रतिनिधि इस धाकड समूहों के थे।

ऐसा इतिहास कारो का मानना है कि बीसलदेव चौहान तथा पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल के मध्य (सन् 1150-1192) ही दिल्ली के आसपास दादरी दनकौर के क्षेत्र में 360 गांव भाटी गुर्जर तथा कैराना के आसपास 84 गांव चौहान गुर्जरों को जागीर देकर बसाया गया है।
किराड जाति के चौहान गोत्र के लोग भी तभी से किराड़ जातिय समूह में शामिल हुए थे 
पृथ्वीराज चौहान के दरबारी जयानक ने पृथ्वीराज विजय नामक एक ग्रंथ लिखा जिसमें पृथ्वीराज चौहान को गुर्जर राज और मरू गुर्जर लिखा है।
पृथ्वीराज चौहान के बाद एक लम्बा संघर्ष भारतियों ने किया,आज गुर्जर और किराड़ दोनों जातियां ओबीसी मे आती है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान गुर्जर और किराड़ दोनों जातियों के सिरमौर है। आज पुनः सन् 1192 के पृथ्वीराज चौहान के वैभव के रूप में उपस्थित हैं।
समाप्त।

बुधवार, 26 अगस्त 2020

ब्रिटिश भारत - संकलन कर्ता अशोक चौधरी मेरठ।

मुगल बादशाह औरंगजेब के शासन काल से ही यूरोप की कम्पनियां भारत में व्यापार करने के लिए आने लगी थी, इनमें पुर्तगाली,डच, अंग्रेज और फ्रांसीसी थे। औरंगजेब की मृत्यु के बाद जिस समय को भारतीय इतिहास में उत्तर मुगल काल भी कहा जाता है, मुगल सत्ता कमजोर होनी शुरू हो गई थी। सन् 1739 में नादिरशाह के हमले के बाद मुगल सत्ता का रूतबा एक तरह से समाप्त हो गया था, उत्तर पश्चिम से अफगानों के आक्रमण भी शुरू हो गये थे।इन परिस्थितियों में मुगल साम्राज्य अपने सूबदारो की शक्ति के बल पर ही चल रहा था। ये क्षेत्रिय शक्तियां बंगाल,अवध, मराठा, हैदराबाद, कर्नाटक, मैसूर और आज का राजपूताना (राजस्थान)थे।
इस समय के इतिहास को समझने के लिए विद्वानों ने पांच चरणों में बांटा है। और अंग्रेजों ने इस समय को तीन चरणो में बांटा -
1- अपने को शासकों के बीच स्थापित करना।
2- घेरें की निति/रिंग आंफ फेंस पालिसी (सन् 1765-1813)।
3- अधिनस्थ पार्थक्य की निती (सन् 1813-1858).
सबसे पहले अंग्रेजों ने फ्रांसीसी भय को समाप्त किया तथा युद्ध में फ्रांसीसियों को हराकर यूरोप की चारों कम्पनियों में अपनी श्रेष्ठता स्थापित कर दी।
सन् 1765 की इलाहबाद संधि जो मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के साथ मुगल बादशाह के बक्सर के युद्ध में हार जाने के बाद अंग्रेजों ने की।इस संधि में अंग्रेजों ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार बादशाह से ले लिए तथा मुगल बादशाह को पैंशन लेने के लिए बाध्य कर दिया।इस संधि के बाद इस्ट इंडिया कम्पनी सिर्फ व्यापारी कम्पनी नही रही।वह भारत की क्षेत्रिय शक्तियों में से एक हो गई। सन् 1789 में फ्रांसीसी क्रांति हो गई थी।इस क्रांति से एक नेता पैदा हुआ जिसका नाम था नेपोलियन बोनापार्ट।यह अंग्रेजों का घोर विरोधी था तथा भारत में अंग्रेजों को समाप्त करना चाहता था, नेपोलियन बोनापार्ट का मानना था कि भारत से ही अंग्रेजों को शक्ति प्राप्त हो रही है। नेपोलियन बोनापार्ट को अंग्रेज सेनापति नेल्सन ने नील नदी के किनारे युद्ध में पराजित कर दिया।अब सन् 1798 में नेपोलियन बोनापार्ट मिश्र आ गया।इस नेपोलियन बोनापार्ट के हमले से बचने के लिए अंग्रेजों ने भारत में अपनी सुरक्षा के लिए बफर स्टेट मध्यवर्ती राज्य बनाए,जिसे घेरे की निति/रिंग आंफ फेंस पालिसी कहा गया।इस सन्धि की कुछ शर्तें थी, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण शर्तें यह थी कि जो रियासत सन्धि कर लेगी,उसकी सुरक्षा अंग्रेज करेगे,वह रियासत किसी भी रियासत से कोई सम्पर्क नही रखेगी, अंग्रेज एक सेना उस रियासत में रखेंगे,जिसका खर्च वह रियासत देंगी।रियासत में एक अंग्रेज़ अधिकारी कम्पनी के प्रतिनिधि के रूप में रहेगा, जिसे पोल्टीकल एजैंट कहा गया।
सन् 1798 में हैदराबाद से अंग्रेजों की पहली संधि हुई। सन् 1799 में हैदराबाद की सहायता से टीपू सुल्तान को मारकर वहा के वाडियार राजा को अंग्रेजों ने मैसूर का राजा बना दिया तथा मैसूर के साथ संधि कर ली। सन् 1799को तंजौर से, सन् 1801 को अवध से, सन् 1802को पैशवा से भसीन की संधि, सन् 1803 में दिल्ली पर अधिकार कर लिया।
राजस्थान में सितम्बर सन् 1803 में भरतपुर से, नवम्बर सन् 1803 में अलवर से तथा दिसम्बर सन् 1803 में जयपुर से सहायक संधि कर ली।
इसके बाद तृतीय चरण प्रारंभ हुआ।इसे अधीनस्थ पारथक्य की निति कहते हैं।जिसका समय सन् 1813 से सन् 1858 तक कहा गया है।इस दौरान सन् 1813 से सन् 1823 तक लार्ड हैस्टिंग्स तथा सन् 1848 से सन् 1856 तक लार्ड डलहौजी का समय रहा।
इस समय में ब्रिटिश सर्वोच्चता की स्थापना को प्रतिपादित किया गया।इसका नियम था एक शक्ति की सर्वोच्चता तथा दूसरी उसके अधीन। ब्रिटेन की संसद में चार्टर एक्ट सन् 1813 आया,उसके अंतर्गत भारत में मुक्त व्यापार हो गया,इस्ट इंडिया कम्पनी का अधिकार भारत में सिर्फ चाय तथा चीन देश में होने वाले व्यापार पर ही रहा।अब कम्पनी का भारत में केवल राजनैतिक क्षेत्र में ही एकाधिकार रहा।इस समय में सन् 1817-18 में पेशवा को पूना से हटाकर कानपुर के पास बिठुर भेज दिया गया।मराठौ के सैनिक सहायक पिंडारियो का सफाया कर दिया गया तथा पिंडारी नेता अमीर खां को टौंक रियासत देकर संतुष्ट कर दिया।
चार्ल्स मेटकांक को राजपूताने की रियासतों से संधि करने के लिए नियुक्त किया गया।
दिल्ली में सन् 1818 में इन रियासतों का एक सम्मेलन बुलाया गया तथा सुरक्षा और अनाक्रमण की संधि की गई।
करौली व टांक से नवम्बर सन् 1817 में,कोटा-जोधपुर-उदयपुर से सन् 1818 में, सिरोही से सन् 1823 में, झालावाड़ जो सन् 1837 में रियासत अंग्रेजों ने बनाई थी से सन् 1838 में सन्धि कर ली गई। डूंगरपुर बांसवाड़ा और प्रताप गढ़ के साथ मालवा के रेजीडेण्ट माल्कम ने संधि की। लार्ड हैस्टिंग्स ने 310 भारतीय रियासत ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन लाई।
विलियम बैंटिक ने सन् 1831 में मैसूर, सन् 1832 में कछार, सन् 1834 में कुर्ग, सन् 1835 में जैतिया रियासत ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन कर ली।
लार्ड आकलैंड ने सन् 1839 मैं कानूल और मांडवी, सन् 1840 में कोलाबा और जालौन ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन कर ली।
लार्ड डलहौजी जब सन् 1848 में भारत के गवर्नर जनरल बन कर आये ।उनका ऐसा मत था कि ये जो ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत नाम के राजा बने हुए हैं,इनकी कोई आवश्यकता नहीं है, इसलिए ये भारतीय राजा समाप्त होने चाहिए। इसलिए डलहौजी ने समस्त रियासतों को ब्रिटिश भारत में मिलाने का प्रयास किया, डलहौजी द्वारा किए गए प्रयास निम्न थे-
1- युद्ध के द्वारा-
सन् 1849 में पंजाब को, सन् 1850 में सिक्किम को,सन् 1852 में वर्मा में पीगू और लोअर वर्मा को।
2- कुशासन, भ्रष्टाचार व बकाया धनराशि के आरोप द्वारा-
 सन् 1856 में कुशासन का आरोप लगाकर अवध को,बकाया धनराशि का भुगतान न करने का आरोप लगाकर हैदराबाद से बरार का क्षेत्र ले लिया।
पैंशन समाप्त,पद समाप्त, उपाधियां छीन ली गई।
3- व्यपगत सिद्धांत/राज्य हडप निति-
राजाओं को अपनी रियासत के वारिसाना हक के लिए वारिस गोद लेने से रोक दिया गया।
लार्ड डलहौजी ने रियासतों की तीन श्रेणियां बनाई।
१- स्वतंत्र रियासत-
ये रियासतें वारिस गोद ले सकती थी।
२- मुगल,मराठा और अंग्रेजों के अधीन रियासत-
इन रियासतों को वारिस गोद लेने के लिए सरकार से परमिशन लेनी होगी, परमिशन मिल जायेगी।
३- पुनर्जीवित रियासतें-
इन रियासत के राजा वारिस गोद नही ले सकते, अंग्रेजी राज में मिला ली जायेंगी। ये पुनर्जीवित रियासते वो थी जिनका निर्माण अंग्रेजों ने किया था, जैसे मैसूर का राजा वाडियार परिवार से था,हैदर अली ने वाडियार राजा से यह रियासत छीन ली थी,हैदर अली वाडियार राजा का सेनापति था। अंग्रेजों ने हैदर अली के बेटे टीपू सुल्तान को मारकर पुनः वाडियार राजा को मैसूर का शासक बना दिया था,इसी प्रकार सतारा मराठा राजा को हटाकर पेशवा जो मराठा राजा के सेनापति थे ने रियासत अपने अधीन कर ली थी और सतारा के स्थान पर पूना को अपनी राजधानी बना लिया था, अंग्रेजों ने पेशवा को हटाकर मराठा राजा प्रताप सिंह को सतारा का पुनः राजा बना दिया था।
इस तरह की रियासतों को वारिस गोद लेने का अधिकार नहीं था।ऐसी रियासतें जब्त कर ली गई जो निम्न थी-
1-सतारा(महाराष्ट्र) सन् 1848 में।
2-जैतपुर(बुंदेलखंड) सन् 1849 में।
3- सम्भल पुर (ओडिशा) सन् 1849 में।
4- बघाट (हिमाचल) सन् 1850 में।
5- उदयपुर (छत्तीसगढ़) सन् 1852 में।
6- झांसी (बुंदेलखंड उत्तर प्रदेश) सन् 1853 में।
7- नागपुर (महाराष्ट्र) सन् 1854 में।
8-‌ करौली (राजस्थान) सन् 1855 में , परन्तु करौली एक स्वतंत्र रियासत थी इसलिए इस्ट इंडिया कम्पनी के बीओडी (बोर्ड आफ डायरेक्टर) ने इस विलय को रद्द कर दिया था।