रविवार, 31 मार्च 2024

एक जीवन मेरे पिताजी श्री समय सिंह-अशोक चौधरी/कुमार मेरठ।


मेरे पिताजी श्री समय सिंह पुत्र स्व श्री जिले सिंह एक सीधे- साधे ईश्वर मे विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे।उनका जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के खतोली ब्लाक के भटौडा नाम के गांव में 11-05- 1942 में हुआ था।वो एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते थे।हमारी माता स्व श्रीमती श्याम कली देवी जो जिला मेरठ की मवाना तहसील के माछरा ब्लाक के अन्तर्गत गढ़ रोड पर स्थित हसनपुर कलां गांव के स्व श्री रामचन्द्र जी की पुत्री थी।हम अपनी माता-पिता के तीन संतान है,मेरी बडी बहन कृष्णा, में (अशोक चौधरी/कुमार) और मेरा छोटा भाई महेश कुमार।
हमारे मामा जी का परिवार पढा लिखा परिवार था,हमारे मामा जी श्री निर्भय सिंह व श्री सिब्बू सिंह सरकारी अधिकारी थे तथा शहर में निवास करते थे।ऊनकी जीवन शैली से प्रभावित होकर हमारी माता जी के अथक प्रयास तथा नाना व नानी जी के अथक सहयोग से हम भी सन् 1977 में मेरठ की नेहरू नगर कालोनी की गली नंबर एक मे अपना मकान बनाकर रहने लगे थे तथा शहरी नागरिक बन गये थे।
ग्रामीण से शहरी नागरिक बनने का सफर काफी दिलचस्प व संघर्ष भरा था। मेरे नाना जी का परिवार यूं तो एक किसान परिवार था, परंतु वह किसानों में अगडे थे।मेरे नाना जी के मकान का दरवाजा लखोरी ईंटों का बना हुआ था,जिसे देखकर यह प्रभाव पडता था कि यह पुराना सम्पन्न परिवार है।
सन् 1965 में मेरा जन्म हुआ था।मेरे परिवार में महिलाओं की कमी थी,मेरी दोनों बुआ शादी शुदा थी तथा मेरी दादी की मृत्यु मेरी माताजी की शादी के कुछ माह बाद ही हो गई थी,दादी जी की मृत्यु के समय मेरी एक बुआ की शादी भी नहीं हुई थी।इस कारण मेरा जन्म मेरे नानाजी के यहां ही हुआ था।जब मेरी माताजी मुझे लेकर मेरे गांव पहुची,तब 
 मेरे गांव से मेरे जन्म की सूचना की रस्म निभाने के लिए  हमारा नाई मेरे नाना जी के यहां पहुचा,तब मेरे नाना जी ने हमारे नाई की बडी खातिरदारी की तथा चलते समय भेंट स्वरूप 251 रुपये दिए।उस मंदे जमाने में यह एक बडी रकम थी।जब मेरै ताऊ जी ने हमारे नाई से पूछा कि रिश्तेदार कैसे हैं।तब नाई ने कहा कि जितने की आपकी पूरी जमीन है,उतनी किमत का तो आपके रिश्तेदार का दरवाजा है।इस पर मेरे ताऊ जी ने उसकी पिटाई कर दी। हमारे पास 65 बीघा जमीन थी,ताऊ बोले क्या दरवाजा 65 बीघा जमीन के बराबर का है।खैर नाई ने अतिश्योक्ति अलंकार का प्रयोग कर दिया था।मेरे ताऊ जी ने गुस्से में कह दिया कि देखेंगे छूछक ट्रक भरकर आयेगा क्या? मेरे नाना जी को यह बात मेरी माता जी के माध्यम से पता चल गई। मेरे नाना जी ने उस समय बेड, सोफा सेट, रेडियो, अनाज की टंकी,बडा सन्दूक आदि सामान ट्रक मे भरकर, ट्रक से ही छूछक भेज दिया।
मेरै नाना जी के यहां सन् 1972-73 के आसपास घर पर शौचालय बना हुआ था,जो उस समय एक किसान के यहां होना, परिवार की अग्रणिय स्थिति की ओर संकेत करता था।मेरी नानी जी जिनका नाम प्रहलादो देवी था,माछरा ब्लाक के भडोली गांव के निवासी श्री बहादर सिंह कसाना की पुत्री थी।जैसा मेरी नानी जी बताती थी कि उनके पिताजी पशुओं (गाय,भैस) की बीमारी दूर करने की देशी दवाई के जानकार थे।उनके द्वारा ही मेरी नानी जी को भी यह तकनीक ज्ञात थी।मेनै स्वयं देखा कि मेरी नानीजी गम्भीर बीमारी से ग्रस्त पशुओं को कान व पूंछ की नस बींधकर तथा देशी दवाई की दो तीन खुराक मे ही ठीक कर देती थी,इस कारण नानीजी का आसपास के कई गांवों में बड़ा आदर था।नानी जी कोई डिग्री प्राप्त डाक्टर नही थी, परंतु उनकी दवाई डिग्री प्राप्त डाक्टरों पर भारी पडती थी।इस कारण नानीजी उस पुराने समय में एक आर्थिक रुप से सशक्त महिला थी।
यही कारण रहा कि मेरे नानाजी एक माध्यम दर्जे के किसान होने के बावजूद भी अपने आसपास के बड़े किसानों से बहतर थे। हमारे मेरठ में स्थापित होने मे हमारी नानी जी का बहुत बड़ा योगदान था। हमारे पिताजी और दादाजी शहर में रहने के पक्षधर नही थे,वो गांव में ही अपनी खेती किसानी बढाना चाहते थे। परंतु हमारी माताजी शहरी जीवन की पक्षधर थी।इस स्थिति में शहर में सम्पत्ति खरीदने में मेरे पिताजी की कोई रुचि नहीं थी। सन् 1972 में मेरी माता जी ने अपने बल पर मेरठ में 200 वर्ग गज का एक प्लाट गढ़ रोड पर स्थित नेहरू नगर कालोनी में खरीद लिया,जिसकी किमत उस समय 12000 रुपये थी।इन 12000 रुपयों में हमारे पिताजी ने कोई सहयोग नहीं दिया था।सब धन मेरी माता जी ने लगाया था।मेरी माता जी का कोई व्यवसाय नही था। अतः किसी ना किसी रुप में यह धन मेरे नाना जी व नानी जी की कृपा से प्राप्त था। सन् 1974 में इस प्लाट की नींव भरी गई। उसमें आधा सहयोग हमारे पिताजी ने दिया था,करीब 5-7 हजार रुपए। सन् 1976 में इस प्लाट पर बिल्डिंग बनी, जिसमें 90000 रुपये खर्च हुए।मेरे पिताजी की ओर से 15000 रुपयों का सहयोग रहा था। सन् 1978 में मकान की फिनिशिंग हुई, इसमें पूरा खर्च मेरे पिताजी ने दिया था,जो करीब 25000 रूपये था।इस प्रकार हम शहरी नागरिक बन मेरठ में रहने लगे थे।
इंसान कितना भी पढ लिख ले, परंतु समाज के नियम उसे प्रभावित अवश्य करते हैं।मेरे मामाजी भी समाज की प्रथा से प्रभावित हो गये थे। क्योंकि वह उनको लाभ पहुंचाने वाली थी। भारतीय समाज में उस समय बेटी को पराया धन समझा जाता था। माता-पिता अपनी बेटी की शादी करना ही अपनी जिम्मेदारी समझते थे। परंतु जमाना बदल रहा था।मेरे नाना जी व नानी जी इस बदलाव से प्रभावित होकर बेटी को पराया धन ना मानकर बराबर का अधिकार दे रहे थे। परन्तु इस बदलाव को मेरे मामाजी स्वीकार नही कर रहे थे। अतः परिवार में तनाव बन गया था। जिसमें मेरे नाना जी व नानी जी तथा माता जी एक ओर थे तथा मेरे दोनों मामा जी एक ओर।आपसी मनमुटाव इतना बढ़ा कि हमारी शादियों में भात की रस्म मे भी परेशानियां बनी। परंतु समय के मरहम ने सब ठीक कर दिया था।हम तीनों भाई बहन तथा हमारे मामा जी के बीच रिश्ते सहज ही थे।
जब सन् 1977 में हम गांव से मेरठ में आ गये।तब मेरे पिताजी को गांव में ही रहकर खेती करानी पडी, क्योंकि मेरे दादाजी शहर में रहने के पक्षधर नही थे। उन्होंने मेरठ में रहने के लिए साफ मना कर दिया था।इस कारण मेरे पिताजी को सात-आठ वर्ष तक गांव में ही दादाजी के पास रुकना पडा।मेरी छोटी बुआ जी श्रीमती शिमला देवी का इस समयावधि में बहुत सहयोग रहा।बुआ जी वर्ष में करीब छः महीने पिताजी और दादाजी के पास गांव में रह जाती थी।कभी कभी कोई आपदा भी रास्ता आसान कर देती है।मेरा गांव मेन रोड से बहुत अंदर था, वहां बाजार से कुछ भी लेने की कोई व्यवस्था नहीं थी।नमक या माचिस जैसी चीजें लेने के लिए भी गांव से सात किलोमीटर दूर मंसूरपुर या तीन किलोमीटर दूर सिखेड़ा आना पडता था।ऐसी परिस्थिति में पिताजी और बाबाजी के खाना बनाने की व्यवस्था कैसे बनें।यह एक गंभीर प्रश्न था। कुटुम्ब के लोग सहयोगी थे परंतु लगातार सहयोग बने रहना सम्भव नहीं था।मेरी छोटी बुआ जी कुछ क्रोधी स्वभाव की थी।उनकी जहां शादी हुई (वर्तमान में उत्तराखंड में रूड़की के पास देवपुर गांव) वहां उनकी सासूजी भी क्रोधी स्वभाव की थी।मेरी बुआ जी के दो संतान एक बेटा व एक बेटी पैदा हो गई थी। लेकिन तभी मेरे फूफाजी का देहांत हो गया था। परिस्थिति ऐसी बनी कि मेरी बुआ जी और उनकी सासूजी के मध्य जो टकराव हो जाता था तो कोई शांत करने वाला नही था। बुआ जी के ससुर फूफाजी की मृत्यु के कुछ माह बाद ही स्वर्ग वासी हो गये थे।इन परिस्थितियों में मेरी बुआ जी वर्ष भर करीब आठ महिने पिताजी के पास गांव अपने बच्चों सहित आ जाती थी,वो छ महीने रहती फिर दो महिने को अपनी ससुराल चली जाती थी। वहां मुश्किल से दो महिने रह पाती थी फिर पिताजी के पास आ जाती थी। क्योंकि गांव में मेरी माताजी भी नही थी, इसलिए वहां उनका किसी से कोई टकराव नही होता था।इस प्रकार मेरे दादा जी की मृत्यु तक यही क्रम बना रहा।मेरी बुआ जी के बच्चे भी बडे हो गये थे,उनकी सासूजी की भी मृत्यु हो गई थी।समय की शक्ति ने सब सामान्य कर दिया था तथा दोनों परिवारों की समस्या का समाधान भी कर दिया था।
 जीवन चलता रहा।मेरी माता जी वृद्ध हो चली थी।उनका पैर फिसल गया तथा कूल्हा टूट गया।वो बैड पर आ गई। पिताजी ने इस समय माता जी को भरपूर सहारा दिया।वे माता जी के साथ एक परछाईं की तरह रहें।माता जी के नीजि देनिक कार्य में पिताजी ने भरपूर सहायता की।
5 दिसम्बर  2021(रविवार का दिन  मार्गशीर्ष मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि ) प्रात: 9 बजे माता जी इस नश्वर संसार को छोड़कर चली गई।
मेरे पिताजी,माता जी की मृत्यु के बाद कुछ समय के लिए असहज से रहें। परंतु हमने पिताजी को अकेला नही छोडा। में और मेरा छोटा भाई महेश, कोई ना कोई उनके पास ही सोता था। लेकिन 12-02-24 की दिन शाम को दूध पीते समय पिताजी के गले में फंदा लग गया।उनको हास्पिटल में भर्ती करना पडा।वो वेंटिलेटर पर आ गए  तथा  20 फरवरी 2024 को (माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि ) को अस्पताल में मृत्यु हो गई।वो इस नश्वर संसार को छोड़कर चले गए।
एक सीधे साधे सरल जीवन का अंत हो गया।

गुरुवार, 14 मार्च 2024

एक जीवन मेरी धर्म पत्नी ऊषा रानी - लेखक अशोक चौधरी मेरठ।

व्यक्ति अकेला जन्म लेता है और जब संसार से विदा होता है तब अकेला ही चला जाता है। संसार में आने और जाने के बीच के समय को ही जीवन कहा गया है।इसी बीच व्यक्ति संसार में रहने वाले अन्य जीवों और वस्तुओं से भी सम्बन्ध बनाता है।जो निर्जिव व संजीव दोनों तरह से होते हैं। अपने देश, अपना गांव इसमें प्रमुख हैं। संसार में सजीव/जींदा लोगों मे बना सम्बन्ध जिनमें भाई-बहन,माता पिता,यार दोस्त तथा पति-पत्नि का है।
मेरा भी विवाह-संस्कार के माध्यम से पत्नी के रुप में मेरठ- हरिद्वार रोड पर स्थित दादरी गांव के निवासी राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त अध्यापक श्री झब्बर सिंह की पुत्री ऊषा रानी ( जन्म 05-11-1970, मृत्यु 14-03-2024) सेे 5 जुलाई सन् 1987 को सम्बन्ध बना।ऊषा देवी के तीन छोटे भाई जोगेंद्र सिंह, राजेंद्र सिंह व प्रमेंद्र सिह थे।मास्टर झबर सिंह तीन भाई थे,जिनमे मास्टर झबर सिंह व उनके बडे भाई जयपाल सिंह एक साथ रहते थे।हमारी सासू मा दो सगी बहनें इन दोनो सगे भाईयों की धर्मपत्नी थी, जयपाल सिंह निसंतान थे समय व्यतीत होता रहा, मुझको दो पुत्री पायल व कोमल के रुप में प्राप्त हुई।मेरी पत्नी ऊषा का सबसे छोटा भाई प्रमेंद्र जो मेरी शादी के समय बच्चा ही था, धीरे-धीरे बडा होने लगा,वह पढ़ाई के लिए कुछ महीनों के लिए मेरे पास ही रहा, इसलिए अति निकट भी हो गया,ऊषा के तीनो भाईयो की शादी भी हो गई, जिसमें प्रमेंद्र की शादी मेरठ जिला के मेरठ ब्लाक के नरहडा गांव के निवासी मास्टर विजय सिंह की पोत्री उपासना देवी के साथ हो गई।मास्टर विजय सिंह राजनितिक दृष्टि से भाजपा के निकट थे,मे भी भाजपा के निकट रहा, इसलिए मेरी मास्टर विजय सिंह से पहले से ही मुलाकात थी।सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था।आपस में प्रेम भाव था,मास्टर विजय सिंह का एक मकान मेरठ में बेगमबाग मे भी था।
मेरी पत्नी ऊषा मृदु भाषी और प्रसन्न दिखने वाली महिला थी।मेरी माता जी सख्त स्वभाव की थी।मेरी माता जी ने घरेलू बात से नाराज़ होकर मुझे अलग कर दिया तथा मुझे दो कमरे दे दिए।कुछ दिन बाद ऊषा अपने मायके चली गई।मेरे पिताजी व मेरा छोटा भाई महेश तथा माता जी एक साथ रह रहे थे।मेरी माताजी किसी घरेलू बात पर मेरे पिताजी से लड पडी तथा पिताजी व महेश का खाना बनाना बंद कर दिया।मे बाहर से आया तो मैंने देखा कि महेश खाना बना रहा था।मे ऊषा को उसके घर से ले आया। पिताजी और महेश का खाना ऊषा बनाने लगी।मेरी बडी बेटी पायल घर पर ही पैदा हुई थी।उसके जन्म लेते समय एक स्थिति ऐसी बनी कि अस्पताल ले जाने की जरूरत आन पडी थी। परंतु डीलिवरी घर पर ही हो गई।मेरी बडी बहन कृष्णा मेरी बडी बेटी के पैदा होने पर ऊषा के साथ रही।
जब दूसरी बेटी के जन्म का समय आया तो मैंने माता जी से कह दिया कि अब घर पर नही, अस्पताल में डिलिवरी होगी।मेरी माता जी इस बात से नाराज़ हो गई।जब मे ऊषा को लेकर सुशीला जसवंत राय अस्पताल ले जाने लगा तो माता जी ने मेरे साथ जाने के लिए मना कर दिया।मे अपनी दूर के रिश्ते की मौसी जो गढ़ रोड पर स्थित किठोर के पास सादुल्लापुर गांव की निवासी थी तथा जिनका नाम धनकौर था ,को ले गया।जब मेरी छोटी बेटी कोमल पैदा हो गई तब ऊषा की माता जी को लेकर आया। अस्पताल में ऊषा की माता जी साथ रही। 
समय गुजरता रहा मेरी बडी पुत्री पायल की सन् 2011 में शादी हो गई। मेरी पत्नी के छोटे भाई प्रमेंद्र की पत्नी उपासना गर्भवती हो गई, डाक्टर ने उसको बेड-रेस्ट बता दिया,उसके गर्भ मे दो बच्चे थे। इस स्थिति में प्रमेंद्र मेरे पास आया और कहने लगा कि मेरी पत्नी को बेड-रेस्ट बताया है,इसकी कैसे व्यवस्था हो,मेने कहा कि तीन ही जगह है,एक अपने घर दादरी जाइयै, दूसरे आपकी पत्नी का मायका है जिनका निवास मेरठ में है,उनसे पास रहिये,तिसरा विकल्प आपकी बहन है,यदि वह चाहे तो यहां भी व्यवस्था बन सकती है। प्रमेंद्र ने अपनी बहन से परामर्श किया और अपना घर तथा ससुराल को छोड़कर तीसरा विकल्प अपनी बहन का घर चुना। प्रमेंद्र पढ़-लखा होशियार व्यक्ति था,उसकी पत्नी भी पढी लिखी थी। बुद्धिमान व्यक्ति वही माने जाते हैं जो अपने संकट में अपने नजदीकी लोगों को बचा ले तथा दूसरे को उसमे शामिल कर लें। प्रमेंद्र ने भी यही किया, उसने अपने पिता तथा ससुराल पक्ष को बचा लिया तथा अपनी समस्या का समाधान का भार अपनी बडी बहन पर डाल दिया।ऊषा देवी ने अपनी छोटी भाभी की बडी सेवा की,वह गर्भावस्था में 6 महिने हमारे पास नेहरु नगर मेरठ में रही,मेरी छोटी बेटी कोमल भी उसकी सेवा में लगी रही।भाई बहन का प्रेम सफल रहा,उपासना देवी ने दो जुडवा बेटो को जन्म दिया। प्रमेंद्र अपने जुडवा बेटो को लेकर फिर 6 महिने अपनी बहन के पास रहा,मेरी पत्नी ऊषा तथा पुत्री कोमल उन बच्चों की देखभाल में लगे रहे। उपासना देवी की नौकरी लग गई,वह मेरठ के आर जी डिग्री कालेज में अध्यापिका नियुक्त हो गई।मेरे ससुर श्री झबर सिंह भी सेवानिवृत्त हो गये।मेरा गांव जिला मुज्जफर नगर के खतोली ब्लाक मे भटौडा है।वही हमारी पुस्तेनी जमीन है।क्योकि मेरे ससुर अध्यापक रहे थे, प्रमेंद्र भी बीएड किये हुए था, इसलिए यह योजना बनी की गांव में एक स्कूल बनाया जाय, जमीन मेरे पास थी,इस कार्य में, में और मेरा छोटा भाई महेश तथा मेरे ससुर तीन हिस्सेदार बन गए।हम तीनों ने मिलकर 744000  रुपए खर्च कर गांव में स्कूल की बिल्डिंग बनाई,इस धन मे अपने हिस्से के अनुसार मेरे ससुर श्री झबर सिंह ने 249000  रूपए लगाये जो 33.5% के करीब था, स्कूल का नाम शहीद विजय सिंह-कल्याण सिंह पब्लिक स्कूल रखा गया,पांचवी कक्षा तक की मान्यता यूपी बोर्ड से ले ली गई। लेकिन वह स्कूल चल नही पाया,श्री झबर सिंह की आयु इसमें आडे आ गई, इसलिए यह विचार हुआ कि स्कूल को किसी ओर से संचालित करवाया जाय।उस विकल्प मे भी कोई खास आमदनी नही हुई। इसलिए यह तय हुआ कि स्कूल को बेच दिया जाय तथा अपनी पूंजी निकाल ली जाय। प्रयास प्रारंभ हुए, स्कूल का खरीदार नही मिल रहा था। बिल्डिंग बनी हुई थी, इसलिए यह योजना बनी की बिल्डिंग को अलग बेच दिया जाय,मेरे द्वारा प्रयास किये जा रहे थे, बिल्डिंग के मलवे के कोई 200000  रुपए से अधिक देने को तैयार नही था।ऐसी परिस्थिति में श्री झबर सिंह के हिस्से के 249000  रुपए घट कर 67000 रुपये हो रहे थे। इसलिए मन में तनाव बनने लगा था।मेरा परिवार यह कह रहा था कि जमीन हमारी है इसलिए बिल्डिंग मे ही हिस्सा हैं, जमीन के दाम बढ रहे थे परंतु बिल्डिंग के दाम घट रहे थे।क्योकि श्री झबर सिंह बिल्डिंग मे ही साझेदार थे, जमीन की कीमत उन्होंने नही दी थी, इसलिए घाटा उनकी तरफ जा रहा था,हमारा घाटा तो जमीन की बढी दर से पूरा हो रहा था।घर में तनाव बन रहा था और इस परिस्थिति का शिकार मेरी पत्नी हो रही थी,जिसकी कोई गलती नही थी।वह शूगर की पेसेंट सन् 2012 से बन गई थी।मेने बडे गम्भीर प्रयास से अपने परिवार को समझाया कि बिल्डिंग और जमीन को एक साथ ही रहने दिया जाए।दोनो को बेचकर जो पूंजी मिले, उसमें से ही हिस्सेदारी तय की जाय।दोनो को खरीदने का कोई ग्राहक नही मिल रहा था। इसलिए मेरे ससुर श्री झबर सिंह मुझसे पूछते रहते थे कि क्या हुआ? सम्बन्धों में एक अजीब सी चुभन बन रही थी।तभी मेरी मुलाकात श्री रजनीश कुमार जो मेरे गांव के पास स्थित फीमपुर गांव के निवासी से हुई,वह मंसूरपुर गांव में स्कूल चलाते थे।मेने उनसे अपना स्कूल खरीदने का प्रस्ताव रखा।पहली बार मे उन्होंने मना कर दिया।लगभग 6 महीने बाद उनसे दोबारा मुलाकात हुई,मेने दोबारा प्रस्ताव रखा,रजनीश जी ने कहा कि उनके पास एक साथ देने के लिए धन नही है,मेने उनसे अपनी सुविधानुसार धन देने का विकल्प रख दिया।जिस पर वह रजामंद हो गये। स्कूल दस लाख रुपए में तय हो गया।अब श्री झबर सिंह के हिस्से में 67000 के स्थान पर 235000 हजार रुपए आ रहे थे। रजनीश जी ने 50000 रुपए बयाना दे दिया। लेकिन तभी कोरोना की महामारी आ गयी,दो वर्ष तक पूरा देश इस महामारी से प्रभावित रहा। इसलिए स्कूल का पेमेंट रुक गया। लेकिन स्थिति सामान्य होने पर सब काम चलने लगे।  स्कूल का पेमेंट आने लगा।मेने 100000 रुपए श्री झबर सिंह को दे दिये।
इसी बीच श्री झबर सिंह के बडे भाई श्री जयपाल सिंह को ब्रेन हेमरेज हो गया,वो सुशीला जसवंत राय हांस्पिटल में भर्ती हो गए तथा वेंटिलेटर पर आ गये।इलाज महंगा हो गया।मेरठ के मेडिकल कॉलेज में वेंटिलेटर की व्यवस्था थी,जो निशुल्क थी, परंतु यदि कोई बीमार व्यक्ति मेडिकल कॉलेज में सीधा भर्ती होकर वेंटिलेटर पर आ जाय तो व्यवस्था बनने में कोई परेशानी नहीं थी, परंतु यदि किसी प्राइवेट नर्सिंग होम में भर्ती होकर कोई बीमार व्यक्ति वेंटिलेटर पर आ जाय तो उसके बाद मेडिकल सरकारी अस्पताल में भर्ती होने का विकल्प सामान्य तौर पर नही था। अतः एक बडी समस्या सामने खडी थी।धन की आवश्यकता थी,मेने अपने सम्बन्धों का प्रयोग किया, अपने विधायक डा लक्ष्मीकांत वाजपेई जी की मदद से श्री जयपाल सिंह को मेडिकल में वेंटिलेटर की व्यवस्था करा दी। सुशिला जसवंराय हास्पिटल में जो खर्च 30000 रुपया प्रतिदिन था वह घटकर शून्य हो गया।करीब दस दिन श्री जयपाल सिंह वेंटिलेटर पर रहें,उनकी मृत्यु हो गई।करीब तीन लाख रुपए की बचत हो गई।
तभी मेरी पत्नी ऊषा देवी बीमार हो गयी।
31-01-2018 की रात्रि को बेगमबाग मेरठ में रह रहे  प्रमेंद्र के माध्यम से डा अनिल मेहता को दिखाया गया तो पता चला कि निमोनिया हो गया है,ऊषा की जान खतरे में है।मेरे पड़ोस में रहने वाले सतीश वर्मा की पुत्री दिल्ली एम्स अस्पताल में कार्यरत थी, उसके माध्यम से 02-02-2018 को ऊषा को दिल्ली ले गए।जब सुबह में ऊषा को गाड़ी से दिल्ली लेकर चला।तब मेरी माताजी नीचे खडी रो रही थी। उनके मन में यह डर समा गया था कि ऊषा जिंदा वापस आये या ना आये।मेरी माताजी सख्त स्वभाव की महिला थी। परंतु अपनो से प्यार कोन नही करता?
मेरे साथ मेरे छोटे भाई की पत्नी बीना व मेरी बडी बेटी पायल के ससुर रिठानी निवासी डा ज्ञानचंद बैसला थे। लेकिन जिनकी बहू की सेवा ऊषा ने एक वर्ष तक की थी,उस पक्ष से कोई नही था।ऊषा दिल्ली से ठीक होकर आ गई।
मार्च 2020 में ऊषा फिर बीमार हो गयी। उसके पैर सूजने लगे।16-03-2020 को ऊषा को डा प्रवीण पुंडीर को दिखाया।तब वह ठीक हुई।लेकिन निमोनिया ने ऊषा का जीवन कठिन बना दिया।
मैं अपनी पत्नी ऊषा के साथ वर्ष में दो बार होली और दीवाली को अपने गांव देवता का पूजन करने जाता था। सन् 2021 में जब दीवाली पर पूजन करने के बाद वापस मेरठ आ रहा था तब हम गंगनहर की पटरी से आ रहे थे।गंगनहर की पटरी से दादरी होते हुए दिल्ली रुडकी वाली सड़क पर पहुंच जाते हैं। जैसे ही हम दादरी पहुंचे,ऊषा ने दादरी मे बने मंदिर में प्रसाद चढाने तथा पूजा करने की इच्छा व्यक्त की। मैंने गाडी रोक ली।जब पूजन समाप्त हुआ,तब मेंने ऊषा से कहा कि आप चाहों तो अपने माता-पिता या भाई भाभी से भी मिल सकती हों। गांव में ही खड़े हैं।इस पर ऊषा ने मिलने से मना कर दिया। उसने कहा कि जब मेरे परिवार वालों ने ही मेरे पास आना बंद कर दिया,तो में भी नही जा रही। माता-पिता के जीवित रहते यदि एक बेटी अपने घर जाने की हिम्मत भी ना जुटा पाये। आखिर यह समाज की कैसी बनावट है? कैसे सम्बन्ध है?
जब ठंड का मौसम आता और जाता था,वह कुछ दिन परेशान रहती थी।वह सामान्य आदमी की तरह सीधा लेट नही पाती थी।एक तरफ करवट लेकर तथा सर की ओर से कुछ ऊंचा होने पर ही लेट पाती थी।जीवन चलता रहा।कुछ समय बाद 10-08-2022 को ऊषा को पेरेलाईसिस/फालिस का एक हल्का आघात हुआ।जब उसकी तबियत खराब हुई,तब उसकी जान खतरे में देख ऊषा के रिश्ते की बहन संगीता ने बताया की,ऊषा ने उससे 90000 रुपये ऊधार लिए है, अपने भाई योगेंद्र के लिए।मेरे छोटे भाई महेश ने बताया कि भाभी ने 140000 रूपये उधार लिए है, अपनी सहेली अमरेश के लिए।फिर एक दिन प्रमेंद्र का फोन आया कि ऊषा ने उसकी पत्नी उपासना से 35000 रुपये लिए है,जब मेने ऊषा से पूछा तब उसने बताया कि पेसे की जरूरत उसकी सहेली को थी,उनको दिलवा दिये है। मेंने जब इन लोगों से पूछा तब पता चला कि इनमें से किसी ने पैसा नहीं लिया था।बडी अजीब बात थी, आखिर इतना पैसा कहा गया। उषा पेरेलाइसिस थी, फिर भी मैने उससे सत्यता जाननी चाही कि इतना पैसा कहा गया।तब उसने बताया कि मेरी छोटी बेटी कोमल की शादी में शोपिंग करते समय, उससे 70000 रुपये बाजार में खो गये। उसने मुझे नही बताया।किसी से ब्याज पर लेकर उसकी पूर्ति कर ली,जब ब्याज बढ गया,तो दूसरे से ब्याज पर लेकर चुकता कर दिये।इसी उलट फेर में सन् 2016 से सन् 2022 तक 70000 से बढ कर इतने हो गये।मेने ऊषा को समझाया कि वह चिंता छोड दे,मेने सबके पैसे चुका दिए। लेकिन इस घटनाक्रम के बाद से ऊषा का भाई योगेंद्र नाराज हो गया,जबकि नाराज मुझे होना चाहिए था,धन की हानि मेरी हुई थी।
मैंने ऊषा से कहा कि मुझे आजीवन इस बात का दुःख रहेगा कि उसने अपनी परेशानी मुझे नही बताई, वर्ना समस्या का समाधान बहुत पहले ही हो जाता।शायद यह मेरी ही कोई कमी है।इस पर ऊषा भावुक हो गईं,वह मेरे गले लग गई तथा उसने एक ही शब्द बोला सारी/खेद।
योगेन्द्र की नाराज़गी से मुझे समझ में आया कि आखिर भारतीय महिलाएं अपने साथ होने वाले किसी भी गलत व्यवहार पर विरोध क्यों नही कर पाती? क्योंकि उनको अपने भाई पिता या पति की ओर से सहयोग के स्थान पर प्रताड़ना ही मिलती हैं। परंतु मे इस विचार का नही था।जब इन रूपयों का भेद खुला तो ऊषा घबरा गई थी।वह मेरी तरफ देख रही थी कि मेरी क्या प्रतिक्रिया होगी?मेने उसे कुछ नहीं कहा और समझा दिया कि वह इस विषय को भूल जाये।आराम से रहें। मेंने ऊषा के नीजी सम्मान/सेल्फ रेस्पेक्ट को हल्का सा भी आघात नही लगने दिया।ना अपनी ओर से,ना अपने परिवार की ओर से।
ऊषा के पिता जी भी सिर्फ फोन पर पूछ रहे थे कि तबियत कैसी है, कोई देखने नही आया।जब मेने ऊषा के पिता जी से सख्त लहजे में कहा कि आकर अपनी बेटी को देख नही सकते,तब वह आये।
डाक्टर ने ऊषा को ताजी हवा में घूमने की सुबह के समय सलाह दी। पेरालिसिस होने की वजह से वह अकेले घूमने जाने मे सक्षम नही थी।मे चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के प्रांगण में ऊषा को शाम को घूमाने ले जाने लगा।जिस दिन मुझे काम लग जाता,उस दिन घूमना छूट जाता था।वह अपने आप घूमने लगे,इसकी व्यवस्था के लिए मेने मेरठ बाईपास पर स्थित सुशांत सिटी सेक्टर तीन के अंदर इरीश गार्डन में डी-02-04 नम्बर का एक फ्लैट खरीद लिया। मार्च 2023 से हम इस फ्लेट में रहने लगे।मेरे पिताजी भी साथ में थे।अब ऊषा और मेरे पिताजी आराम से अपने आप फ्लेट के प्रांगण में घूम लेते थे।बाहर का कोई वाहन नही आता था,गेट पर चौकीदार रहता था। अच्छी व्यवस्था थी।शूगर, निमोनिया तथा पेरालिसिस की दवाई ऊषा खाती थी, उसके पास जीवन कम ही बचा था।यह में जानता था। परंतु मेने कभी ऊषा का साहस नही गिरने दिया।मेने उसे भरोसा दिलाया कि वह ठीक है।खूब जीयेगी।एक दिन ऊषा कहने लगी कि यदि उसे कुछ हो गया तो मे कैसे करूंगा? क्योंकि मैं घर के काम में रूचि नही लेता था।कपडे धोना आदि से में हमेशा दूर रहा। लेकिन मेने चाय बनाना सीख लिया था।मे सुबह उठकर पिताजी,ऊषा व खुद को चाय पिलाकर घूमने जाता था।इतना कमजोर होने पर भी ऊषा को मेरी चिंता थी,अपनी नही।मैने मन ही मन सोचा शायद भारत में नारी को देवी इसलिए ही कहा गया है।जिसे अपनी सेहत के बारे में सोचना चाहिए था,वह इस हालत में दूसरे के बारे में सोच रही थी।जीवन मृत्यु तो ईश्वर के हाथ है,वह कब किसे अपने पास बुला ले,वह उसकी मर्जी। परंतु सामान्य तौर पर तो ऊषा ही कमजोर थी।मेरे पिताजी भी इस बात से चिंतित रहते थे कि कही ऊषा को उनसे पहले ही कुछ ना हो जाए।
में भी ईश्वर से यही चाहता था कि वह मुझसे पहले दुनिया से चली जाय।
जब ऊषा ने मुझसे यह सवाल किया कि मे उसके बाद कैसे रहूंगा।मेने कहा वो मेरी फिक्र ना करें। क्योंकि जिस सेवा व सहारे की उसको जरूरत थी,वह मेरे अलावा कोई दूसरा परिवार का सदस्य ऊषा को नही दे सकता था।
 समय गुजरने लगा।20 फरवरी सन् 2024 को मेरे पिताजी की मृत्यु हो गई।29 फरवरी सन् 2024 को उनकी तेरहवीं थी।मेरे पिताजी की इच्छा पूरी हो गई।जब उनकी मृत्यु हुई ऊषा ठीक थी।
8 मार्च की रात्रि को ऊषा की तबियत खराब हो गई। में मेरी बेटी कोमल तथा मेरे एक मेडिकल लाइन के साथी श्री सुभाष घर पर ही थे,ऊषा ने अपनी बडी बेटी पायल को याद किया।पायल का ससुराल मेरे निवास से मुश्किल से चार किलोमीटर दूर था,मेने फोन कर उसे बुला लिया।अब हम सबने उसको आनंद नर्सिंग होम में भर्ती कर दिया ,मेने ऊषा के पिता जी को सूचित कर दिया,14 मार्च 2024 , फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष, पंचमी तिथि दिन गुरुवार  को ऊषा इस नश्वर संसार को छोड़कर परलोक वासी हो गयी।
मेरी भी इच्छा भगवान ने पूरी कर दी।वह मुझसे पहले इस संसार से चली गई।
वह वेंटिलेटर पर थी,जब बेहोश थी,उस समय ऊषा के पिता जी अस्पताल पहुंचे।दादरी से मेरठ 25 किलोमीटर दूर है।ऊषा के पिता जी को यह दूरी तय करने में पांच दिन लगे।
रक्त के सम्बन्ध इतने ढीले भी हो जाते हैं। मुझे पहली बार इसका अनुभव हुआ।
मेरा पूरा परिवार शुरू से ही साथ था,यदि कोई साथ नही रहा तो ऊषा का परिवार।
ऊषा ने अपने गृहस्थ जीवन मे सबकी सेवा की।मेरे माता-पिता की,मेरे जीजा श्री मनवीर सिंह का एक्सीडेंट हो गया था,उनका पैर टूट गया था,वह एक वर्ष बेड पर हमारे घर रहें।मेरी बहन उनकी सेवा में लगी रही।उनको देखने आने वालो की चाय पानी की सेवा ऊषा ने की।मेरे भाई की पत्नी बीना के तीन आप्रेशन हुए,एक बेटा होते समय,एक बेटी होते समय तथा एक एप्रेंडिस का।वह जब बेड पर थी उसकी सेवा भी जितना हो सकती थी ऊषा ने ही की।जब ऊषा को जरुरत पडी तो मेरी बहन,भाई की पत्नी बीना,मेरा भाई सब साथ खडे रहे।यदि कही शून्यता थी तो ऊषा के भाई,भाभी और पिता की ओर से।
ऊषा के परिवार वाले सबसे अधिक लाभ उठाकर रिटर्न जीरो दे गये।
यदि ऊषा की सेवा को पूंजी में बदल दिया जाय तौ जो एक वर्ष सेवा उसने अपनी भाभी की की,उसका बाजार मूल्य करीब 300000 रुपये बैठता है। मेरे साथी की पत्नी की स्थिति उपासना जैसी ही थी,उसका ध्यान रखने के लिए दो नौकरानी लगानी पडी थी,एक दिन में तथा एक रात में।दोनो दस दस हजार रुपए महीने लेती थी।
ऊषा के ताऊ जयपाल सिंह जी 10 दिन मेडिकल रहे।इसका नर्सिंग होम में करीब 300000  रूपये पेमेंट देना पडता।इतना लाभ उठाकर जिंदा रहते देखने नही आये।
ऊषा के माता-पिता व भाईयों ने जो समाज में प्रचलन होता है,उसके अनुसार मेरी दोनों लड़कियों की शादी में भात खूब अच्छी तरह दिये थे। परंतु फिर जाने क्या हुआ?मेरी समझ में भी नही आया।
विद्वान लोगों ने कहा है कि आपा ही बुरा है, दूसरे को क्या कहना?शायद हम में ही कमी थी।

मंगलवार, 30 जनवरी 2024

1857 के महान क्रांतिकारी अमर शहीद चौधरी तोता सिंह कसाना - लेखक अशोक चौधरी मेरठ।

भारतियों ने अपनी भूमि को माता के समान माना है। अतः जब- जब भी भूमि को बचाने के लिए बलिदान देने की जरूरत पडी तो भारतियों ने अतुलनीय बलिदान दिये है।ऐसा ही संघर्ष सन् 1857 की क्रांति में चौधरी तोता सिंह कसाना का है।1857 में अंग्रेजों की भारतिय सैना बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के सिपाहियों के साथ भारत के वो राजा/जागीरदार जो अंग्रेजों के शोषण का शिकार हो गये थे तथा उन रियासत व जागीरों में निवास करने वाली जनता ने एक साथ मिलकर अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने का एक बडा प्रयास किया था। इस संघर्ष में लाखों की संख्या में भारतियों का बलिदान हुआ था, अंग्रेजों की ओर से भी  उनके अधिकारी, सैनिक व परिवार के स्त्री-बच्चे मारे गए थे।इस कारण भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से निकल कर सीधा ब्रिटिश क्राउन के हाथ में चला गया था।भारतियों द्वारा दिए गये बलिदान से वो फल तो प्राप्त नही हुआ जो भारतिय चाहते थे, परंतु बहुत कुछ प्राप्त हो गया था। यह अंग्रेजों की समझ में आ गया था कि भारतियों को वो पूर्ण रूप से गुलाम नहीं  बना सकते, यदि उनको यहां शासक बन कर रहना है तो भारतियों की बात और भावना की कद्र करनी ही पड़ेगी।
भारतियों के अस्तित्व व अस्मिता को बचाने के इस संघर्ष में जिन असंख्य लोगों ने बलिदान दिया। उनमें बहुत बडी संख्या उन लोगों की थी, जो न तो किसी जागीर या रियासत के जागीर दार थे और नाहि क्रांति कारी सेना/बंगाल नेटिव इन्फैंट्री का हिस्सा थे बल्कि एक साधारण किसान परिवार से थे। चौधरी तोता सिंह कसाना उन्ही आम आदमी का एक चेहरा है।वो असंख्य लोग जिनका कोई नाम रिकार्ड में नही आया, सिर्फ अंग्रेजों के द्वारा संख्या लिख दी गई,कि इस जगह इतने लोग मारे गए,चौधरी तोता सिंह कसाना उन सभी अमर क्रांतिकारियों का एक मान बिन्दु है।
चौधरी तोता सिंह कसाना एक जगह जरुर भाग्यशाली रहें हैं कि उनके वंशजों ने अपनी स्मृति में उनकी याद सजोये रखी तथा वे उनका स्मरण समय समय पर करते रहे हैं।
क्रांति के इस किरदार पर मेरे द्वारा किया गया यह लेखन चौधरी तोता सिंह कसाना तथा उन सभी अज्ञात क्रांतिकारियों को एक छोटी सी श्रंद्धाजलि के रूप में पाठकों की सेवा में प्रस्तुत है।-
चौधरी तोता सिंह कसाना जी की वीरता को जानने से पहले हमें उस समय की समाज रचना को समझना होगा। जिसके प्रभाव के कारण एक सामान्य किसान क्रांतिकारी योद्धा के रूप में प्रकट हो गया।
भारत के उत्तर में तथा दक्षिण में जो समाज की व्यवस्था रही है, उसमें कुछ अंतर रहा है। दक्षिण भारत में जाति प्रथा रही है तथा उत्तर भारत में यजमान प्रथा रही है।
जाति प्रथा के अनुसार किसी भी गांव में जो शासक जाति होती थी यानि जिसके पास जमीन होती थी,उस गांव में बसी सभी जातियां किसान जाति के साथ एक श्रमिक के रूप में जुडी रहती थी।यानि एक तरह से यदि किसी गांव में बसी ब्राह्मण जाति किसान जाति है तो जो अन्य श्रमिक जातियां सम्पूर्ण गांव की ब्राह्मण जाति की श्रमिक मानी जाती थी।
लेकिन उत्तर भारत में ऐसा नहीं था खासतौर से हरियाणा पंजाब पश्चिम उत्तर प्रदेश या जहां जाट गूजर अहीर बाहुल्य में थे, उनके गांव में यजमान प्रथा थी।इस प्रथा में यदि एक गुर्जर जाति का गांव है, उसमें सभी जमीन गुर्जर जाति के व्यक्तियों के पास है,उस गांव में बसी श्रमिक जातियां गुर्जर जाति की श्रमिक जाति न होकर,एक परिवार के कृषक के साथ एक परिवार की ही श्रमिक जाति जुडी होती थी। जैसे एक किसान परिवार के साथ एक नाई परिवार,एक कुम्हार परिवार,एक धोबी परिवार,एक भंगी/बाल्मिकी परिवार, एक चमार परिवार,एक धींवर परिवार तथा पुरोहित के रुप में एक ब्राह्मण परिवार जुडा रहता था।इस व्यवस्था के कारण एक दूसरे के सुख दुख का जुडाव बना हुआ था। कार्य के रुप में शोषण भी श्रमिक जाति का कम था,क्यौकि एक परिवार पर एक परिवार की ही जिम्मेदारी थी,अन्य उससे काम नही लेता था।
लडने की पहली शर्त यही है कि जो लडना चाहते हैं उनमें समानता हो,इस यजमान प्रथा के कारण उत्तर भारत के समाज में काफी हद तक समानता थी,मानव अधिकारों का हनन बहुत ही कम था, मुसीबत आने पर किसान व श्रमिक जातियां एक साथ मिलकर अपने शत्रु से संघर्ष कर जाती थी। इसलिए भारत के इतिहास ऐसे अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं जिनमें श्रमिक जाति के लोगों ने अपने किसान जाति के लोगों पर आयी मुसीबतों का कंधे से कंधा मिलाकर विरोध किया है तथा बलिदान दिये है।
गुर्जर प्रतिहार सम्राटों के द्वारा जातिय आधार पर जो जागीर दी गई थी,उनकी रचना इस तरह की बन गई थी कि प्रत्येक जाति की बसावट एक छावनी के रुप में हो गई थी।12,24,60,84,360 गांव की संख्या की जागीर के गांव थे जो एक ही जाति तथा एक ही गोत्र के लोगों के पास थे।ऐसी मान्यता है कि दिल्ली के पास  पृथ्वीराज चौहान के ताऊ सम्राट बिसल देव चौहान के द्वारा 360 गांव की जागीर भाटी गुर्जरों को दी गई थी।इन 360 गांव में भाटी गुर्जर सिर्फ 80 गांव में थै बाकि गांव इन भाटी गुर्जरों ने अपने रिश्तेदारों को दे दिए थे, जिनमें 12-12 गांव कसाना और बेसला गुर्जरों को लोनी के आसपास दिए गए,लोनी मे बना किला एक सैनिक छावनी के रुप में था,लोनी के पास बसा जावली गांव इन चौबीस गांव का हैडक्वार्टर था।इसी प्रकार बुलंदशहर में राजगढ़ में बना किला सैनिक छावनी के रुप में था, दुजाना व दादरी के पास बसा कटेहडा गांव क्षैत्र का हेडक्वार्टर था।उस समय समाज का प्रत्येक वर्ग एक सेनिक की तरह हथियार बंद और प्रशिक्षित रहता था,राजा की सेना हार जाने के बाद भी आम आदमी इतना संगठित व सशक्त था कि वह छोटी-मोटी सेना का मुकाबला करने मे सक्षम था, दुश्मन का दबाव बनने पर उसे पलायन कर कहा चले जाना है वह भली-भांति जानता था, मुसीबत टलने पर फिर अपनी जगह लौट आता था।ऐसी व्यवस्था लोगों ने बना रखी थी। सन् 1398 में तैमूर लंग के हमले के समय तुगलक की सेना के हार जाने के बाद भी इस क्षेत्र के लोगों ने तैमूर की सेना का जमकर मुकाबला किया था तथा तैमूर के बेटे को मारकर लोनी के किलेदार करतार सिंह ने उसका शव किले दीवार पर टांग दिया था।
सन् 1773 में राज गढ किलै के किलेदार चंद्र भान सिंह गुर्जर/चंदू गुर्जर ने भरतपुर के राजा नवल सिंह के सेनापति के रूप में मुगल सेना से लडते हुए बलिदान दिया था। कहने का तात्पर्य यह कि सन् 1857 के समय भी इस क्षेत्र बसे किसान जाति समूह हथियार बंद थे तथा आवश्यकता पड़ने पर सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने की स्थिति में थे।इसी संरचना के कारण चौधरी तोता सिंह कसाना एक क्रांतिकारी सिपाही के रूप में सन् 1857 की क्रांति में अपने स्थानीय सेनापतियो क्रमशः रोशन सिंह भाटी, उमराव सिंह भाटी व राव कदम सिंह व चौधरी शाहमल सिंह के साथ सम्मिलित हो गये। ंं
श्री तोता सिंह कसाना जी का जन्म प्रातः 5 बजे सन् 1802,दिन बृहस्पतिवार को चौधरी रणजीत सिंह कसाना व माता श्रीमती महकारो देवी के यहां लोनी तहसील के गांव महमूद पुर जो वर्तमान में जिला गाजियाबाद मे आता है, में हुआ था।
सन् 1857 की क्रांति के समय तोता सिंह कसाना की आयु 52 वर्ष थी।एक अच्छै मिलनसार परिवार में पैदा होने के कारण अपने आसपास कै गांवों में उनका बडा सम्मान था।
10 मई सन् 1857 को जब मेरठ से क्रांति की शुरुआत हुई तथा दिल्ली के मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को भारत का सम्राट घोषित कर दिया गया।तब क्षेत्र की व्यवस्था बनाने के लिए बहादुर शाह जफर ने 26 मई को यमुना के पास के क्षेत्र बडोत-बागपत का सूबेदार बडोत के पास स्थित बिजरोल गांव के चौधरी शाहमल सिंह को बना दिया था। यमुना नदी पर नावों का पुल बना हुआ था। अंग्रेजों की मदद के लिए अम्बाला छावनी से सैनिक मदद इसी पुल से आई तथा हिंडन के तट पर भारतीयों और अंग्रेजों के मध्य 30- 31 मई सन् 1857  को घमासान युद्ध हुआ।इस युद्ध में बुलंदशहर और अलीगढ़ के  सूबेदार माला गढ़ के वलीदाद खां के साथ गुठावली के इंद्र सिंह राठी व कटहडा दादरी के राव रोशन सिंह भाटी अपने सहयोगियों के साथ अंग्रेजों से लड़ें।
दादरी के राव रोशन सिंह भाटी के युद्ध में सहभागी हो जाने कै कारण इस क्षेत्र के आसपास बसे गुर्जर जाति के किसान भी अपने नेता कै साथ सम्मिलित हो गये। जिनमें एक तोता सिंह कसाना भी थे।राव रोशन सिंह व उनके छोटे भाई भगवान सिंह इस युद्ध में उन हजारों भारतियों के साथ शहीद हो गए,ऐसा अनुमान है। क्योकि इस तारिख के बाद राव रोशन सिंह व भगवान सिंह की गतिविधी का कही कोई जिक्र नहीं आता। परंतु राव रोशन सिंह के भतीजे राव उमराव सिंह भाटी ने 31 मई को सिकंदराबाद के अंग्रेज परस्त व्यक्तियों पर, करीब 20000 साथियों के साथ हमला कर दिया था।इस हमले में सैकड़ों अंग्रेज  परस्त मारे गए थे।
श्री तोता सिंह कसाना भी हिंडन नदी के किनारे हुए इस युद्ध में बलिदान हो गये।
उनके बलिदान के बाद जब शांति स्थापित हुई,तभी से श्री तोता सिंह कसाना जी के वंशज,उनको स्मरण करते आ रहे हैं।आज के समय में जब उनके वंशज गांव महमूद पुर से निकल कर बाहर शहर में निवास करने लगे हैं। लेकिन श्री तोता सिंह कसाना जी का स्मरण वो करते रहे हैं।
श्री तोता सिंह कसाना के एक वंशज श्री नेपाल सिंह कसाना जी मेरे (अशोक चौधरी) भी सम्पर्क में हैं।भारत सरकार के सांस्कृतिक मंत्रालय की ओर से सन् 1857 से लेकर सन् 1947 तक के सभी बलिदानियों को स्मरण करने के लिए उनके गांवों में कार्यक्रम करने की योजना बनी।उसी योजना के अंतर्गत मेरठ प्रांत के अंदर कार्यक्रम करने के लिए क्रांति तीर्थ समिति के नाम से एक टोली का गठन हुआ। जिसमें मेरठ के गढ़ रोड पर स्थित गांव माछरा के अश्वनी त्यागी जी इस समिति के संयोजक बने। में इस समिति के संरक्षक मंडल में था। आईआईएमटी कालेज मेरठ के मैनेजर श्री मयंक अग्रवाल जी बुलंदशहर व गोतम बुद्ध नगर के संयोजक बने।इस टोली के द्वारा मेरठ प्रांत में विभिन्न क्रांतिकारियों के गांवो में कार्यक्रम कर, बलिदानियों के वंशजों को सम्मानित किया गया।
नोएडा में श्री तोता सिंह कसाना के वंशज श्री नेपाल सिंह कसाना जी निवास करते हैं। अतः श्री तोता सिंह कसाना जी की स्मृति में एक कार्यक्रम 26 अगस्त सन् 2023 को नोएडा में किया गया, जिसमें पूर्व मंत्री श्री नबाब सिंह नागर जी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहें तथा मुझे मुख्य वक्ता के रूप में रहने का अवसर प्राप्त हुआ। समिति की ओर से श्री नेपाल सिंह कसाना तथा अन्य वंशजों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
समाप्त।





रविवार, 21 जनवरी 2024

22 जनवरी भगवान राम जी की अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा पर विशेष - लेखक अशोक चौधरी मेरठ।

सम्पूर्ण भारत वर्ष में गजब का हर्षोल्लास भगवान राम के मंदिर अयोध्या में बनने को लेकर छाया हुआ है।भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने 22 जनवरी को भगवान राम की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर सहभागिता की हैं।यह प्रसन्नता कितने लम्बे संघर्ष के बाद प्राप्त हो रही है।इस ओर बरबस ही ध्यान चला जाता है।
दुनिया में शायद ही कोई दूसरा देश हो,जिस देश के बहुसंख्यक समुदाय को अपने ईष्ट देव को स्थापित करने कै लिए इतना लम्बा संघर्ष करना पड़ा हो।
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण करने के लिए हिंदूओं द्वारा जो संघर्ष किया गया,उसको दो भागो मे बांटा जा सकता है।पहला भाग सन् 1947 तक  तथा दूसरा भाग भारत के आजाद होने के बाद सन् 1947 से 22 जनवरी सन् 2024 तक।
          ऐसी भारतीय सनातन समाज में मान्यता है कि भगवान राम के सरयू नदी में जल समाधि लेने के बाद, उनके बडे पुत्र महाराज लव ने भगवान राम का मंदिर अयोध्या में बनवाया था,उस समय दुनिया में सनातन धर्म के अलावा कोई दूसरा पंथ नही था,लोग छोटे छोटे कबीलों में रहते थे, उनके अपने अपने देवता थे, व्यक्तिगत पूजा पद्धति अलग थी, इसलिए उस युग में व्यक्ति की समाज में जिम्मेदारी को ही धर्म कहा गया।पिता के प्रति पुत्र का कर्तव्य,राजा का जनता के प्रति कर्तव्य,एक योद्धा का अपने पक्ष के लिए कर्तव्य ही धर्म कहलाता था।
कुरुक्षेत्र के मैदान में जब अर्जुन एक योद्धा के कर्तव्य से पीछे हटने लगा था,तब भगवान कृष्ण ने गीता का उपदेश देकर अर्जुन को अपने क्षत्रिय धर्म/कर्तव्य का बोध कराया था, जो आज तक मानव का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।
उस समय का समाज संघर्षों से भरा समाज था, इसलिए हमारे आदर्श भगवान भी एक योद्धा के रूप में हैं।
आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व जब वेद लिखे गए,तब यह धारणा हमारे श्रृषि मुनियों ने दी कि ईश्वर एक ही हैं,वह निराकार है,जो अनेक देवी देवताओं के रुप में साकार हमने बना रखा है,यह ईश्वर तक पहुंचने का माध्यम है।
तभी महात्मा बुद्ध, भगवान महावीर तथा पश्चिम में ईसा मसीह,आगे चलकर हजरत मोहम्मद साहब के द्वारा जो विचार दिए गए, मनुष्य ने उनको अंगीकार कर जीवन जीने का प्रयास किया।
अब से दो हजार वर्ष पूर्व महाराजा विक्रमादित्य ने अयोध्या में लव के बनाये हुए भगवान राम के मंदिर का जीर्णोद्धार कर एक भव्य मंदिर का निर्माण किया। ऐसी मान्यता भारतीय जनमानस में रही है।
पश्चिम मैं इस्लाम व ईसाई धर्म को राज्य धर्म घोषित कर उनके अनुयायियों ने अपने अपने धर्म का विस्तार किया तथा भारत में सम्राट अशोक तथा आगे चलकर सम्राट कनिष्क ने बुद्ध धर्म को राज्य धर्म घोषित कर अपने धर्म का विस्तार किया।एक समय बौद्ध धर्म संसार का विशाल धर्म बन गया था। परंतु ईसाई और इस्लाम की आक्रामकता के सामने वह धाराशाई हो गया।
भारत में जब सन् 712 में मुहम्मद बिन कासिम का आक्रमण राजा दाहिर पर हुआ,तब ही से भारत में जबरदस्ती धर्म थोपने के विरोध में सनातन धर्म के मानने वालों ने इसका प्रत्युत्तर दिया। इसलिए सन् 735 से लेकर सन् 1000 तक भारत के गुर्जर- प्रतिहार वंश के नेतृत्व में भारतियों ने इस्लाम की आक्रामकता को कुंद कर दिया। गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज के समय सुलेमान नामक एक अरबी यात्री भारत आया था, उसने सम्राट मिहिर भोज को इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु लिखा है।
सम्राट मिहिर भोज (सन् 836-885) की ग्वालियर प्रशस्ती में प्रतिहार वंश के राजाओं को राम जी के भाई लक्ष्मण का वंशज बताया गया है। गुर्जर प्रतिहार वंश के राजा भगवान विष्णु के अवतार वराह के उपासक थे। इसलिए इनके सिक्कों पर भगवान वराह का चित्र अंकित है।
सम्राट मिहिर भोज के दरबारी विद्वान राजशेखर जो मिहिरभोज के पुत्र महेन्द्र पाल (सन् 885-910) के गुरू थे, ने महेंद्र पाल को रघुग्रामिणी और रघुवंश तिलक कहा है।
राजशेखर ने ही महेंद्र पाल के पुत्र महीपाल को रघुवंश मुकुट मणि कहा है।
 धार्मिक आधार पर आदि शंकराचार्य जी का जन्म भी आठवीं शताब्दी में इसी कालखंड में हुआ।आदि शंकराचार्य जी ने भारत में चार मठ बनाये, उन्होंने साधुओं मे सैन्यपथ का मार्ग प्रशस्त किया तथा साधुओं के अनेक अखाडे बनाये।इन अखाड़ों में एक अखाडा नागा साधुओं का था,नागा शब्द का अर्थ ही गुजरात में लडाका है।इन नागा साधुओं ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए अतुलनीय बलिदान दिये।
इस समय जब भारत में नागा साधु हथियार उठाये हुए थे,उसी समय ग्यारहवीं शताब्दी में इस्लाम के खलीफा के सामने एक मुल्ला ने भारत में इस्लाम को फैलाने के लिए सूफि मत को बनाने का प्रस्ताव रखा। क्योंकि शक्ति के बल पर इस्लाम का रास्ता भारत में असफल हो गया था।मुल्ला के इस प्रस्ताव पर खलीफा आग बबूला हो गया तथा उस मुल्ला को फांसी पर चढा दिया, परन्तु कुछ समय बाद खलीफा को सूफि मत की बात को स्वीकारोक्ति देनी पडी। भारत में साधुओ का बडा सम्मान था,अत ये सूफि भारतीय साधुओं की तरह ही मठ में रहते थे, इनके मठो को मुस्लिम खानगाह कहते थे। भारतीय साधुओं की तरह के कपड़े तथा भजनो की तरह का गाना भी ये सूफि गाते थे।जब महमूद गजनवी ने भारत पर हमले प्रारंभ किए,तब सूफि उसकी सेना के साथ चलते थे। अतः गजनवी ने जब लाहौर पर अधिकार कर लिया तब लाहोर मे सूफि का पहला खानगाह/मठ बना।जब मोहम्मद गौरी ने भारत पर हमला किया तब मोहिद्दीन चिश्ती नाम का एक सूफि उसके साथ था, सन् 1192 में तराईन के द्वीतिय युद्ध में मोहम्मद गौरी की विजय के पश्चात मोहिनूद्दीन चिश्ती ने अजमेर में अपना खानगाह/मठ बनाया।इस मोहम्मद गौरी के छोटे भाई मकदूम शाह जुरान गोरी ने ही सबसे पहले अयोध्या पर हमला किया,वह राम मंदिर को तो क्षति नही पहुचा पाया, परन्तु आदिनाथ भगवान के जैन मंदिर को तोड़ने में सफल हो गया।यह अयोध्या पर किसी मुस्लिम का पहला हमला था। परन्तु गहडवाल नरेश जयचंद के सेनापति बारुथ ने मोहम्मद गोरी के छोटे भाई को घेरकर युद्ध में सेना सहित मार डाला। सन् 1194 में राजा जयचंद मोहम्मद गोरी के साथ युद्ध में लड़ते हुए बलिदान हो गये।
सन् 1226 में सुल्तान इल्तुतमिश ने मलिक नसरुद्दीन को अयोध्या पर हमला करने के लिए भेजा।बारुथ ने मुस्लिम सेना का रास्ता रोक लिया।इस युद्ध में वीर बारुथ का बलिदान हो गया। भगवान राम का मंदिर सुरक्षित रहा।बारुथ के इस संघर्ष का जिक्र नागोर से मिले महासामंत वराह देव के नाम के शिलालेख में है।
इन हमलों का जिक्र उसी समय के मुस्लिम ग्रंथ तबाकत-ए- नासिरी में है।
यह वह समय था जब मुस्लिम भारत की राजसत्ता का अधिग्रहण कर रहे थे तथा भारतीय अपनी सामर्थ्य अनुसार उसका प्रतिकार कर रहे थे।आगे चलकर बाबर ने भारत में मुगल वंश की स्थापना की।
बाबरनामा जो बाबर की जीवनी है तथा हुमायूं की बेटी गुलबदन द्वारा रचित हुमायूं नामा
 में अयोध्या में हुएं किसी युद्ध या निर्माण का संकेत नही है। अकबर के दरबारी अबुल फजल के द्वारा लिखित आईने अकबरी नामक पुस्तक में अयोध्या के रामकोट जन्म स्थान पर मेले का वर्णन है। परंतु किसी मस्जिद का जिक्र नहीं है।
यूरोपियन यात्री फिंच,जो मुगल बादशाह जहांगीर के काल में अयोध्या आया था,के द्वारा अयोध्या में जन्म स्थान व स्थानीय पंडो द्वारा श्रधालुओं का विवरण लिखा है।
तुलसीदास जी ने रामचरित मानस की रचना अयोध्या में राम मंदिर में बैठकर की थी, उन्होंने भी वहा किसी मस्जिद का जिक्र नहीं किया।
सन् 1660 में मनूकी नामक एक इतावली व्यक्ति भारत आया था।वह औरंगजेब की सेना में सैनिक अधिकारी बन गया। उसने एक पुस्तक लिखी जिसका नाम "हिस्टोरिया आफ मुगल/मुगल का इतिहास" था।इस पुस्तक में औरंगजेब के आदेश पर उज्जैन, मथुरा,काशी, हरिद्वार व अयोध्या के प्रमुखतम मंदिरों का ध्वंस लिखा है।साथ मे यह भी लिखा है कि अयोध्या में विध्वंस मंदिर वाले स्थान पर हिंदू फिर से अधिकार कर पूजा पाठ करने लगे हैं।
 सन् 1722 में मुगल बादशाह अहमद शाह रंगीला ने अयोध्या के बैरागियों को पूजा स्थल बनाने के लिए एक जगह अधिकृत की,जिस जगह पर हिंदू संतों ने हनुमान गढी के नाम से एक चबूतरा बना लिया तथा बाबरी मस्जिद के अहाते के भीतर भी कुछ पूजा करने के लिए निर्माण कर लिया।ये साधू यदि कोई मुस्लिम इस मस्जिद मे जाता तो उसको पीटकर भगा देते थे। सन् 1754 में मराठा मुगल सत्ता के केयर टेकर बन गए थे। 
सन् 1770 में आस्ट्रियन पादरी द्वारा लिखित पुस्तक में 3 गुम्बद वाले स्थान की परिक्रमा करते हुए हिंदुओं का वर्णन है।पादरी ने मध्य गुम्बद के नीचे हिंदुओं के श्रद्धा केंद्र के रूप में एक वेदी का उल्लेख किया है।इस पादरी की पुस्तक में प्रथम बार मस्जिद की संरचना का संकेत प्राप्त हुआ है।
सन् 1803 में मराठो को हराकर अंग्रेज मुगल सत्ता के केयर टेकर बन गए।
सन् 1828 के ब्रिटिश गजट में भी रामकोट में मंदिर का उल्लेख है।
 सन् 1855 में अमेठी के एक मुल्ला अमीर अली ने कहा कि हनुमान गढी मस्जिद को तोडकर बनाई गई है।इस आरोप की जब जांच हुई,तब यह आरोप झूठा पाया गया, सन् 1722 का मुगल बादशाह का जमीन देने का शाही फरमान दिखा दिया गया। परंतु मुस्लिम पक्ष अपनी हठधरमी पर अडा रहा,जिसके फलस्वरूप हिंदू मुस्लिम दंगा हो गया।इस दंगे में 11 हिंदू और 75 मुस्लिम मारे गए।मुल्ला अमीर अली ने जेहाद घोषित कर हिंदुओं पर हमला करने की घोषणा कर दी। अंग्रेज अधिकारी ने अवध के नबाब को कहा कि या तो वह मुस्लिमों को रोके वर्ना अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहें। मुस्लिम, नबाब वाजिद अली शाह से तो नही रुके। परंतु अंग्रेजों की सेना ने उनको रोक दिया,इस संघर्ष में करीब 400 मुस्लिम मारे गए। अंग्रेजों ने नबाब वाजिद अली शाह को गिरफ्तार कर कलकत्ता में नज़र बंद कर दिया।नबाब के अल्पव्यस्क पुत्र को गद्दी पर बैठा दिया तथा उसकी माता बेगम हजरत महल को रियासत का संरक्षक बना दिया।
कुछ समय बाद सन् 1857 की क्रांति हो गई।
सन् 1858 के गजट में पहली बार बाबरी मस्जिद का उल्लेख किया गया है।
सन् 1859 में अंग्रेजों ने विवादित स्थल को हिंदू और मुस्लिम के लिए दो भागों मे विभक्त कर दिया।इसी बीच निहंग सिक्ख, पंजाब के निहंगो ने अपने ब्रह्मा (राम)का स्थान बताकर बलपूर्वक इस स्थान को अपने कब्जे में ले लिया।उस समय के दरोगा शीतल दूबे द्वारा लिखित एफआईआर में यह घटना दर्ज है।
 समय सन् 1902 में प्रिंस आफ वेल्स के रुप में एडवर्ड के भारत आने के कारण धनसग्रह का कार्यक्रम तत्कालीन शासनतंत्र द्वारा चलाया गया। परंतु किसी कारणवश प्रिंस का दौरा निरस्त हो गया।तब अयोध्या के तत्कालीन कलेक्टर जिनका नाम भी एडवर्ड था,ने उसी धन से एक तीर्थ अन्वेषणी सभा का गठन कर स्कन्द-पुराण आदि के आधार पर अयोध्या में जगह-जगह कुल 158 पत्थर लगाये। जिसमें एक नम्बर का पत्थर (खम्भा) जन्म स्थली पर लगाया।
इन्हीं पर शोध कर लेखक हान्स बेकर ने पुस्तक लिखी, जिसमें इन 158 खम्भो का मानचित्र भी था।
इसी तरह छिटपुट संघर्ष चलता रहा। परंतु सन् 1934 में पुनः हिन्दू मुस्लिम दंगा अयोध्या में हुआ। हिंदूओं ने बाबरी मस्जिद के तीनों गुम्बद क्षतिग्रस्त कर दिए। अंग्रेजों ने हिंदूओं से हर्जाना वसूल कर एक मुस्लिम ठेकेदार तसव्वुर खान के द्वारा पुनः गुम्बद बनवा दिये गये।
औरंगजेब के समय हिन्दू मान्यताओं पर अत्यधिक चोट हुई थी,आदि शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित चार मठों में से जगन्नाथ पुरी के मठ को छोड़कर बाकि तीन मठों का कार्य अवरुद्ध हो गया था।लगभग 300 वर्ष बाद सन् 1941 में एक महान संत श्री करपात्री जी महाराज जो काशी में रहते थे, ने पुनः अवरुद्ध चल रहें तीनों मठों को संचालित कर शंकराचार्य नियुक्त कर दिए थे।
बलरामपुर के राजा पटेश्वरी प्रसाद करपात्री महाराज के शिष्य थे।
धीरे-धीरे सन् 1947 आ गया।15 अगस्त सन् 1947 को देश आजाद हो गया।भारत में अंतरिम सरकार बनी हुई थी।भारत का विभाजन होकर पाकिस्तान बन चुका था।भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे तथा गृहमंत्री सरदार पटेल थे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पंत थे तथा गृहमंत्री लालबहादुर शास्त्री थे।
आजादी के बाद एक घटना घटी, सोशलिस्ट नेता आचार्य नरेन्द्र मोहन सहित 11 विधायकों ने उत्तर प्रदेश विधानसभा से स्तिफा दे दिया था। जून-जुलाई सन् 1948 में इन सीटों पर चुनाव होना था। अयोध्या उस समय फैजाबाद विधानसभा के अन्तर्गत आती थी। नरेंद्र मोहन फैजाबाद से उपचुनाव में खड़े थे। कांग्रेस ने एक रामभक्त संत बाबा राघवदास को नरेंद्र मोहन के सामने खडा कर दिया तथा वह संत चुनाव में जीतकर विधायक बन गए।
इस प्रकार अयोध्या में रामभक्त विधायक संत बाबा राघवदास,महंत दिग्विजय नाथ (गोरखपुर पीठ, हिन्दू महासभा), निर्मोही अखाड़ा के बाबा अभिराम दास, रामचंद्र दास (दिगम्बर अखाडा, अयोध्या के हिंदू महासभा के शहर अध्यक्ष),गीता प्रेस के संस्थापक श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (हिन्दू महासभा)एक साथ आ गये।
ऐसा बताया जाता है कि करपात्री जी महाराज ने अपने शिष्य बलरामपुर के राजा साहब के यहा एक यज्ञ किया था, जिसमें सरकारी अधिकारी श्री केकेके नायर भी सम्मिलित हुए थे।महाराज जी ने इस यज्ञ में सम्मिलित सभी लोगों से भगवान राम को अपने गर्भ ग्रह में स्थापित करने का वचन लिया था।
22-23 दिसम्बर सन् 1949 की रात को सरयू नदी के तट पर साधु अभिराम दास जी के साथ महंत दिग्विजय नाथ सहित पांच व्यक्तियों ने स्नान कर भगवान श्री राम की मूर्ति रात में जन्म स्थान पर रख दी।उस समय रामचबूतरा पर यज्ञ चल रहा था, रामचरितमानस का पाठ चल रहा था। पुलिस के 12 सिपाही ड्यूटी पर थे,एक सिपाही जिसका नाम शेर सिंह था जाग कर विवादित स्थल की निगरानी कर रहा था। शेर सिंह सिपाही,अभि राम दास जी से बहुत प्रभावित था,रात के बारह बजे तक शेर सिंह की ड्यूटी थी,रात 12 बजे के बाद एक मुस्लिम सिपाही की ड्यूटी थी।जब सिपाही शेर सिंह ने साधु अभिराम दास को अन्य रामभक्त के साथ आते देखा तो उसने नही रोका। अभिराम दास जी दीवार कूद कर जाने लगे। सिपाही शेर सिंह ने विवादित स्थल के गेट का ताला खोल दिया।अब साधु अभिराम दास जी मूर्ति लेकर अंदर चले गए तथा मूर्ति स्थापित कर दी गई। 
मस्जिद की रखवाली  मोहम्मद इस्माइल नाम का एक व्यक्ति करता था।साधु अभिराम दास जी ने इसको पीट कर भगा दिया।
सिपाही शेर सिंह अपनी ड्यूटी समाप्त होने के बाद उस ड्यूटी देने वाले मुस्लिम सिपाही अब्दुल बरकत को जगाता था, परंतु उस दिन सिपाही शेर सिंह 12 बजे के स्थान पर एक बजे तक ड्यूटी पर रहा।एक बजे सिपाही शेर सिंह ने मुस्लिम सिपाही को जाकर उठाया।जब वह सिपाही ड्यूटी पर पहुंचा तो उस समय राम लला की चांदी की मूर्ति चमक रही थी। सिपाही ने शोर मचाया।रामलला प्रकट हो चुकै थे। सिपाही ने मूर्ति स्थापित करते किसी को नही देखा था।सब जगह शौर मच गया।लोग परिसर में एकत्रित होनै लगे। कलेक्टर के के के नायर व सिटी मजिस्ट्रेट गुरूदत्त सिंह ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को तब तक सूचना नही दी,जब तक परिसर में 15000 के करीब लोग इकट्ठे नही हुए।
भारत के गृहमंत्रालय ने प्रदेश को आदेशित किया कि मूर्ति हटा दी जाय। प्रदेश के गृहमंत्रालय ने कलेक्टर नायर को आदेश दिया कि मूर्ति हटा दी जाय। परंतु नायर साहब व गुरुदत्त सिंह ने रिपोर्ट भेज दी कि मूर्ति हटाना सम्भव नही है,खून खराबा हो सकता है। सरकार चाहै तो उनको बर्खास्त कर दे।
16 जनवरी सन् 1950 को गोपाल जी विषारद ने पूजा करने की अनुमति के लिए अदालत में केस डाल दिया।न्यायालय के आदेश पर जहां मूर्ति रखी थी, उसके चारो ओर लोहे का जाल लगाकर ताला लगा दिया गया,चार पुजारी रोज राम लला की पूजा करते रहने की अनुमति भी न्यायलय ने दे दी। मुकदमे चलने शुरू हो गये।
22 जनवरी सन् 1950 को राम जन्म भूमि सेवा समिति के नाम से एक संस्था का रजिस्ट्रेशन कराया गया। जिसमें यह लिखा था कि हम इस स्थल को राम जन्म भूमि मानते हैं।
सन् 1952 में जनसंघ बना।जनसंघ पार्टी से फैजाबाद के कलेक्टर रहें श्री नायर व उनकी पत्नी तथा सिटी मजिस्ट्रेट रहें गुरूदत्त सिंह सांसद व विधायक बने।
सन् 1964 में विश्व हिन्दू परिषद का गठन किया गया।
राम जन्म भूमि सेवा समिति के तत्वावधान में ही सन् 1949 से प्रत्येक वर्ष सन् 1983 तक 23 दिसंबर को भगवान राम का प्रकट उत्सव मनाया जाता रहा। 
सन् 1980 में सत्ता में आने के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी जी का झुकाव हिंदू पक्ष की ओर हो गया था।इसी दौर में वीर सावरकर पर एक डाक टिकट जारी किया गया। श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने खुलकर कहा कि बहुसंख्यक समुदाय की कीमत पर अल्पसंख्यकों को नही बढाया जा सकता।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अप्रत्यक्ष रूप से राम मंदिर का प्रारंभ से ही समर्थन कर रहा था। परंतु सन् 1980 मे राम मंदिर निर्माण को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने प्रत्यक्ष रूप से अपने एजेंडे में शामिल कर लिया।
कश्मीर के राजा हरि सिंह के पुत्र कर्ण सिंह जी के द्वारा विराट हिन्दू समागम के नाम से कार्यक्रम कराया गया।
20 अप्रैल सन् 1983 को राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह अयोध्या पधारे। उन्होंने अयोध्या देखने की इच्छा व्यक्त की। हनुमान टीला में चल रहे कार्यक्रम में भाग लिया तथा सरकारी अधिकारियों से गर्भ ग्रह में रखी भगवान राम की मूर्ति के दर्शन करने की इच्छा व्यक्त की। विवादित जगह होने के कारण सरकारी अधिकारी राष्ट्रपति जी को मूर्ति के दर्शन कराने तो नही ले गये। परंतु कनक भवन में हो रहें कार्यक्रम में राष्ट्रपति जी को ले गये।यह रामनवमी का दिन था।
मई सन् 1983 में मुरादाबाद से एक कांग्रेस के विधायक श्री दाऊदयाल खन्ना जी ने मुज्जफर नगर में हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया।इन्ही दाऊदयाल खन्ना जी ने सबसे पहले अयोध्या, मथुरा काशी को मुक्त कराने का प्रस्ताव श्रीमती इंदिरा गांधी जी को दिया। 
भारत माता मंदिर हरिद्वार के महंत सत्यमित्रानंद गिरी जी भी अयोध्या आये। वो भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी के निकट थे। उनके माध्यम से विहिप का एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री जी से मिला। प्रधानमंत्री जी ने कहा कि लोकतंत्र में बिना आंदोलन के कोई मांग पूरी नहीं होती।इस प्रतिनिधिमंडल को नवम्बर को पुनः बुलाया गया।
 सन् 1983 के प्रकट उत्सव कार्यक्रम में मोहम्मद अब्दुल हनीफ नामक एक मुस्लिम नेता पहुंचे।पहली बार गुम्बद पर लाल पताका फहराई गई।प्रकट उत्सव के कार्यक्रम से पूर्व अयोध्या में एक झांकी निकाली गई।इस समय केंद्र और राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। श्रीमती इंदिरा गांधी जी प्रधानमंत्री थी तथा श्रीपति मिश्र मुख्यमंत्री थे।
सन् 1984 में विहिप ने राम मंदिर निर्माण को अपने एजेंडे में शामिल कर लिया था। 24 सितंबर सन् 1984 से विहिप के द्वारा राम रथ यात्रा निकाली गई। 2 दिसंबर को हिंदू सम्मेलन होना था, परंतु 31 अक्टूबर सन् 1984 को इंदिरा गांधी जी की हत्या हो गई।
आगे चलकर 18 दिसंबर सन् 1985 को विहिप के द्वारा राम जन्म भूमि न्यास का गठन किया गया।
 प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय ताला खुलने का आदेश कोर्ट ने 1 फरवरी सन् 1986 को दिया।इसी समयांतराल में दूरदर्शन पर रामायण का प्रसारण किया गया। फ़रवरी सन् 1989 में तिसरी धर्म संसद का आयोजन विहिप द्वारा किया गया,इस आयोजन में संत देवराह बाबा भी पधारें।देवराह बाबा राजीव गांधी जी के अति निकट थे।इस सम्मेलन में यह तय हुआ कि 9 नवम्बर सन् 1989 को अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास किया जायेगा। मन्दिर नागर शैली में बनेगा तथा अनुमानित लागत 25 करोड़ रुपए होगी।5 नवम्बर सन् 1989 तक शिला पूजन कर,शिलाए अयोध्या में पहुंच जायेगी।
 जून सन् 1989 में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हिमाचल प्रदेश के पालम पुर स्थान पर हुई।इस बैठक में राम मंदिर निर्माण को भाजपा के घोषणा-पत्र में शामिल किया गया।
मन्दिर का शिलान्यास चुनाव के दोरान हो, ऐसा सोचकर राजीव गांधी जी ने चुनाव तय समय से पहले नवम्बर के अंत में कराने का निर्णय लिया।3 नवम्बर सन् 1989 को राजीव गांधी जी ने रामराज्य स्थापित करने का नारा देकर अपने चुनावी प्रचार को प्रारंभ किया। विहिप व प्रदेश सरकार के मध्य यह समझोता हुआ कि शिलान्यास विवादित स्थल से बाहर होगा।इस कारण शिलान्यास गर्भ ग्रह को छोड़कर, उससे 192 फुट दूर सिंह द्वार पर होना निश्चित किया गया।
13 अक्टूबर सन् 1989 को विहिप व कांग्रेस को छोड़कर सभी राजनीतिक दलों ने शिलान्यास का विरोध कर दिया।
जैसे ही यह समाचार फैला,बाबरी एक्शन कमेटी के सदस्य आजम खान ने एक रिट याचिका कोर्ट में डाल दी कि जो जगह शिलान्यास के लिए निश्चित हुई है,उस स्थान पर मुस्लिमो का कब्रिस्तान है। जबकि वह स्थान अयोध्या नगर पालिका में प्लाट नम्बर 576 , धर्म दास के नाम से दर्ज था,जिसे विहिप ने धर्म दास जी से क्रय कर लिया था।
कहने का तात्पर्य यह है कि जगह को जानबूझकर विवादित बना दिया गया। प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री नारायण दत्त तिवारी जी ने विहिप से स्थान बदलने का आग्रह किया। परंतु विहिप ने उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया।अब देवराह बाबा जी को बीच में आना पडा।
5 नवम्बर तक विहिप द्वारा 3 लाख 16 हजार गांवों में शिलापूजन कर शिलाए अयोध्या पहुचा दी गई।
6 नवम्बर सन् 1989 को राजीव गांधी जी वृंदावन में देवराह बाबा से मिलने गये।देवराह बाबा ने राजीव गांधी जी से शिलान्यास तय स्थान पर ही कराने का वचन प्राप्त कर लिया। राजीव गांधी जी की ओर से मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी जी को शिलान्यास तय स्थान पर कराने का निर्देश प्राप्त हुआ। मुख्यमंत्री जी ने जिलाधिकारी फैजाबाद को निर्देश दिया कि शिलान्यास कराने की व्यवस्था किजिए। जिलाधिकारी जी ने शिलान्यास स्थल का नक्शा बनाकर जज साहब के सामने पेश कर दिया,जिसमे शिलान्यास विवादित स्थल से बाहर चिंहित दर्शा रखा था। शिलान्यास के समय सरकार की ओर से गृहमंत्री बूटा सिंह तथा विहिप की ओर से श्रीचंद दिक्षित व बद्री प्रसाद जी सपत्नि उपस्थित रहें। शिलान्यास के समय 8 लाख लोग उपस्थित थे।
शिलान्यास होने के बाद मुस्लिम पक्ष ने यह कहकर विरोध करना प्रारंभ कर दिया कि प्रदेश सरकार के अधिकारियों ने न्यायाधीश के समक्ष विवादित स्थल से बाहर का नक्शा दिखा कर, शिलान्यास विवादित स्थल पर करा दिया है।
इस पर कांग्रेस पार्टी व सरकार बेकफुट पर आ गई। भाजपा व संघ परिवार खुलकर हिन्दू पक्ष में आ गया।
चुनाव में कांग्रेस हार गई। केंद्र में वीपी सिंह जी प्रधानमंत्री बने। मुलायम सिंह यादव जी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने बाबरी एक्शन कमेटी में सक्रिय रहें आजम खां,,शफीकुररहमान  तथा जफर इलानी को सरकार का हिस्सा बना लिया। वीपी सिंह ने विवादित जमीन के लिए अध्यादेश बनाया, परंतु मुलायम सिंह ने उसको लागू नही होने दिया।
27-28 जनवरी सन् 1990 को विहिप ने कार सेवा की घोषणा कर दी। वीपी सिंह ने विहिप से समय की मोहलत मांगी। विहिप ने 4 माह का समय दे दिया। वीपी सिंह ने इस विवाद के हल के लिए मधु दंडवते, जार्ज फर्नांडिस तथा मुख्तार अनीस को कमेटी बनाकर जिम्मेदारी दी।इस कमेटी में मुलायम सिंह यादव का नाम ना होने के कारण वो वीपी सिंह से नाराज़ हो गये।इस समय मुफ्ती मोहम्मद सईद गृहमंत्री थे।
विहिप के नेताओं का कहना था कि यह आस्था का विषय है, इसमें कोर्ट को लाना उचित नहीं है,बाबरी एक्शन कमेटी के नेता कह रहे थे कि हम वो मानेंगे,जो कोर्ट निर्णय देगा।
वीपी सिंह ने मुस्लिम पक्ष से बात की ,जिसमे मुस्लिम पक्ष को सहनवा गांव में मस्जिद के लिए जगह देने का वादा कर मना लिया गया।
वीपी सिंह सरकार ने राजीव गांधी जी के समय हुए शिलान्यास को मानने से मना कर दिया।उनका कहना था कि यह विवादित स्थल पर हुआ है।वी पी सिंह ने गर्भ ग्रह से दूर निर्माण करने के लिए विहिप को प्रस्ताव दिया। पहले तो विहिप ने इसका विरोध किया, परंतु बाद में जहा शिलान्यास हुआ था, वहां कार सेवा के लिए विहिप सहमत हो गई।
अब विहिप ने 9 अप्रैल से 13 दिन की यात्रा करने की घोषणा कर दी।
विहिप ने हरिद्वार में मिटिंग कर 30 अक्टूबर से कार सेवा की घोषणा कर दी।
शंकराचार्य श्री स्वरुपानंद जी ने भी यह कहकर इस शिलान्यास का विरोध किया कि शिलान्यास गर्भ ग्रह पर क्यों नहीं किया गया? वह चार ईट लेकर गर्भ ग्रह पर शिलान्यास करने के लिए चल पड़े।30 अप्रैल सन् 1990 को शंकराचार्य जी को मुलायम सिंह यादव जी की सरकार ने आजमगढ़ में गिरफ्तार कर चुनार के किले में नजरबंद कर दिया।जहा शंकराचार्य जी 9 दिन तक रहें।
राम जन्म भूमि के पुजारी लाल दास को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
आडवाणी जी ने 12 सितंबर 1990 को यात्रा की घोषणा की ।  रथ यात्रा 25 सितंबर 1990 को शुरू हुई ।
18 अक्टूबर को एक मिटिंग हुई। वीपी सिंह एक अध्यादेश लाने के लिए राजी हो गए। गर्भ ग्रह को छोड़कर बाकी पूरी जमीन विहिप ने मंदिर के लिए मांगी। अध्यादेश का प्रारुप तैयार हो गया।
वीपी सिंह फिर पलट गये,वो शिलान्यास के स्थान से भी दूर कार सेवा करने के लिए कहने लगे।
इस पर विहिप ने कार सेवा को शिलान्यास स्थल से ही करने की घोषणा कर दी।
बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने 23 अक्टूबर सन् 1990 को आडवाणी जी को गिरफ्तार कर लिया।
मुलायम सिंह यादव ने 14 कोसी परिक्रमा पर प्रतिबंध लगा दिया।
अशोक सिंघल व विनय कटियार विहिप की ओर से आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे।कार सेवकों की गिरफ्तारी होने लगी।
30 अक्टूबर को लाखों कार सेवक अयोध्या में प्रकट हो गए।  सीआरपीएफ व पीएसी सरकार की ओर से लगी हुई थी।
29 अक्टूबर को अशोक सिंघल जी अयोध्या पहुंच गए। अयोध्या में अशोक सिंघल और विनय कटियार   के नेतृत्व में कार सेवा प्रारंभ करने का प्रयास किया गया। जिसमें सीआरपीएफ ने सरकार के आदेश पर  गोली चलाकर  11 कारसेवकों को मार डाला। 30 कार सेवकों सहित अशोक सिंघल जी भी घायल हो गए।
एक नवम्बर को 24 वी बटालियन पीएसी के जवानों ने कार सेवा प्रारंभ कर दी।ऐसा होने पर पीएसी को हटा दिया गया।
दो नवम्बर को कार्तिक पूर्णिमा का दिन था। फिर कार सेवा का प्रयास किया गया।इस दिन भी सीआरपीएफ ने गोली चला दी।40 बलिदानी कार सेवकों की सूची विहिप द्वारा बताई गई।एक समाचार पत्र ने मृतक संख्या 45 तथा एक ने 400 बताई।
अगले चुनाव में राज्य में भाजपा की सरकार बनी। कल्याण सिंह जी मुख्यमंत्री बने। केंद्र में कांग्रेस की नरसिंहा राव की सरकार थी। पुनः कार सेवा प्रारंभ हुई। रामभक्तो ने 6 दिसंबर सन् 1992 को विवादित ढांचे को समाप्त कर दिया। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह जी ने स्तीफा दे दिया।भाजपा की तीन प्रदेश में चल रही सरकार को प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने बर्खास्त कर दिया। उत्तर प्रदेश सहित चार सरकार भाजपा की राम काज के लिए बलिदान हो गई।
श्री लालकृष्ण आडवाणी जी,श्री कल्याण सिंह जी,श्री अशोक सिंघल जी,श्री विनय कटियार जी,श्री मुरली मनोहर जोशी जी का विवादित ढांचे को समाप्त करने में बहुत बडा योगदान रहा।
मुकदमा हाई कोर्ट में चला।सन् 2009 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ द्वारा 3 न्यायाधीशों की पीठ (श्री सुधीर अग्रवाल,श्री धर्मवीर शर्मा व रफत आलम) ने सुनवाई प्रारंभ की थी। परन्तु इसी समय न्यायाधीश रफत आलम जी का राजस्थान में स्थानांतरण हो गया। उनके स्थान पर न्यायाधीश सिग्बत उल्ला खां आ गये।
 इसके बाद 24 सितंबर सन् 2010 को लखनऊ पीठ की बेंच ने फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन को तीन हिस्सों सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलाला के बीच बांटा. ये फैसला इन पक्षों का मंजूर नहीं था, फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया गया।
  शंकराचार्य श्री स्वरुपानंद जी के प्रतिनिधि के रूप में वर्तमान शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी तथा शंकराचार्य रामभद्राचार्य जी की गवाही हुई। प्रधानमंत्री वीपी सिंह व चंद्र शेखर जी के समय अयोध्या के ओएसडी रहे अधिकारी कुणाल कुमार की अयोध्या के ऊपर लिखी थिसिस बडी काम आई। शंकराचार्य जी के वकील पी एन मिश्रा जी ने जोरदार बहस की। सुप्रीम कोर्ट में 90 दिन बहस हुई। जिसमें 50 दिन मुस्लिम पक्ष को सुना गया। मुस्लिम पक्ष बाबरी मस्जिद होने का कोई सबूत पेश नही कर पाया।24 दिन शंकराचार्य जी के वकील पी एन मिश्रा ने तथा 16 दिन विहिप के वकील ने हिंदू पक्ष की ओर से बहस की।
परिणाम स्वरूप राम जन्म भूमि का मुकदमा हिंदू पक्ष जीत गया।
साल 2019 में फैसला देने वाली पांच जजों की संविधान पीठ में जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस. ए बोबड़े, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल थे।
विद्वान न्यायधीश ने यह तर्क दिया कि हिंदू पक्ष सही था, परंतु जबरन मूर्ति रखने तथा मस्जिद का ढांचा गिराने के कारण मुस्लिम समाज की भावना आहत हुई हैं। इसलिए पांच एकड़ जमीन मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए दे दी गई।
राम मंदिर बनने का मार्ग साफ हो गया।
जस्टिस रंजन गोगोई ने 19 मार्च 2020 को राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ ली।
5 अगस्त सन् 2020 को रामलला के भव्य मंदिर का शिलान्यास प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के द्वारा किया गया।
देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने ही 22 जनवरी सन् 2024 को मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कर समस्त देशवासियों की इच्छा की पूर्ति कर दी है।
अयोध्या में राम मंदिर दुनिया के सबसे बड़े चार मंदिरों में से एक है।
पहले नंबर पर आता है अंकोर वाट का मंदिर। ये मंदिर कंबोडिया में है और दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है. यह मंदिर 500 एकड़ में फैला हुआ है।
दूसरे नंबर पर है श्री रंगनाथस्वामी मंदिर (Sri Ranganathaswamy Temple)। तमिलनाडु में स्थित यह मंदिर भगवान विष्णू को समर्पित है। यह मंदिर 156 एकड़ में फैला है। इस मंदिर को आप भारत का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर भी कह सकते हैं।
तीसरे नंबर पर है दिल्ली में स्थित अक्षरधाम मंदिर (Akshardham Temple)। यह मंदिर 100 एकड़ में फैला है। 
चौथे नंबर पर है अयोध्या का राम मंदिर।  यह मंदिर 70 एकड़ में फैला है. इस हिसाब से यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा हिंदू मंदिर हैं।
इस लम्बे संघर्ष में संघर्षरत रहें व बलिदान हुए,सभी राम भक्तों को शत् शत् नमन।
समाप्त।

शनिवार, 12 अगस्त 2023

गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज पर मेरठ में कार्यक्रम

30 अगस्त सन् 2022 ,वराह जयंती पर मेरठ में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के प्रांगण मे हुए कार्यक्रम के छायाचित्र , मुख्य वक्ता श्री विरेन्द्र विक्रम सिंह जी तथा मुख्य अतिथि धर्म जागरण मंच के अधिकारी श्री अरुण कान्त जी

शुक्रवार, 11 अगस्त 2023

अंतिम हिन्दू सम्राट, गुर्जर राज- मरू गुर्जर राज पृथ्वीराज चौहान/राय पिथौरा की स्मृति में मेरठ में आयोजित कार्यक्रम

1 मार्च सन 2022व 1 मार्च सन् 2023 

1857 के अमर क्रांतिकारी तथा किला परिक्षत गढ़ के अंतिम राजा राव कदम की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम

9 जुलाई सन् 2023,27 जून 2023 गांव गोहरा,27 जून 2022 गांव लोदीपुर छपका, हापुड़ की जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती रेखा नागर/हूण के माध्यम से मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश को गढ़ गंगा ब्रजघाट के पुल का नाम राव कदम सिंह सेतु करने के लिए दिया गया ज्ञापन