मंगलवार, 1 जून 2021

संविधान का बेसिक स्टरक्चर - अशोक चौधरी मेरठ

24 अप्रैल सन् 1973 का दिन एक मिल का पत्थर है, भारत के संविधान के बेसिक स्टरक्चर के लिए।
24 अप्रैल सन् 1993 को पंचायती राज्य भारत में लागू किया गया।यह दूसरा महत्वपूर्ण निर्णय है जो 24 अप्रैल के दिन को महत्वपूर्ण बनाता है।
संविधान के भाग 3 में  मूल अधिकार राज्य द्वारा दिए गए हैं,जो धारा 12-35 तक है।
संविधान के भाग 4 में निति निदेशक तत्व शामिल हैं जो धारा 36-51 तक है।
संविधान के भाग 20 की धारा 368 में संविधान संशोधन की शक्ति निहित है।
भाग 3 की धारा 13 व 32 के अंतर्गत यदि किसी व्यक्ति का मूल अधिकार प्रभावित होता है तो वह सुप्रीम कोर्ट जा सकता है।
आजादी की लड़ाई में अगड़, पिछड़े, महिला, अनुसूचित जाति व जनजाति सहित सभी लोग शामिल थे। किसानों का आजादी से मतलब था जमींदारो से आजादी,इस कारण राज्य को आर्थिक समानता की कोशिश करनी थी। लेकिन सम्पत्ति का अधिकार मूल अधिकार था।धारा 14-18 तक समानता का अधिकार है, जिसमें धारा 15 के अंदर शिक्षा की समानता का अधिकार है।भाग 4 की धारा 46 में राज्य प्रयास करेगा कि कमजोर वर्गों के शैक्षिक व आर्थिक हितों की पूर्ति के लिए।धारा 25 के अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है।धारा 44 के अंतर्गत यूनिफॉर्म सिविल कोड के लिए राज्य प्रयास करेगा।
भूमि सुधार में चकबंदी तथा जमींदारी प्रथा का उन्मूलन होना प्रमुख कार्य था, किसान का सीधा संबंध राज्य से हो, कोई बीच में ना हो।धारा 39ए व बी आर्थिक समानता तय करती है।कई राज्यों ने शिक्षा क्षेत्र में आरक्षण दे दिया जिसमें मद्रास प्रमुख था।
इन सुधारों के विरोध में लोग सुप्रीम कोर्ट चले गए।
सुप्रिम कोर्ट ने कहा कि शिक्षा में आरक्षण व सम्पत्ति से किसी को बेदखल नहीं किया जा सकता।
नेहरू समाजवादी मानसिकता के थे, सन् 1951 में पहला संविधान संशोधन किया गया धारा 31 में ए और बी क्लाज जोड दी गई,
ए मे यह लिखा गया कि यदि भूमि सुधार के लिए कोई कानून आता है तो धारा 31(1) लागू नही होगी।
बी के तहत 9 वी अनुसूची बनाई गई। कोई भी कानून यदि 9 वी अनुसूची में डाल दिया गया तो सुप्रिम कोर्ट या हाई कोर्ट उसका संज्ञान नही लेगा।
धारा 15 में जो तीन क्लाज थी, उसमें 4 वी क्लाज जोडी गई कि यदि कोई राज्य एस सी,एस टी या अन्य कमजोर वर्ग के लिए कोई लाभ देता है तो उसके विरुद्ध कोई कोर्ट नही जा सकता।
इन सुधारों के विरोध में शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ का एक केस सन् 1951 में सुप्रिम कोर्ट में आया। जिसके अन्तर्गत धारा 13 व धारा 368 के आपस में क्या सम्बन्ध है? पर बहस हुई।
धारा 13 की क्लाज 2 व 3 है,2 में लिखा है कि राज्य कोई ऐसा कानून नहीं बनायेंगे जो फंडामेंटल राइट्स के विरुद्ध हों, यदि कोई राज्य कोई कानून बनाता है तो सुप्रिम कोर्ट उस कानून को उतना ही खारिज कर देगा,जितना वह फंडामेंटल राइट्स को प्रभावित करता है।3 में लिखा है कि यह अधिकार एक्ट, अध्यादेश, आर्डर, नोटिफिकेशन,रूल,बायलाज,रेगूलेशन,कस्टम जिसमें कानून की फार्म हो पर लागू है। परंतु इसमें यह नही लिखा कि संविधान संशोधन पर भी सुप्रिम कोर्ट का अधिकार लागू है।
इसलिए शंकरी प्रसाद केस में यह कहा गया कि धारा 368 भी धारा 13 के अंदर समाहित है, परंतु दोनों अलग-अलग है, संविधान बनने के बाद हुआ संशोधन पर धारा 13 का अधिकार लागू नही होता।इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के फेवर में फैसला दिया।
सन् 1955 में 4 वा संशोधन कर बंगाल के एक जमीन के कानून को 9 वी अनुसूची में डाल दिया गया।
सन् 1964 में 17 वा संशोधन किया गया उसमें राजस्थान और पंजाब की भूमि में संशोधन किया गया। सन् 1965 में सज्जन सिंह नाम के व्यक्ति इन संशोधन के विरूद्ध सुप्रिम कोर्ट गये। परंतु इस केस को शंकरी प्रसाद केस के समतुल्य भान खारिज कर दिया गया।
सन् 1967 में पंजाब के जालंधर के गोलक नाथ ने संविधान के 17 वें संशोधन के विरूद्ध केस सुप्रिम कोर्ट में डाल दिया।ये दो भाई थे इनके पास 500 एकड़ जमीन थी,17 वे संशोधन के कारण एक भाई सिर्फ 30 एकड जमीन रख सकता था।सुप्रिम कोर्ट की 11 जजों की बेंच बेठी।6-5 के बहुमत से फैसला किया गया और कहा गया कि अनुच्छेद 368,13 से बाहर नही है। अतः संसद संशोधन करके भी सम्पत्ति का मूल अधिकार नही छीन सकती। अब तक के हुए कार्यों के लिए जो जमीन ली गई थी, उसके लिए कहा गया कि जो अब तक हुआ,उस पर यह फैसला नही लागू होगा।
मोरारजी देसाई सन् 1928-30 में गुजरात के गोधरा में डिप्टी कलेक्टर के पद पर रहे थे,गोधरा में इनके कार्यकाल में साम्प्रदायिक दंगें हो गये थे, जिनमें मोरारजी देसाई भी आरोपित हो गये थे।इस कारण सन् 1930 में मोरारजी देसाई स्तिफा देकर गांधी जी के साथ आजादी की लड़ाई में सम्मिलित हो गये थे।बाद में बोम्बे के मुख्यमंत्री रहें तथा जवाहर लाल नेहरू के साथ वित्त मंत्री रहें।
जब के कामराज जो तमिलनाडु के मुख्यमंत्री भी रहें थे कांग्रेस के अध्यक्ष थे।पं जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु हो गई।गुलजारी लाल नंदा को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बना दिया गया। कामराज ने मोरारजी देसाई का नम्बर काट कर लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री बना दिया।
कुछ समय बाद लाल बहादुर शास्त्री की भी मृत्यु हो गई,अब मोरारजी देसाई ने फिर अपनी दावेदारी पेश की, परन्तु कामराज ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद के लिए पेश कर दिया। मोरारजी देसाई व इंदिरा गांधी के मध्य कांग्रेस में चुनाव हुआ, जिसमें इंदिरा गांधी जीत गई।
सन् 1967 में लोकसभा का चुनाव हुआ, इंदिरा गांधी साधारण बहुमत से जीत गई। मोरारजी देसाई इंदिरा गांधी जी की सरकार में उप-प्रधानमंत्री तथा वित्त मंत्री बने। लेकिन इस चुनाव में 6- राज्य कांग्रेस से निकल गये।
इंदिरा गांधी जी ने दस सूत्रीय कार्यक्रम घोषित किए-
1- बैंको का राष्ट्रीय करण
2- इंश्योरेंस कंपनी का सरकारी करण
3- अरबन लैंड सिलिंग
4- पीवी पर्स (राजाओं की टैंशन) की समाप्ति
आदि थे।
सन् 1969 में इंदिरा गांधी ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण बिना वित्त मंत्री की सलाह के इंदिरा गांधी जी ने कर दिया।
सन् 1969 में ही भारत के राष्ट्रपति डा जाकिर हुसैन की मृत्यु हो गई। उप-राष्ट्रपति वी वी गिरि राष्ट्रपति बन गए। कांग्रेस ने राष्ट्रपति के पद के लिए निलम संजिवारेड्डी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। परन्तु इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति वीवी गिरी से पद से इस्तीफा दिलवाकर उन्हें भी राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना कर खडा कर दिया। कांग्रेस के अध्यक्ष ने अपने उम्मीदवार निलम संजिवारेड्डी को मत देने के लिए व्हीप जारी कर दिया, इंदिरा गांधी ने कहा कि राष्ट्रपति का पद पूरे देश का है इसलिए मतदाता अपने अंतरात्मा की आवाज पर मत देने का आव्हान किया।इस चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी निलम संजिवारेड्डी चुनाव हार गए। अतः 12 नवंबर सन् 1969 को कांग्रेस के अध्यक्ष कामराज ने इंदिरा गांधी को कांग्रेस से बाहर निकाल दिया।
कांग्रेस के अंदर फिर चुनाव हुआ, जिसमें कांग्रेस दो फाड हो गई, इंदिरा गांधी की सरकार अल्पमत में आ गई जिसे करूणानिधि ने समर्थन दे कर बचा लिया।
इंदिरा गांधी जी ने 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण का अध्यादेश जारी कर दिया।
इस निर्णय कै विरोध में एक शख्स आर सी कूपर,जिनका सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया तथा बैंक ऑफ बड़ौदा में हिस्सा था,सुप्रिम कोर्ट चले गए।11 जजों की बैंच ने इस अध्यादेश को 10-1 के बहुमत से खारिज कर दिया।जो जज इस अध्यादेश को खारिज करने के एक मात्र विरोध में थे वो थे जस्टिस एएम रे। सन् 1970 में प्रीवी पर्स को भी अध्यादेश के माध्यम से समाप्त कर दिया गया,माधव राव सिंधिया जो इस समय चैम्बर ऑफ प्रिंसिस थे,सुप्रिम कोर्ट चले गए, सुप्रीम कोर्ट ने यह अध्यादेश भी खारिज कर दिया।
अब इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति से निवेदन कर सन् 1971 में ही चुनाव करवा दिए जो सन् 1972 में होने थे। सन् 1971 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी को 352 सीट मिली तथा दूसरी कांग्रेस को 16 सीट मिली।
प्रधानमंत्री बनते ही इंदिरा गांधी ने 25 साल के लिए सोवियत संघ रूस से संधि कर ली तथा दिसम्बर 1971 में बंगलादेश बना दिया।
अब इंदिरा गांधी ने संविधान में 6 संशोधन (24से29) किये।24 वे संशोधन में धारा 13व धारा 368 को एक दूसरे से अलग कर दिया।25 वे संशोधन में आर्थिक समानता के लिए धारा 14 के अंतर्गत चैलेंज कोर्ट में नही कर सकते।26 वे संशोधन में रियासत के राजा समाप्त कर दिए।29 वे संशोधन में केरल का लैंड रिफार्म एक्ट 9 वी अनुसूची में डाल दिया।इस 29 वे संशोधन के विरूद्ध केरल के शंकराचार्य केशवानंद भारती कोर्ट चले गए।13 जजो की बैंच बैठी।7-6 के बहुमत से निर्णय हुआ। कोर्ट ने कहा कि (1)24,25,26 तीनों संशोधन सही है।
(2)संसद के पास कही भी संशोधन की शक्ति है, लेकिन संविधान में संशोधन की शक्ति है, संविधान को बनानें की शक्ति नही है। संविधान का मूल ढांचा अर्थात बेसिक स्टरक्चर संसद नही बदल सकती।
कोर्ट ने कहा कि कोर्ट किसी भी संशोधन की जांच कर सकती हैं जो बेसिक स्टरक्चर को प्रभावित करता हो। लेकिन 24 अप्रैल सन् 1973 के पहले के किसी निर्णय की नही, जैसे डेमोक्रेसी, धर्मनिरपेक्षता।
यह केशवानंद भारती का फैसला 24 अप्रैल सन् 1973 को आया।
सन् 1999 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि सिनियर मोस्ट जज ही चीफ जस्टिस बनेगा।
संदर्भ
1- संविधान का बेसिक स्ट्रक्चर और केशवानंद भारती केस, डा विकास दिव्य कीर्ति
https://youtu.be/uIZik791zRA

आरक्षण क्या और क्यों - लेखक अशोक चौधरी मेरठ

आरक्षण के कारण भारत में एक अच्छा खासा विवाद बना हुआ है। जो आरक्षण के लाभार्थी है उनका कहना है कि आरक्षण देश में अति आवश्यक है।जो आरक्षण के दायरे में नहीं आते उनका कहना है कि आरक्षण देश को क्षति पहुचा रहा है।
यदि कोई भी व्यक्ति या समाज अपनी व्यक्तिगत लाभ के लिए किसी व्यवस्था को अच्छा बताता है तथा कोई व्यक्तिगत हानि होने पर उस व्यवस्था को खराब बताता है तो दोनों ही देश भक्त नही है। इसलिए आरक्षण की समीक्षा लाभ हानि से अलग रहकर करने की आवश्यकता है। विश्व में दो तरह के शासन रहते आये है।एक शासन को पुलिस स्टेट कहते हैं जिसके अन्तर्गत जो कानून है उसका शत प्रतिशत पालन होता है, किसी को कोई छूट नहीं है।इसको नकारात्मक भेदभाव वाला शासन कहा गया है।
दूसरा शासन वेलफेयर स्टेट है जिसे कल्याणकारी राज्य कहा गया है।इस शासन के अनुसार किसी कमजोर वर्ग या समाज को कुछ सहूलियत देने का प्रावधान होता है इसको सकारात्मक भेदभाव कहा गया है।
भारत की संस्कृति सदा ही सकारात्मक भेदभाव की समर्थक रही है। कमजोर की रक्षा करना यहा पुण्य का कार्य माना गया है। इसलिए कहा है कि-
सूरा सोई सराहीये,जो लडे हीन के हेत।
पुर्जा-पुर्जा हो गये,ताऊ ना छोड़े खेत।।
भारत में इंसान तो क्या पशु पक्षी के हित के लिए भी आम जनमानस तत्पर रहा है, यहां लोग चींटी को आटा खिलाना पुण्य मानते हैं।इसी कारण वसुधेव कुटुम्ब की भावना रही है। अतः भारत में राजतंत्र में भी कल्याणकारी राज्य की ही प्रशंसा की गई है। लेकिन जब भारत में विदेशियों का कब्जा हो गया तो यह धारणा भी दब गई। लेकिन जब विदेशी भी पुलिस स्टेट से परेशान हुए तो घूम कर वेलफेयर स्टेट की ओर मुड़े, सन् 1815 से ब्रिटिश शासन करने वाले वेलफेयर स्टेट के हिमायती बन गए।
इस व्यवस्था में यह कहा गया है कि यदि कोई गरीब परिवार में को बच्चे हैं, दोनों बच्चों को एक-एक किलो दूध माता-पिता देते हैं। यदि उनमें से एक बच्चा बीमार पड जाये तो डाक्टर यह सलाह देता है कि बीमार बच्चे को एक की जगह 1.5 किलो दूध दिजिए।पैसा ना होने के कारण वह परिवार दोनों बच्चों के लिए एक किलो दूध की अतिरिक्त व्यवस्था नहीं कर सकता।तो वह यह व्यवस्था बनाता है कि स्वस्थ बच्चे के एक किलो दूध में से आधा किलो दूध बीमार बच्चे को देने लगता है और जिस कारण स्वस्थ बच्चे को आधा किलो दूध तथा बीमार बच्चे को 1.5 किलो दूध मिल जाता है।जब तक बीमार बच्चा स्वस्थ होता वह इसी प्रकार व्यवस्था बनाता है,जब बीमार बच्चा स्वस्थ हो जाता है तो फिर दोनों को एक-एक किलो दूध मिलने लगता है।इस बंटवारे को सकारात्मक भेदभाव कहा गया है।
इसी प्रकार यदि बास्केटबॉल के दो खिलाड़ी मे से एक खिलाड़ी 6 फुट लम्बा है,दूसरा 5 फुट लम्बा है, दोनों के लिए गैंद को डालने वाली बास्केट यदि समान दूरी पर बंधी हो,तो वह 5 फुट के खिलाड़ी के साथ गलत ही तो होगा।यही आरक्षण का आधार है। दुनिया में गोरो ने कालो के साथ, अमीरों ने गरीबों के साथ,ऊंची जातियों ने नीची जातियों के साथ, पुरूषों ने महिलाओं के साथ भेदभाव किया है।इस कारण आज के आधुनिक युग में जो भी वेलफेयर कंट्री है, उनमें आरक्षण किसी ना किसी रूप में है। अमेरिका और इंग्लैंड में यह प्रिफरेंस के आधार पर है,कई देशों में यह आरक्षण अर्थात कोटा के रूप में है। भारत में 90%आबादी भेदभाव का शिकार रही है। आरक्षण की दो श्रेणियां हैं जिसमें एक होरिजेंटल तथा दूसरी वर्टिकल। भारत में वर्टिकल और होरिजेंटल दोनों तरह का आरक्षण है। एससी-एसटी, ओबीसी तथा आर्थिक आधार पर वर्टिकल आरक्षण है, महिला और दिव्यांग को होरिजेंटल आरक्षण है। वर्टिकल आरक्षण उसे कहते हैं कि जैसे भारत में 50% आरक्षण है, यदि कोई आरक्षण वर्ग का केंडिडेट जनरल से ज्यादा नम्बर ले आये तो वह जनरल मे ही गिन लिया जायेगा। परन्तु यदि कोई महिला या दिव्यांग जनरल से अधिक नम्बर ले आये तो वह अपने आरक्षित वर्ग में मे ही गीना जायेग।इसे होरिजेंटल आरक्षण कहते हैं।
अमेरिका के 50 राज्यों में से 41 राज्यों में आरक्षण है।
केनेडा में भारत की तरह ही आरक्षण है। चीन में 8% , जापान में 5% आरक्षण है।
भारत में संविधान की धारा 30 के अंतर्गत अल्पसंख्यकों के लिए भी आरक्षण है।
संदर्भ
1- आरक्षण क्या है- डा विकास दिव्य कीर्ति
https://youtu.be/oOSuGZeLxFM


गुरुवार, 20 मई 2021

समान नागरिक संहिता - लेखक अशोक चौधरी मेरठ।

समान नागरिक संहिता अर्थात यूनिफॉर्म सीविल काड एक ऐसा मामला है जो भारत में आजादी से पहले प्रकाश में रहा है।जब कोई शासन चलता है तो अपराध के कानूनों को दो हिस्सों में बांटता है जिसमें एक है - क्रिमिनल लॉ और दूसरा है सीविल ला। 
क्रिमिनल केस व्यक्ति बनाम राज्य होते हैं तथा सीविल केस व्यक्ति बनाम व्यक्ति होते हैं।
सीविल कानून के चार भाग है-
1- फैमिली मेटर अर्थात परिवार के विवाद जिनमें शादी,तलाक, बंटवारा, गुजारा भत्ता, गार्जियन शिप,गोद लेना,व्यस्क कब तक।
2- प्रोपर्टी
3- संविदा
4- टोड्स (मानहानि) असावधानी जैसे सात वर्ष तक की आयु का बच्चा यदि किसी को कोई हानि पहुचाता है तो उस पर कोई कानून लागू नही होता, असावधानी का मुकदमा उसके पेरेंट्स पर चलता है। उपरोक्त चारो कानूनो में सबसे अधिक विवाद फैमिली मेटर को लेकर है।
दूसरी ओर यहूदी, पारसी, मुस्लिम, हिंदू और जनजाति में जीवन जीने के अलग-अलग कानून है, अपने दायरे में रहते किसी नागरिक के फंडामेंटल राइट ना छिने,ऐसी व्यवस्था ही यूनिफॉर्म सीविल काड है।
भारत में जब भारतीयों का शासन था तब भारत की न्याय पद्धति मनुस्मृति के आधार पर चलती थी, भारत में कई मनुस्मृति है लेकिन एक अंग्रेज़ अधिकारी विलियम जोन्स ने एक मनुस्मृति का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया,वही अत्याधिक प्रसिद्ध है। मनुस्मृति में जो क्रिमिनल ला है वो भेदभाव पूर्ण है, ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र के लिए एक ही अपराध की अलग-अलग सजाए है। सम्पत्ति का बंटवार  याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार होता था। याज्ञवल्क्य स्मृति में दो तरह के बंटवारे का कानून था,एक कानून जो बंगाल व आसाम को छोड़कर पूरे भारत में चलता था,इसके अंतर्गत पुत्र पैदा होते ही पिता की सम्पत्ति का हिस्सेदार हो जाता था,इसे मिताक्षरा विधि के नाम से जाना जाता था।  दूसरा कानून जिसे दायभाग के नाम से जाना जाता था,वह बंगाल और असम में ही चलता था, इसके अंतर्गत पुत्र पिता की मृत्यु के बाद ही उसकी सम्पत्ति मे हिस्सेदार होता था।
परन्तु जब भारत में सन् 1192 के बाद मुस्लिम सत्ता स्थापित हुई तो मुस्लिम शासक अपने साथ अपने धर्म की किताब के रूप में कुरान को लाये तथा शासन चलाने के लिए शरियत को लाये। इनके शासन में गैर मुस्लिमो से भेदभाव किया जाता था, दिल्ली सल्तनत के सुल्तान ग्यासुद्दीन तुगलक ने किसानों के लिए कानून बनाया, जिसके अन्तर्गत हिंदू किसानों को अपनी फसल का आधा अर्थात 50% कर के रूप में देना था तथा मुस्लिम किसानों को 10% या 15% कर देना था, इसके बाद फिरोज शाह तुगलक ने कर में परिवर्तन किया, फिरोज शाह तुगलक ने कई नहरें अपने राज्य में खुदवाई, फिरोज शाह तुगलक ने हिंदू किसानों पर नहर के पानी को प्रयोग कर खेती करने वालों पर फसल का 60% कर लगाया तथा मुस्लिम किसानों पर फसल का एक चौथाई अर्थात 25% कर लगाया। अकबर के शासनकाल में भारतीयों को सत्ता में हिस्सेदार बनाया, हिंदूओं पर लगे जजिया कर व तीर्थ कर को हटा दिया, किसानों पर कर भी समान कर दिया।
भारत की संस्कृति एक सहिष्णु संस्कृति रही है। भारत में वेलफेयर स्टेट/कल्याणकारी राज्य, ह्यूमन राईट/मानवाधिकार का बडा व्यापक प्रभाव रहा है। वसुधेव कुटुम्ब की भावना रही है जिसमें मानव तो क्या?पशु पक्षी भी समायोजित रहें हैं। धनाढ्य लोगों द्वारा कुएं खुदवाना, प्याऊ लगवाना, धर्मशालाएं बनवाना पुण्य का कार्य माना गया है।पशु पक्षी को भोजन कराना आम जनमानस में साधारण रूप से व्याप्त विचार रहा है। किसी भी बच्चे को गोद लेने के बाद उस बच्चे का बिल्कुल वैसा ही अधिकार, जैसा कि सगी संतान का होता है,वह भारतीय संस्कृति में ही रहा है,रामयण में सीता इसका उदाहरण है,राजा जनक को सीता हल चलाते समय मिली,जब राजा जनक ने विद्वानों ने पूछा कि इस बच्चे का गोत्र और वंश क्या होगा?तब विद्वानों ने कहा कि जो इस बालिका को अपनी पुत्री स्वीकार कर लेगा,वही इस बालिका का कुल होगा।
महाभारत काल में कुंती के 3, माद्री के 2 पुत्र थे, ये 5 पुत्र राजा पाण्डु द्वारा अपनाए हुए थे, परन्तु छठा पुत्र कर्ण अलग था,पितामह भीष्म और श्री कृष्ण जी इस बात को जानते थे।जब महाभारत का युद्ध आरम्भ हुआ तब कुंती पितामह भीष्म के पास जाकर अपने पुत्रों की रक्षा का वचन मांगती है,तब पितामह भीष्म बिल्कुल स्पष्ट रूप से यह कहते हैं कि राजा पाण्डु ने जिन पुत्रों को अपना मान लिया है वही कुरूवंश के है। इतना मानव अधिकार वाला समाज विश्व में नही है, भारतीय संस्कृति से अलग या आज भारत के संविधान के अनुसार गैर हिन्दू समाज में कोई गार्जियन/संरक्षक तो हो सकता है, परन्तु अपना नहीं सकता।एक ही परिवार में अपनी इच्छानुसार व्यक्ति अपने ईष्ट देव की पूजा कर एक साथ भारतीय समाज में ही रह सकता है,यहा गाय को माता मानने वाले तथा पशु बलि देकर काली माता को प्रसन्न करने वाले एक ही समाज के अंग है।किसी को अपना इष्ट देव ना मानने वाले नास्तिक भी इसी समाज में एक साथ आराम से रह रहते आए हैं।
 16 वी सदी में मुगल सल्तनत मे अकबर नाम का एक सम्राट हुआ। जिसने महसूस किया कि उसके राज्य में निवास करने वाले 95% गैर मुस्लिम लोगों के सहयोग के बिना शासन को स्थायित्व देना असम्भव है। इसलिए अकबर ने भारतियों को सत्ता में अपना कनिष्ठ सहयोगी बनाया।अकबर ने भारतिय राजाओं से वैवाहिक संधि की। परंतु इस्लाम में एक पुरुष की सिर्फ चार शादियां ही वैध मानी गई है। जबकि भारतीय समाज में राजा की चाहें कितनी भी रानियां हो सब वैध मानी गई है यहा संख्या का प्रतिबंध नही है। मुस्लिम समुदाय में चार शादी के बाद जो निकाह होता था,उसे मूता निकाह कहा गया है।मूता अरबी फारसी या जकताई भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है मजा/आनंद अर्थात मूता निकाह एक अवधि के लिए लडकी के पिता को निकाह से पहले धन देकर किया गया निकाह था,यह निकाह ईरान में शिया लोगों में प्रचलित था, सुन्नियों में नही।इस निकाह से जो संतान पैदा होती थी वह भी अवैध मानी जाती थी और मूता निकाह की अवधि समाप्त हो जाने के बाद महिला का भी कोई सम्बन्ध अपने पति से या उसकी सम्पत्ति से नही रहता था। अकबर ने आमेर की राजकुमारी से शादी करके जो आमेर रियासत से वैवाहिक संधि की थी, इस्लाम के अनुसार आमेर की राजकुमारी अकबर की छठी रानी थी, अतः यह शादी मूता निकाह की श्रेणी में आ गई थी। अकबर के अपनी पहली चार रानियो से कोई संतान नहीं थी, आमेर की राजकुमारी से एक पुत्र उत्पन्न हुआ था जिसका नाम सलीम था। इस्लाम के कानून के अनुसार अकबर का यह पुत्र भी अवैध था अर्थात सत्ता का अधिकारी नही था।
ऐसी परिस्थिति में अकबर भारतीय राजाओं से वैवाहिक संधि करके कैसे सहायता प्राप्त कर सकता था,जब वह शादी ही अवैध थी।अत अकबर ने इस समस्या का हल तलाशने के लिए मुल्ला मौलवियों को अपने दरबार में बुलाया।एक तरह से अकबर को इस समय एक यूनिफॉर्म सीविल कानून की आवश्यकता महसूस हुई जो भारतीय हिन्दू तथा इस्लाम के बीच एक सम्मान जनक रास्ता बना सके।अकबर ने जब अपने सामने आयी इस समस्या को इस्लाम के विद्वानों के सामने रखा तो जो कट्टर पंथी थे वो तो टस से मस नहीं हुए परन्तु एक बदायूंनी नाम के विद्वान थे उन्होंने कहा कि बादशाह सलामत निकाह और मूता निकाह मे क्या फर्क है यह सिर्फ विद्वान लोग ही समझते हैं,आम मुस्लिम की नजर में तो दोनों ही निकाह है दोनों ही बादशाह की बेगम है। दोनों तरह के निकाह से पैदा होने वाली संतान का फर्क भी विद्वान ही समझते हैं,आम आदमी की नजर में तो दोनों ही संतान है।इस पर अकबर मुल्ला बदायूंनी से बडा प्रसन्न हुआ तथा अकबर ने सभी बेगमे जो बादशाह के साथ हरम में थी,सब बराबर की रानियां घोषित कर दी,उन रानियों से उत्पन्न संतान भी वैध घोषित कर दी गई।जिन कट्टर पंथी मुल्लाओं ने बादशाह के फैसले का विरोध किया उनका तबादला बहुत दूर कर दिया गया, उनसे महत्वपूर्ण ओहदे छिन लिए गए तथा कुछ को तो मरवा भी डाला।इस प्रकार बादशाह अकबर ने भारतियों और मुस्लिमो के बीच पहला यूनिफॉर्म सीविल कानून बनाया।
सन् 1582 में अकबर ने एक दरबार का आयोजन किया, जिसमें राज्य में गुलामी प्रथा को समाप्त कर दिया तथा सभी गुलामों को मुक्त कर दिया गया।गुलाम शब्द के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया।अब गुलाम के स्थान पर लोग चेला शब्द का प्रयोग करने लगे।
अकबर ने 12 वर्ष की कम आयु के बच्चों की शादी पर प्रतिबंध लगा दिया।
छोटे पक्षियों के शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया।
सराय और अस्पताल सरकारी कोष से आम गरीब जनता के लिए बनवाने प्रारंभ किए।
अपने अधिकारियों पर किसी को भी मृत्यु दंड देने के अधिकार को छीन लिया। मृत्यु दण्ड देने के लिए बादशाह की स्वीकृति अनिवार्य कर दी गई।
सन् 1591 में अकबर ने जबरन सती प्रथा पर रोक लगा दी।गोने से पहले पति की मृत्यु हो जाने पर सती होने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया।
विधवा विवाह को स्वीकृति दे दी गई।
एक पत्नी प्रथा का कानून बना दिया गया। दूसरी शादी जभी होगी जब पहली पत्नी संतान पैदा करने योग्य ना हो।
सन् 1592 में शादी की उम्र 16 वर्ष कर दी गई।
प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा अनुसार धर्म अपनाने की छूट दे दी गई।
हिंदू और मुसलमान किसानों पर लगान बराबर कर दिया गया।
सन् 1577 में अकबर ने फतेहपुर सीकरी में एक टकसाल बनवाई। जिसमें अकबर ने अपने सिक्कों पर सीता राम का चित्र बनवाया।इन सिक्कों को सियाराम के सिक्के भी कहते थे।
 फिरोज शाह तुगलक के समय एक ब्राह्मण ने एक मुस्लिम महिला को हिंदू बना दिया था।जब फिरोज शाह तुगलक को यह बात पता चली तो बादशाह ने उस ब्राह्मण को दोपहर बाद की नमाज के समय बीच चौराहे पर जिंदा जलाकर मार डाला था। सिकंदर लोदी ने बोधन नाम के ब्राह्मण को सिर्फ इसलिए मृत्यु दंड दे दिया था कि बोधन ने सभी धर्मों को बराबर बता दिया था।
इस प्रकार अकबर ने अपने समय में हिंदू और मुस्लिम समाज के बीच कुछ समानता लाने की कोशिश की थी अर्थात भारत में पहले यूनिफॉर्म सीविल कोड को बनाया था।
परन्तु औरंगजेब ने अपने शासनकाल में पुनः अपने शासन को इस्लामिक शासन बना दिया, पुनः जजिया कर और तीर्थंकर लागू कर दिए गए, मुस्लिम किसानों पर कर 25% कर दिया गया। हिन्दू किसानों पर 50% कर रहा।  मुस्लिम शासन शरियत के अनुसार चलता रहा, औरंगजेब  जिस शरियत से भारत में शासन चला रहा था,उसको लिपिबद्ध किया तथा उसको फतुआ आलमगीर नाम दिया।शरियत पूरे विश्व में चार प्रकार की है,जिस शरियत के अनुसार भारत में शासन चलता था उसे हनफी सम्प्रदाय की शरियत कहा जाता है।इस शरियत में दो तरह के अपराध है,एक वो अपराध है जो खुदा के विरोध में बताये गये है, जैसे जिन्ना (व्याभिचार), चोरी, डकैती है,इन अपराधों को हुदुद कहा गया है। इन अपराधों में बडी सख्त सजा है, कोई छूट नहीं है।
दूसरे आपसी हिंसा के अपराध है,इन अपराधों में वह व्यक्ति जिसके साथ अपराध हुआ है, अपराध करने वाले को माफ कर सकता है,इन अपराधों को किसास कहते हैं।
तिसरे वो अपराध है जिसमें अपराध करने वाले ने अपराध करने का प्रयास किया परन्तु वह सफल नहीं हुआ जैसे किसी ने किसी का अपहरण करने का प्रयास किया परंतु अपहरण हुआ नही,इन अपराधों को ताजिर कहते हैं।
सन् 1757 से अंग्रेजों का दखल भारतीय शासन में प्रारंभ हुआ, सन् 1764 के बक्सर के युद्ध में विजय के बाद अंग्रेजों को बिहार, बंगाल और उड़ीसा के सीविल अधिकार मुगल बादशाह से प्राप्त हो गये थे, सन् 1803 में दिल्ली तथा सन् 1818 में पेशवा राज्य पर कब्जा होने के बाद सम्पूर्ण भारत का सीविल सैक्टर अंग्रेजों के हाथ में आ गया। क्रिमिनल केस शरियत के अनुसार तय होते रहें तथा सीविल केस में अंग्रेजों ने हिंदुओं को हिंदू ला अर्थात मनुस्मृति, मुस्लिमो को मुस्लिम ला अर्थात शरीयत और बाकि अन्य को अंग्रेजों ने अपने कानून के हिसाब से चलाना प्रारंभ कर दिया।
भारत में चल रही शरीयत के अनुसार जो मुस्लिमो के सीविल कानून थे उनमें भी हिंदुओं के कानूनों से अलग प्रावधान थे, जैसे सम्पत्ति के बंटवारे के लिए जो मुस्लिम कानून था उसे सूफा नाम दिया गया था।इसके अंतर्गत यदि चार भाई एक जगह रह रहें हैं, उनमें से एक भाई यदि अपना हिस्सा किसी को बेच देता है तो उसके भाई उस पर सूफा कानून के अन्तर्गत यह दावा कर सकते हैं कि वो उसके पहले हकदार हैं यानि जितने धन मे किसी बाहर वाले को बेच दिया है वह धन देकर अपने भाई का हिस्सा प्राप्त कर सकते हैं।दूसरा महिला को पिता की सम्पत्ति मे 1/3 भाग का पूर्ण अधिकार है। कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपनी सम्पत्ति मे से 1/3 भाग की ही वसीयत कर सकता है।
संविधान की धारा 14 में इक्वलिटी बी फार ला (प्रत्येक व्यक्ति को कानून का संरक्षण मिले)
संविधान की धारा 15 (1) राज्य किसी भी व्यक्ति के साथ सेक्स,कास्ट, रिलीजन व क्षेत्र के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता।
लेकिन वही राज्य 15(3)के अंतर्गत महिलाओं और बच्चों के पक्ष में कानून बना सकता है।
यहां भी ज्यादा भेदभाव फैमिली मेटर को लेकर ही है, मुस्लिम समुदाय में शादी एक समझौता है जो कभी भी रद्द किया जा सकता है, जिसमें तलाक एक माध्यम है,निकाह के समय मेहर तय होता है, जिसमें तलाक देने पर तीन महीने तक,जिसे इद्दत की अवधि कहा गया है, पुरुष महिला का खर्च देगा, यदि कोई बच्चा है तो बच्चे की आयु दो वर्ष पूरी होने तक बच्चे का खर्च देगा।
तलाक भी दो तरह का है,एक तलाक- ए- सुन्नत,दूसरा तलाक- ए- इद्दत।
तलाक- ए- सुन्नत मोहम्मद साहब द्वारा बताया गया है, जिसमें कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति अपने पूरे जीवन में तीन बार तलाक कह देता है तब तलाक माना जाता है। जैसे किसी व्यक्ति अपनी पत्नी को अपनी तीस वर्ष की आयु में तलाक कह दिया, फिर दस वर्ष बाद कोई बात हुई,फिर तलाक बोल दिया,उसके 15 वर्ष बाद फिर तलाक बोल दिया,अब आकर तलाक हुआ 55 वर्ष की आयु में,दूसरा यदि एक महिने में एक बार तलाक बोल,इस तरह तीन महीने में तलाक हो गया।
दुसरी तरह का तलाक मुस्लिम विद्वानों द्वारा बाद में स्थापित किया गया है। मुस्लिम ला के अनुसार विवाद के फैसले काजी करता है जो कुरान और हदीस की रोशनी में किये जाते हैं, कुरान में वह लिखा है जो मोहम्मद साहब को दिव्य दृष्टि प्राप्त होने पर मिले ज्ञान पर आधारित है,हदीस में मोहम्मद साहब के उपदेश (विचार) और उनकेे कर्म (लिए गए निर्णय) लिखें हैं। लेकिन ऐसे बहुत से विवाद है जो मोहम्मद साहब के जीवन में सामने नही आये,वो हदीस में नही है,इस तरह के विवाद जब सामने आते हैं तब काजी मुफ्ती से सलाह करता है,मुफ्ती उस विवाद से सम्बंधित कानून की व्याख्या करता है,उसे फतुआ कहते हैं। यदि मुफ्ती की भी समझ में ना आएं तो उलेमा विचार करते, और विद्वान विचार करते हैं,तब कानून की व्याख्या कर फतुआ दिया जाता है।तलाक- ए- इद्दत इसी प्रकार बनाया गया कानून है, इसमें कोई व्यक्ति लगातार तीन बार तलाक बोल देता है और तलाक हो जाता है, आज के आधुनिक युग में वाट्स एप,स्पीड पोस्ट से लिखकर भी तलाक दे दिया जाता है, भारत में तलाक ए इद्दत ही चल रहा था।शिया मुस्लिम तलाक - ए - इद्दत को नहीं मानते।
मुस्लिम यहूदी पारसी ईसाई धर्म में बच्चे को गोद नही लिया जाता, वहां संरक्षक बना जा सकता है। यदि कोई बच्चा छोटा है, उसके माता-पिता की मृत्यु हो गई है तो कोई रिश्तेदार उसका संरक्षक बन सकता है,जब बच्चा व्यस्क हो जायेगा तब संरक्षक की जिम्मेदारी समाप्त।बच्चा संरक्षक की सम्पत्ति मे हिस्सेदार नही होता। लेकिन हिन्दू धर्म में जिसे गोद लेना कहते हैं, उसके अंतर्गत बच्चे को वो सभी अधिकार मिल जाते हैं जो एक माता-पिता की ओर से उनके सगे बच्चों को मिलते है।
जब अंग्रेजों का भारत पर शासन स्थापित हो गया तो भारत के सीविल कानून मे उनकी दखलंदाजी शुरू हुई।इस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने सन् 1772 में भारत में एक जुडिशल प्लान पेश किया।वारेन हेस्टिंग्स सन् 1781 तक रहें।वो भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के पहले गवर्नर जनरल थे। सन् 1781 से लेकर सन् 1810 तक क्रिमिनल लॉ जो शरियत के अनुसार चल रहा था, में भी अंग्रेजों ने दखल देना शुरू कर दिया था, क्योंकि शरीयत के कानून बहुत कठोर थे। सन् 1828 में वैटिंग भारत के पहले गवर्नर जनरल बने।
अंग्रेज एक विकसित समाज से थे, राजा राम मोहन राय ने वैटिंग के साथ समन्वय बना लिया था।इसलिए सन् 1829 में राजा राम मोहन राय के अनुरोध पर सती प्रथा उन्मूलन अधिनियम बनाया गया।लडकी के पैदा होते ही हत्या कर दी जाती थी,इस प्रकार की हत्या के विरोध में भी कानून बना दिया गया। सन् 1833 के चार्टर एक्ट के बाद सन् 1834 में अंग्रेजों ने भारत में पहला विधि आयोग अर्थात ला कमिशन बनाया, लार्ड मैकाले इसके अध्यक्ष थे। कौन सा कानून बनाना है उसका ड्राफ्ट बनाकर सुझाव के रूप में सरकार को देना ला कमिशन का काम था। लार्ड मैकाले ने पूरे भारत में एक आईपीसी हो इसका ड्राफ्ट लिखा।
सन् 1848 में लार्ड डलहौजी भारत के गवर्नर जनरल बन कर आये।
लार्ड डलहौजी के साथ ईश्वर चंद्र विद्यासागर का अच्छा समन्वय था। अतः सन् 1850 में छूआछूत के विरोध में कास्ट डिसएक्टिविटीज एक्ट बना दिया गया।
सन् 1853 में दूसरा चार्टर एक्ट आया,  भारत में दूसरा ला कमिशन बना,सर जान रोमेली नाम के अंग्रेज अधिकारी इसके अध्यक्ष बने। इन्होंने सीपीसी, सीआरपीसी, आईपीसी को तैयार किया। 
सन 1856 में हिंदू विडो मेरिज एक्ट बना दिया गया।अब तिसरा ला कमिशन बना,सर हेनरी मेन जो ला के प्रोफेसर थे, इसके अध्यक्ष बने।
इसी समय सन् 1857 का संघर्ष भारत में हो गया।
इस संघर्ष के बाद भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से निकल ब्रिटिश क्राउन के हाथ में चला गया।अब भारत में गवर्नर जनरल का स्थान वायसराय नाम के पद ने ले लिया जो भारत में ब्रिटिश क्राउन का प्रतिनिधि था।
अतः सन् 1861 में आईपीसी एक्ट लागू हो गया।अब क्रिमिनल लॉ शरियत के आधार से हट गया तथा क्रिमिनल लॉ में यूनिफॉर्म क्रिमिनल एक्ट बन गया।
सन् 1871 में इंडियन एविडेंस एक्ट।
सन् 1872 में कांट्रेक्ट एक्ट।
 सन् 1873 में आथ एक्ट जो अब सन् 1969 का एक्ट कहा जाता है।
 सन् 1873 में ही स्पेशल मेरिज एक्ट लागू हो गया, जिसके अन्तर्गत इंटर कास्ट और इंटर रिलिजन शादी की जा सकती थी आज यह सन् 1954 के एक्ट के नाम से चल रहा है।
सन् 1874 में विवाहित महिला एक्ट बना जिसके अन्तर्गत स्त्री धन को महिलाओं की सम्पत्ति माना गया, इस एक्ट के अनुसार लिमिटेड राइट दिये गये।  स्त्री धन में शादी के समय ससुराल और मायके पक्ष की ओर से मिले उपहार (गहने) आते थे। क्योंकि हिन्दू धर्म में महिलाओं को सम्पत्ति मे अधिकार नहीं था, इसलिए यह एक छोटा सा कदम उठाया गया था।
शादी की उम्र के लिए सन् 1891 से लेकर सन् 1929-30 तक अनेक कदम उठाए गए।
सन् 1891 में लडकी की शादी की उम्र 12 वर्ष तथा लडके की उम्र 14 वर्ष की गई,इस एक्ट का नाम ऐज आफ कंसेंट एक्ट रखा गया।
 सन् 1929-30 में लड़की की शादी की आयु 14 वर्ष तथा लडके की उम्र 18 वर्ष की गई।आज सन् 1978 का एक्ट लागू है जिसमें लड़की की आयु 18 वर्ष तथा लडके की आयु 21 वर्ष है।
सन् 1937 में हिंदू (देशमुख एक्ट)वोमेंस राइट टू प्रोपर्टीज एक्ट बना, जिसमें कहा गया कि स्त्री धन पर महिला का पूर्ण अधिकार होगा,बाकी सम्पत्ति पर लिमिटेड राइट होगा।
हिन्दू विधवा को अपने पति की सम्पत्ति मिलेगी, परन्तु उस पर उसका लिमिटेड राइट होगा।
जब ये सुधार के कार्यक्रम हिन्दू धर्म में चल रहे थे, कानून बन रहें थे,ऐसा देख मुस्लिमो ने सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया कि मुस्लिमो के कानूनों में कोई छेड़छाड़ न की जाए, लेकिन अंग्रेजों ने सन् 1937 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बना दिया, सन् 1939 में सन् 1937 के पर्सनल लॉ के 5 वें सेक्शन को हटा कर उसमें यह जोड दिया कि यदि मुस्लिम महिला चाहे तो तलाक के लिए कोर्ट जा सकती है।
सम्पूर्ण हिन्दू समाज के लिए एक कानून हो,इसके लिए हिन्दू कोड बिल की डिवेट शुरू हो गई थी। अतः सन् 1941 में एक आइसीएस अधिकारी बीएनराव के नेतृत्व में हिंदू ला कमेटी बनाई गई,इस कमेटी में राव सहित चार सदस्य थे। इस कमेटी ने सन् 1944 में मसौदा बना लिया, लेकिन सरकार ने श्री बीएन राव को इस मसौदे पर दोबारा और अच्छी तरह बनाने का आग्रह किया। सन् 1947 में देश आजाद हो गया, सन् 1949 में बीएन राव ने यह मसौदा तैयार कर भारतीय संसद को सोप दिया। भारत की संसद ने इस मसौदे की समीक्षा के लिए संसद की एक स्टेंडिंग कमेटी बनाई, जिसके अध्यक्ष डा भीमराव अम्बेडकर बने, जो कि भारत सरकार में ला मिनिस्टर भी थे। हिन्दू कोड बिल में आठ खंड थे, मेरिज मे पहली बार तलाक का प्रावधान था,एक पत्नी विवाह का प्रावधान था। हिन्दू, यहूदी और कैथोलिक ईसाई मे शादी एक संस्कार माना जाता है,इनमे विवाह विच्छेद नही होता था, पुरूष अनेक विवाह कर सकता था,वह अपनी पत्नी का परित्याग कर सकता था। परंतु महिला पुरुष का परित्याग नही कर सकती थी।इस बिल का खूब विरोध हुआ।डा राजेन्द्र प्रसाद, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पुरूषोत्तम दास टंडन, हिन्दू महासभा के नेता डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी हिन्दू कोड बिल के खुल कर विरोध में आ गए,सबका कहना था कि इस समय भारत में कोई जनता की चुनी हुई सरकार नही है, इसलिए देश की 80% आबादी के विषय में कानून बनाना उचित नहीं है।देश के प्रधानमंत्री पं जवाहरलाल नेहरू ने 26 सितंबर सन् 1950 को संसद से यह बिल वापस ले लिया,27 सितंबर सन् 1950 को खिन्न होकर डा अम्बेडकर जी ने ला मिनिस्टर के पद से त्यागपत्र दे दिया।
नेहरू जी ने सन् 1952 का पहला चुनाव लडा, हिन्दू कोड बिल के मुद्दे को कांग्रेस के घोषणा पत्र में डाला। कांग्रेस की जोरदार विजय हुई। नेहरू जी को 400 में से 381 लोकसभा सीट मिली। सन् 1954 में स्पेशल मेरिज एक्ट पास कर दिया गया,इस एक्ट के अंतर्गत इंटर रिलिजन शादी होती है।
अब परिस्थिति बदल चुकी थी,डा राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति बन गए थे, पुरूषोत्तम दास टंडन अध्यक्ष के पद से हट गए थे,अत सन् 1955-56 में हिंदू कोड बिल को चार हिस्सों में संसद से पास कराकर एक्ट बना दिया।
1- हिन्दू मेरिज एक्ट, सन् 1955 में
बाकि तीनो सन् 1956 में
2- हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम एक्ट
3- हिन्दू अव्यस्क तथा संरक्षता एक्ट
4- हिन्दू एडोप्शन एवं मेंटिनेंस एक्ट
इन सब एक्ट में सबसे पहले हिन्दू कौन है इसकी परिभाषा लिखी। मुस्लिम, ईसाई, यहूदी,पारसी को छोड़कर जो भी है सब हिन्दू है।यानि सिक्ख,जैन, बौद्ध, आर्य समाज, ब्रह्मा समाज, प्रार्थना समाज,वीर शैव सब हिन्दू है। सन् 1956 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अंतर्गत महिलाओं को कृषि भूमि को छोड़कर बाकी सम्पत्ति मे पूरा हिस्सा मिलने का प्रावधान हो गया।
सन् 1995 में सरला मुद्गगल केस में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया। इससे पहले हिन्दू व्यक्ति मुस्लिम बनकर दूसरी शादी कर लेता था, परंतु इस केस में यह निर्णय दिया गया कि शादी करते समय जो धर्म व्यक्ति का होगा,उस पर वही मेरिज एक्ट लागू होगा।
सन् 2005 में हिंदू सक्शेसन एमेंडमेंट एक्ट लागू हो गया है जिसमें अब पुत्री को पुत्र की तरह ही सम्पत्ति मे हिस्सा मिलता है।
मुस्लिम पर्सनल लॉ की तरह भारत में कुछ जनजातियों के लिए भी अलग से कानून हैं। संविधान की धारा 371(A)(F) व 244(5-6) में इन जनजातियों के लिए अलग से प्रावधान है।केरल,गोवा में कैथोलिक ईसाई हैं, नागालैंड और मिजोरम में 80% ईसाई है।
इंडियन डायवर्स एक्ट - 1869 में एमेंडमेंट कर सन् 2001 में दूसरो जैसा ही कर दिया गया
गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट - 1890
इंडियन सक्शेसन एक्ट - 1925
क्रिश्चियन सीविल ला व क्रिश्चियन मेरिज एक्ट - 1872
कहने का तात्पर्य यह है कि यहूदी, ईसाई और पारसी के कानून यूनिफॉर्म सीविल काड के दायरें में आ गए हैं।
जब वैष्णो देवी मंदिर को सरकार ने अपने हाथ में ले लिया तो सरकार ने मंदिर के पुजारी की नौकरी की राशि नियत कर दी,इस पर माता वैष्णो देवी का पुजारी कोर्ट चला गया, उसने कहा कि मंदिर का पुजारी चढ़ावे का 25% लेता था,यह धर्म का मामला है सरकार इसमें नौकरी कैसे निश्चित कर सकती हैं, कोर्ट ने कहा कि पुजारी हो यह धर्म का मामला है परन्तु उसको कितनी राशि मिले यह धर्म का सेकुलर मामला है इसमें सरकार को हस्तक्षेप करने का अधिकार है। जो नौकरी सरकार दे रही है वही ठीक है।
जगन्नाथ मंदिर में वंशानुगत पुजारी होता रहा है, वहां पुजारी बदल दिया गया,जो वंशानुगत पुजारी चले आ रहे थे, उन्होंने कोर्ट में अपील की कि उनको गलत हटाया गया है, कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और कहा कि मंदिर में पुजारी होना चाहिए,वह किस वंश से हो इसका आरक्षण नही हो सकता।
केरल के मंदिर में गैर ब्राह्मण पुजारी बन गया, ब्राह्मणों ने कोर्ट में अपील की कि पुजारी तो ब्राह्मण ही होना चाहिए, कोर्ट ने यह अपील भी खारीज कर दी और कहा कि हिन्दू धर्म का मंदिर है इसलिए पुजारी हिंदू धर्म का होना चाहिए,उसकी जाति आरक्षित नही हो सकती।
बिल्कुल इसी तरह अजान लगाना धर्म का मामला है परंतु माइक से अजान लगाना धर्म का मामला नही है इस पर रोक लग सकती है।
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, इसलिए धर्म राज्य के अधीन स्वतंत्रता ले सकता है,राज्य का कानून सर्वोपरि है।
सन् 1964 में पं जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने दहेज के विरूद्ध भी एक कानून बना दिया।
सन् 1829 से लेकर सन् 1964 तक हिंदुओं के सुधार के लिए अनेक कानून बने, परन्तु मुस्लिमो के लिए कोई कानून नहीं बना। नेताओं के एक पक्ष का कहना था कि जब मुस्लिमो की ओर से कोई सुधार के लिए आगे आया ही नहीं तो कैसे करते,दूसरा पक्ष यह कहता रहा है कि यह मुस्लिम तुष्टिकरण है।
सन् 1975 में शाहबानो नाम की एक महिला का केस कोर्ट के सामने आया। इंदौर में अहमद खां नाम के एक मशहूर वकील थे, शाहबानो इनकी पत्नी थी, शाहबानो की शादी को हुए 16 वर्ष हो गए थे,इनके पांच बच्चे थे।इस परिस्थिति में अहमद खां ने दूसरी शादी कर ली, शादी के चालीस साल तक शाहबानो अपने पति के साथ ही रही, परन्तु सन् 1975 में घर छोड कर चली गई।अहमद खां ने अलग रह रही शाहबानो को सन् 1978 तक 200 रुपए प्रति माह गुजारा भत्ता दिया। लेकिन बाद में यह राशि देना बंद कर दिया और शाहबानो को तलाक दे दिया। अहमद खां ने तीन महीने इद्दत के हो जाने पर मेहर तथा बाकि रकम जो 5400 रूपये थी शाहबानो को दे दिया। शाहबानो कोर्ट चली गई। इंदौर के कोर्ट ने आदेश दिया कि अहमद खां 25 रुपए प्रतिमाह शाहबानो को गुजारा भत्ता देंगे।
परन्तु अहमद खां ने कोर्ट के फैसले को अपने धर्म में हस्तक्षेप मानते हुए इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, सन् 1980 में हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि 25 रुपए कम है अतः अहमद खां 189 रुपए प्रति माह शाहबानो को गुजारा भत्ता देंगे।अब अहमद खां सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, पांच जजों की बेंच ने इस मुकदमे को सुना तथा सन् 1985 में यह फैसला दिया कि हाईकोर्ट का फैसला ठीक है अहमद खां 189 रूपए प्रति माह गुजारा भत्ता देंगे तथा 10000 रूपए शाहबानो को ओर देंगे जो उसके कानूनी लडाई में खर्च हुए हैं।
इस समय राजीव गांधी की सरकार थी, सन् 1986 में राजीव गांधी की सरकार ने एक एक्ट पास किया जिसका नाम था   The Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act 1986 (मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम 1986) , जिसमें कहा गया कि मुस्लिमो पर डीवोरस में मुस्लिम पर्सनल लॉ ही लागू होगा।इस कानून में मेहर इद्दत और बच्चे दो शब्दों के लिए इतना जोड़ दिया कि फेयर एंड रिजनेबिल एमाउंट होना चाहिए।यह एमाउंट महिला का पति देगा, यदि वह सक्षम नही है तो महिला का पिता देगा, यदि वो दोनों भी नहीं है तो वक्फ बोर्ड देगा। सन् 1985 से लेकर 1997 तक पर्सनल लॉ के मामले में कोर्ट चुप रही। सन् 1997 में नोवल खा खातून का मामला कोर्ट के सामने आया, कोर्ट ने फेयर एंड रिजनेबिल एमाउंट की व्याख्या करते हुए कहा कि बच्चे जब तक व्यस्क नही हो जाते तब तक खर्चा देना होगा। सन् 2001 में डेनियल लतिफी जो शाहबानो के वकील थे ने सुप्रीम कोर्ट में फेयर एंड रिजनेबिल एमाउंट की व्याख्या क्या हो? यह पूछने के लिए केस डाल दिया। कोर्ट ने कहा कि जो महिला का स्टेंडर्ड आफ लिविंग पति के साथ रहते हुए था उसका हर महिने होने वाले खर्च को महिला की बची हुई जिंदगी की उम्र से केलकुलेट  करके जितने रुपये बैठेंगे वो तीन महीने इद्दत के पूरे होने पर देने होंगे। यदि पति इतनी रकम एक साथ देने में असमर्थ हैं तो उसकी किस्त बाधी जा सकती है।इस प्रकार मुस्लिम महिलाओं को मेंटिनेंस के मामले में न्याय मिल गया।
भारत में तलाक के 6 तरीके है।
1 - तलाक, इसमें पुरुष को विशेष अधिकार है।
 2- खुला , इसमें महिला तलाक दे सकती है पुरुष की रजामंदी से, इसमें पुरुष को मेहर नही देनी पडती।
3- मुबारत,इसका मतलब पिंड छुड़ाना।
4- तजबीब, कमेंट मेंट यानि वचन, विवाह के आसपास दिया वचन पूरा करना होता है।
5- लियान,पति द्वारा पत्नी पर,या पत्नी द्वारा पति पर व्याभिचार का आरोप लगाया गया हो और दोनों मे से कोई भी सिद्ध ना कर पाया हो।
6- खियार,यदि किसी लडकी का विवाह व्यस्क होने से पहले हुआ हो तो व्यस्क होने पर वह अपने निकाह को खारिज कर सकती हैं।
सन् 1939 में यदि मुस्लिम महिला चाहे तो कोर्ट से भी तलाक ले सकती है।
सायराबानो नाम की एक लड़की जो उत्तराखंड की रहने वाली थी,उसकी शादी उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में रीजवान अहमद के साथ हो गई।इनकी आपस में कुछ अनबन हो गई, सायरा बानो अपने पिता के घर चली आई, रिजवान अहमद ने स्पीड पोस्ट से तलाक भेज दिया।इस पर सायरा बानो संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट चली गई इन्होंने तीन तलाक,निकाह हलाला और चार पत्नियों के मुस्लिम पर्सनल लॉ के कानून को मुस्लिम महिलाओं के गरिमामय जीवन के विरूद्ध माना। सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक पर सुनवाई को स्वीकार किया। रिजवान अहमद मुस्लिम पर्सनल बोर्ड के पास गए, अदालत ने इस पर विचार किया कि क्या ट्रीपल तलाक धर्म का अनिवार्य हिस्सा है?या धर्म में बाद में जोडा गया हिस्सा है।इस विषय पर पांच जजों की बेंच बैठी तथा इस बेंच ने दिसम्बर सन् 2017 में फैसला दिया कि ट्रीपल तलाक असंवैधानिक है तथा भारत सरकार को निर्देशित किया कि संसद इस विषय पर कानून बनाये। सन् 2019 में संसद में लोकसभा और राज्यसभा दोनों से ट्रिपल तलाक के विरोध में कानून बन गया,अब भारत में किसी भी तरह का तलाक गैर कानूनी है।
शबाना हाशमी नामक महिला ने एक बच्चे को पाला था,वह उसे अपना बच्चा मानकर पाल रही थी, उसे अपने धर्म के मुस्लिम कानून का ज्ञान नहीं था, जिसमें किसी बच्चे की गार्जियन शिप तो ली जा सकती है परन्तु गोद नही लिया जा सकता।जब वह बच्ची व्यस्क हुई तब वह बात शबाना को पता लगी, ईसाई धर्म के लिए जुबेनाइल जस्टिस केयर एंड प्रोटेक्शन चिल्ड्रेन एक्ट- सन् 2000 से बच्चा गोद ले लेते हैं। शबाना हाशमी मामले में सन् 2014 में यह स्पष्ट हुआ कि अब कोई भी धर्म का आदमी बच्चा गोद ले सकता है।
जनजाति समुदाय जो हजारों साल से अलग थलग जी रहा था उसके लिए धारा 371(A) के तहत कुछ राज्यों में व्यवस्था की गई है। नागालैंड और मिजोरम में संविधान की धारा 371(F) के तहत संसद का कोई भी कानून वहा जभी लागू होगा जब वहा कि विधानसभा एक प्रस्ताव देगी।कस्टमी ला,सीवील ला और क्रिमिनल लॉ में से कुछ कानून वहा के अलग है। संविधान के 244(5,6) भाग में भारत में 10 ट्राईबल एरिया है, ट्राईबल एरिया 244(6) में आते हैं। मेघालय में 3, मिजोरम में 3,असम में 3, त्रिपुरा मे 1 ट्राईबल एरिया है।इनको डिस्ट्रिक ओटोमस कोंसिल का दर्जा मिला हुआ है।
मुस्लिमो के निकाह हलाला और चार पत्नियों के मुस्लिम पर्सनल लॉ के कानून के विरोध में सन् 2020 में कोर्ट ने केस स्वीकार कर लिया है,कोराना महामारी के कारण सुनवाई नही हो सकी है,इन दोनों पर कानून बनते ही पूरे भारत में सबके लिए यूनिफॉर्म सीविल काड बन जायेगा।निकाह हलाला पूरे इस्लाम जगत में बंद हैं अफगानिस्तान सहित।
समाप्त
संदर्भ ग्रंथ
डा विकास दिव्य कीर्ति
1- समान नागरिक संहिता, अर्थ, इतिहास और हिंदू कोड बिल 
https://youtu.be/xiVAIcDVYew
2- मुस्लिम पर्सनल लॉ, अल्पसंख्यक व जनजातिय कानून तथा समान नागरिक संहिता  https://youtu.be/MlBHGQB3Hr0


मंगलवार, 11 मई 2021

लेटरल एंट्री (पार्श्व नियुक्ति) - लेखक अशोक चौधरी मेरठ।

किसी पद पर प्रोपर चैनल के अनुसार कोई काबिल व्यक्ति ना मिल पाये,तब सरकार किसी दूसरे स्थान से किसी काबिल व्यक्ति की नियुक्ति कर दे,तो उसे लेटरल एंट्री या पार्श्व नियुक्ति कहते हैं।आज भारत में उच्च पदो पर लेटरल एंट्री एक बडा मुद्दा बना हुआ है।सिनियर ब्यूरोक्रेसी के पद पर जो भारत सरकार लेटरल एंट्री कर रही है यह तत्कालीन विवाद है परमानेंट नही।
जो लोग आइएएस की परिक्षा देकर आइएएस नही बने,उन लोगों की उच्च पदो पर नियुक्ति,जहा आइएएस की नियुक्ति होती थी, भारत सरकार द्वारा की जा रही है जो एक विवाद का कारण बन गई है।भारत सरकार ने फरवरी 2018-19 में जोइंट सेक्रेटरी की 10 वेकेंसी निकली थी, जिसमें 7 लेटरल एंट्री के माध्यम से ले लिए थे, सन् 2021 में 30   वेकेंसी निकाली, जिनमें 27 डायरेक्टर,3 जोइंट सेक्रेटरी है। डायरेक्टर के पद पर वही आइएएस जाता है,जो 13 वर्ष की नौकरी कर लेता है। जोइंट सेक्रेटरी के लिए 16-18 वर्ष नोकरी करने के बाद कोई आइएएस उपयुक्त माना जाता है।इन नौकरियों के लिए कोई भी ऐसा व्यक्ति जो योग्य हो, प्रोत्साहित करने वाला हो, भारतीय नागरिक हो तथा राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में भागेदारी करना चाहता हो,वो फार्म भर सकता है।
अब क्या भारत में ऐसा पहली बार हो रहा है,तब हम देखते हैं कि पहले भी सरकारें काबिल व्यक्तियों को लेती रही है, जैसे मनमोहन सिंह व डा अबुल कलाम दोनों आइएएस नही थे, परन्तु वे सीधे ले लिए गए थे। 
मनमोहन सिंह रिजर्व बैंक के गवर्नर, प्लानिंग कमीशन के डिप्टी चेयरमैन रहें, फाइनेंस मिनिस्ट्री में सलाहकार रहे।
अबुल कलाम जी सैक्रेटरी लेविल की पोस्ट पर रहे।
दूसरे कई लोग भी ऐसे ही उच्च पदों पर रहे हैं।
क्योंकि वो अपने क्षेत्रों के एक्सपर्ट थे। अमेरिका और चीन में तो यह सिस्टम सरकार मे है, अमेरिका का राष्ट्रपति अपनी इच्छा के अनुसार उच्च ब्यूरोक्रेसी में चार हजार पदों पर नियुक्ति कर सकता है। लेकिन भारत में सरकार का सिस्टम इंग्लैंड के आधार पर है, इसलिए यहा सरकारी व्यक्ति को तटस्थ रहना होता है।ये उच्च ब्यूरोक्रेसी के पद तीन या पांच साल के लिए संविदा पर होते हैं। यदि कोई व्यक्ति इस पद पर नियुक्त होकर नौकरी छोडना चाहें तो वह तीन महीने पहले नोटिस देगा, यदि सरकार किसी को हटाना चाहें तो वह भी तीन महीने पहले नोटिस देगी।
जब भारत सरकार पहले से ही लेती रही है तो अब शोर क्यो मच रहा है।
इन पदो पर नियुक्ति निकालने के दो कारण भारत सरकार ने बताये,पहला तो यही कि उच्च पदो को सम्भालने के लिए काबिल व्यक्ति चाहिए, दूसरा ये कि भारत में आइएएस अधिकारी कम है।आज भारत को 6500 आइएएस अधिकारी चाहिए, जबकि आज भारत के पास कुल पांच हजार आईएएस अधिकारी है।
सन् 2001 में निती आयोग ने सिफारिश की कि हायर सिविल सर्विस में लेटरल एंट्री को लाना चाहिए। सन् 2018-2021 में कुछ हद तक लेटरल एंट्री को नियम व्यवस्था के तहत लाया गया। नियुक्ति प्रक्रिया यूपीएससी के माध्यम से कर दी गई।
जब सन् 1991 में आर्थिक सुधार प्रारंभ हुए तब से आइएएस की वैकेंसी भारत सरकार ने कम निकालनी शुरू कर दी थी, सरकार का मानना था कि जब प्राईवेट सैक्टर बढेगा तो आइएएस अधिकारियों की आवश्यकता कम होगी। सन् 1996- 1997 से सन् 2003 तक आते-आते 55 आइएएस की हर साल वैकेंसी भारत सरकार की ओर से निकाली जाने लगी, जो सन् 2012 तक ऐसे ही निकलती रही, जबकि प्रत्येक वर्ष 200 वैकेंसी निकालनी चाहिए थी,इसका असर यह हुआ कि सन् 2012 तक आते-आते आइएएस अधिकारी कम पड गये। सन् 2012 के बाद से भारत सरकार 180 आइएएस की वैकेंसी हर वर्ष निकाल रही है।
मोदी जी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद 39 आइएएस अधिकारी काम करने की लापरवाही के कारण हटा दिए, जिससे और कमी आ गई।
सन् 1967 का एससी-एसटी के लिए व सन् 2018 का ओबीसी के लिए सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश है कि संविदा पर 45 दिन से अधिक की यदि कोई नियुक्त सरकार करेगी तो उसमें अनुसूचित जाति तथा पिछडी जाति के लिए आरक्षण होगा।
आइएएस के लिए जनरल की अधिकतम आयु 32 वर्ष, ओबीसी के लिए 35 वर्ष, एससी एसटी के लिए 37 वर्ष है, सेवानिवृत्ति आयु सबके लिए 60 वर्ष है।
जोइंट सेक्रेटरी बनने के लिए आइएएस अधिकारी की सर्विस 18 वर्ष, एडिशनल सेक्रेटरी के लिए 20 वर्ष, सेक्रेटरी के लिए 25-30 वर्ष होनी चाहिए। क्योंकि एससी-एसटी और ओबीसी की आयु 37 व 35 वर्ष हैं और सेवानिवृत्ति की आयु सबकी 60 वर्ष है, इसलिए एससी-एसटी को 23 वर्ष तथा ओबीसी को 25 वर्ष नौकरी के मिलते हैं,इस कारण एससी-एसटी और ओबीसी के लोग सेक्रेटरी जैसे पदो पर नही पहुंच पाते। क्योंकि
सेक्रेटरी बनने के लिए कम से कम 4 वर्ष की सर्विस बची हुई होनी चाहिए। आइएएस का इंटरव्यू 275 नम्बर का होता है। इंटरव्यू में आठ बोर्ड होते हैं। इनमें कुछ बोर्ड ऐसे होते है जो 170 से कम नम्बर नही दे सकते, कुछ ऐसे होते हैं जो 170 से ऊपर नम्बर नही दे सकते।इस कारण भी कुछ प्रतिभावान लोग भी इंटरव्यू में बाहर हो जाते हैं। क्योंकि कितना भी बुद्धिमान व्यक्ति का इंटरव्यू उस ग्रुप में पड गया जो 170 नम्बर से ऊपर दे ही नही सकता तो क्या करें?
समाप्त
संदर्भ ग्रंथ
लेटरल एंट्री- डा विकास दिव्य कीर्ति
https://youtu.be/1u0LZHCy6Ww

शुक्रवार, 7 मई 2021

गणतंत्र भारत- लेखक अशोक चौधरी।

आज भारत एक गणतंत्र है,जिसे अंग्रेजी में रिपब्लिक इंडिया कहते हैं।भारत एक वेलफेयर स्टेट है। स्टेट दो प्रकार की होती है,एक पुलिस स्टेट तथा दूसरी वेलफेयर स्टेट।
पुलिस स्टेट उसे कहते हैं जहां कानून का कड़ाई से पालन होता है,किसी कमजोर के लिए कानून मे कोई छूट नहीं होती।इसे निगेटिव डिस्क्रिमिनेशन अर्थात नकारात्मक भेदभाव भी कहा जाता है। लेकिन जो वेलफेयर स्टेट होता है,उस राज्य में ऐसे प्रावधान होते हैं जिसमें कमजोर के लिए कुछ छूट होती है,इसे पोजेटिव डिस्क्रिमिनेशन कहते हैं अर्थात सकारात्मक भेदभाव।
जैसे यदि किसी सामान्य परिवार में माता-पिता के दो बच्चे हैं,वो इन दोनों को एक-एक किलो दूध पीने के लिए रोज देता है, परंतु उन बच्चों में से एक बच्चा बीमार हो जाता है और डाक्टर यह सलाह देता है कि इस बीमार बच्चे को एक किलो दूध जो इसे मिल रहा है, से अधिक की आवश्यकता है। माता-पिता के पास इतना बजट नही है कि वो दोनों बच्चों को दो-दो किलो दूध की व्यवस्था कर सके।वह तो एक-एक किलो की ही पूर्ति मुश्किल से कर पा रहा है।तो वह यह व्यवस्था बनाता है कि जो स्वस्थ बच्चा है उसके एक किलो दूध में से आधा किलो दूध बीमार बच्चे को और देने लगता है।इस प्रक्रिया को सकारात्मक भेदभाव कहा गया है।इस नियम को अपनाने वाले स्टेट को वेलफेयर स्टेट कहते है।
वेलफेयर स्टेट भारत का मूल चरित्र रहा है, इसलिए हमारे यहा वसुदेव कुटुम्ब की धारणा रही है। परन्तु सन् 1192 से लेकर जो विदेशी शासन भारत में स्थापित हुआ, उसने पुलिस स्टेट को स्थापित कर दिया। लेकिन सन् 1815 से अंग्रेजों मे पुलिस स्टेट के स्थान पर वेलफेयर स्टेट के प्रयास प्रारंभ हुए, उस कारण अंग्रेजों ने भारत में भी इस ओर कदम बढाये तथा सन् 1829 से भारत में सुधार करने चालू किए।राजा राम मोहन राय की सिफारिश पर उस समय के गवर्नर जनरल ने सती प्रथा जैसी कुरिति को बंद करने के लिए कानून बनाये, सन् 1850 में लार्ड डलहौजी ने ईश्वर चंद्र विद्यासागर की सिफारिश पर अस्पृश्यता के निषेध का कानून बनाया। सन् 1857 की क्रांति के बाद और अधिक इस विषय में काम हुआ तथा सन् 1947 में भारत आजाद हुआ। 
15 अगस्त सन् 1947 से पहले भारत ब्रिटिश राज्य की एक कालोनी था,जिसे उपनिवेश कहते हैं। लेकिन 18 जुलाई सन् 1947 को लंदन की संसद ने यह प्रस्ताव पास कर दिया कि 15 अगस्त सन् 1947 को भारत को आजाद कर दिया जायेगा। तथा ब्रिटिश इंडिया को भारत और पाकिस्तान के रुप में दो डोमेनियन स्टेट में विभक्त कर दिया जायेगा।जिसे द इंडियन इंडिपेंडेंट एक्ट कहते हैं।इसी दिन वायसराय के स्थान पर गवर्नर जनरल का पद अस्तित्व में आ गया।अब भारत व पाकिस्तान की अंतरिम सरकार की कैबिनेट के निर्देश पर दोनों देशों के गवर्नर जनरल ब्रिटिश क्राउन के हस्ताक्षर से बनने थे, अतः भारत की कैबिनेट के निर्देश पर वायसराय माउंट बेटन को भारत का तथा मोहम्मद अली जिन्ना को पाकिस्तान का गवर्नर जनरल नामित कर दिया गया। दोनों देशों के संविधान बनने तक सन् 1935 के संविधान के अनुसार ही शासन चलना था।26 नवम्बर सन् 1949 को भारत का संविधान बनकर डा राजेन्द्र प्रसाद जी को सोप दिया गया, भारत के संविधान को बनाने में डा भीमराव अम्बेडकर तथा बीएन राव का विशेष योगदान रहा।26 नवम्बर सन् 1949 को ही संविधान के चार अनुच्छेद लागू हो गये, जिसमें एक भारत की नागरिकता,दूसरा चुनाव आयोग आदि थे।भारत के संविधान में आधे से अधिक सन् 1935 के संविधान से ही लिया गया है।
भारत का संविधान 26 जनवरी सन् 1950 को लागू हो गया।31 दिसम्बर सन् 1929 को कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पं जवाहरलाल लाल नेहरू ने यह घोषणा की थी कि भारत एक सम्प्रभु राष्ट्र बनेगा तथा 26 जनवरी सन् 1930 से कांग्रेस प्रत्येक 26 जनवरी को भारत की आज़ादी का उत्सव मनाती आ रही थी, इसलिए भारत के संविधान को लागू करने तथा भारत को ब्रिटेन के डोमिनियन स्टेट के स्थान पर एक गणतंत्र देश बनाने की घोषणा कर दी गई। भारतीय संविधान की धारा 395 के अंतर्गत मिले अधिकार से ब्रिटिश सरकार के दोनों एक्ट -
( 1) इंडियन इंडिपेंडेंट एक्ट 1947
(2) गवर्मेंट एक्ट 1935
 को समाप्त कर दिया।
भारत के राष्ट्रपति के पद पर डा राजेन्द्र प्रसाद को नामित कर दिया गया था।अब भारत एक रिपब्लिक देश बन गया था।
आज की दुनिया में
सऊदी अरब, नार्थ कोरिया,वेटेकन सिटी राजतंत्र से चल रहे हैं। राजतंत्र में सम्पूर्ण शक्ति राजा के पास होती है।
जारडन, ओमान निश्चित राजतंत्र से चल रहे हैं। निश्चित राजतंत्र में कुछ शक्ति राजा के पास होती है कुछ कैबिनेट के पास होती है।
इंग्लैंड, नार्वे,स्वीडन, डेनमार्क, भूटान, थाईलैंड, जापान संवैधानिक राजतंत्र से चल रहे हैं। संवैधानिक राजतंत्र में राजा सिर्फ नाममात्र का होता है, सम्पूर्ण कार्य जनता के द्वारा चुनी हुई कैबिनेट देखती है।
ग्रीस, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड,कनाडा आज भी ब्रिटेन के डोमेनियन स्टेट है।
भारत, अमेरिका, ब्राजील, फ्रांस, जर्मनी,इटली, स्वीटजरलैंड, पाकिस्तान, बंग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका सभी रिपब्लिकन देश है।
समाप्त
संदर्भ ग्रंथ
https://youtu.be/clGbdD6SxGo

मंगलवार, 2 मार्च 2021

अंतिम हिन्दू सम्राट गुर्जर राज-मरू गुर्जर राज पृथ्वीराज चौहान/ राय पिथोरा - लेखक अशोक चौधरी मेरठ।

 भारत के इतिहास में अपने पूर्वजों के महान कार्यों को समझने के लिए विद्वानों ने इसे कई कालखंडों में विभाजित किया है।इन कालखंडों में एक काल हिन्दू काल भी है,जो सिंधु के राजा दाहिर से प्रारंभ होकर पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु तक या  इस्लामिक हमलावर मुहम्मद बिन कासिम (सन् 712) से लेकर मोहम्मद गोरी ( सन् 1192) के हमले तक है।इस 480 वर्ष के समयांतराल में राजा दाहिर का संघर्ष,उसके बाद गुर्जर प्रतिहार राजाओं का संघर्ष तथा चौहान राजाओं का संघर्ष अविस्मरणीय है।इस संघर्ष काल को ही मोहम्मद बिन कासिम द्वारा हिन्दूओं से संघर्ष तथा ग्यारहवीं शताब्दी में महमूद गजनवी के साथ आये विद्वान अलबरूनी द्वारा लिखित पुस्तक तहकीक-ए-हिन्द के आधार पर हिंदू काल की संज्ञा दी जा सकती है। इस समयांतराल के संघर्षों में एक संघर्ष सम्राट पृथ्वीराज चौहान का भी है।भारत के इतिहास में इस संघर्ष का महत्व इसलिए भी अधिक है कि पृथ्वीराज चौहान के मोहम्मद गोरी से हार जाने के बाद भारत में विदेशी मुस्लिम शासन की स्थापना हो गई थी।
सम्राट पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु ( सन् 1192) से लेकर भारत के आजाद (सन् 1947) होने तक का 755 वर्ष का समय हिन्दूओं द्वारा अपने अस्तित्व को बचाने के लिए किए गए संघर्ष का काल है।
 भारत की राजनीति में  पटना, कन्नौज और अजमेर के बाद दिल्ली एक राजधानी के रुप में पृथ्वीराज चौहान के मोहम्मद गोरी से हार जाने के बाद ही स्थापित हुई।
भारत के चौहान राजाओं में पांच चौहान सम्राट हुए हैं, सबसे पहले बीसलदेव, दूसरे अमर गंगेय ,तिसरे पृथ्वीराज द्वितीय,चौथे सोमेश्वर चौहान और पांचवें पृथ्वीराज चौहान तृतीय जिनको राय पिथोरा भी कहा गया है।
 चौहान राजाओं में तीन पृथ्वीराज चौहान हुए हैं, पृथ्वीराज चौहान प्रथम(सन्1090-1110), पृथ्वीराज चौहान द्वितीय (सन 1165-1169), पृथ्वीराज चौहान तृतीय(सन्1178-1192)। 
यहां हमारे अध्ययन का केन्द्र  पृथ्वीराज तृतीय है। जिन्हें इतिहास में अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान उर्फ राय पिथोरा तथा पृथ्वीराज चौहान के दरबारी जयानक के द्वारा लिखित पृथ्वीराज विजय में गुर्जर राज व मरू गुर्जर राज कहा गया है।
पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल में चौहानों का राज्य विंध्याचल से हिमालय तक फैला था। दिल्ली, हांसी,थानेश्वर व नगरकोट चौहान राज्य का हिस्सा थे। पृथ्वीराज चौहान के समय दिल्ली अजमेर का एक ठिकाना थी तथा दिल्ली के तोमर और मेवाड़ के गहलोत,  चौहान सम्राट पृथ्वीराज के सामंत थे। गुर्जर प्रतिहार राजाओं के सामंत से सम्राट तक की यात्रा चौहान राजाओं ने किस प्रकार तय की,इसे जानने के लिए देखें-
 परिशिष्ट नंबर- 1
 
   बीसलदेव चौहानों के प्रथम सम्राट थे।बीसलदेव ने ही धार की तरह अजमेर में संस्कृत विद्यालय तथा सरस्वती का मंदिर बनवाया, जिसे अब ढाई दिन का झोपड़ा कहते हैं तथा बीसलसर झील का निर्माण करवाया।बीसलदेव ने  गुर्जर प्रतिहार सम्राटों की तरह परमभट्टारक,महाराजाधिराज, परमेश्वर, श्रीमद् उपाधि धारण की। सन् 1158 के नाहड़ लेख के अनुसार अपने नाम के पीछे देवराज की उपाधि भी बीसलदेव ने प्राप्त की।बीसलदेव का एक शिलालेख अजमेर संग्राहलय में रखा है जिसमे चौहानों को सूर्यवंशी क्षत्रिय कहा गया है।
सम्राट बीसलदेव के साहित्य प्रेम व विद्वता तथा विद्वानों का आदर करने के कारण उन्हें कवि बांधव की उपाधि दी गई थी। 
ऐसा माना जाता है कि बीसलदेव के समय ही सहारनपुर में शाकुम्भरी माता का मंदिर बना, बीसलदेव चौहान तथा पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल के मध्य (सन् 1150-1192) ही दिल्ली के आसपास दादरी दनकौर के क्षेत्र में 360 गांव भाटी गुर्जर तथा कैराना के आसपास 84 गांव चौहान गुर्जरों को चौहान सम्राट द्वारा जागीर देकर बसाया गया है।
सम्राट बिसलदेव की मृत्यु के बाद उसका अल्पव्यस्क पुत्र अमरगंगेय शासक बना, परन्तु अमरगंगेय को जगदेव के पुत्र पृथ्वीराज चौहान द्वितीय ने हटा दिया और खुद सम्राट बन गया। सन् 1169 में पृथ्वीराज चौहान द्वितीय की मृत्यु हो गई।वह निसंतान था।
 सन् 1170 में बिजौलियां शिलालेख में चौहानों को विप्र श्रीवत्स गोतभूते लिखा है,यहा विप्र का अर्थ विद्वान,वत्स का अर्थ पुत्र तथा गोत का अर्थ कुल या वंश है जिसका अर्थ है विद्वान कुल के पुत्र।ऐसा बीसलदेव चौहान के विद्वान होने के कारण लिखा गया है, परन्तु इतिहास कार दशरथ शर्मा ने इसको पढ़कर चौहानों को ब्राह्मण ही लिख दिया।
उस स्थिति में अजमेर के सामंतों ने सोमेश्वर चौहान को सम्राट बनाने के लिए अपना समर्थन दिया। सोमेश्वर चौहान अरणोराज का छोटा पुत्र था। सोमेश्वर चौहान अपने नाना सिद्धराज चालुक्य के पास गुजरात में रह रहे थे। सोमेश्वर चौहान की शादी चेदी देश (वर्तमान में जबलपुर के पास) के कलचूरी राजा की राजकुमारी कर्पूरी देवी के साथ हो गई थी, अपने नाना के यहां ही सोमेश्वर चौहान के दो पुत्र पृथ्वीराज चौहान व हरिराज चौहान तथा एक पुत्री पृथा पैदा हो गई थी। अजमेर में शासन करने के लिए सोमेश्वर चौहान अपने नाना के यहां से नागर वंशी ब्राह्मण स्कंद,बामन तथा सौर नामक योग्य व्यक्तियों को ले आये थे। सन् 1178 में सोमेश्वर चौहान की मृत्यु हो गई थी।18 अगस्त सन् 1178 का आवल्दा नामक स्थान से  सोमेश्वर चौहान का एक अंतिम शिलालेख प्राप्त हुआ है तथा 14 मार्च सन् 1179 का बडल्लया नामक स्थान से पृथ्वीराज चौहान तृतीय का प्रथम शिलालेख प्राप्त हुआ है, इसलिए विद्वानों का ऐसा मानना है कि पृथ्वीराज चौहान उर्फ राय पिथोरा का राजतिलक अगस्त 1178 व मार्च 1179 के समयांतराल में कभी हुआ है। सम्राट बनने के समय पृथ्वीराज चौहान की आयु 12-13 वर्ष थी। अल्पव्यस्क होने के कारण पृथ्वीराज चौहान की माता कर्पूरी देवी ने राजकाज को अच्छी तरह से सम्भाल लिया। कर्पूरी देवी ने राजकाज को सम्भालने के लिए कदम्वास दाहिमा नामक एक योग्य व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त किया तथा अपने सहयोग के लिए चेदि देश से अपने चाचा भुवनमल्ल को भी अजमेर बुला लिया।
पृथ्वीराज चौहान व हरिराज चौहान की शिक्षा दीक्षा की व्यवस्था सरस्वती कंठावरण पाठशाला अजमेर में की गई। पृथ्वीराज विजय के अनुसार पृथ्वीराज चौहान 64 कला व 14 विद्याओं में पारंगत थे। धर्मशास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, संगीत कला, इंद्र जाल, कविता, वाणिज्य विनिमय तथा 6भाषाए  संस्कृत अपभ्रंश, प्राकृत,पेशाची महाघवी एवं सूरसेनी के साथ  अनेक देशी भाषाएं,पक्षी भाषाएं, गणित विद्या के साथ तलवार,भाला, धनुष सहित 36 प्रकार के अस्त्र शस्त्र चलाने व धारण करने में दक्ष थे।
पृथ्वीराज चौहान ने दो वर्ष पश्चात ही अपनी माता से शासन की बागडोर अपने हाथ मे ले ली।शासन को अपने अनुरूप चलाने के लिए पृथ्वीराज चौहान ने अपने मंत्रिमंडल में आमूलचूल परिवर्तन किया। प्रधानमंत्री कदम्वास के स्थान पर पं पद्मनाभ को प्रधानमंत्री नियुक्त किया, सेनापति भुवनमल्ल के स्थान पर गुजरात से आये नागर ब्राह्मण स्कंद को सेनापति बना दिया गया। सेनापति स्कंद के सहयोग के लिए उदयराज,कातिया, गोपाल सिंह चौहान सेना नायक बनाये गये। जयानक, विद्यापति गोंड,वासिश्वर,विश्वरूप,रामभट्ट और प्रताप सिंह को मंत्री बनाया गया। मंत्री जयानक ने ही पृथ्वीराज विजय की रचना की।
पृथ्वीराज चौहान को अपदस्थ करने के लिए सम्राट बिसलदेव के पुत्र  अमरगंगेय ने विद्रोह कर गुड़गांव पर अधिकार कर लिया। पृथ्वीराज चौहान ने अमरगंगेय को परास्त कर मार डाला। अमरगंगेय के छोटे भाई नागार्जुन ने भी विद्रोह का झंडा खडा कर दिया। पृथ्वीराज चौहान के राज्य के उत्तरी भाग में मथुरा, भरतपुर,अलवर के आसपास भडानक (भडाना जो गुर्जर जाति का एक गोत्र है) बडी संख्या में रहते थे जो एक शक्तिशाली तथा लडाका समुदाय के रूप में प्रसिद्ध थे।ये भडानक भी नागार्जुन के सहयोगी बन गए।इस विद्रोह को दबाने के लिए पृथ्वीराज चौहान ने बडी तैयारी के साथ योजना बनाई। पृथ्वीराज चौहान अपनी सेना लेकर जब नागार्जुन से युद्ध के लिए आगे बढ़ा तो नागार्जुन युद्ध से पहले ही भाग गया। नागार्जुन के सेनापति ने पृथ्वीराज चौहान का सामना किया परन्तु वह भी परास्त हो गया। नागार्जुन की माता, स्त्री और बच्चे तथा कुछ सैनिकपकड़ लिए गए। पृथ्वीराज विजय के अनुसार अजमेर लाकर सभी विद्रोहियों को मार डाला गया तथा विद्रोहियों के सर अजमेर के प्रमुख स्थानों पर टांग दिए गए, जिससे कोई आगे विद्रोह करने से पहले उसके परिणाम से परिचित रहें।
सन् 1182 में पृथ्वीराज चौहान ने एक बडी सेना लेकर भडानको  (भडाना)पर हमला किया ।भड़ानक’ मुख्य रूप से  मथुरा, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली क्षेत्र में निवास करते थे और यह क्षेत्र इनके राजनीतिक आधिपत्य के कारण ‘भड़ाना देश’ अथवा ‘भड़ानक देश’ कहलाता था। सम्भवतः भड़ानकों की बस्तियाँ दिल्ली के दक्षिण में फरीदाबाद जिले तक थीं, जहाँ आज भी ये बड़ी संख्या में निवास करते हैं। फरीदाबाद जिले में भड़ानों के बारह गांव आबाद हैं। इतिहासकार दशरथ शर्मा के अनुसार जब शाकुम्भरी के राजा पृथ्वीराज चौहान ने भड़ाना देश पर आक्रमण किया, उस समय पर इस राज्य की पूर्वी सीमा पर चम्बल नदी एवं कछुवाहों का ग्वालियर राज्य था,  पूर्वोत्तर दिशा में इसकी सीमाएँ यमुना नदी एवं गहड़वालों के कन्नौज राज्य तक थी। इसकी अन्य सीमाएँ शाकुम्भरी के चौहान राज्य से मिलती थी। भड़ाना या भड़ानक देश एक पर्याप्त विस्तृत राज्य था। स्कन्द पुराण के विवरण के अनुसार भड़ाना देश में 1,25,000 ग्राम थे। समकालीन चौहान राज्य में भी इतने ग्राम न थे। पृथ्वीराज चौहान ने भडानको की हाथी सेना को परास्त कर उत्तर की ओर धकेल दिया। समकालीन लेखक जिनपथि सूरी ने अपने ग्रंथ में इस हमले का वर्णन किया है।
 पृथ्वीराज चौहान ने अगला हमला मोहबा के चंदेल राजा परमाल देव पर किया। चौहान राज्य की पूर्वी सीमा मोहबा से मिलती थी। चौहान गुर्जर प्रतिहार राजवंश के सबसे अधिक निकट तथा विश्वस्त सहयोगी थे। परंतु चंदेल राजा विद्याधर ने गुर्जर प्रतिहार सम्राट राजपाल को मार डाला था,इस कारण चौहान और चंदेलो के सम्बन्ध में  एक खटास बनी हुई थी। चंदेल राजा ने कन्नौज के राजा जयचंद से सन्धि कर रखी थी।
 मध्य भारत के जेजाभक्ति(सन् 1531 के बाद बुंदेलखंड) क्षेत्र में मोहबा, कालिंजर का प्रसिद्ध दुर्ग तथा राजा पृथ्वीराज चौहान का ननिहाल चेदि देश,जहा कलचूरी राजवंश का शासन था, चंदेलों और कलचूरी राजवंश के राज्य को मिलाकर जो क्षेत्र बनता था,वो सन 1531के बाद बुंदेलखंड कहलाया।   सन् 1182 के मदनपुर शिलालेख के अनुसार पृथ्वीराज चौहान ने जेजाभुक्ति को नष्ट कर दिया तथा चंदेल राज्य पर आक्रमण कर दिया।इस हमले का सामना करने के लिए चंदेल राजा ने अपने प्रसिद्ध योद्धा आल्हा-ऊदल को,जो इस समय कन्नौज में थे को बुलावा भेजा। आल्हा-ऊदल अपनी मात्रभूमि की रक्षा के लिए मोहबा आ गये। मात्रभूमि और राष्ट्र का आशय उस समय,उस स्थान या राज्य से होता था, जिसमें वह निवास करता था, आल्हा-ऊदल चंदेल राजा परमाल के सेनापति जस्सराज के पुत्र थे तथा अहीर जाति की  उप-जाति बनाफर में पैदा हुए थे। आल्हा-ऊदल ने मोहबा को बचाने के लिए भयानक युद्ध किया।जब युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की सेना भारी पडने लगी तो ऊदल ने अपनी पगड़ी में शालिग्राम और मूंह में तुलसी रखकर अपनी सेना के साथ घोड़ों से नीचे उतर कर घमासान युद्ध किया,इस युद्ध में ऊदल पृथ्वीराज चौहान के योद्धा काका कन्ह चौहान के हाथो वीरगति को प्राप्त हो गया,राजा पृथ्वीराज चौहान भी बुरी तरह घायल होकर जमीन पर गिर गया।ऊदल की मृत्यु होते ही चंदेल राजा ने अपनी हार स्वीकार कर ली, चंदेल राजा के हारने के बाद धासान नदी के पश्चिमी भाग सागर,ललकपुर,ओरछा, झांसी,सिरसवा, गढ़ मोहबा का बहुत सा भू-भाग पृथ्वीराज चौहान के हाथो में आ गया। पृथ्वीराज चौहान ने अपने सामंत पंजावन राय को इस क्षेत्र का प्रांतपति बना दिया।इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान भले ही विजयी हो गये, परंतु आल्हा-ऊदल की वीरता आज तक भी भारतीय जनमानस के मन पर छाई हुई है,वो अमर हो गए।आम जनमानस में इस युद्ध में आल्हा-ऊदल ही विजेता माने जाते हैं।
अब पृथ्वीराज चौहान के राज्य की सीमाएं कन्नौज राज्य की सीमा से मिल गई थी।
मोहबा पर विजय के पश्चात सम्राट पृथ्वीराज चौहान के राज्य की सीमाएं उत्तर में जम्मू के राजा, दक्षिण में चालुक्य शासक, उत्तर पूर्व में कन्नौज के गढ़वाल शासक तथा पश्चिम में मुस्लिम शासकों से मिल गयी।इस कारण ये सब पृथ्वीराज चौहान के शत्रु बन गए थे। परन्तु सबसे अधिक खतरा इनमें से चौहान साम्राज्य को होना था,तो वह वह पश्चिम की ओर से था।
पश्चिम में गजनी में इस समय गोर वंश का शासन था, मोहम्मद गोरी भी गजनवी की तरह भारत पर हमला कर,अरब के खलिफाओ से प्रशंसा प्राप्त करना चाहता था। मोहम्मद गोरी महमूद गजनवी के द्वारा बनाए गए अमीरों से राज्य को छीनकर अपने कब्जे में करते हुए आगे बढ़ रहा था। मोहम्मद गोरी ने गजनवी द्वारा स्थापित पंजाब के अमीरों को पराजित कर सन् 1179 में पेशावर,  पंजाब के स्यालकोट, सन् 1182 में मोहम्मद गोरी ने सिंध क्षेत्र के देवल को अपने अधिकार में कर लिया। सन् 1185 में लाहौर  को भी अपने अधिकार में ले लिया। लाहौर पर अधिकार हो जाने के बाद पंजाब के सरहिंद से मोहम्मद गोरी के राज्य की सीमा लग गई। सरहिंद का दुर्ग पृथ्वीराज चौहान के राज्य में था।
सन् 1182 में मोहम्मद गोरी और जम्मू के राजा चक्रदेव के मध्य एक संधि हुई,खोखरो के दमन के लिए। सन् 1185 में मोहम्मद गोरी ने सतलज के किनारे बसे छोटे छोटे हिन्दू राजाओं को अपने अधीन करने के लिए प्रयास किए,ये राजा अपने गुट के नेता राजा चंद्र राज के नेतृत्व में पहले गुजरात के सोलंकियों के पास सहायता के लिए पहुंचे। लेकिन यहा से कोई सहायता ना मिलने के कारण अजमेर में सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पास पहुंचे।सतलज के इन राजाओं ने कभी सम्राट बिसलदेव चौहान की सेना के साथ मिलकर गजनी के शासकों से युद्ध किया था,उसी का वास्ता देकर सम्राट पृथ्वीराज चौहान से मदद की गुहार लगाई। सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने इन सबकी मदद के लिए अपनी सेना को सेनापति चामुण्ड राय तथा भुवनक मल्ल के नेतृत्व में मोहम्मद गोरी से युद्ध के लिए भेजा तथा स्वयं भी साथ चल दिए। सिंधु और सतलज के मध्य किसी स्थान पर भयानक युद्ध हुआ, जिसमें मोहम्मद गोरी पराजित हुआ तथा बंदी बना कर सम्राट पृथ्वीराज चौहान के सामने पेश किया गया। सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने गजनी से हर वर्ष निश्चित कर लेने के संधि प्रस्ताव पर गोरी को छोड दिया।
गजनी से कर लेने के लिए अपने मंत्री प्रताप सिंह को नियुक्त किया।यह प्रताप सिंह धन का लोभी था,गजनी से मिले कर मे से कुछ धन चुरा लेता था, अजमेर की महत्वपूर्ण सूचनाएं भी गोरी को देने लगा था।एक बार पृथ्वीराज चौहान ने प्रताप सिंह के स्थान पर अपने दूसरे सामंत शूर सिंह पंवार को कर लेने के लिए गजनी भेज दिया।जब गोरी को यह मालूम हुआ कि प्रताप सिंह के स्थान पर कोई ओर कर लेने के लिए आया है,तब मुहम्मद गोरी ने शूर सिंह को अपमानित करने की कोशिश की, परन्तु शूर सिंह ने गोरी के भरे दरबार में गोरी के एक सेनानायक सहित 74 दरबारियों को मार डाला तथा वो खुद भी वीरगति को प्राप्त हो गये।गोरी ने दोगुना कर देकर तथा क्षमा का एक पत्र लिखकर सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पास भेज दिया।
अब पुनः प्रताप सिंह ही गजनी से कर लेने के लिए जाने लगा।
सन् 1189 में मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान के अधीन भटिंडा पर हमला कर दिया।इस हमले पर पृथ्वीराज चौहान ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की।
सन् 1191 में मोहम्मद गोरी ने सरहिंद के किले पर हमला कर अपने अधिकार में ले लिया ,अब पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गोरी के विरूद्ध सैनिक अभियान किया। पृथ्वीराज चौहान ने अपने सामंत दिल्ली के राजा गोविन्द राय तोमर/ खांडेराव तोमर(दिल्ली के तंवर,देखे परिशिष्ट नम्बर- 2) को मोहम्मद गोरी पर हमले का आदेश दिया। गोविंद राय तोमर ने थानेश्वर और करनाल के मध्य तराईन के मैदान में गोरी की सेना पर जोरदार हमला किया।इस युद्ध में गोविंद राय तोमर का मोहम्मद गोरी से आमना-सामना हो गया। मोहम्मद गोरी के हमले से गोविन्द राय तोमर के दो दांत टूट गए, परन्तु गोविंद राय तोमर ने मोहम्मद गोरी पर ऐसा जोरदार हमला किया कि वह बुरी तरह घायल हो गया, मोहम्मद गोरी की सेना में भगदड़ मच गई।इस भगदड़ में मोहम्मद गोरी के सेनानायक किसी प्रकार घायल मोहम्मद गोरी को बचा ले गये। पृथ्वीराज चौहान ने आगे बढ़कर सरहिंद के किले पर हमला कर अपने अधिकार में ले लिया तथा मोहम्मद गोरी की ओर से नियुक्त सरहिंद के किलेदार काजी जियाउद्दीन को बंदी बना लिया। पृथ्वीराज चौहान काजी जियाउद्दीन को पकड़ कर अजमेर ले आया।पृथ्वीराज चौहान से काजी जियाउद्दीन ने निवेदन किया कि यदि सम्राट उसके प्राण बख्श दे तथा मुक्त कर दे तो वह सम्राट को विपुल धन देगा। सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने  धन लेकर काजी जियाउद्दीन को छोड दिया।काजी जियाउद्दीन गजनी चला गया।हम ऊपर लिख चुके हैं कि सूफी भी मुस्लिम बादशाह के साथ रहते थे,इस दौरान भी मोहम्मद गोरी के साथ मोहिनुद्दीन चिश्ती नाम के एक सूफी साथ थे। सूफी मोइनुद्दीन चिश्ती वापस नही गया।वह फकीरों का भेष बनाकर अजमेर में ही रहने लगा।मिनाज- उल- सिराज, अबुल फजल तथा मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनि ने अपनी पुस्तकों में मोइनुद्दीन चिश्ती के अजमेर आने के विषय में लिखा है।
ऊधर मोहम्मद गोरी ने स्वस्थ होकर नये सिरे से गजनी में सेना एकत्रित करनी प्रारंभ कर दी। पूरे एक वर्ष तक तैयारी करने के बाद मोहम्मद गोरी एक लाख बीस हजार की सेना लेकर पृथ्वीराज चौहान पर हमला करने के लिए गजनी से चल दिया। सन् 1192 के युद्ध से पहले पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गोरी की सेना के बीच अनेक छोटी बडी झड़पें हुईं।इन झड़पों के बारे में पृथ्वीराज रासो में 21 बार,हम्मीर काव्य में 7 बार, पृथ्वीराज प्रबंध में 8 बार,सुरजन चरित्र में 21 बार, प्रबंध चिंतामणि में 23 बार पृथ्वीराज चौहान की मोहम्मद गोरी पर विजय बताई गई है। प्रबंध कोष में 20 बार पृथ्वीराज चौहान के द्वारा मोहम्मद गोरी को परास्त कर पकड़ कर छोड़ना लिखा है।इन ग्रंथों के प्रचार के कारण पृथ्वीराज चौहान की छवि एक बिल्कुल अनुभव हीन राजनितिक राजा की बन गई है। पृथ्वीराज चौहान एक सम्राट था,वह अपने दुश्मनों से निपटना जानता था, कौन सा दुश्मन उसके लिए कितना हानिकारक है वह भली-भांति समझता था। पृथ्वीराज चौहान ने अपने रिश्ते के भाई अमरगंगेय व नागार्जुन के परिवार को भी गिरफ्तार कर जिंदा नही छोडा था तो मोहम्मद गोरी को कैसे छोड देता। वास्तविकता यही है कि  छोटी बडी कुछ झड़पों में पृथ्वीराज चौहान का पलडा भारी रहा। मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान के पास अपना दूत अजमेर भेजा और कहा कि या तो पृथ्वीराज चौहान इस्लाम स्वीकार कर ले,या गम्भीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार हो जाये। पृथ्वीराज चौहान ने जबाव दिया कि या तो गजनी वापस लौट जाओ, वर्ना भेट युद्ध के मैदान में होगी।
गोरी ने पृथ्वीराज चौहान का उत्तर सुनकर छल करने का निर्णय लिया। गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को लिख भेजा कि वह अपने बड़े भाई जो कि सुल्तान है, से पूछ कर निर्णय लेगा। गोरी ने कहा वह भी युद्ध नही चाहता। यदि मेरे बडे भाई जो कि गजनी का सुल्तान है, की सहमति मिलने पर वापस चला जायेगा। परन्तु पृथ्वीराज चौहान पंजाब, मुल्तान व सरहिंद पर गजनी का अधिकार मान ले।
पृथ्वीराज चौहान तुरन्त अजमेर से एक सेना लेकर तराईन की ओर चल दिया। पृथ्वीराज चौहान की सेना का मुख्य भाग, सेनापति स्कंद के साथ था,वह साथ नही चल सका तथा पिछे रह गया।दूसरा सेनापति उदयराज भी समय से अजमेर से रवाना ना हो सका। पृथ्वीराज चौहान का मंत्री सोमेश्वर जो पृथ्वीराज चौहान के द्वारा पहले दंडित किया जा चुका था, चुपके से अजमेर से निकल कर मोहम्मद गोरी से जा मिला। जम्मू का हिंदू राजा भी अपनी सेना लेकर गोरी से जा मिला।
तराईन के द्वीतिय युद्ध के समय पृथ्वीराज चौहान की आयु कुल 26 वर्ष थी। पृथ्वीराज चौहान का प्रमुख सेनापति स्कंद, मंत्री प्रताप सिंह एवं सोमेश्वर तीनों ही पृथ्वीराज चौहान के वफादार नहीं थे। सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती भी पल-पल की सूचना मोहम्मद गोरी को दे रहा था। पृथ्वीराज चौहान की अन्य सेनाएं पृथ्वीराज चौहान से कितनी दूर थी इसकी सम्पूर्ण जानकारी  मोहम्मद गोरी को थी। पृथ्वीराज चौहान के साथ दिल्ली का राजा गोविन्द राय तोमर अपनी सेना के साथ था। पृथ्वीराज चौहान ने अपनी सेना का खेमा सरस्वती नदी के एक किनारे पर  लगा दिया, मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को धोखा देने के लिए अपनी सेना की छोटी सी टुकडी का एक खेमा सरस्वती नदी के दूसरे किनारे पर लगा दिया तथा सेना के मुख्य भाग को पीछे छिपाकर रखा। पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गोरी को सूचना भेजी कि या तो वह युद्ध करें वर्ना भाग जाये। मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज से निवेदन किया कि उसने अपना दूत अपने बड़े भाई के पास भेजा है,वह तो सिर्फ सेनापति है सुल्तान तो उसका बडा भाई ही है, इसलिए कुछ समय दें। पृथ्वीराज चौहान गोरी के द्वारा प्रयोग किए गए  झांसे में आ गया । मोहम्मद गोरी ने अपनी सेना के पांच भाग किये। पांच जगह दस-दस हजार घुड़सवार रखें।चार टुकड़ियों को पृथ्वीराज चौहान की निंद्रा में पडी सेना पर चारों ओर से हमला करने के लिए एक मार्च,दिन रविवार सन् 1192 की प्रातः काल में भेज दिया। युद्ध की यह तिथि दिल्ली के तोमर ग्रंथ के लेखक हरिहर निवास द्विवेदी ने अपनी पुस्तक में लिखी है। मोहम्मद गोरी के साथ रहें हसन निजामी ने हिजरी 581, रमजान महीने के प्रारम्भ होने से पहले युद्ध का समाप्त होना लिखा है,जो 10 सितम्बर सन् 1192 है। अजमेर, नागौर आदि स्थानों पर अप्रैल और मई 1192 के शिलालेख लगें हैं, जिनमें तराईन के युद्ध में बलिदान हुए योद्धाओं की पत्नियों के सती होने का उल्लेख है। अतः हरिहर निवास द्विवेदी की तिथि 1 मार्च सन् 1192 बिल्कुल ठीक है।
 दुष्ट मोहम्मद गोरी ने अचानक हमला कर  पृथ्वीराज चौहान की सेना का कत्लेआम शुरू कर दिया। हजारों सैनिक मार डालें गये।यह युद्ध नही था एक भयंकर दुर्घटना थी।इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की सेना के ना तो रण गजो पर होदे चढ़े ,ना घोड़ों पर जीन कसी,ना सैनिक कवच धारण कर घोड़ों पर सवार हो सकें।ना कुमकुम का तिलक लगा सकें,ना अपने चारणो और भाटो द्वारा अपने पूर्वजों की बहादुरी का बखान सुन कर शत्रु से दो-दो हाथ कर सके।अचानक हुए इस हमले से पृथ्वीराज चौहान की सेना में भगदड़ मच गई। तराईन के प्रथम युद्ध के विजेता गोविंद राय तोमर ने साहस दिखाते हुए अपनी गज सेना को तैयार कर मोहम्मद गोरी की सेना का सामना किया। गोविंद राय तोमर ने अपनी सेना के दाहिने ओर की कमान पदमशाह रावल को तथा बायी ओर की कमान भोला उर्फ भुवनेक मल्ल के नेतृत्व में लेकर युद्ध प्रारम्भ कर दिया।इस संकट की घड़ी में गोविंद राय तोमर ने अदम्य साहस का प्रदर्शन किया, उसने अपने सम्राट पृथ्वीराज चौहान को एक हाथी पर बैठाकर भयंकर युद्ध किया। युद्ध का परिणाम अपने विरूद्ध जाता देख एक दिशा में आक्रमण कर सम्राट को युद्ध के मैदान से निकालने का रास्ता बना दिया। अब पृथ्वीराज चौहान हाथी से नीचे उतर कर घोड़े पर सवार हो गया। पृथ्वीराज चौहान की सेना को एक ओर से निकलते देख गोरी ने अपने पांचवें दस्ते को उस पर हमले का आदेश दिया।दूसरी ओर इस घमासान युद्ध में गोविंद राय तोमर वीर गति को प्राप्त हो गया।  गोरी के सैनिकों ने पृथ्वीराज चौहान को चारों ओर से घेर लिया।इस पर पृथ्वीराज चौहान अपने को घिरा देख शत्रु पर प्राणघातक आक्रमण करने के लिए सैनिकों सहित घोड़े से नीचे उतर कर  युद्ध करने लगा। परन्तु तुर्की सैनिक अधिक होने के कारण निकलने का रास्ता ना मिल सका।एक तुर्की सैनिक ने युद्ध कर रहे पृथ्वीराज चौहान के गले में लोहे की सिंहनी डाल दी और पृथ्वीराज चौहान को गिरफ़्तार कर लिया।इस प्रकार तराईन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की पराजय हो गई।17 मार्च सन् 1192 को दिल्ली पर मोहम्मद गोरी का अधिकार हो गया।
मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को अजमेर में अपने अधीन बना कर शासन चलाना प्रारंभ किया।
 मोहम्मद गोरी ने कई प्रकार के सिक्के चलवाये, जिनमें एक ओर पृथ्वीराज चौहान तथा दूसरी ओर मोहम्मद गोरी का नाम अंकित था।
भारतीय ग्रंथ पृथ्वीराज प्रबंध तथा मोहम्मद गोरी के समकालीन मुस्लिम लेखक हसन निजामी के द्वारा रचित ग्रंथ ताज - उल - मासिर के अनुसार
अजमेर में ही गोरी ने अपने विरूद्ध षड्यंत्र रचने का आरोप लगा कर पृथ्वीराज चौहान की हत्या कर दी।
हसन निजामी ने पृथ्वीराज चौहान को  इस्लाम का शत्रु उसी प्रकार कहा है। जिस तरह सम्राट मिहिर भोज के शासनकाल में सन् 851 ई. में सुलेमान नाम का अरब भूगोलवेत्ता और व्यापारी भारत आया। उसने अपने ग्रन्थ ‘सिलसिलात-उत तवारीख’ में गुर्जर प्रतिहारो को  अरबों का सबसे बड़ा शत्रु कहा है। 
मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान के अल्पव्यस्क पुत्र  को विपुल कर लेकर अजमेर का शासक नियुक्त कर दिया।
इस प्रकार भारत के एक युग का दुखद अंत हो गया।
मोइनुद्दीन चिश्ती ने अजमेर में अपना एक खानगाह (मठ) बनाया। मोहम्मद गोरी ने मोइनुद्दीन चिश्ती को सुल्तान-ए-हिंद की उपाधि प्रदान की।
समाप्त

नोट- पृथ्वीराज रासो सन् 1676 ई में मेवाड़ के राणा राज सिंह प्रथम को अजमेर से प्राप्त हुई थी। पृथ्वीराज रासो में पृथ्वीराज चौहान की माता कमला देवी को दिल्ली के राजा अनंगपाल तोमर की पुत्री  बताया गया है जो गलत है, पृथ्वीराज चौहान और जयचंद को मौसेरे भाई तथा दुश्मनी का कारण दिल्ली के राज का पृथ्वीराज चौहान को मिलना बताया गया है, जबकि दिल्ली के तोमर तो पहले से ही अजमेर के चौहान राजाओं के सामंत थे। फिर जयचंद को दिल्ली कैसे मिल सकती थी। मोहम्मद गोरी को धीर सिंह पुंडीर द्वारा गिरफ्तार कर लिया जाना लिखा है जो सत्य नही है। तराईन के दूसरे युद्ध की तिथि संवत 1158 अर्थात सन् 1101 लिखी है,वह भी गलत है,इस प्रकार पृथ्वीराज रासो ग्रंथ एतिहासिकता से दूर हो गया है। क्योंकि पृथ्वीराज विजय का लेखक जयानक तराईन के युद्ध में अपने स्वामी की हार होते ही अजमेर को छोड़कर कश्मीर चला गया था।इस कारण पृथ्वीराज चौहान पर कोई लिखित ग्रंथ नही था। परन्तु सन् 1876 में जयानक द्वारा लिखित पृथ्वीराज विजय नामक ग्रंथ मिल गया।
संस्कृत भाषा में विरचित जीवनीपरक ऐतिहासिक महाकाव्यों की श्रृंखला में काश्मीर निवासी महाकवि श्री जयानक द्वारा प्रणीत पृथ्वीराजविजय महाकाव्यम् शीर्षक ग्रन्थ अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। भूर्जपत्र पर लिखित इस ग्रंथ की पाण्डुलिपि की पहली खोज डॉ. जी. बूह्लर द्वारा सन् 1876 में की गई थी, जब वे संस्कृत की प्राचीन पाण्डुलिपियों का पता लगाने के लिए काश्मीर गये थे। उन्होंने तत्सम्बद्ध सम्पूर्ण सामग्री ‘डेक्कन कॉलेज, पुना’ को सुपुर्द कर दी, जिनका विवरण उस कॉलेज की सन् 1875-76 की 150वीं संख्या पर उल्लिखित है। डॉ. बूह्लर ने अपनी शोधयात्रा का विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत करते समय इस बात पर हार्दिक दुःख प्रकट किया है कि संस्कृत के अमर ग्रन्थों की पाण्डुलिपियों की वर्तमान दुर्दशा निस्संदेह हमारे लिए दुर्भाग्य की सूचक है।
डॉ. बूह्लर की समग्र रिपोर्ट का गम्भीर अध्ययन करने के पश्चात् स्वर्गीय पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने और पूर्वतः म.म.पं. गौरीशंकर ओझा ने तदनंतर ‘पृथ्वीराजविजय महाकाव्य’ का सुसम्पादित संस्करण वि. संवत् 1995 अर्थात सन् 1938 में वैदिक यंत्रालय, अजमेर से प्रकाशित कराया।
परिशिष्ट नंबर-1
अरब हमलावरों से भारत को बचाने के लिए गुर्जर प्रतिहार नागभट प्रथम के नेतृत्व में बप्पा रावल, देवराज भाटी व अजयराज चौहान (प्रथम) ने भारी संघर्ष किया।  गुर्जर प्रतिहार
 नागभट द्वितीय (सन् 816-833)  ने अपने शासन काल में कई महत्वपूर्ण सफलताएं अर्जित की। नागभट द्वितीय ने चित्तौड़ के गहलोत व सौराष्ट्र के बाहकधवल के सहयोग से उणियारा (वर्तमान में टांक राजस्थान में)नामक स्थान पर पाल शासक धर्मपाल को पराजित कर दिया तथा सांभर के चौहान राजा गुवक प्रथम की सहायता से मत्स्य देश (वर्तमान अलवर राजस्थान में) के निकुंभ राजा को भी पराजित कर दिया। नागभट द्वितीय ने प्रसन्न होकर चौहान राजा गुवक प्रथम को "वीर" की उपाधि से विभूषित किया। गुर्जर प्रतिहार अपनी राजधानी कन्नौज मे स्थापित हो गए थे, इसलिए पुरानी राजधानी जालौर के क्षेत्र में चौहान उनके सबसे विश्वसनीय और प्रमुख प्रतिनिधि थे, इसलिए चौहान राजा गुवक प्रथम को दी गई "वीर" उपाधि को सम्पूर्ण क्षेत्र में रहने वाले गुर्जर आज भी धारण किए हुए हैं तथा गुर्जर बाहुल्य गांव में जगह जगह गांव में अंदर जाने  के रास्ते पर आज भी "वीर गुर्जर" द्वार लिखा मिल जायेगा। चौहान राजा गुर्जर प्रतिहार राजाओं के लिए कितने महत्वपूर्ण थे,इस बात का पता इस एक रिश्तें से ही चल जाता है कि चौहान गुवक द्वितीय की बहन कलावती गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज की रानी थी। 
सम्राट मिहिर भोज के पोत्र सम्राट महिपाल  (सन् 914-943) के अंतिम दिनों में गुर्जर प्रतिहार राजाओं की शक्ति क्षीण होने लगी थी,इस कारण महोबा के चंदेल,सांभर के चौहान, चित्तौड़ के गुहिल तथा ग्वालियर के कच्छपघट(कछवाहे) एक तरह से स्वतंत्र शासक बन गए थे। सम्राट महिपाल के समय सांभर के चौहान वाक्पतिराज प्रथम (सन् 917-944)शासक थे।इसके बाद सिम्ह राज (सन्944-971),विग्रह राज द्वीतिय (सन् 971-998)शासक बनें।
चौहान राजा दुर्लभ राज द्वीतिय (सन् 998-1012) ने मुस्लिम सेनापति शाहबुद्दीन को परास्त किया और गोविंद राज तृतीय (सन् 1012-1026),वाक्पतिराज द्वितीय (सन् 1026-1040) चौहान शासक रहें।
यह ग्यारहवीं शताब्दी का वह समय था जब बगदाद के खलीफा भारत को दारूल हरब से दारूल इस्लाम बनाने के प्रयास में नाकाम हो चुके थे। अतः भारत को दारूल इस्लाम बनाने के लिए किये जाने वाले संघर्ष की कमान सैनिक कार्यवाही के लिए अफगानिस्तान के तुर्क शासको पर तथा शांति मार्ग से इस्लाम को फैलाने की जिम्मेदारी सूफी सम्प्रदाय पर आ गई थी। ग्यारहवीं शताब्दी में इमाम गज्जाली ने सूफी मत को इस्लाम के एक हिस्से के रूप में मान्यता दे दी थी। ये सूफी अरब व बगदाद के मुस्लिम व्यापारियों के साथ भारत में आ गए तथा भारत के आम जनमानस में घुल-मिल कर रहने लगे थे।
अरबी शासकों ने अपने तुर्क गुलामों को इस्लाम में दिक्षित कर अपने अंगरक्षक बनाने प्रारंभ कर दिए थे।जो तुर्क गुलाम अधिक काबिल होते थे वो सेनानायक भी बनने लगे थे तथा उच्च पदों पर जाने लगे थे।ये गुलाम तुर्क सरदार अपने महलों व अपने अंगरक्षक के रूप में तुर्की गुलाम ही नियुक्त करते थे।
गजनी में एक दुर्ग था जिसका निर्माण कभी भाटी राजाओं ने करवाया था।यह दुर्ग अल्तगीन तुर्क के अधीन था,इस अल्तगीन का वंश ही गजनी वंश कहलाया।अल्तगीन एक तुर्की गुलाम था,अल्तगीन के बाद सुबुक्तगीन शासक बना, सन् 997 में सुबुक्तगीन की मृत्यु के बाद सुबुक्तगीन का छोटा बेटा गजनी का शासक बना, परन्तु सुबुक्तगीन के बड़े बेटे महमूद ने अपने छोटे भाई की हत्या कर के गजनी की सत्ता पर कब्जा कर लिया।यही महमूद, महमूद गजनवी के नाम से जाना गया। महमूद गजनवी ने खलीफा से यह आग्रह किया कि यदि खलिफा उसे सुल्तान घोषित कर दे तो वह जब तक जीवित रहेगा तब तक भारत पर हमला करता रहेगा तथा कुफ्र का सफाया कर देगा,खलीफा को लूट की सम्पत्ति में भी हिस्सा देगा।खलीफा की समझ में महमूद गजनवी की बात आ गई और महमूद गजनवी एक गुलाम से सुल्तान बन गया।खलीफा अलकाहिदे बिल्लाह ने महमूद गजनवी को यामिनीद्दोला अर्थात साम्राज्य का दाहिना हाथ और अमीनउलमिल्लत अर्थात मुसलमानों का संरक्षक नामक उपाधियां प्रदान की।यामिनीद्दोला उपाधि के कारण ही महमूद गजनवी का वंश यामिनी वंश कहलाया।अपनी बात को सत्य सिद्ध करते हुए महमूद गजनवी ने भारत पर सन् 1000 से लेकर सन् 1027 तक लगातार 17 हमले किए।
महमूद गजनवी के द्वारा किए गए इन 17 हमलों में तीन हमले बडे महत्वपूर्ण है।
वो सन 1008 में हिंदू शाही के राजा जयपाल, सन् 1018 में कन्नोज के गुर्जर प्रतिहार राजा राजपाल तथा सन्1025 में सोमनाथ पर प्रमुख रूप से किये गये हमले है। जिनके कारण भारत की राजनीतिक व सामाजिक प्रतिष्ठा को गहरा आघात लगा। सन् 1030 में महमूद गजनवी की मृत्यु हो गई। महमूद गजनवी के उत्तराधिकारियों में सत्ता संघर्ष शुरू हो गया। अतः उपयुक्त अवसर का लाभ उठाते हुए
वीर्य राम चौहान (सन् 1040) ने गजनी की सेना को परास्त कर दिया। चौहान राजा विग्रह राज तृतीय (सन् 1070-1090) ने दिल्ली के तोमरो के सहयोग से हांसी,थानेश्वर व नगर कोट को गजनवी के उत्तराधिकारियों के शासन से मुक्त करा लिया। विंध्याचल से हिमालय तक विदेशी मुस्लिम शासकों को भगा दिया गया। पृथ्वीराज प्रथम ने गजनी के सेनापति तुगस्दीन को युद्ध में हरा दिया।
चौहान राजा अजयराज द्वीतिय (सन् 1110-1135) ने अजमेर को अपनी राजधानी बनाया।अब चौहान राजधानी सांभर के स्थान पर अजमेर हो गई। अजयराज चौहान के शासनकाल में नागौर पर गजनी के शासकों का कब्जा हो गया था। परन्तु अजयराज चौहान के उत्तराधिकारी अरणोराज(सन् 1135-1150) उर्फ आना जी ने नागौर दुर्ग को पुनः अपने अधिकार में ले लिया तथा गजनी के शासकों को यहां से मार कर भगा दिया।अरणोराज के समय मुस्लिम सेना पुश्कर तक पहुंच गई थी,अरणोराज ने तारागढ़ क़िले से कुछ दूरी पर इस तुर्की सेना को युद्ध में समाप्त कर दिया तथा पुश्कर की पहाड़ियों से निकलने वाली चंद्रा नदी के पानी को लाकर युद्ध स्थल पर एक झील का निर्माण करवाया, जिसे आनासागर झील कहते हैं।अरणोराज ने परमभट्टारक,महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।अरणोराज की उसके बड़े पुत्र जगदेव ने हत्या कर दी तथा अजमेर की गद्दी पर अधिकार कर लिया। परंतु अरणोराज के छोटे भाई विग्रह राज चतुर्थ उर्फ बीसल देव(सन् 1150-1164) ने पिता के हत्यारे जगदेव को गद्दी से हटा दिया।अब बीसलदेव अजमेर के शासक बन गए।बीसलदेव बड़े ही शक्तिशाली चौहान शासक हुए।इन बीसलदेव के समय में गजनी की मुस्लिम सेना वर्तमान राजस्थान में शेखावाटी में स्थित भवेरा गांव तक आ पहुंची थी। लेकिन बीसलदेव ने अपनी सेना तथा सहयोगियों की मदद से इन मुस्लिम सेनाओं को अटक नदी के पार खदेड दिया तथा हिमालय से लेकर विंध्याचल तक का क्षेत्र विदेशी मुस्लिम हमलावरों से खाली करा लिया।बीसलदेव का दिल्ली में एक शिलालेख 9 अप्रैल सन् 1163 का प्राप्त हुआ है,जिसको शिवालिक स्तम्भ लेख भी कहते हैं।इस शिलालेख में बीसलदेव के द्वारा किए गए कार्यों का वर्णन है।बीसलदेव ने दिल्ली के राजा अनंगपाल तोमर को भी अपने अधीन कर लिया।बीसलदेव साहित्य प्रेमी, साहित्यकारों का आश्रय दाता था,बीसलदेव को कवि बांधव की उपाधि प्राप्त थी,वह हरि वेली नाटक के रचनाकार थे। इस समय चौहान राज्य की सीमा शिवालिक पहाड़ी सहारनपुर उत्तर प्रदेश से लेकर अटक नदी तक थी। 
परिशिष्ट नम्बर- 2
दिल्ली के तंवर -
दिल्ली के शासक अनंगपाल तोमर प्रथम ने सन् 735 के आसपास दिल्ली की सत्ता सम्भाली। अनंगपाल तोमर प्रथम का वास्तविक नाम राजा जाऊ था,वो ऐशो के राजा थे। दिल्ली को केंद्र बनाकर हस्तिनापुर तक के क्षेत्र में जब उनका राज स्थापित हो गया,उस समय इस क्षेत्र को अनंग देश के नाम से जाना जाता था।इस अनंग देश के राजा होने के कारण उनको अनंगपाल तोमर प्रथम के नाम से जाना गया। योगमाया माता तंवरो की कुल देवी है।राजा अनंगपाल तोमर प्रथम ने दिल्ली में योगमाया माता का मंदिर बनवाना। योगमाया माता का वाहन चील होने के कारण इनको चिलाय माता भी कहा जाता है।
अनंगपाल तोमर प्रथम के समय भारत पर अरबों के हमले हो रहे थे। दिल्ली के तंवरो ने गुर्जर प्रतिहार राजाओं के साथ सहयोग कर इस संघर्ष में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
सन् 1081 तक राजा अनंगपाल तोमर द्वीतिय का शासन रहा है।
राजा अनंगपाल तोमर द्वीतिय ने ही दिल्ली में लालकोट किले का निर्माण कराया था तथा विष्णु स्तम्भ को बनवाया था। दिल्ली के तंवर गुर्जर प्रतिहार नागभट्ट प्रथम के सहयोगी रहे तथा तब गुर्जर प्रतिहार सम्राट बने, पहले सम्राट वत्सराज के  सामंत रहें, जब सन् 1036 में गुर्जर प्रतिहार सम्राट समाप्त हो गये,तब दूसरे सामंतो की तरह दिल्ली के तंवर भी स्वतंत्र हो गये। परन्तु अजमेर के प्रथम चौहान सम्राट बिसल देव के समय फिर दिल्ली के तंवर चौहान सम्राट के सामंत बन गए थे।राजा अनंगपाल तोमर द्वीतिय के वंशज मदन पाल तंवर की पुत्री का विवाह सम्राट बिसल देव के साथ हो गया था। सम्राट बिसल देव, सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय/राय पिथोरा/गुर्जर राज मरू गुर्जर राज पृथ्वीराज चौहान के सगे ताऊ थे। इसलिए दिल्ली के तंवर पृथ्वीराज चौहान के भी मामा थे। पृथ्वीराज चौहान के समय दिल्ली का राजा मदन पाल तंवर का पुत्र पृथ्वीराज तंवर था।
सन् 1190 में मदन पाल तंवर की मृत्यु के बाद गोविन्द राय तोमर दिल्ली का राजा बन गया था।यही गोविन्द राय तोमर तराईन के प्रथम युद्ध का विजेता था ।यही गोविन्द राय तोमर तराईन के द्वीतिय युद्ध में शहीद हो गया था।इन दोनों युद्धों में गोविंद राय तोमर पृथ्वीराज चौहान का सेनापति था।
आज भी दिल्ली में तंवर गुर्जरों के प्रसिद्ध आठ गांव है।
1- फतेहपुर बेरी
 पूर्व सांसद कंवर सिंह तंवर, छतरपुर के पूर्व विधायक ब्रहम सिंह तंवर और विधायक करतार सिंह तंवर इसी गांव से है।
2- असौला
3- चंदन होला
पूर्व विधायक बलराम सिंह तंवर इसी गांव से है।
4- डेरा
5- मांडी
6- भाटी कला
7- भाटी खुर्द
8- बांस
समाप्त
संदर्भ ग्रंथ-
1- भड़ना देश एवं वंश- डां सुशील भाटी।
2- दिल्ली की दर्द भरी दास्तां (36,37,38,39)- यूट्यूब,डा मोहनलाल गुप्ता।
https://youtu.be/-roFAyzJNhQ
3- अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान (7,10,11,12,18,23)- डा मोहनलाल गुप्ता यूट्यूब।
https://youtu.be/ryLT9J7tgJU
4-https://youtu.be/g6Bl9vifK1o
5-https://youtu.be/0kxsDcHZWAk

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

प्रार्थना-पत्र

सेवा में
श्रीमान प्रधानमंत्री जी/ग्रह मंत्री जी/कृषि मंत्री जी
भारत सरकार।
विषय- भारत सरकार द्वारा लागू किए गए कृषि कानूनों में सुधार हेतु सुझाव।
मान्यवर
भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र में सुधार हेतु तीन कानून बनाए हैं,इन कानूनों का भारत के किसानों द्वारा विरोध किया जा रहा है।इन तीनों कानूनों में कुछ सुधार किसान हितों के लिए आवश्यक है,जो निम्न हैं-
1- कृषि विवाद को सुलझाने के लिए इन कानूनों में एसडीएम और डीएम को नियुक्त किया गया है। इन दोनों पदों में राजनीतिक हस्तक्षेप अधिक होता है। इसलिए न्यायालय जाने का किसी भी पक्ष को अधिकार देना बेहद जरूरी है, अतः एसडीएम और डीएम के साथ न्यायालय जाने का भी अधिकार सरकार दे।
2- ऐपीएमसी (मंडी) में जब किसान फसल विक्रय करने के लिए जाता है तो मंडी का टैक्स किसान को देना होता है।
परन्तु नये बने कानूनों में किसान अपनी फसल कही भी बेच सकता है, जिस पर कोई टैक्स नहीं होगा,इस कारण कोई किसान मंडी के अंदर अपनी फसल बेचने क्यों जायेगा?
अत भारत सरकार को मंडी टैक्स को भी शून्य कर देना चाहिए।
3- (क)कांट्रैक्ट फार्मिंग के अंतर्गत किसान के साथ जो एग्रिमेंट किया जाय,उसका फार्मेट भारत सरकार के द्वारा एक जैसा ही बनना चाहिए, किसान के साथ तय की गई फसल की दर, जमीन का क्षेत्रफल तथा खसरा नंबर तथा कितने समय के लिए एग्रिमेंट किया गया और किसान के हस्ताक्षर का कालम ही किसान और कांट्रेक्टर द्वारा भरा जाना चाहिए।
(ख)नये बने क़ानून में किसान की फसल किस न्यूनतम दर से एग्रिमेंट होगी,इसकी कोई व्यवस्था सरकार ने नही की है, फसल की न्यूनतम दर के लिए या तो सरकार एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य)को कानूनी मान्यता प्रदान करें या एग्रिमेंट के समय अंतराष्ट्रीय बाजार में जो फसल की दर हो, उससे नीचे किसान की फसल का एग्रीमेंट नही होना चाहिए।
4- भारत सरकार प्रत्येक किसान को 6000 रूपए प्रति वर्ष किसान सम्मान निधि के रुप में दे रही है,ना होने से कुछ होना अच्छा है।
यह राशि बहुत कम है, भारत में 86% छोटी जोत वाले किसान है,इन 86% किसानों को किसान सम्मान निधि 50000 रूपए प्रति किसान सरकार को देनी चाहिए।
5- दुग्ध उत्पादन के लिए जो नागरिक गाय- भैंस पाल रहै है तथा दुग्ध बेचते हैं,उनका रजिस्ट्रेशन होना चाहिए तथा इन कार्य में लगे नागरिकों को भी दुग्ध सम्मान निधि के रुप में प्रत्येक वर्ष कोई निश्चित राशि सरकार को देनी चाहिए।
इसमें भी छोटी जोत वाले किसान की तरह दो से अधिक तथा अधिकतम 20 गाय या भैंस तक की सीमा रेखा तय की जा सकती है।
 भारत के एक जागरूक नागरिक के नाते मेरी ओर से  उपरोक्त सुझाव आपके सामने प्रस्तुत है।
भवदीय
अशोक चौधरी (अध्यक्ष प्रताप राव गुर्जर स्मृति समिति मेरठ, पूर्व महासचिव गुर्जर महासभा उत्तर प्रदेश)
108/1 नेहरू नगर गढ रोड़ मेरठ(उत्तर प्रदेश)।
मोबाइल नंबर- 9837856146