रविवार, 14 फ़रवरी 2021

प्रार्थना-पत्र

सेवा में
श्रीमान प्रधानमंत्री जी/ग्रह मंत्री जी/कृषि मंत्री जी
भारत सरकार।
विषय- भारत सरकार द्वारा लागू किए गए कृषि कानूनों में सुधार हेतु सुझाव।
मान्यवर
भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र में सुधार हेतु तीन कानून बनाए हैं,इन कानूनों का भारत के किसानों द्वारा विरोध किया जा रहा है।इन तीनों कानूनों में कुछ सुधार किसान हितों के लिए आवश्यक है,जो निम्न हैं-
1- कृषि विवाद को सुलझाने के लिए इन कानूनों में एसडीएम और डीएम को नियुक्त किया गया है। इन दोनों पदों में राजनीतिक हस्तक्षेप अधिक होता है। इसलिए न्यायालय जाने का किसी भी पक्ष को अधिकार देना बेहद जरूरी है, अतः एसडीएम और डीएम के साथ न्यायालय जाने का भी अधिकार सरकार दे।
2- ऐपीएमसी (मंडी) में जब किसान फसल विक्रय करने के लिए जाता है तो मंडी का टैक्स किसान को देना होता है।
परन्तु नये बने कानूनों में किसान अपनी फसल कही भी बेच सकता है, जिस पर कोई टैक्स नहीं होगा,इस कारण कोई किसान मंडी के अंदर अपनी फसल बेचने क्यों जायेगा?
अत भारत सरकार को मंडी टैक्स को भी शून्य कर देना चाहिए।
3- (क)कांट्रैक्ट फार्मिंग के अंतर्गत किसान के साथ जो एग्रिमेंट किया जाय,उसका फार्मेट भारत सरकार के द्वारा एक जैसा ही बनना चाहिए, किसान के साथ तय की गई फसल की दर, जमीन का क्षेत्रफल तथा खसरा नंबर तथा कितने समय के लिए एग्रिमेंट किया गया और किसान के हस्ताक्षर का कालम ही किसान और कांट्रेक्टर द्वारा भरा जाना चाहिए।
(ख)नये बने क़ानून में किसान की फसल किस न्यूनतम दर से एग्रिमेंट होगी,इसकी कोई व्यवस्था सरकार ने नही की है, फसल की न्यूनतम दर के लिए या तो सरकार एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य)को कानूनी मान्यता प्रदान करें या एग्रिमेंट के समय अंतराष्ट्रीय बाजार में जो फसल की दर हो, उससे नीचे किसान की फसल का एग्रीमेंट नही होना चाहिए।
4- भारत सरकार प्रत्येक किसान को 6000 रूपए प्रति वर्ष किसान सम्मान निधि के रुप में दे रही है,ना होने से कुछ होना अच्छा है।
यह राशि बहुत कम है, भारत में 86% छोटी जोत वाले किसान है,इन 86% किसानों को किसान सम्मान निधि 50000 रूपए प्रति किसान सरकार को देनी चाहिए।
5- दुग्ध उत्पादन के लिए जो नागरिक गाय- भैंस पाल रहै है तथा दुग्ध बेचते हैं,उनका रजिस्ट्रेशन होना चाहिए तथा इन कार्य में लगे नागरिकों को भी दुग्ध सम्मान निधि के रुप में प्रत्येक वर्ष कोई निश्चित राशि सरकार को देनी चाहिए।
इसमें भी छोटी जोत वाले किसान की तरह दो से अधिक तथा अधिकतम 20 गाय या भैंस तक की सीमा रेखा तय की जा सकती है।
 भारत के एक जागरूक नागरिक के नाते मेरी ओर से  उपरोक्त सुझाव आपके सामने प्रस्तुत है।
भवदीय
अशोक चौधरी (अध्यक्ष प्रताप राव गुर्जर स्मृति समिति मेरठ, पूर्व महासचिव गुर्जर महासभा उत्तर प्रदेश)
108/1 नेहरू नगर गढ रोड़ मेरठ(उत्तर प्रदेश)।
मोबाइल नंबर- 9837856146

रविवार, 3 जनवरी 2021

भारत का किसान और वर्तमान सरकार द्वारा लाये गये कृषि बिल और उनकी वास्तविकता - अशोक चौधरी मेरठ

भारत का किसान सैकड़ों वर्षों से प्रताड़ित रहा है, दिल्ली में सन् 1192 में विदेशी तुर्क शासन स्थापित हो गया था।जब भारत में भारतियों का शासन था तब किसान से फसल का छठवां हिस्सा यानि 16% लगान शासक द्वारा लिया जाता था।यदि किसान इस लगान को देने में कभी कभी असमर्थ हो जाता था तो शासक वर्ग किसान की समस्या पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करता था,उसकी समस्या को दूर करने की कोशिश करता था, परंतु तुर्की शासन अपने सैनिक बल पर ही स्थापित था, अतः तुर्की शासकों ने भारतीय किसानों से फसल का आधा यानि 50% लगान वसूल किया,लगान बडी निर्दयता से वसूला जाता था, भारत की हिन्दू जनता के प्रति उनके मन में कोई दयाभाव नही था,उनका न्याय सिर्फ मुस्लिमों तक ही सीमित था, अतः लोग मुसलमान बनने लगे, सुल्तान ग्यासुद्दीन तुगलक के समय (सन्1320-1325) तक यानि तुर्की शासनकाल जो 125 वर्ष से चल रहा था, काफी संख्या में भारतीय मुसलमान बन गए थे। अतः सुल्तान ने कृषि नीति बनाई, जिसमें हिन्दू किसानों पर तो लगान फसल का आधा ही रखा गया, परन्तु मुस्लिम किसानों पर लगान फसल का सातवां और दसवां भाग अर्थात 14%व 10% लगाया गया। फिरोजशाह तुगलक (सन् 1351-1388) ने चार नेहरे बनवायी तथा लगान का पुनः निर्धारण किया।नेहर का पानी प्रयोग करने वाले मुस्लिम किसानों पर 25%लगान तथा हिंदू किसानों पर 60%लगान लगा दिया गया, अकबर(सन् 1570-1605) के शासनकाल में भारतीयों को सत्ता में साझेदार तो बना लिया गया परन्तु लगान की दर फसल का आधा हिस्सा ही रही,अंतर सिर्फ इतना रहा कि हिंदू और मुस्लिम दोनों किसानों से लगान की दर समान कर दी गई। औरंगजेब(सन् 1658-1707) के शासनकाल में फिर मुस्लिम किसानों से लगान की दर फसल का चौथाई हिस्सा यानि 25% रखी गई।उससे आगे चलकर अंग्रेज भारत के शासक बने, किसान पर लगान अंग्रेजी शासन में भी कम नहीं हुआ,उसी शोषण के कारण 1857 की क्रांति हुई,जब रानी विक्टोरिया के हाथ में शासन चला गया,तब भी भारत में किसान आंदोलन चलते रहे, अंग्रेजों के शासन में दो प्रकार का भारत था,एक वह भारत, जिसका शासन सीधा अंग्रेजों के हाथ में था,दूसरा वह भारत जिसका शासन,भारतीय राजाओं के माध्यम से अंग्रेजों के हाथ में था, अतः अंग्रेजों के सीधे हाथ में जो भारत था उसमें भी किसान आंदोलन हुए, परंतु अंग्रेज अपने सीधे शासन के भारत में हुए आंदोलनों को जल्दी ही हल कर लिया करते थे, जैसे चम्पारण का आंदोलन जिसका नेतृत्व महात्मा गांधी जी ने किया तथा गुजरात में खेड़ा का आंदोलन,जिसका नेतृत्व सरदार पटेल ने किया था।वही पर मेवाड़ रियासत में बिजौलियां का किसान आंदोलन जिसका नेतृत्व विजय सिंह पथिक ने किया था,वो 43 वर्ष चला।
किसान लूटता पिटता आ रहा था, सन् 1947 में देश आजाद हुआ,देश का संविधान बना,तब यह भरोसा दिलाया गया कि भारत एक कृषि प्रधान देश है अतः किसानों के हित प्राथमिकता पर रहेंगे।भूमि सुधार के प्रयास किए गए,लगान की दर बहुत कम कर दी गई,खेती की आमदनी को इंकमटैक्स के दायरे से बाहर कर दिया गया।
आजाद भारत में कृषि के लिए कानून बनाने का संवैधानिक अधिकार राज्यों को दिया गया, परंतु भारत की केंद्र सरकार को बहुत जल्द ही यह अहसास हो गया कि कृषि का अधिकार यदि सिर्फ राज्यों पर ही रहा तो सुधार होना मुश्किल है, इसलिए सन् 1954 में संविधान में तिसरे संशोधन के द्वारा  संविधान की समवर्ती सूची की धारा 33 के अंतर्गत केंद्र सरकार को भी अधिकार दिया गया कि वह भी किसानों के लिए कानून बना सकती है।
सन् 1947 से लेकर सन् 2014 तक संसद में 1274 बार किसानों की समस्याओं पर चर्चा हुई है, आजादी के बाद 21 वी सदी के प्रारम्भ सन् 2000 तक 56 किसान आंदोलन हुए हैं,56 बार ही किसानों की समस्या पर प्रस्ताव पास किए गए।प्रस्ताव पर हुई चर्चा के समय संसद में 28 बार 15% से भी कम सांसद संसद में उपस्थित रहे हैं,बाकि 28 में 15% सांसद संसद में उपस्थित रहें हैं।15% की उपस्थिति संसद में प्रस्ताव पर बहस का कोरम पूरा करने के लिए आवश्यक है।जो इस बात को दर्शाता है कि भारत के सांसदो की किसानों की समस्या के हल मे कोई रूचि नहीं है।
देश के आजाद होने के बाद महात्मा गांधी जी ने कहा था कि क्या हम देश के किसान को उपज का वह मूल्य निर्धारण कर सकते हैं जो देश के चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी की नौकरी की बढ़ोत्तरी से तालमेल खा जाये? 
डा राजेंद्र प्रसाद जी ने कहा था कि क्या हम देश के उन लोगों को गरीबी की उस रेखा से ऊपर उठा सकते हैं जो अपने लिए बाजार भाव से अनाज खरीद सके ? यदि देश का प्रत्येक आदमी जिस दिन बाजार भाव से अनाज खरिदने में सक्षम हो जाएगा, उस दिन हम किसान को मुक्त बाजार के हवाले कर सकते हैं।
सरदार पटेल ने रियासत के राजाओं से कहा था कि वो यह न समझें कि उनके पास धन व सेना है तो वो मनमानी कर लेंगे,यह देश गरीबों और किसानों का है।
 सन् 1955 से लेकर आज तक 16 बार किसानों और गरीबों के कल्याण का नारा देकर चुनाव लडा गया।
सन् 1966-67 में जब जगजीवन राम जी भारत के कृषि मंत्री थे,तब उन्होंने कहा था कि हरित क्रांति जिन राज्यों के आधार पर की जा रही है वो भारत की आवश्यकता की पूर्ति लायक अन्न तो पैदा कर ही देंगे।
पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश इस हरीत क्रांति का मुख्य आधार थे। क्योंकि पूरे देश में सिंचाई की बेहतर व्यवस्था यही पर थी।
 सन् 1965 में करीब 30 करोड लोग राशन की दुकान से सस्ता राशन लेते थे,आज भी 80-82 करोड़ बीपीएल कार्ड से सस्ता राशन ले रहें हैं।
21 वी सदी के प्रारम्भ में मनमोहन सरकार के कार्यकाल में जब शरद पवार देश के कृषि मंत्री थे,तब विदेश से गेहूं सस्ते मे खरीद कर एफसीआई के गोदामों में रख दिया गया, व्यापारियों ने किसानों से सस्ते मे गेहूं खरीद कर एमएसपी रेट पर एफसीआई को बेच दिया गया।21 वी सदी की शुरुआत भ्रष्टाचार से हुई।
आज भारत सरकार द्वारा लाए गए कृषि बिल का किसानों द्वारा विरोध किया जा रहा है।आइये देखते हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ? जो इतना विरोध हो रहा है। क्या है कृषि कानूनों की वास्तविकता?
सन् 1991 में उद्योगों के लिए भारत में भारत सरकार द्वारा बाजार खोल दिया गया था।ये जो तीन बिल सरकार लाई है,इनकी औपचारिक सिफारिश पहली बार भानू प्रताप सिंह की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने सन् 1990 में की थी।तब से ही यह लम्बित पडी थी। सन् 2016 में मोदी जी ने किसानों की आय दोगुना करने के लिए कहा था,जब तक बाजार नही खुलेगा,आय कैसे दोगुना हो। अतः भारत सरकार ने 5 जून सन् 2020 में आर्डिनेंस के माध्यम से कृषि बिल ला कर 20 सितंबर सन् 2020 को कानून बना दिया।आज जो किसान आंदोलन भारत में किया जा रहा है,उसको भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए इन बिलो की समीक्षा एकेडमिक स्तर पर होनी बडी जरुरी है।
इस कृषि बिल में चार मुद्दे प्रमुख रूप से दिखाई पड़ते हैं।जो निम्न हैं-
1- संवैधानिकता
2- एक्ट 1
3- एक्ट 2
4- एक्ट 3
सबसे पहले एक्ट की संवैधानिकता पर विचार करते हैं।जब भी कोई एक्ट संसद में पारित किया जाता है तो उसकी संवैधानिकता के दो पहलू हैं।
1- एक्ट की विषय वस्तु
2- प्रक्रिया
1- क्या विषय वस्तु में समस्या है-
विषय-वस्तु में तीन बातें आती है।
 A- फंडामेंटल राइट्स
B- बेसिक स्टरक्चर
C- राज्य(धारा 246,254) और केंद्र की विधायी शक्ति या धारा।
भारत सरकार संविधान में संशोधन तो कर सकती हैं परन्तु उसका पुनर्लेखन नही कर सकती अर्थात बेसिक स्टरक्चर को नही हिला सकती। कुछ मामलों पर राज्य सरकार ही कानून बना सकती है, कुछ मामलों पर केंद्र सरकार ही कानून बना सकती है। कुछ मामले ऐसे हैं कि दोनों कानून बना सकते हैं, यदि किसी कानून पर राज्य सरकार व केंद्र सरकार में टकराव हो तो केंद्र सरकार का कानून माना जाता है।कृषि कानून राज्य और केंद्र सरकार दोनों बना सकती है।
कानून की प्रक्रिया इस प्रकार है-
संसद में सरकार के साथ बहुमत है।
राज्यसभा में भी बहुमत है,यदि राज्य सभा में बहुमत ना भी हो तो संयुक्त अधिवेशन बुला कर सरकार कानून पास करा सकती है।
सरकार ने वोईस वोटिंग से कानून राज्यसभा में इसलिए पास कराया,क्योकि सदस्य कोरोना के कारण दूरी लिए बैठे थे, अपनी सीट पर नही थे, इसलिए वोटिंग सम्भव नहीं थी।
बिल संसद की सलेक्ट कमेटी को सोपा जाना चाहिए था, परन्तु इस बात का फैसला भी बहुमत के आधार पर होता है।आम सहमति बन नही पा रही थी,यदि बिल राज्यसभा में पास ना होते तो निरस्त हो जाते। इसलिए सलेक्ट कमेटी को नही भेजें गए।
भारत की आज़ादी के बाद से ही राज्य सरकार और केंद्र सरकार कृषि क्षेत्र में सुधार करते रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में सन् 1991 में जब कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे तब किसानों का गन्ना भुगतान बैंकों के माध्यम से किया गया था,यानि गन्ना भुगतान किसान के बैंक खाते में जायेगा। उससे पहले सोसायटी के माध्यम से भुगतान होता था, ताकतवर किसान कमजोर किसान की गन्ने की पर्ची डाल कर, पेमेंट ले लिया करते थे, किसान को पता भी नहीं चलता था, बैंक से भुगतान होने के बाद पर्ची यदि कोई दूसरा किसान डाल भी दे तो भुगतना तो उसी किसान के खाते में जाना है जिसके नाम की पर्ची होगी। कमजोर किसान के शोषण पर रोक लग गई।
अगस्त 1998 में किसानों के लिए अटल जी की केंद्र सरकार ने किसान क्रेडिट कार्ड की योजना लागू की। 
सन् 2003 में अटल बिहारी वाजपेई जी ने सभी राज्यों को चिट्ठी लिखी कि वो किसानों को अपनी फसल बेचने की छूट मंडी के बाहर भी प्रदान करें।तब से किसान अपनी फसल बाहर बेचने के लिए स्वतंत्र है।
मनमोहन सरकार ने आम चुनाव से एक साल पहले वर्ष 2008 में 65 हजार करोड़ रुपये की किसान ऋण माफी योजना का ऐलान किया था।
सन् 2013 के अंत में मनमोहन सरकार ने नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट पास किया। जिसके अन्तर्गत मीड-डे-मिल तथा राशन की दुकानों पर गरीबों को सस्ता अनाज सरकार देने के लिए बाध्य है।
1 दिसम्बर सन् 2018 से किसान सम्मान निधि योजना मोदी जी द्वारा चालू की गई,जिसके अन्तर्गत 6000 रुपए प्रत्यक वर्ष देश के प्रत्येक किसान को दिया जा रहा है।
देश के आजाद होने से लेकर आज तक किसान की आय 21 गुणा बढी है जबकि सरकारी कर्मचारी की नौकरी 180 और 200 गुणा बढी है।
विश्व स्तर की तीन एजेंसी द्वारा जैसे WHO द्वारा 58%, दूसरी एजेंसी द्वारा 62% और तीसरी एजेंसी द्वारा 72% आबादी भारत की कृषि पर निर्भर है।86% रोजगार कृषि क्षेत्र से निकलता है। कारपोरेट सेक्टर में भारत का कुल 5-6% रोजगार निकलता है। लेकिन पिछले 15 वर्षों में 42 लाख करोड़ रुपए का कर्जा भारत सरकार द्वारा कारपोरेट सेक्टर का माफ कर दिया गया है।  20 सितंबर सन् 2020 को सरकार ने जो कृषि कानून पास किये वो निम्न हैं-
1- कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य(the farmers trade and commerce(promotion and facilitation Bill 2020)
2- The farmers(Empowerment and protection) argument on price Assurance and farm service Bill 2020
3- The Essential Commodities(Amendment) Bill 2020
1- कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (the farmers trade and commerce(promotion and facilitation Bill 2020)।
उद्देश्य-A-( Farmer produes)जो किसान उत्पादन करते हैं जमीन व पशु से सम्बंधित व्यवसाय
Trade and commerce (लेना बेचना व व्यापार)
promotion and facilitation(आगे बढाना और सहूलियत देना)
मुख्य प्रावधान-
(क) ट्रेड एरिया आऊट साइड ऐपीएमसी (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग कमेटी)
खेत के बाहर,फूड प्रोसेसिंग यूनिट, भंडारण घर,कोल्ड स्टोरेज, निर्यात करने की छूट
2- पहले कानून के अनुसार किसान अपने एरिया में ही फसल बेच सकता था,अब कही भी बेच सकता है।
3- आन लाइन ट्रेडिंग किसान कर सकता है।
4- कोई स्टेट टेक्स नही, कोई राज्य का कानून नही लगेगा।
5- किसी विवाद को सुलझाने के लिए जिले के एसडीएम और डीएम 60 दिन में विवाद सुलझायेंगे।
अच्छाईयां- (क)बिजनेस से बिजनेस,अंतर राज्य, अच्छा कम्पटीशन,
(ख)बुरा होने की सम्भावना- एपीएमसी समाप्त हो सकती है।
(ग)न्याय की आजादी नही है, कोर्ट का रास्ता बंद है।
(घ)खरिदने वाले के लिए कोई नियम नही है।
(च) एक नया अल्प तंत्र बन सकता है।
उपाय- (क) एपीएमसी के बराबर ही बाहर खरीदार पर भी टैक्स लगने चाहिए।
(ख) न्याय की सुविधा मे कोर्ट का रास्ता मिलना चाहिए। कृषि न्याय प्राधिकरण बनना चाहिए।
(ग) रजिस्ट्रेशन होने चाहिए।
2- The farmers(Empowerment and protection) argument on price Assurance and farm service Bill 2020
कांटेक्ट फार्मिंग होगी। किसान किसी से भी कांटेक्ट कर सकता है।
उद्देश्य-
(क) किसान को ताकतवर व सुरक्षा
(ख) एग्रीमेंट
(ग) मूल्य व कृषि सेवा
मुख्य प्रावधान-
(क) एग्रिमेंट कर सकते हैं।दो पार्टी में एक किसान और दूसरा समझौता करने वाला।
2- समय सीमा (क) एक फसल सीजन से लेकर पांच साल तक या पशु के लिए एक ब्यात से लेकर पांच साल तक।
3- माडल कांटेक्ट- माडल कांट्रैक्टर बना सकते हैं।, केंद्र सरकार गाइड लाइन जारी कर सकती हैं।
4- मूल्य निर्धारण कैसे होगा- कांट्रैक्ट करते समय जो मूल्य निर्धारण हुआ,यदि फसल कटते समय रेट घट या बढ गए तो-(क) पहले से फिक्स रेट तय हो सकता है।
(ख)या तो एक ही रेट रहेगा या उतार चढ़ाव का प्रतिशत तय किया जा सकता है।
5- पेमेंट नकद या ज्यादा से ज्यादा एक दिन।
6- (क)किसान की जमीन को एग्रिमेंट में कोई कंडीशन नही बनाया जायेगा।
(ख) जिससे एग्रिमेंट होगा,वह किसान की जमीन में कोई स्थायी निर्माण नही करेगा, यदि किसान की सहमति से स्थायी निर्माण कर भी लिया है तो कांट्रैक्ट समाप्त होने पर हटाना पड़ेगा। यदि कांट्रेक्टर नही हटाता है तो वह निर्माण किसान का हो जायेगा।
7- रजिस्ट्रेशन- हर राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह एक एथोरिटी बना सकती है।
8- फोर्स मेजर- (क)यदि कोई ऐसी घटना घट जाय,जिसकी वजह से कांट्रेक्ट की शर्तों का पालन करना सम्भव न हो,तब कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी।
(ख)यदि किसान किसी ऐसी हालत में शर्त पूरी ना कर पाए तो वह भी इसका लाभ उठायेंगे।
9- झगड़ा होने पर-(क) आपसी समझौता (ख) एसडीएम और डीएम
कोर्ट नही।
10- दंड-(क) यदि गलती कांट्रेक्टर की है तो डेढ़ गुणा देना होगा।
(ख) किसान पर पेनल्टी नहीं लगेगी, किसान को वही पैसा देना होगा,जितना कांट्रेक्टर खर्च करेगा।
11- एग्रिमेंट का तरिका-एफपीओ, फर्टिलाइजर,बीज, कीटनाशक
अधिनियम की अच्छाईया-
(क)अच्छे किसान बढ़ेंगे
(ख)फसल का पेटर्न बदलेगा
(ग)एफपीओ (फार्म प्रोड्यूसर आर्गेनाइजेशन) बनेंगे।
अधिनियम की चिंताएं-
(क) कोर्ट की हिस्सेदारी नही है
(ख) मार्केट रेट का बेनिफिट ना मिलने का खतरा
(ग) एग्रिमेंट का माडल सरकार बनाये
(घ) रेगुलेशन कमजोर है
3- The Essential Commodities(Amendment) Bill 2020
सन् 1955 में यह एक्ट बना था,एक सीमा से अधिक भंडारण नही कर सकते थे। उसमें संशोधन किया गया है कि अब भंडारण कर सकते हैं। युद्ध,अकाल व महमारी, बाढ़, भूकंप जैसी विपदा आने पर भंडारण नही होगा।
फल, फूल,सब्जी पर रेट 100% बढ गया हो एक साल या पांच साल में तो भंडारण नही होगा।
अनाज या तेल का रेट 50% बढ़ गया हो तो भंडारण नही होगा।
यदि कोई डेरी एक दिन में दस हजार लीटर दूध की दही या अन्य उत्पाद बना लेती है तो वह उसका एक दिन का भंडारण कर सकते हैं। यदि किसी ने निर्यात का जितना आर्डर ले रखा है,उतना भंडारण कर सकता है।
चिंताएं- आर्टिफिशल डिमांड पैदा की जा सकती है।
रेट बढ़ाए जा सकते हैं।
एमएसपी- 
न्यूनतम समर्थन मूल्य,यह केंद्र सरकार की ओर से होता है सीएसीपी व सीसीइए विभाग तय करता है, बिक्री एपीएमसी तथा एफसीआई के माध्यम से खरीद होती है।
23 फसलों पर सरकार एमएसपी घोषित करती है।
फल सब्जी डेरी फिशरी, फूल पर एमएसपी घोषित नही होता।
स्वामीनाथन आयोग ने दिसंबर 2004, अगस्त 2005, दिसंबर 2005 और अप्रैल 2006 में क्रमश: चार रिपोर्ट सौंपी थी और अंतिम रिपोर्ट चार अक्टूबर 2006 को सौंपी गई थी, जिसमें फसलों का समर्थन मूल्य बढ़ाने समेत किसानों की दशा सुधारने के लिए किए जाने वाले उपायों के सुझाव दिए गए थे।जो इस प्रकार है-
1- A2 इसमें किसान की लागत का डेढ़ गुणा।
2- A2+FL इसमें लागत+ परिश्रम की किमत का डेढ़ गुणा।
3- C2 इसमें लागत+परिश्रम+जमीन का रेंट+लागत के धन का ब्याज का डेढ़ गुणा।
स्वामीनाथन आयोग ने अन्य सुझाव भी दिए थे, जैसे भूमि सुधार, किसान पर कर्ज कम हो,कृषि भूमि में सिंचाई की व्यवस्था।
देश के आजाद होने से आज तक भारत में कृषि भूमि में सिंचाई की व्यवस्था में कुल 5-6% की बढ़ोत्तरी हुई है, जिसमें वर्तमान मोदी सरकार के छः साल में यह बढ़ोतरी 0.75% है। बाकि कृषि वर्षा पर आधारित है।
सन् 2014 के चुनाव में भाजपा की ओर से स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का वादा किया गया था। परन्तु जब सरकार बन गई तब सरकार ने अपने को तिसरे नम्बर को लागू करने में असमर्थ पाया। और दूसरे नम्बर को लागू कर दिया है सन् 2018-19 के बजट में।
पंजाब और हरियाणा का 88%चावल और 70% गेहूं एमएसपी पर जाता है। पूरे भारत का 35%चावल,62% गेहूं,50% मोटा अनाज पंजाब और हरियाणा से प्राप्त होता है।
आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश से 44% चावल तथा उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से 23% गेहूं एमएसपी पर जाता है।
लेकिन जो अनाज किसान का बाहर बाजार में बिक रहा है वह आज से 10 वर्ष पहले जो एमएसपी रेट था,उस पर बिक रहा है।
एमएसपी पर जो सरकार का विभाग एफसीआई (फूड कारपोरेशन आफ इंडिया) खरीदारी करता है,उसकी आज हालत यह है कि उस पर 2018-2019 के साल में तीन लाख पन्द्रह हजार करोड़ का कर्ज है, जो 2013-14 में 91401 करोड था।यानि एफसीआई खुद दिवालिया होने के कगार पर है।
इन कानूनों को लेकर किसानों मे भ्रम पैदा हो गया है या कर दिया गया।लाभ हानि तो समय के गर्भ में हैं। परन्तु किसी विद्वान व्यक्ति ने कहा है-
शक की कैची के फलके जब, अनजाने भी चल जाते हैं।
सच कहता हूं विश्वासों के चंदन वन भी जल जाते हैं।।
संदर्भ- यू ट्यूब
 डां विकास दिव्य कीर्ति- कृषि कानून (विवाद और वास्तविकता।
https://youtu.be/YcqVWFZXyaE
यू ट्यूब-पुण्य प्रसून बाजपेई।


मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

भारत का किसान आंदोलन और सरकार-अशोक चौधरी मेरठ।

भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र में उन्नति के लिए तीन बिल पास किये -
 (1) आवश्यक वस्तु अधिनियम (भंडारण निमन)
(2) मूल्य आश्वासन पर बंदोबस्त और सुरक्षा समझौता
(3)कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य
ये जो तीन बिल सरकार लाई है,इनकी औपचारिक सिफारिश पहली बार भानू प्रताप सिंह की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने सन् 1990 में की थी।तब से ही यह लम्बित पडी थी। वर्तमान मोदी सरकार ने इसे लागू कर दिया है।
इन सिफारिशों को अक्षरशः लागू करना किसान हित में हो, ऐसा जरूरी नहीं है।ऐसा विद्वान लोगों का मानना है।इनको किसान के लिए लाभकारी बनाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को एक गारंटी के तौर पर सरकार को देना चाहिए तथा अनुबंध खेती यानि कांट्रैक्ट फार्मिंग से उपजने वाले विवाद के लिए ब्लाक स्तर, जनपद स्तर,राज्य स्तर और केंद्र स्तर पर अलग-अलग ट्रिब्यूनल बनें,जिनको न्यायिक अधिकार मिलने चाहिए।
भारत के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों में 50%के पास जमीन नही है। बाकी 50% में से 25% के पास एक एकड़ से कम जमीन है।वो कही दूर जाकर अपनी फसल नही बेच सकते।बाकि 25% में से 10% ही ऐसे हैं जो अपनी फसल को दूर ले जाकर तथा मंडियों में बेचते हैं, बाकि बचे 10% किसान सी एमएसपी का लाभ लेने की स्थति में है।
सरकार को एक चौथा बिल लाकर जिसमें एमएसपी से नीचे खरीद ना हो, किसानों को न्यायिक अधिकार देना चाहिए।
एमएसपी और किसान सम्मान निधि दोनों व्यवस्था साथ साथ चलनी चाहिए। एमएसपी केवल 23 फसलों पर मिलती है।जो 80% फसलों को कवर करती है। सरकार यदि एमएसपी पर फसल खरीद को संवैधानिक अधिकार बना देती है (एक अलग बिल लाकर)तो देश के 40% किसान की समस्या समाप्त हो जायेगी। इनके अलावा बचे किसानों की खाई भरने के लिए किसान सम्मान निधि योजना है ही।
सरकार अपने कानून को अमल में उस तारीख से  लाया जायेगा,जब उसका नोटिफिकेशन होगा।  नोटिफिकेशन जारी करने की तारीख हर राज्य की अलग भी हो सकती है।
राज्य सरकार पर केंद्र सरकार के द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करने की जिम्मेदारी छोड दी जाय।
पंजाब, हरियाणा में इन कानूनों का सबसे अधिक विरोध हो रहा है,जब दूसरे राज्यों के किसान केंद्र सरकार के कानून से लाभान्वित होंगे तो पंजाब और हरियाणा के किसान भी अपने आप मान जायेंगे।
उपरोक्त विचार पूर्व कृषि मंत्री श्री सोमपाल शास्त्री जी, आलोक सिन्हा जी पूर्व चेयरमैन फ़ूड कारपोरेशन आफ इंडिया (2006-2008), देवेंद्र शर्मा कृषि विषेषज्ञ,एन सी सक्सेना पूर्व फूड कमिश्नर सुप्रिम कोर्ट (2002-2017) जैसे विद्वान और अनुभवी लोगों के लेखो से सम्बंधित है।
समाप्त

सोमवार, 12 अक्टूबर 2020

धाकड़ और किराड (किरार ) और गुर्जर जाति में सम्बन्ध- लेखक अशोक चौधरी मेरठ

धाकड़ एवं किरार जाति की उत्पत्ति के संबंध में परिपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी एवं साक्ष उपलब्ध नहीं है, कुछ विचारों एवं लेखकों का मत है कि धाकड़ और किरार चौहान गुर्जर क्षत्रिय जाति की उपजाति है या छत्रिय वंशजों में से बने हुए एक समूह का नाम है, इस समूह की कुलदेवी मां अन्नपूर्णा को माना गया है, सोलिया का सविस्तार विवरण देने के पूर्व #नागरचार (चार्या) की पोथी जो प्राचीन डिंगर लिपि में लिपिबद्ध है, के तथ्यों का उल्लेख करना चाहूंगा, नागरचार  की पोती का विवरण-
 गुर्जर चौहान क्षत्रियों की 24 शाखाओं में से एक शाखा दाईमां चौहान मे  राजा धरणीधर हुए, उन्होंने शस्त्र छोड़कर कृषि का कार्य करना प्रारंभ किया, श्री धरणीधर से ही धाकड़ समाज का नामकरण हुआ, राजा धरणीधर के 4 पुत्र थे
 1. सारपाल
 2. वीरपाल
 3. विशु पाल
 4. बावनिया,
  जिनके उत्तरोत्तर वंश से चार शाखाएं हुई
  1.1. शारपाल – सौलिया मेवाड़ा धाकड़ 2. वीर पाल – नागर धाकड़ (नागर चार) 3. विशुपाल – मालवी धाकड़ 4. बावनिया – पुरवीया धाकड़ (किरार) गौ्त्र विवरण – चार शाखाओं की कुल 444 गौत्र है नागर की 144 गौत्र क्षत्रिय कुलों के नाम से हैं। ऐतिहासि‍क तथ्यों एवं पोथियों के विलेखों से इतना तो निर्विवाद है कि धाकड़ जाति की उत्पत्ति स्थाान राजस्थांन का मेवाड़ क्षेत्र है। कृषि व्यवसाय को अपनाकर वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर बसते रहे। विशेष का भी नामकरण पर प्रभाव पड़ा जैसे – जो समूह नागर चाल – बुंदी की सीमा व नागौर में जाकर बसे वे ‘नागर’ कहलाये। मालवा में बसे ‘मालवी’ एवं पूर्व-उत्तगरांचल में जाकर बसे वे ‘किरार’ (किराड़) कहलाये। इस तरह समाज के पूर्वजों, कुल ऋषियों एवं स्थान के अनुसार गौत्र एवं शाखाओं का नामकरण होता रहा।

किराड एक खेती करने वाली मेहनत कश जाति है,जो मध्यप्रदेश और राजस्थान तथा नर्मदा नदी तक बसी हुई है।किराड जाति का गुर्जर जाति से बडा गहरा नाता रहा है,बल्की यू कहिए कि किराड जाति गुर्जर जाति का ही एक हिस्सा रही है।
कन्नोज के गुर्जर प्रतिहार राजाओं के पतन के बाद विदेशी तुर्क आक्रमणकारियों का सामना अजमेर के चौहान शासको ने किया।इन चौहान शासको में सम्राट बिसलदेव(सन् 1150-1164) सबसे पहले चौहान सम्राट हुए हैं। बीसलदेव के समय में गजनी की मुस्लिम सेना वर्तमान राजस्थान में शेखावाटी में स्थित भवेरा गांव तक आ पहुंची थी। लेकिन बीसलदेव ने अपनी सेना तथा सहयोगियों की मदद से इन मुस्लिम सेनाओं को अटक नदी के पार खदेड दिया तथा हिमालय से लेकर विंध्याचल तक का क्षेत्र विदेशी मुस्लिम हमलावरों से खाली करा लिया।बीसलदेव का दिल्ली में एक शिलालेख 9 अप्रैल सन् 1163 का प्राप्त हुआ है,जिसको शिवालिक स्तम्भ लेख भी कहते हैं।इस शिलालेख में बीसलदेव के द्वारा किए गए कार्यों का वर्णन है।बीसलदेव ने ही दिल्ली के राजा अनंगपाल तोमर को अपने अधीन कर लिया।बीसलदेव साहित्य प्रेमी, साहित्यकारों का आश्रय दाता था,बीसलदेव को कवि बांधव की उपाधि प्राप्त थी,वह हरि वेली नाटक के रचनाकार थे।  इस समय चौहान राज्य की सीमा शिवालिक पहाड़ी सहारनपुर उत्तर प्रदेश से लेकर अटक नदी तक थी। 

सम्राट बीसलदेव ने तुर्क हमलावरों से लडने के लिए अपने क्षेत्र के संघर्षशील किसान समूहों को एकत्रित किया था,  क्योकि अजमेर के चौहान गुर्जर ही थे अतः किराड़ लोग भी गुर्जरों की एक शाखा कहलाते रहें हैं। गुर्जर राज-मरु गुर्जर पृथ्वीराज चौहान अथवा पृथ्वीराज चौहान तृतीय अथवा राय पिथोरा की राज्यसभा में 30 प्रतिनिधि इस धाकड समूहों के थे।

ऐसा इतिहास कारो का मानना है कि बीसलदेव चौहान तथा पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल के मध्य (सन् 1150-1192) ही दिल्ली के आसपास दादरी दनकौर के क्षेत्र में 360 गांव भाटी गुर्जर तथा कैराना के आसपास 84 गांव चौहान गुर्जरों को जागीर देकर बसाया गया है।
किराड जाति के चौहान गोत्र के लोग भी तभी से किराड़ जातिय समूह में शामिल हुए थे 
पृथ्वीराज चौहान के दरबारी जयानक ने पृथ्वीराज विजय नामक एक ग्रंथ लिखा जिसमें पृथ्वीराज चौहान को गुर्जर राज और मरू गुर्जर लिखा है।
पृथ्वीराज चौहान के बाद एक लम्बा संघर्ष भारतियों ने किया,आज गुर्जर और किराड़ दोनों जातियां ओबीसी मे आती है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान गुर्जर और किराड़ दोनों जातियों के सिरमौर है। आज पुनः सन् 1192 के पृथ्वीराज चौहान के वैभव के रूप में उपस्थित हैं।
समाप्त।

बुधवार, 26 अगस्त 2020

ब्रिटिश भारत - संकलन कर्ता अशोक चौधरी मेरठ।

मुगल बादशाह औरंगजेब के शासन काल से ही यूरोप की कम्पनियां भारत में व्यापार करने के लिए आने लगी थी, इनमें पुर्तगाली,डच, अंग्रेज और फ्रांसीसी थे। औरंगजेब की मृत्यु के बाद जिस समय को भारतीय इतिहास में उत्तर मुगल काल भी कहा जाता है, मुगल सत्ता कमजोर होनी शुरू हो गई थी। सन् 1739 में नादिरशाह के हमले के बाद मुगल सत्ता का रूतबा एक तरह से समाप्त हो गया था, उत्तर पश्चिम से अफगानों के आक्रमण भी शुरू हो गये थे।इन परिस्थितियों में मुगल साम्राज्य अपने सूबदारो की शक्ति के बल पर ही चल रहा था। ये क्षेत्रिय शक्तियां बंगाल,अवध, मराठा, हैदराबाद, कर्नाटक, मैसूर और आज का राजपूताना (राजस्थान)थे।
इस समय के इतिहास को समझने के लिए विद्वानों ने पांच चरणों में बांटा है। और अंग्रेजों ने इस समय को तीन चरणो में बांटा -
1- अपने को शासकों के बीच स्थापित करना।
2- घेरें की निति/रिंग आंफ फेंस पालिसी (सन् 1765-1813)।
3- अधिनस्थ पार्थक्य की निती (सन् 1813-1858).
सबसे पहले अंग्रेजों ने फ्रांसीसी भय को समाप्त किया तथा युद्ध में फ्रांसीसियों को हराकर यूरोप की चारों कम्पनियों में अपनी श्रेष्ठता स्थापित कर दी।
सन् 1765 की इलाहबाद संधि जो मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के साथ मुगल बादशाह के बक्सर के युद्ध में हार जाने के बाद अंग्रेजों ने की।इस संधि में अंग्रेजों ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार बादशाह से ले लिए तथा मुगल बादशाह को पैंशन लेने के लिए बाध्य कर दिया।इस संधि के बाद इस्ट इंडिया कम्पनी सिर्फ व्यापारी कम्पनी नही रही।वह भारत की क्षेत्रिय शक्तियों में से एक हो गई। सन् 1789 में फ्रांसीसी क्रांति हो गई थी।इस क्रांति से एक नेता पैदा हुआ जिसका नाम था नेपोलियन बोनापार्ट।यह अंग्रेजों का घोर विरोधी था तथा भारत में अंग्रेजों को समाप्त करना चाहता था, नेपोलियन बोनापार्ट का मानना था कि भारत से ही अंग्रेजों को शक्ति प्राप्त हो रही है। नेपोलियन बोनापार्ट को अंग्रेज सेनापति नेल्सन ने नील नदी के किनारे युद्ध में पराजित कर दिया।अब सन् 1798 में नेपोलियन बोनापार्ट मिश्र आ गया।इस नेपोलियन बोनापार्ट के हमले से बचने के लिए अंग्रेजों ने भारत में अपनी सुरक्षा के लिए बफर स्टेट मध्यवर्ती राज्य बनाए,जिसे घेरे की निति/रिंग आंफ फेंस पालिसी कहा गया।इस सन्धि की कुछ शर्तें थी, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण शर्तें यह थी कि जो रियासत सन्धि कर लेगी,उसकी सुरक्षा अंग्रेज करेगे,वह रियासत किसी भी रियासत से कोई सम्पर्क नही रखेगी, अंग्रेज एक सेना उस रियासत में रखेंगे,जिसका खर्च वह रियासत देंगी।रियासत में एक अंग्रेज़ अधिकारी कम्पनी के प्रतिनिधि के रूप में रहेगा, जिसे पोल्टीकल एजैंट कहा गया।
सन् 1798 में हैदराबाद से अंग्रेजों की पहली संधि हुई। सन् 1799 में हैदराबाद की सहायता से टीपू सुल्तान को मारकर वहा के वाडियार राजा को अंग्रेजों ने मैसूर का राजा बना दिया तथा मैसूर के साथ संधि कर ली। सन् 1799को तंजौर से, सन् 1801 को अवध से, सन् 1802को पैशवा से भसीन की संधि, सन् 1803 में दिल्ली पर अधिकार कर लिया।
राजस्थान में सितम्बर सन् 1803 में भरतपुर से, नवम्बर सन् 1803 में अलवर से तथा दिसम्बर सन् 1803 में जयपुर से सहायक संधि कर ली।
इसके बाद तृतीय चरण प्रारंभ हुआ।इसे अधीनस्थ पारथक्य की निति कहते हैं।जिसका समय सन् 1813 से सन् 1858 तक कहा गया है।इस दौरान सन् 1813 से सन् 1823 तक लार्ड हैस्टिंग्स तथा सन् 1848 से सन् 1856 तक लार्ड डलहौजी का समय रहा।
इस समय में ब्रिटिश सर्वोच्चता की स्थापना को प्रतिपादित किया गया।इसका नियम था एक शक्ति की सर्वोच्चता तथा दूसरी उसके अधीन। ब्रिटेन की संसद में चार्टर एक्ट सन् 1813 आया,उसके अंतर्गत भारत में मुक्त व्यापार हो गया,इस्ट इंडिया कम्पनी का अधिकार भारत में सिर्फ चाय तथा चीन देश में होने वाले व्यापार पर ही रहा।अब कम्पनी का भारत में केवल राजनैतिक क्षेत्र में ही एकाधिकार रहा।इस समय में सन् 1817-18 में पेशवा को पूना से हटाकर कानपुर के पास बिठुर भेज दिया गया।मराठौ के सैनिक सहायक पिंडारियो का सफाया कर दिया गया तथा पिंडारी नेता अमीर खां को टौंक रियासत देकर संतुष्ट कर दिया।
चार्ल्स मेटकांक को राजपूताने की रियासतों से संधि करने के लिए नियुक्त किया गया।
दिल्ली में सन् 1818 में इन रियासतों का एक सम्मेलन बुलाया गया तथा सुरक्षा और अनाक्रमण की संधि की गई।
करौली व टांक से नवम्बर सन् 1817 में,कोटा-जोधपुर-उदयपुर से सन् 1818 में, सिरोही से सन् 1823 में, झालावाड़ जो सन् 1837 में रियासत अंग्रेजों ने बनाई थी से सन् 1838 में सन्धि कर ली गई। डूंगरपुर बांसवाड़ा और प्रताप गढ़ के साथ मालवा के रेजीडेण्ट माल्कम ने संधि की। लार्ड हैस्टिंग्स ने 310 भारतीय रियासत ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन लाई।
विलियम बैंटिक ने सन् 1831 में मैसूर, सन् 1832 में कछार, सन् 1834 में कुर्ग, सन् 1835 में जैतिया रियासत ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन कर ली।
लार्ड आकलैंड ने सन् 1839 मैं कानूल और मांडवी, सन् 1840 में कोलाबा और जालौन ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन कर ली।
लार्ड डलहौजी जब सन् 1848 में भारत के गवर्नर जनरल बन कर आये ।उनका ऐसा मत था कि ये जो ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत नाम के राजा बने हुए हैं,इनकी कोई आवश्यकता नहीं है, इसलिए ये भारतीय राजा समाप्त होने चाहिए। इसलिए डलहौजी ने समस्त रियासतों को ब्रिटिश भारत में मिलाने का प्रयास किया, डलहौजी द्वारा किए गए प्रयास निम्न थे-
1- युद्ध के द्वारा-
सन् 1849 में पंजाब को, सन् 1850 में सिक्किम को,सन् 1852 में वर्मा में पीगू और लोअर वर्मा को।
2- कुशासन, भ्रष्टाचार व बकाया धनराशि के आरोप द्वारा-
 सन् 1856 में कुशासन का आरोप लगाकर अवध को,बकाया धनराशि का भुगतान न करने का आरोप लगाकर हैदराबाद से बरार का क्षेत्र ले लिया।
पैंशन समाप्त,पद समाप्त, उपाधियां छीन ली गई।
3- व्यपगत सिद्धांत/राज्य हडप निति-
राजाओं को अपनी रियासत के वारिसाना हक के लिए वारिस गोद लेने से रोक दिया गया।
लार्ड डलहौजी ने रियासतों की तीन श्रेणियां बनाई।
१- स्वतंत्र रियासत-
ये रियासतें वारिस गोद ले सकती थी।
२- मुगल,मराठा और अंग्रेजों के अधीन रियासत-
इन रियासतों को वारिस गोद लेने के लिए सरकार से परमिशन लेनी होगी, परमिशन मिल जायेगी।
३- पुनर्जीवित रियासतें-
इन रियासत के राजा वारिस गोद नही ले सकते, अंग्रेजी राज में मिला ली जायेंगी। ये पुनर्जीवित रियासते वो थी जिनका निर्माण अंग्रेजों ने किया था, जैसे मैसूर का राजा वाडियार परिवार से था,हैदर अली ने वाडियार राजा से यह रियासत छीन ली थी,हैदर अली वाडियार राजा का सेनापति था। अंग्रेजों ने हैदर अली के बेटे टीपू सुल्तान को मारकर पुनः वाडियार राजा को मैसूर का शासक बना दिया था,इसी प्रकार सतारा मराठा राजा को हटाकर पेशवा जो मराठा राजा के सेनापति थे ने रियासत अपने अधीन कर ली थी और सतारा के स्थान पर पूना को अपनी राजधानी बना लिया था, अंग्रेजों ने पेशवा को हटाकर मराठा राजा प्रताप सिंह को सतारा का पुनः राजा बना दिया था।
इस तरह की रियासतों को वारिस गोद लेने का अधिकार नहीं था।ऐसी रियासतें जब्त कर ली गई जो निम्न थी-
1-सतारा(महाराष्ट्र) सन् 1848 में।
2-जैतपुर(बुंदेलखंड) सन् 1849 में।
3- सम्भल पुर (ओडिशा) सन् 1849 में।
4- बघाट (हिमाचल) सन् 1850 में।
5- उदयपुर (छत्तीसगढ़) सन् 1852 में।
6- झांसी (बुंदेलखंड उत्तर प्रदेश) सन् 1853 में।
7- नागपुर (महाराष्ट्र) सन् 1854 में।
8-‌ करौली (राजस्थान) सन् 1855 में , परन्तु करौली एक स्वतंत्र रियासत थी इसलिए इस्ट इंडिया कम्पनी के बीओडी (बोर्ड आफ डायरेक्टर) ने इस विलय को रद्द कर दिया था।

रविवार, 26 जुलाई 2020

भारत में किसान आंदोलन के जनक महान क्रांतिकारी विजय सिंह पथिक (भूप सिंह) - लेखक अशोक चौधरी मेरठ।

सीमा पर खडा सिपाही बिना एक क्षण की देरी करें अपना बलिदान देश की रक्षा के लिए दे देता है।क्योकि उस सिपाही को अपने देश की सरकार व समाज पर यह विश्वास होता है कि उसकी मौत के बाद उसके देशवासी उसके परिवार के हितों का ध्यान रखेंगे। उसके बलिदान की सराहना करेंगे।इसी प्रकार हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। उन्हें यह विश्वास था कि आजादी मिलने के बाद देश की आने वाली पीढ़ी उनके त्याग और बलिदान का स्मरण करेंगी। भारत की आज़ादी के आंदोलन में विजय सिंह पथिक एक ऐसे ही आजादी के योद्धा है। भारत में विजय सिंह पथिक, महात्मा गांधी व सरदार पटेल तीनो महापुरुष किसान आंदोलन के द्वारा ही अपने राजनीतिक सफर पर चलें तथा अपने जीवन के अंत तक भारत माता की सेवा करते रहें।देश आजाद होने के बाद महात्मा गांधी जी का चित्र देश के संविधान की जिल्द में लगा है,पूरी दुनिया उन्हें महात्मा, राष्ट्रपिता व बापू के नाम से आदर देती है। सरदार पटेल भारत के लौह पुरुष, भारत रत्न से सम्मानित है, दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के नाम से पटेल जी की प्रतिमा गुजरात में लगी है। परन्तु विजय सिंह पथिक(भूप सिंह गुर्जर) जिन्हें भारत के किसान आंदोलन का जनक तथा अनेक क्रांतिकारी घटनाओं का सूत्रधार माना जाता है। अपने किये गये कार्यों के अनुरूप आजाद भारत में सम्मान व आदर की उस ऊंचाई से दूर दिखाई देते हैं जिसके वो हकदार थे। सन् 1992 में दूरसंचार मंत्री श्री राजेश पायलट जी के द्वारा पथिक जी पर एक रूपए का डाक टिकट जारी किया गया था। यूं तो हमारे यहां एक कहावत है कि मान का तो पान ही काफी है। हमारे इस लेखन का उद्देश्य भी पथिक जी के महान कार्यों को भारत के जनमानस के सम्मुख उचित ढंग से प्रस्तुत करने का एक प्रयास मात्र है -
भारत में किसानों का उत्पीडन विदेशी तुर्की सत्ता की स्थापना के साथ ही प्रारंभ हो गया था। भारतीय राजा अपने किसानों से लगान के रुप में फसल का छठवां हिस्सा यानि 16% लेते थे। यदि किसान किसी कारण वश लगान नही दे पाता था,उस स्थिति में राजा किसान की समस्या को सुनता था, समस्या को दूर करने का प्रयास करता था। परंतु विदेशी शासकों ने जहां लगान को बढाकर फसल का आधा या उससे अधिक यानि 50% कर दिया था, वही लगान को बडी कठोरता से वसूला जाता था। लगान न देने पर किसानों की झोपड़ियों में आग लगा दी जाती थी,उनकी महिलाओं को बेइज्जत कर दिया जाता था तथा किसानों के बच्चों को जिंदा आग में फेंक दिया जाता था।
इन विदेशी शासकों से भारत के लोगों ने अनवरत संघर्ष किया। सन् 1192 में मोहम्मद गोरी के दिल्ली पर अधिकार हो जाने पर भारत के लोगों को गुलाम होने का अनुभव प्राप्त हुआ तथा मुगल सत्ता के स्थापित हो जाने तक भारतीय इन हमलावरों से संघर्ष करते रहे। परंतु अकबर ने सन् 1570 के आसपास कुछ भारतीयों को अपने साथ सत्ता में साझीदार कर लिया।जिन भारतीयों ने मुगलों के साथ यह सत्ता समझोता किया उन्हें मुगल+राजपूत समझोता भी कहा गया।अब भारतीय मुगल शासन में बडे बड़े मनसबदार बन गए तथा अकबर के नवरत्नों में से चार नवरत्न भारतीय थे। सन् 1615 में मेवाड़ के राणा अमर सिंह ने भी मुगल शासक जहांगीर से समझौता कर लिया।अब मुगल शासकों की शोषणकारी निति को कोई रोकने वाला नही था। दिल्ली और आगरा मुगल सत्ता के केन्द्र थे। अतः इसी क्षेत्र में सन् 1633 से ही आगरा और मथुरा के आसपास गेर राजपूत किसानों ने जाट किसान नेताओं के नेतृत्व में मुगल सत्ता से संघर्ष प्रारंभ कर दिया जो गोकुला जाट, राजाराम जाट तथा राजा सूरजमल के बलिदान के दौर से गुजरता हुआ जाट राजा सूरजमल के बेटे राजा जवाहर सिंह की मृत्यु सन् 1768 तक अनवरत चला।इस संघर्ष का परिणाम यह हुआ कि मुगलों की तीन राजधानियों आगरा, फतेहपुर सीकरी तथा दिल्ली में से दो राजधानी आगरा और फतेहपुर सीकरी को भारतियों (जाटों) ने मुगलों से छीन लिया। दक्षिण में छत्रपति शिवाजी महाराज के नेतृत्व में मराठों ने मुगल सत्ता की कमर तोड दी तथा सन् 1707 में मुगल बादशाह औरंगजेब दक्षिण में मर गया।
मुगल सत्ता लाल किले के अंदर तक सिमट कर रह गई। इतने में ही अंग्रेज भारत में शासन पर काबिज़ हो गये।जिन भारतीयों ने अकबर के समय मुगलों से सत्ता समझौता किया था उनके साथ साथ कुछ और भारतीय राजाओं ने जो मुगलों के साथ संघर्ष कर बने थे, ने सन् 1818 तक  अंग्रेजों से समझौता कर लिया। अंग्रेजों के शोषण का केन्द्र भी भारत का किसान ही रहा। भारतीय जनता का अधिक से अधिक शोषण किया जा सके,उसके लिए अंग्रेजों ने भारतीयों राजाओं के राज्य हड़पने प्रारंभ कर दिए।जिस कारण सन् 1857 की क्रांति हुई। जिसमें भारतीय किसानों, सैनिकों तथा पीड़ित रजवाड़ों और जागीर दारो ने मिलकर अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने का प्रयास किया। अंग्रेज तो भारत से ना जा सके, परन्तु इस्ट इंडिया कम्पनी के हाथ से सत्ता निकलकर रानी विक्टोरिया के हाथ में चली गई। अंग्रेजों की समझ में आ गया कि भारतीय रजवाड़े जिन्हें वो समाप्त करना चाहते थे वो तो उनके शासन करने में सहायक थे अतः अब अंग्रेजों ने इन देशी रियासतों को समाप्त करने का विचार त्याग दिया तथा इनके माध्यम से अपने उद्देश्य की पूर्ति करनी शुरू कर दी।शासन चलाने के वित्त प्रबंधन के लिए किसानों से लगान प्राप्त करना एक बडा माध्यम था। ब्रिटिश भारत  दो भागों में बंटा था,एक भाग तो सीधा अंग्रेजों के हाथ में था तथा दूसरा रियासत के राजाओं के हाथ में था जिनका अंग्रेजों के साथ समझौता था।इन रियासतों में भारत का किसान तीन लोगों के द्वारा शोषित होता था, एक अंग्रेज़ दूसरा रियासत का राजा तिसरा रियासत के राजा का जागीर दार।रियासत के राजा के राज में भी दो तरह की भूमि पर खेती करने वाले किसान थे,एक जागीर दार की भूमि होती थी,दूसरी जो सीधी राजा के पास होती थी,इस राजा के पास वाली भूमि को खालसा भूमि कहते थे। यहां हमारे अध्ययन का केन्द्र क्रांतिकारी विजय सिंह पथिक के द्वारा चलाए गए किसान आंदोलन है,जो कि वर्तमान राजस्थान की तत्कालीन समय की मेवाड़ (उदयपुर) रियासत में बिजौलियां तथा बेगूं नामक ठिकानों से चलाये गये थे । राजस्थान का यह क्षेत्र तथा यहां के लोग  उन बहादुर लोगों की संतान है। जिन्होंने करीब 500 वर्षों तक भारत की अरब हमलावरों तथा तुर्क आक्रमणकारियों से रक्षा की थी। परन्तु जिस प्रकार लोहा पानी और हवा के सम्पर्क में आने के कारण अपने कठोरता के गुण को खो देता है, जिस प्रकार कोई हंस कौवों के साथ रहने लगे तो वह मोती के स्थान पर मैला खाने के लिए विवश हो जाता है,उसी प्रकार मुगल और अंग्रेज शासकों के साथ रहने के कारण ये भारतीय राजा अपनी जनता का शोषण देखने तथा करने के लिए विवश थे, बिल्कुल उसी तरह जैसे पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य तथा कर्ण ना चाहते हुए भी द्रोपदी का चीर हरण तथा दुर्योधन की ओर से लडने के लिए विवश थे।पांडव रुपी जनता को अपने बल पर ही लडना था अतः संघर्ष संचालन के लिए एक कृष्ण जी की आवश्यकता थी। जो विजय सिंह पथिक के रुप में यहां के किसानों को प्राप्त हुए। इतिहास  अपने आप को पुनः दोहरा रहा था, जिस प्रकार सन् 1633 में जाट किसान नेताओं के नेतृत्व में मुगल सत्ता से संघर्ष प्रारंभ हुआ था और गुर्जर किसानों ने इनका सहयोग किया था उसी प्रकार सन् 1880 में मेवाड़ रियासत में चित्तौड़ के राश्मी परगने से जाट किसानों ने राजस्थान के क्षेत्र का पहला आंदोलन शुरू कर दिया था।इस राजस्थान क्षेत्र में हुए आंदोलनों को चलाने के लिए प्रमुख भूमिका में सहयोग करने के लिए श्री विजय सिंह पथिक (भूप सिंह गुर्जर) परिस्थितीवश उपस्थित थे। आखिर ये विजय सिंह पथिक कौन थे,किस प्रकार राजस्थान में हुए किसान आंदोलनों में सक्रिय हो गए थे,इसे जानने के लिए हमे थोडा पीछे की ओर चलना होगा।
सन् 1857 की क्रांति में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले की माला गढ रियासत के नबाब वलीदाद खां के इन्द्र सिंह गुर्जर नाम के दीवान थे जो बुलंदशहर के गुठावली कला नामक गांव के निवासी थे। सन् 1857 की क्रांति में संघर्ष करते हुए इन्द्र सिंह गुर्जर शहीद हो गए थे।इन्द्र सिंह गुर्जर के हमीर सिंह गुर्जर नाम के पुत्र थे,इन हमीर सिंह गुर्जर के 27 फरवरी सन् 1882 को भूप सिंह गुर्जर नाम के एक पुत्र का जन्म हुआ।
भूप सिंह गुर्जर पर अपने परिवार की क्रान्तिकारी और देशभक्ति से परिपूर्ण पृष्ठभूमि का बहुत गहरा असर पड़ा।10 अप्रैल सन् 1875 को आर्य समाज की स्थापना मुम्बई में हो गई थी। आर्य समाज के द्वारा लोगों में जनजागरण का कार्य किया जाने लगा था। सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हो गई थी।
युवावस्था में भूप सिंह गुर्जर का सम्पर्क अजमेर गुट के राव गोपाल सिंह खरवा से हो गया था तथा भूप सिंह गुर्जर राव गोपाल सिंह खरवा के सचिव बन गए थे,राव गोपाल सिंह खरवा आर्य समाज से जुड़े हुए थे,राव गोपाल सिंह"खरवा"जागीर के जागीर दार थे।राव गोपाल सिंह खरवा राजपूत जाति के थे। एक बार बंगाल के क्रांतिकारी अरविंद घोष राजस्थान आये थे तभी गोपाल सिंह खरवा का परिचय अरविन्द घोष से हुआ।जब आर्य समाज का भारत धर्म महामंडल राजस्थान से बंगाल गया तब गोपाल सिंह खरवा भी इस मंडल में बंगाल गये थे,वही पर पुनः गोपाल सिंह खरवा की मुलाकात अरविन्द घोष,रास विहारी बोस व सचिन सन्याल से हुई। सन् 1912 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की राजधानी कलकत्ता से हटाकर दिल्ली लाने का निर्णय किया। इस अवसर पर भारत के गवर्नर जनरल लार्ड हाडिंग ने दिल्ली प्रवेश करने के लिए एक शानदार जुलूस का आयोजन किया। गवर्नर जनरल लार्ड हाडिंग के दिल्ली प्रवेश के समय राव गोपाल सिंह खरवा व भूप सिंह गुर्जर ने अन्य क्रान्तिकारियों के साथ जुलूस पर बम फेंक कर लार्ड हार्डिग को मारने की कोशिश की। रास बिहारी बोस,राव गोपाल सिंह खरवा, जोरावर सिंह, प्रताप सिंह, भूप सिंह गुर्जर व अन्य सभी सम्बन्धित क्रान्तिकारी अंग्रेजो के हाथ नहीं आये और  फरार हो गए।
आर्य समाज के सम्पर्क में एक गोविंद गिरि नाम के व्यक्ति आये।जो बंजारा जाति के थे,यह जाति वर्तमान में अनुसूचित जनजाति में आती है।इन गोविंद गिरि ने भील जाति के लोगों को जागृत करना प्रारंभ कर दिया। गोविंद गिरि का कार्यक्षेत्र उदयपुर रियासत के अंदर ही था जो वर्तमान में बांसवाड़ा जिले में आता है।17 नवम्बर सन् 1913 को मान गढ़ पहाड़ी पर भील सम्मेलन पर शासन के द्वारा अंधाधुंध फायरिंग की गई तथा 1500 भील मार डाले गए। अनुसूचित जनजाति का यह आंदोलन भगत आंदोलन के नाम से जाना जाता है। किसी भी समाचार पत्र में न छपने के कारण इस नरसंहार का देश के लोगों को पता ही नहीं चला। भीलों की आवाज बलपूर्वक दबा दी गई।
सन् 1915 में रास बिहारी बोस के नेतृत्व में लाहौर में क्रान्तिकारियों ने निर्णय लिया कि 21 फरवरी को देश के विभिन्न स्थानों पर 1857 की क्रान्ति की तर्ज पर सशस्त्र विद्रोह किया जाए। भारतीय इतिहास में इसे गदर आन्दोलन कहते है।
9 जनवरी सन् 1915 को गांधी जी विदेश से भारत आ गये। भारत आने पर गांधी जी ने गोपाल कृष्ण गोखले को अपना राजनीतिक गुरु बना लिया तथा कांग्रेस में कार्य करने लगे।
रास बिहारी बोस की योजना यह थी कि एक तरफ तो भारतीय ब्रिटिश सेना को विद्रोह के लिए उकसाय जाये दूसरी तरफ देशी राजाओं और उनकी सेनाओं का विद्रोह में सहयोग प्राप्त किया जाए। राजस्थान में इस क्रान्ति को संचालित करने का दायित्व राव गोपाल सिंह खरवा व भूप सिंह गुर्जर को सौंपा गया। उस समय भूप सिंह गुर्जर फिरोजपुर षडयंत्र केस में फरार थे और खरवा (राजस्थान) में गोपाल सिंह के पास रह रहे थे। दोनो ने मिलकर दो हजार युवकों का दल तैयार किया और तीस हजार से अधिक बन्दूकें एकत्र की।ब्यावर में क्रांति की जिम्मेदारी राव गोपाल सिंह खरवा व दामोदर दास राठी पर थी और अजमेर व नसीराबाद में क्रांति की जिम्मेदारी भूप सिंह गुर्जर पर थी। दुर्भाग्य से अंग्रेजी सरकार पर क्रान्तिकारियों की देशव्यापी योजना का भेद खुल गया। देश भर में क्रान्तिकारयों को समय से पूर्व पकड़ लिया गया। भूप सिंह गुर्जर और गोपाल सिंह ने गोला बारूद्व भूमिगत कर दिया और सैनिकों को बिखेर दिया । परन्तु कुछ  दिनों बाद अजमेर के अंग्रेज कमिश्नर ने पांच सौ सैनिकों के साथ भूप सिंह गुर्जर और गोपाल सिंह को खरवा के जंगलों से गिरफ्तार कर लिया और टाडगढ़ के किले में नजरबंद कर दिया गया। उन्हीं दिनों लाहौर षडयंत्र केस में भूप सिंह गुर्जर का नाम उभरा और उन्हें लाहौर ले जाने के आदेश हुए। किसी तरह यह खबर राव गोपाल सिंह खरवा और भूप सिंह गुर्जर को मिल गई और वो टाडगढ़ के किले से फरार हो गए।
राव गोपाल सिंह खरवा को पुनः पकड़ लिया गया।राव गोपाल सिंह खरवा करीब पांच वर्ष जेल में बंद रहे। परंतु भूप सिंह गुर्जर अंग्रेजों की पकड में नही आये। भूप सिंह गुर्जर ने अपना भेष बदल लिया,अपनी दाढ़ी और मूंछें बढ़ा ली तथा अपना नाम बदलकर विजय सिंह पथिक रख लिया।अब विजय सिंह पथिक चित्तौड़ के एक गांव ओछड़ी में विद्या प्रचारिणी सभा चलाने लगे।इस संस्था के नाम से ही जान पड रहा है कि आम लोगों में शिक्षा का प्रचार प्रसार किया जाना इस संगठन का उद्देश्य होगा। विद्या प्रचारिणी सभा के अधिवेशन में साधु सीताराम दास जो बिजौलियां ठिकाने के पुस्तकालय में नौकरी करते थे, परन्तु किसान हितैषी थे,भी पहुंचे।साधु सीताराम दास जी ने विजय सिंह पथिक जी से प्रभावित होकर बिजौलियां किसानों के आंदोलन का नेतृत्व करने का आग्रह पथिक जी से किया। सन् 1916 में विजय सिंह पथिक जी ने बिजौलियां किसान आंदोलन में प्रवेश किया।
हम पाठको को बिजौलियां ठिकाने के विषय में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी देने की जरूरत समझेंगे। ताकि इस आंदोलन के माध्यम से पथिक जी के महान कार्यों पर उचित प्रकाश पड़ सके-
बिजौलियां ठिकाना मेवाड़ राज्य के 16 प्रथम श्रेणी के ठिकानों में से एक था।जो वर्तमान में भीलवाड़ा जिले में आता है। वर्तमान भरतपुर के पास जगनेर नामक स्थान के अशोक परमार नामक एक व्यक्ति थे, जिन्होंने सन् 1527 में खानवा के युद्ध में राणा सांगा की ओर से युद्ध किया था। अशोक परमार को उनकी  सैनिक सेवा से प्रसन्न होकर राणा सांगा ने उपरमाल नाम की एक जागीर दी थी। बिजोलिया इस उपरमाल नामक जागीर का मुख्यालय था।इस ठिकाने में 79 गांव थे। बिजौलियां ठिकाने की सीमा ग्वालियर,कोटा और बूंदी  रियासतों को छूती थी। बिजौलियां ठिकाने में धाकड़ जाति के किसान बसे हुए थे।इन किसानों के अपने ठिकाने के ठाकुर के साथ बडे मधुर सम्बन्ध थे। बिजौलियां ठिकाने के ठाकुर राव केशव दास के साथ इन धाकड़ जाति के किसानों ने मिलकर अपने क्षेत्र से मराठों को बाहर निकाल दिया था।यह तालमेल राव गोविन्द दास जो बिजौलियां ठिकाने के ठाकुर थे, की मृत्यु सन् 1894 तक बना रहा।राव गोविन्द दास की मृत्यु के बाद राव कृष्णा सिंह बिजौलियां के ठाकुर बने।राव कृष्णा सिंह ने 84 प्रकार के कर अपने ठिकाने के किसानों पर लगा दिए। भू-राजस्व नगदी में लेने का आदेश पारित किया गया।यही से किसान आंदोलन की नींव पड गई। बिजौलियां किसान आंदोलन भारत ही क्या विश्व का सबसे लम्बा चलने वाला आंदोलन माना जाता है।यह आंदोलन  44 वर्ष तक चला।इस आंदोलन को तीन भागों में बांटा जाता है।प्रथम चरण सन् 1897-1915, द्वितीय चरण सन् 1915-1923, तृतीय चरण सन् 1923-1941तक।
प्रथम चरण में यह आंदोलन स्थानिय किसानों के नेतृत्व में चला। बिजौलियां के किसानों ने अपनी स्थानिय समस्याओं के निराकरण के लिए धाकड़ पंचायत के नाम से एक संगठन बना रखा था। बिजौलियां ठिकाने में गिरधर पुर नाम का एक गांव था,इस गांव में गंगाराम धाकड़ नाम के एक किसान के पिता की मृत्यु हो गई थी।इस मृत्यु भोज में आसपास के किसान एकत्रित हुए, जिसमें इन असिमित लगें कर से छूटकारा प्राप्त करने के लिए विचार विमर्श हुआ।इन किसानों का सम्पर्क साधु सीताराम दास जी से हुआ,जो बिजोलिया ठिकाने के पुस्तकालय में नौकरी करते थे। किसानों ने अपनी समस्या साधु सीताराम दास जी के सामने रखी। सीताराम जी ने किसानों को सलाह दी कि आप अपने ठाकुर की शिकायत उदयपुर जाकर मेवाड़ के राणा फतेह सिंह जी से करें। सीताराम दास जी की सलाह के अनुसार दो किसान नानाजी पटेल व ठाकरी पटेल राणा जी से मिल कर शिकायत कर आये।राणा जी ने हामिद नाम का एक जांच अधिकारी बिजौलियां मे भेजा। हामिद ने अपनी रिपोर्ट किसानों के हित में दी तथा ठिकाने के ठाकुर कृष्णा सिंह को दोषी माना।जब राव कृष्णा सिंह को इस घटना का पता चला तो उसने नाराज किसानों को कुछ सहुलियत देकर मना लिया, लेकिन जो दो किसान शिकायत करने राणा जी के पास गये थे,उनको अपने क्षेत्र से निष्कासित कर दिया।यह सन् 1899 की घटना है। कुछ समय शांति से व्यतीत हुआ, परन्तु सन् 1903 में राव कृष्णा सिंह ने  चंवरी के नाम से एक नया कर किसानों पर लगा दिया।इस कर के अनुसार किसान जब अपनी लड़की की शादी करेगा तो 5 रुपए चंवरी कर के रूप में ठाकुर को  देगा।इस कर को लेकर किसानों में रोष व्याप्त हो गया। भारत में यह प्रथा है कि लडकी की शादी में कन्यादान के रूप में धन दिया जाता है यहां धन लेने की बात थी। किसानों ने दो साल तक अपनी लड़कियों की शादी नही की। सन् 1905 में दो सो किसान इकट्ठा होकर राव कृष्णा सिंह के पास पहुंचे और इस चंवरी कर को हटाने का आग्रह किया।जिस पर राव कृष्णा सिंह नही माने।ये सब दो सो किसान राव कृष्णा सिंह का क्षेत्र छोड़कर पास के राज्य ग्वालियर में चले गए।जब किसान ही नहीं रहें तो कर कौन देगा।इस परिस्थिति में राव कृष्णा सिंह ने किसानों को वापस बुला लिया तथा चंवरी कर हटा दिया। कुछ सहुलियत और भी किसानों को दी गई। सन् 1906 में राव कृष्णा सिंह की मृत्यु हो गई।राव कृष्णा सिंह निसंतान थे। अतः नये ठाकुर के रूप में पृथ्वी सिंह बने जो भरतपुर के पास जगनेर नामक स्थान से लाकर बनाये गये थे।जब कोई नया ठाकुर ठिकाने का बनता था तब वह उत्तराधिकारी बनने के नियमानुसार अपने राणा को तलवार बधांई के नाम से कुछ धन भेंट करता था।राव पृथ्वी सिंह ने इस तलवार बंधाई की धन राशि के लिए अपने ठिकाने के किसानों पर एक कर और लगा दिया। किसानों ने इस कर का विरोध किया। परंतु राव पृथ्वी सिंह ने किसान नेता फतह करण चारण व ब्रह्म देव को क्षेत्र से निष्कासित कर दिया।साधु सीताराम दास को भी नौकरी से निकाल दिया। परंतु अब किसान जागरूक हो चुके थे यह सन् 1915तक का संघर्ष था।
इन्ही साधु सीताराम दास जी के आग्रह पर विजय सिंह पथिक जी ने बिजौलियां किसान आंदोलन में सन् 1916 में प्रवेश किया। सन् 1916 में ही लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, जिसमें कांग्रेस के नरम दल व गरम दल तथा मुस्लिम लीग एक हो कर कांग्रेस में मिल गये थे।
विजय सिंह पथिक जी ने बिजोलिया पहुंच कर इस आंदोलन में प्राण फूंक दिए। विजय सिंह पथिक जी ने उपरमाल पंच बोर्ड के नाम से एक संगठन बनाया तथा इसका सरपंच माना पटेल को बनाया। उपरमाल सेवा समिति के नाम से क्षेत्र के युवाओं को जोडा। जिन्हें गांव गांव जाकर आंदोलन का प्रचार करना तथा" उपरमाल का डंका" के नाम से छपा पर्चा वितरण करना था।इस समय प्रथम विश्व युद्ध के लिए चंदा भी वसूल किया जा रहा था। अतः सावन की अमावस्या अर्थात जुलाई-अगस्त सन् 1917 को बैरीसाल गांव से आंदोलन का बिगुल बजा दिया। सन् 1917 में अप्रेल में बिहार का चम्पारण सत्याग्रह भी नील की खेती की तिनकठिया निति के विरोध में हुआ था, जिसमें महात्मा गांधी जी ने भाग लिया था।क्योकि बिजौलियां में पथिक जी ने सन् 1916 से ही आंदोलन शुरू कर दिया था, अतः पथिक जी को भारत के किसान आंदोलन का जनक कहा जाता है। पथिक जी ने आंदोलन के प्रचार के लिए तत्तकालीन समय के समाचार पत्रों से सम्पर्क किया।उस समय कानपुर से गणेश शंकर विद्यार्थी जी के द्वारा"प्रताप"नामक समाचार पत्र निकाला जाता था। पथिक जी ने गणेश शंकर विद्यार्थी जी को चांदी की राखी भेजकर  बिजौलियां आंदोलन के लिए मदद मांगी।इसके साथ तिलक के मराठा, प्रयाग के अभ्युदय, कलकत्ता के भारत मित्र तथा अजमेर से नवीन राजस्थान नामक समाचार पत्रों में बिजौलियां आंदोलन के समाचार प्रकाशित कर आंदोलन को भारत में पहुंचा दिया। दूसरी ओर जमुना लाल बजाज के माध्यम से आंदोलन में कांग्रेस की मदद के लिए भी प्रयास प्रारंभ कर दिया। सन् 1918 में गुजरात के खेड़ा में भी सरदार पटेल ने किसानों का आंदोलन शुरू कर दिया, जिसमें गांधी जी ने भी भाग लिया।इस प्रकार भारत में किसान आंदोलन शुरू हो गये। सन् 1919 में अमृतसर में कांग्रेस के अधिवेशन में पथिक जी बिजौलियां आंदोलन में मदद के लिए पहुंचे। वहां पर पथिक जी ने बाल गंगाधर तिलक को मदद के लिए तैयार कर लिया। कांग्रेस के अधिवेशन में बिजौलियां आंदोलन के विषय में समर्थन के लिए बालगंगाधर तिलक व केलकर ने प्रस्ताव रख दिया। परन्तु महात्मा गांधी जी व मदनमोहन मालवीय जी ने इस प्रस्ताव को रोक दिया। गांधी जी का कहना था कि जो भारत सीधे अंग्रेजों के हाथ में है कांग्रेस उसमें ही भाग लेगी।जो भारत देशी राजाओं के हाथ में है,जहा अंग्रेजों की अप्रत्यक्ष सत्ता है, उसमें कांग्रेस आम जनता के लिए किए जा रहे आंदोलन में भाग नहीं लेगी। लेकिन बिजौलियां के किसानों की समस्या का हल हो,इसके लिए मेवाड़ के राणा को गांधी जी व तिलक जी ने पत्र लिखे तथा मदन मोहन मालवीय जी को राणा से मिलने के लिए भेजा। अब राणा ने बिंदुलाल भट्टाचार्य,अमर सिंह तथा अफजल अली के नेतृत्व में एक जांच आयोग बिजौलियां के किसानों की परेशानी को जानने के लिए बना दिया। कांग्रेस व जांच आयोग से किसानों को कोई लाभ नहीं हुआ। सन् 1919 में ही महाराष्ट्र के वर्धा में राजस्थान सेवा संघ के नाम से विजय सिंह पथिक जी ने एक संगठन बनाया। 13 अप्रैल सन् 1919 को अमृतसर में जलियांवाला बाग में अंग्रेजों द्वारा गोलीकांड कर दिया गया।ब्रिटिश राज के अभिलेख इस घटना में 200 लोगों के घायल होने और 379 लोगों के शहीद होने की बात स्वीकार करते है जिनमें से 337 पुरुष, 41 नाबालिग लड़के और एक 6-सप्ताह का बच्चा था।
 पथिक जी ने सन् 1920 में राजस्थान सेवा संघ का मुख्यालय अजमेर में बना लिया।इस संगठन में विजय सिंह पथिक,साधु सीताराम दास, माणिक्य लाल वर्मा व जमुना लाल बजाज, रामनारायण चौधरी आदि थे। सन् 1920 के कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में विजय सिंह पथिक अपने साथ बिजौलियां के तीन किसान कालू जी, गोकुल जी व नंदराम जी को लेकर पहुंचे। अधिवेशन में चित्रों के माध्यम से प्रदर्शनी लगाकर बिजौलियां के किसानों की हालत को दर्शाया गया।गांधी जी ने अपने निजी सचिव महादेव देसाई को राणा से वार्ता करने के लिए भेजा।गांधी जी का यह मत था कि सबसे पहले अंग्रेजों को भारत से भगाया जाय। यदि कांग्रेस देशी राजाओं के साथ उलझ गई तो देशी राजा अंग्रेजों के पक्ष में आ जायेगे,जिस कारण आजादी की लडाई में अवरोध पैदा हो जायेगा। लेकिन भारत के देशी राजा और नबाब तो अंग्रेजों की कठपुतली थे।यही सोच कर गाधी जी ने खिलाफत आन्दोलन (मार्च सन् 1919- जनवरी सन् 1921) में मुस्लिमो का समर्थन किया था कि भारत का मुस्लिम अंग्रेजों के विरुद्ध कांग्रेस के साथ आ जाएं। दूसरी ओर विजय सिंह पथिक और डा अम्बेडकर जैसे नेताओं का यह मत था कि किसी व्यक्ति का शोषण घर का व्यक्ति करें या बाहर का। शोषित व्यक्ति को पीड़ा बराबर ही होती है। इसलिए डा अम्बेडकर ने कहा था कि कांग्रेस फ्रिडम आफ इंडिया तो चाहती है परन्तु फ्रिडम आफ पिपुल आफ इंडिया नही चाहती।यानि भारत की आज़ादी तो चाहती है परन्तु भारत के नागरिक की आजादी नही चाहती।
राजपूताना मध्य भारत संघ नामक संगठन जो जमुना लाल बजाज के नेतृत्व में चलता था ने बिजोलिया किसानों की स्थति की जांच के लिए अपने संगठन की ओर से भवानी दयाल नाम के एक कार्यकर्ता को नियुक्त कर दिया।ऐसी स्थिति में मेवाड़ के राणा फतह सिंह ने पुनः दूसरा जांच आयोग बना दिया, जिसमें राज सिंह मेहता,तख्त सिंह मेहता व रमाकांत मालवीय को रखा गया। इन तीनों ने बिजोलिया से 15 किसानों को बातचीत के लिए उदयपुर में बुलाया। लेकिन किसानों को कोई लाभ नहीं दिया। विजय सिंह पथिक का गिरफ्तारी वारंट निकाल दिया। विजय सिंह पथिक मेवाड़ रियासत के बाहर उमा जी का खेडा नामक गांव में चले गए।अब राजस्थान सेवा संघ के मंत्री रामनारायण चौधरी अंग्रेज अधिकारी विलकिम से मिले। पुनः किसानों की समस्या के हल पर विचार विमर्श के सन् 1922 में  एक जांच समिति का गठन कर दिया गया।इस कमेटी में राबर्ट हालेंड(AGG),आगतवी (सचिव),प्रभाष चंद्र चटर्जी (मेवाड़ के दीवान) तथा बिहारी लाल थे।इस जांच समिति ने बिजोलिया के किसान मोतीराम सरपंच व नारायण जी पटेल से बातचीत कर किसानों की मांग सुनी और 35 कर समाप्त कर दिए।जिससे किसान प्रसन्न हो गए, लेकिन बिजौलियां के ठाकुर ने इस समझौते को नही माना।
बिजोलिया में चल रहे इस आंदोलन को देखकर समस्त राजस्थान के किसानों तथा अन्य वर्गों में अपने अधिकारों के प्रति चेतना जागृत हुई। परिणाम स्वरूप कई जगह आंदोलन प्रारंभ हो गये।भोमट भील आंदोलन के नाम से भील और गरासिया जनजाति ने मिलकर आंदोलन प्रारंभ कर दिया।इस आंदोलन का नेतृत्व मोतीलाल तेजावत जो ओसवाल जाति के थे तथा झाडोल ठिकाने में कामदार थे, ने किया तथा एक किसान नेता गोकुल जाट ने सहयोग किया।7 नवम्बर सन् 1922 को मेजर शर्टन ने विजय नगर रियासत के नीमडा गांव में एकत्रित भीलों पर फायरिंग करवा दी, जिसमें 1200 भील शहीद हो गए। बेगूं, बूंदी, शेखावाटी में जो आंदोलन हुए राजस्थान सेवा संघ ने इन आंदोलनों का नेतृत्व किया।
बिजोलिया और बेगूं के आंदोलन का नेतृत्व स्वयं विजय सिंह पथिक जी ने किया। बेगूं के किसान सन् 1921 में विजय सिंह पथिक जी के पास आये, पथिक जी ने बेगूं के किसानों का नेतृत्व करने के लिए राजस्थान सेवा संघ के मंत्री रामनारायण चौधरी को भेजा। बेगूं भी मेवाड़ रियासत का एक ठिकाना था। इसमें भी बिजौलियां की तरह धाकड़ जाति के किसान रहते थे। मेवाड़ रियासत के चार ठिकाने क्रमशः सलूम्बर,आमेट, बेगूं और देवगढ़ राणा लाखा के बडे पुत्र चूड़ा जिन्हें आधुनिक युग का भिष्म कहा जाता है को दे दिए गए थे।उनकी संतानें ही इन ठिकानों के ठाकुर थे। अकबर के साथ चित्तौड़ के युद्ध में जो फत्ता सिसोदिया वीर गति को प्राप्त हुए थे वो आमेट ठिकाने के जागीर दार थे। बेगूं में किसानों पर 54 प्रकार के कर लगे हुए थे। यहां के ठिकाने दार अनूप सिंह थे। रामनारायण चौधरी मेवाड़ के दीवान से बेगूं की समस्या के समाधान के लिए मिलें। सन् 1922 में मंडावरी नामक स्थान पर सभा कर रहे किसानों पर लाठी चार्ज किया गया। परन्तु किसान आंदोलन चलता रहा।मजबूर होकर बेगूं के ठिकाने दार अनूप सिंह ने जून सन् 1922 में अजमेर में जाकर विजय सिंह पथिक जी की मध्यस्थता में किसानों के साथ समझौता कर लिया।
इस समय गांधी जी ने असहयोग आंदोलन चला रखा था। जिसमें चौरी चौरा कांड हो गया।चौरी चौरा उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के पास का एक कस्बा है जहाँ 4 फ़रवरी 1922 को  भारतीयों ने बिट्रिश सरकार की एक पुलिस चौकी को आग लगा दी थी जिससे उसमें छुपे हुए 22 पुलिस कर्मचारी जिन्दा जल के मर गए थे। इस घटना के बाद गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।
जब बेगूं के किसानों के समझौते की सूचना मेवाड़ के राणा फतेह सिंह को पहुंची तो ठाकुर अनूप सिंह को उदयपुर बुलाकर कैद कर लिया।
बिजौलियां में राणा का समझौता ठिकाने दार नही मान रहा था, बेगूं में ठिकाने दार का समझौता राणा नही मान रहा था। कुल मिलाकर मेवाड़ का नेतृत्व किसानों को सहूलियत नही देना चाहता था।अब 13 जून सन् 1923 को मेवाड़ के सेटलमेंट कमिश्नर ट्रेंच को बेगूं के किसानों की समस्या को हल करने के लिए भेजा गया। ट्रेंच ने बेगूं के किसानों से कहा कि बातचीत में बेगूं से बाहर का कोई व्यक्ति भाग नही लेगा।इस पर किसान तैयार नहीं हुए, किसान राजस्थान सेवा संघ को बातचीत से बाहर नही चाहते थे। अतः 13 जुलाई सन् 1923 को किसान गोविंद पुरा नामक गांव में एकत्रित हुए।इस समय किसानों पर ट्रेंच के द्वारा लाठीचार्ज व फायरिंग करवा दी गई। जिसमें 500 किसान गिरफ्तार कर लिए गए तथा रूपा जी धाकड़ व कृपा जी धाकड़ नाम के दो किसान शहीद हो गए।जब यह समाचार पथिक जी को प्राप्त हुआ तो वह अपने आप को रोक नहीं पाये तथा किसानों का मनोबल बढ़ाने के लिए अजमेर से बेगूं आ गये। जहां 10 सितंबर सन् 1923 को पथिक जी को गिरफ्तार कर लिया गया तथा पांच वर्ष के लिए उदयपुर जेल में भेज दिया गया।अब बेगूं किसान आंदोलन की कमान माणिक्य लाल वर्मा ने सम्भाली। मार्च सन् 1925 में लगभग 34 प्रकार के कर मेवाड़ सरकार ने बेगूं के किसानों से हटा कर समझौता कर लिया। बेगूं का आंदोलन समाप्त हो गया।
बिजौलियां की सीमा से लगा बूंदी राज्य का बरड क्षेत्र था,यहा के गुर्जर किसानों ने बेगार व भ्रष्टाचार के विरुद्ध बूंदी सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया।इस आंदोलन का नेतृत्व राजस्थान सेवा संघ के एक कार्यकर्ता नयनू शर्मा ने किया।2 अप्रैल सन् 1923 को डाबी नाम के स्थान पर किसानों की सभा पर बूंदी प्रशासन ने गोली चला दी, जिसमें नानक भील व देवीलाल गुर्जर शहीद हो गए।
पथिक जी की गिरफ्तारी के बाद सन् 1923-1941 का समय बिजौलियां आंदोलन का अंतिम चरण है। वहीं राजस्थान के अन्य क्षेत्रों में भी इस अवधि में अनेक आंदोलन हुए। अलवर रियासत में राजपूत जाति के किसानों के द्वारा लगान की बढी दरों को लेकर आंदोलन किया गया।जो निमूचाना आंदोलन के नाम से जाना जाता है।इस आंदोलन में 14 मई सन् 1925 को अलवर रियासत की सेना ने कमांडर छाजू सिंह के नेतृत्व में किसानों पर अंधाधुंध फायरिंग की। जिसमें 156 किसान मारे गए,39 गिरफ्तार कर लिए गए। हजारों की संख्या में किसान और पशु घायल हुए।इस नरसंहार को गांधी जी ने दोहरी डायरशाही कह कर अपने यंग इंडिया समाचार पत्र में भर्त्सना की।
 सन् 1926 में अंग्रेज अधिकारी ट्रेंच को बिजौलियां की भूमि का बंदोबस्त करने के लिए भेजा गया। ट्रेंच ने जो सिंचित भूमि थी,उस पर कर घटा दिया तथा असिंचित भूमि पर कर बढ़ा दिया।ऐसा उल्टा काम देख किसान आंदोलित हो उठे। किसानों ने आपस में सलाह की, सन् 1927 में विजय सिंह पथिक भी जेल से छूटकर आ गये थे। किसानों की यह योजना बनी कि असिंचित भूमि के पट्टे ठिकाने दार को वापस कर दिए जाएं।जब जमीन खाली हो जायेगी तो ठिकाने दार अपने आप समझौता करेगा।सभी किसानों ने अपनी जमीन के पट्टे वापस कर दिए। परन्तु साहूकारों व सम्पन्न किसानों ने वो पट्टे ठिकाने दार से खरीद लिए।इस समय विजय सिंह पथिक, रामनारायण चौधरी, माणिक्य लाल वर्मा व जमुना लाल बजाज में भी आपसी मतभेद हो गये थे।जब बात गांधीजी तक पहुंची,तो जमुना लाल बजाज से आंदोलन के नेतृत्व का आग्रह किया गया। परन्तु यह उनके बस का काम नही था, हरिभाऊ उपाध्याय नाम के एक कार्यकर्ता को गांधी जी ने बिजौलियां भेजा। मदन मोहन मालवीय जी ने एक पत्र मेवाड़ प्रशासन को लिखा। मेवाड़ प्रशासन ने माणिक्य लाल वर्मा को भी गिरफ्तार कर लिया।समय व्यतीत होता रहा।
सन् 1927 में अंग्रेजों ने भरतपुर के जाट राजा किशन सिंह को हटा कर उनकेे अल्पव्यस्क पुत्र को राजा बना दिया। सन् 1930 में अंग्रेजों ने मेवाड़ के राणा फतेह सिंह के स्थान पर उनके पुत्र भोपाल सिंह को राणा बना दिया।
 सन् 1931 में अक्षय तृतीया के दिन बिजौलियां के किसानों ने अपनी उन जमीनों पर जिनके पट्टे ठिकाने दार को वापस कर दिए थे, में अपने हल चलाने प्रारंभ कर दिए।इन किसानों पर ठिकाने दार के सैनिकों ने, मेवाड़ रियासत के सैनिकों ने तथा उन किसानों ने जिन्होंने ये पट्टे खरीद लिए थे, ने मिलकर हमला कर दिया।
सन् 1933 में अंग्रेजों ने अलवर के राजा जय सिंह को हटाकर एक जागीरदार तेज सिंह को अलवर का राजा बना दिया तथा राजा जयसिंह को देश निकाला दे कर पेरिस भेज दिया।
 सन् 1938 में किसानों ने लिखकर मेवाड़ के राणा भोपाल सिंह को दिया कि वो आगे कोई आंदोलन नही करेंगे,उनकी जमीन वापस दे दी जाय। 
सन् 1938 में सुभाषचन्द्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष बने। सुभाषचन्द्र बोस ने कहा कि अब कांग्रेस रियासत के राजाओं द्वारा शोषित जनता के लिए राजाओं के क्षेत्रों में भी आंदोलन में सक्रिय सहयोग करेगी।
12 मार्च सन् 1939 में पथिक जी के अनन्य सहयोगी राव गोपाल सिंह खरवा का देहांत हो गया।
अतः सन् 1941 में बिजौलियां के किसानों को अपनी जमीन वापस मिल गई।इस प्रकार इस बिजौलियां आंदोलन का अंत हो गया।विजय सिंह पथिक जी के लम्बे संघर्ष ने राजाओं की शक्ति के नीचे दबी जनता में अभूतपूर्व चेतना व आत्मबल का संचार किया।जिस कारण पूरा राजस्थान आंदोलित हो उठा।विजय सिंह पथिक आंदोलनकारी नेता के साथ एक विचारक व लेखक भी थे। पथिक जी ने भारत की रियासतों के विषय में एक पुस्तक लिखी जिसका नाम है "व्हाट आर द इंडियन स्टेट्स"।
15 अगस्त सन् 1947 को देश आजाद हो गया। देश में लोकतंत्र स्थापित हो गया।18 अप्रैल सन् 1948 को राजस्थान के तृतीय चरण का एकीकरण होने पर मेवाड़ के महाराणा भूपाल सिंह राजस्थान के राजप्रमुख तथा माणिक्य लाल वर्मा राजस्थान के प्रधानमंत्री बने।
26 जनवरी सन् 1950 को देश का संविधान लागू हो गया। सन् 1952 में आजाद भारत का पहला चुनाव सम्पन्न हुआ। पथिक जी के शिष्य माणिक्य लाल वर्मा जी टोंक से १९५२ में लोकसभा के सांसद चुने गए ।विजय सिंह पथिक (भूप सिंह गुर्जर) जी ने  अंग्रेजी शासन की जुल्मों भरी भयानकता तथा अपने जीवन की अंतिम बेला में आजाद भारतीय जनता की प्रसन्नता को अपनी आंखों से देखा।
पथिक जी जीवनपर्यन्त निःस्वार्थ भाव से देश सेवा  में जुटे रहें। भारत माता का यह महान सपूत 28 मई, 1954 में चिर निद्रा में सो गया। पथिक जी की देशभक्ति निःस्वार्थ थी और  मृत्यु के समय उनके पास सम्पत्ति के नाम पर कुछ नहीं था, जबकि तत्कालीन सरकार के कई मंत्री उनके राजनैतिक शिष्य थे। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री श्री शिवचरण माथुर ने पथिक जी का वर्णन राजस्थान की जागृति के अग्रदूत महान क्रान्तिकारी के रूप में किया।
क्रांतिकारी विजय सिंह पथिक व उन हजारों सत्याग्रहियों को जो आंदोलनों में शहीद हो गए,को शत-शत नमन।
समाप्त
सन्दर्भ ग्रंथ
1- डा सुशील भाटी - बिजौलिया के गांधी - विजय सिंह पथिक।
2 - रमन भारद्वाज (यू ट्यूब) - बिजौलियां व बेगूं किसान आंदोलन राजस्थान।



बुधवार, 15 जुलाई 2020

भारतीय संस्कृति के रक्षक गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज - लेखक अशोक चौधरी मेरठ।

आज के भारत में हम भारत के नागरिक जिस आजादी में जीवन व्यतीत कर रहे हैं,उसे इस रूप में प्राप्त करने के लिए हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्षों तक संघर्ष किया तथा असंख्य बलिदान दिए हैं,ऐसा ही एक संघर्ष आठवीं सदी के प्रारंभ में शुरू हुआ।

सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु(सन् 647) के बाद से सन् 1947 तक के 1300 वर्ष के कालखंड में गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य (सन् 730 से सन् 980) 250 वर्षों तक भारत के एक बड़े भू-भाग पर स्थापित रहा।जो भारतीयों के लिए एक प्रकाश पुंज की तरह है। गुर्जर प्रतिहार राजाओं के शासन काल में ही भारतीय सनातन संस्कृति अपने चरम पर पहुची।इसी कालखंड में आदि शंकराचार्य का उदभव हुआ।आदि शंकराचार्य ने वैष्णव,शैव और शाक्य परम्पराओं की बडी सुंदर प्रस्तुति आम जनमानस के सामने रखी। हिंदूओं के चार धामों में चार पीठ,सप्त पुरियो,12 ज्योतिर्लिंग तथा देवी के कई शक्ति पीठ इसी कालखंड में स्थापित  किए गये।

यह वह समय था जब भारत पर अरब के द्वारा इस्लामिक हमले शुरू हो गये थे।ये हमलावर मंदिरों को क्षतिग्रस्त कर रहे थे,सम्पदा को लूट रहे थे, निहत्थे और सात्विक पुजारी और भारतियों की हत्या कर रहें थे। सत्ता की ओर से गुर्जर प्रतिहार राजाओं ने सभी स्थानीय शक्तियों को एकत्रित कर इन हमलावरों को रोकने के लिए अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगा रखी थी, परन्तु दूसरी ओर राजनीतिक लाभ के लिए राष्ट्रकूट और पाल शासक या तो उदासीन थे या इन अरब हमलावरों से मिल जाते थे।

इन परिस्थितियों में आदि शंकराचार्य ने धर्म व धार्मिक स्थलों की सुरक्षा के लिए साधुओं में सैन्य पथ की स्थापना की। जिनको नागा साधु कहा गया। गुजरात की भाषा में नागा शब्द का अर्थ है लडाका।

इस समय सोरसेनी प्राकृत साहित्य में वृद्धि हुई।विक्रमी संवत् की उत्तरी भारत में लोकप्रियता अपने चरम पर पहुची। हिन्दू तीर्थों की पुनर्स्थापना हुई।यह हिन्दू धर्म का स्वर्ण युग भी कहा जा सकता है।
यहां हमारे लेखन का उद्देश्य इस कालखंड में हुए संघर्ष में गुर्जर प्रतिहार तथा उनके सहयोगियों के पराक्रम व बलिदान पर प्रकाश डालते हुए सम्राट मिहिर भोज के द्वारा स्थापित विशाल साम्राज्य के बारे में पाठकों को बताना है-
प्रतिहार शब्द की विवेचना के लिए देखें परिशिष्ट नंबर-1

 उज्जैन/कन्नोज के प्रतिहार  गुर्जर प्रतिहार कहलाये। अतः देखते हैं कि उज्जैन/कन्नोज के प्रतिहार वंश को किन समकालीन ग्रंथ व अभिलेखों में गुर्जर कहा है -

देखें परिशिष्ट नंबर- 2

सम्राट मिहिर भोज (सन् 836-885) की ग्वालियर प्रशस्ती में प्रतिहार वंश के राजाओं को राम जी के भाई लक्ष्मण का वंशज बताया गया है।

सम्राट मिहिर भोज के दरबारी विद्वान राजशेखर जो मिहिरभोज के पुत्र महेन्द्र पाल (सन् 885-910) के गुरू थे, ने महेंद्र पाल को रघुग्रामिणी और रघुवंश तिलक कहा है।

राजशेखर ने ही महेंद्र पाल के पुत्र महीपाल को रघुवंश मुकुट मणि कहा है।

 उपरोक्त गुर्जर प्रतिहार परिचय के पश्चात् पाठकों को उस समय के घटनाक्रम को जानने के लिए  जब अरब हमलावरों ने भारत पर आक्रमण प्रारंभ कर दिए थे। देखें-

परिशिष्ट नंबर-3

  रामभद्र सूर्य का उपासक था तथा गुर्जर प्रतिहार वंश का तिसरा सम्राट था। वत्सराज गुर्जर प्रतिहार वंश के पहले सम्राट थे। सम्राट रामभद्र पर पाल राजा देवपाल ने हमला कर दिया, जिसे रामभद्र ने निष्फल कर दिया।इस हमले की जानकारी बादल स्तम्भ लेख व दौलतपुर दान पत्र से मिलती है।रामभद्र कुछ विलासी प्रवृत्ति का था अतः उसके मंत्रियों ने रामभद्र को हटाकर उसके पुत्र भोज को शासक बना दिया,जिसकी माता का नाम अप्पा देवी था।यही भोज सम्राट मिहिर भोज (सन् 836-885)के नाम से प्रसिद्ध हुआ। भोज नाम के चार शासक भारतीय इतिहास में हुए हैं, सबसे पहले सम्राट मिहिर भोज जो नो वी शताब्दी में हुए, दूसरे उज्जैन के भोज परमार जो ग्यारहवीं शताब्दी में हुए,तिसरे सवाई भोज बगड़ावत जो तेरहवीं शताब्दी में हुए और भगवान् देवनारायण के पिता थे, चौथे भोजराज जो राणा सांगा के पुत्र तथा संत मीराबाई के पति थे जिनका समय 16 वी शताब्दी है। यहां हमारे अध्ययन का केन्द्र नो वी शताब्दी के गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज है।

सम्राट मिहिर भोज की दो उपाधियां और थी,एक आदि वराह  (ग्वालियर प्रशस्ती) ,दूसरी प्रभास(दौलतपुर अभिलेख जोधपुर)।

सम्राट मिहिर भोज के द्वारा ही त्रिपक्षिय संघर्ष जो पाल, राष्ट्रकूट और प्रतिहारो के बीच चल रहा था, में अंतिम विजय प्रतिहारो की हुई तथा प्रतिहार राजा ( सन् 1036) अपने अंत तक कन्नौज पर काबिज रहे। सम्राट मिहिर भोज ने चांदी के द्रम सिक्के चलाये। ग्वालियर में चतुर्भुज भगवान का मंदिर बनवाया।मिहिर भोज (836-885 ई.) के शासन सभालने के एक वर्ष के भीतर ही सिंध के अरबी सूबेदार ने आस-पास के क्षेत्रो को जीतने का प्रयास किया | लेकिन 833-843 के मध्य अरबो को परास्त कर कच्छ से भगा दिया| कुछ ही वर्षो में गुर्जर प्रतीहारो ने अरबो से सिंध का एक बड़ा भाग जीत लिया| अरबी लेखक अल मसूदी (900-940 ई.) के अनुसार सिन्धु नदी गुर्जर साम्राज्य के एक शहर के बीच से बहती थी| अरबो के पास दो छोटे-छोटे राज्य रह गए थे जिनकी राजधानी अल मंसूरा और मुल्तान थी| अरबी लेखक बिलादुरी कहता हैं कि अल-हाकिम इब्न-अवान्हा के समय ‘अल हिन्द’ में मुसलमानों को ऐसा कोई स्थान ढूंढे से भी नहीं मिलता था ज़हा भागकर वो अपनी जान बचा ले। इसलिए उसने अल हिन्द की सीमा के बाहर झील के दूसरी तरफ मुसलमानों की पनाहगाह के रूप में अल मह्फूज़ा नाम का शहर बसाया जहा मुसलमान सुरक्षित रह सके और उसे अपनी राजधानी बना सके| सम्राट मिहिरभोज ने सिंधु और मुल्तान में स्थापित हो गए अरबों को कर देने के लिए मजबूर कर दिया। अरबों से कर वसूलने की जानकारी फारसी ग्रंथ हुदूद- उल-आलम से प्राप्त होती है।

 सम्राट मिहिर भोज के शासनकाल में सन् 851 ई. में सुलेमान नाम का अरब भूगोलवेत्ता और व्यापारी भारत आया| उसने अपने ग्रन्थ ‘सिलसिलात-उत तवारीख’ में गुर्जर साम्राज्य की समृधि और सैन्य शक्ति का शानदार विवरण प्रस्तुत किया हैं| 

सुलेमान तत्तकालीन समय के पाल राजा देवपाल तथा राष्ट्रकूट राजा शर्व अमोघ वर्ष तथा प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज के राज्य में रहा, उसने लिखा कि भारत में सबसे बडी अश्वसेना सम्राट मिहिर भोज के पास है, हाथियों की सेना राजा देवपाल के पास है तथा पैदल सेना शर्व अमोघ वर्ष के पास है।वह लिखता है कि पाल राजा देवपाल भारत का सबसे शक्तिशाली राजा है, राष्ट्रकूट राजा शर्व अमोघ वर्ष संसार के चार महान राजाओं में से एक है।

लेकिन सबसे अधिक ध्यान देने योग्य बात यह है कि वह सम्राट मिहिर भोज के विषय में लिखता है कि मिहिरभोज अरबों का सबसे बड़ा शत्रु है। सम्राट मिहिर भोज का राज्य चोर और डाकुओं से सुरक्षित है। अरब हमलावरों से उस समय पूरा विश्व त्राहि-त्राहि कर रहा था,उनका सबसे बड़ा शत्रु सम्राट मिहिर भोज है। मिस्र के प्रधानमंत्री मलहबी ने भूगोल की एक पुस्तक लिखी,जिसका नाम"अजोजो" है, उसमें वह लिखता है कि कन्नौज भारत का सबसे बड़ा नगर है जिसमें जौहरियों की तीन सौ दुकाने है।

सम्राट मिहिर भोज के द्वारा लिखाई गई ग्वालियर प्रशस्ती में गुर्जर प्रतिहारो को भगवान् राम के भाई लक्ष्मण से जोडा गया है। भारत में श्री राम और श्री कृष्ण सबसे प्रसिद्ध और मान्यता प्राप्त देवता हैं,जब भी किसी व्यक्ति ने बडा कार्य किया है, उसने अपने आप को इन दोनों देवताओं से जरूर जोडा है। छत्रपति शिवाजी महाराज ने जब अपना राज्याभिषेक किया तो उन्होंने भी अपने आप को भगवान् राम से जोडा।यहा पर भी सम्राट मिहिरभोज ने अपने वंश के साथ जुड़े प्रतिहार शब्द को दिव्यता प्रदान करते हुए भगवान् राम के भाई लक्ष्मण के साथ जोड़ा तथा एक तरह से अपने को भारत भूमि और भारतीय संस्कृति का प्रतिहार (प्रहरी)कहा है।इस ग्वालियर प्रशस्ती में ही नागभट प्रथम को लिखा है कि वो नारायण की तरह प्रकट हुए और म्लेच्छो को भारत भूमि से बाहर फैंक दिया।यहा म्लेच्छ का मतलब अरब हमलावरों से है, इस प्रशस्ती में ही प्रतिहारो को आदि वराह कहा है,कि भगवान वराह ने अपनी चार भुजाओं से जिस प्रकार पृथ्वी को बचाया था उसी प्रकार वराह भगवान् की चार भुजाओं (नागभट प्रथम,बप्पा रावल, देवराज भाटी तथा अजयपाल चौहान) ने मलेच्छो को भारत भूमि से बाहर कर दिया। प्रतिहार राजाओं के इस महान कार्य में जो उनके सहयोगी सामंत रहे उनका नाम उजागर करना भी यहा आवश्यक है,जो निम्न हैं-

1- मंडोर (वर्तमान में जोधपुर)के बाऊक प्रतिहार

2- दिल्ली के तंवर

3- शेरगढ़ (राजस्थान में)के नागवंश (नागड़ी/नागर) के देवदत्त।

4-मतस्य(अलवर व आभानेरी/ दौसा) के निकुंभ।

5- महोबा के ननुक चंदेल।

6- चित्तौड़ के गुहिल/गहलोत।

7- सांभर के गुविक द्वितीय चौहान।

8- मांड (जैसलमेर) के भाटी।

9- राजौर गढ (अलवर)के बड़गुर्जर।

10- विजय गढ (बयाना)व तिमन गढ (करौली)के यादव।

11- मोरय।

12- योद्धेय।

13- खालोली,धनोट और हस्तकुंडी (राजस्थान)के राठौड़ (राठी)।

14- ग्वालियर के कच्छपघट (कछवाहे)।

15- आमेर,खोह (जयपुर) और मांच (जमुवा रामगढ़) के मीणा।

16-गोरखपुर(उत्तर प्रदेश) के सोढ देव प्रतिहार (काहता दान पत्र में उल्लेख)

सम्राट मिहिर भोज के समय सांभर के चौहान सबसे शक्तिशाली और विश्वसनीय सामंत थे, चौहान गुवक द्वितीय की बहन कलावती सम्राट मिहिर भोज की रानी थी, पेहवा (हरियाणा) घोड़ों के व्यापार का प्रमुख केन्द्र था।

मिहिर भोज और उसके वंश की सबसे बड़ी राजनैतिक सफलता उस अरब साम्राज्यवाद से भारत की रक्षा करना था, जिसने अल्पकाल में ही लगभग एक तिहाई पुरानी दुनिया को निगल, आठवी शताब्दी के आरम्भ में भारत की सीमा पर दस्तक दे दी थी| तीन शताब्दियों तक गुर्जर प्रतिहारो ने अरबो को भारत की सीमा पर रोक कर रखा| दक्कन के राष्ट्रकूट अपने राजनैतिक स्वार्थो के लिए जहाँ अरबो के साथ मिल गए, वही मिहिर भोज ने काबुल-पेशावर के हिन्दू शासक लल्लिया शाही और पंजाब के अलखान गुर्जर के साथ परिसंघ बनाकर अरबो का डट कर मुकाबला किया| आर. सी. मजुमदार के अनुसार मिहिर भोज “मुस्लिम आक्रमणों के सामने वह अभेद दीवार की भाति था| अपना यह गुण वह अपने उत्तराधिकारियों को विरासत में दे गया”।

 सम्राट मिहिर भोज ने अपने पुत्र महेन्द्र पाल(सन् 914-943) की शिक्षा हेतु अपने समय के विद्वान राजशेखर को शिक्षक नियुक्त किया।इन्ही राजशेखर ने महेंद्र पाल को रघुग्रामिणी व रघुवंश तिलक कह कर सीधे भगवान् राम के वंश से जोडा। महेंद्र पाल के पुत्र महिपाल के अंतिम दिनों में चंदेल, चौहान, गहलोत, कच्छपघट तथा बड़गुर्जर( राजौर गढ,मोचडी और राजगढ़) प्रसिद्ध सामंत थे। इस समय गुर्जर प्रतिहार सत्ता कमजोर होने लगी थी,महोबा के चंदेल,सांभर के चौहान, चित्तौड़ के गुहिल तथा ग्वालियर के कच्छपघट एक तरह से स्वतंत्र शासक बन गए थे। राजौर गढ के राजा मथनदेव बड़गुर्जर का सन् 960 का राजौर गढ में शिलालेख मिला है, राजौर गढ की स्थापना राज देव बड़गुर्जर ने की थी।राज गढ़ के बाघ सिंह बड़गुर्जर "भोमिया" देवता के रूप में राजस्थान में पूजे जाते हैं।

सन् 1018 में जब कन्नौज का राजा राजपाल था तब मोहम्मद गजनवी ने हमला किया। राजपाल गजनवी का सामना नही कर सका तथा कन्नौज से पलायन कर गया,गजनवी ने कन्नौज को लूट लिया।गजनवी के इस हमले का जिक्र गजनवी के दरबारी उत्बी द्वारा लिखित"तारीख-ए-यामिनी"में मिलता है।गजनवी के साथ अलबरूनी नाम का विद्वान भी आया था, जिसने"तहकीक-ए-हिन्द" नाम की एक किताब लिखी।यह किताब ग्यारहवीं सदी का भारत का दर्पण कही जाती है। 

लेकिन इस समय नागभट प्रथम और बप्पा रावल जैसे सुलझे हुए व्यक्ति नही थे, चंदेल राजा विद्याधर और अर्जुन कछवाहे ने महमूद गजनवी के विरूद्ध कोई मोर्चा बनाने के स्थान पर अपने ही राजा राजपाल पर हमला कर उसकी हत्या कर दी।दुबकुंड अभिलेख से राजा राजपाल की अर्जुन कछवाहे के तीर से मृत्यु हो जाने की जानकारी प्राप्त होती है।

इस प्रकार भारत की सुरक्षा का जो द्वार सन् 730 में नागभट प्रथम ने बनाया था वह सन् 1018 में टूट गया।

गुर्जर प्रतिहार राजाओं के शासनकाल में अनेक स्थापत्य कला के कार्य हुए।अनेक मंदिर निर्माण किये गये। भारत में हिमालय से लेकर विंध्याचल पर्वत तक मंदिर नागर शैली में बने हैं, शिखर पर खड़ी रेखाएं होने के कारण इस शैली को आर्य रेखिय शिखर शैली भी कहते हैं। दक्षिण भारत में कृष्णा नदी से लेकर कन्याकुमारी तक द्रविड़ शैली में मंदिर बने हैं,इस शैली की एक विशेषता यह है कि, मंदिर का तोरणद्वार जिसे गोपुरम  कहा जाता है,भव्य बनाया जाता है।कृष्णा नदी से लेकर विंध्याचल पर्वत तक बेसर शैली,जो नागर+द्रविड़/चालुक्य होयसल शैली में मंदिर बने हैं। गुर्जर प्रतिहार राजाओं ने अपनी अलग शैली बनाई, जिसे महामारू शैली कहा गया,इस शैली को नागर शैली का विकसित रुप कहा गया।यह नागर शैली ही मानी गई। प्रतिहार राजाओं ने निम्न मंदिर बनवाए-

1- नीलकंठ मंदिर राजौर गढ (अलवर)

2- हर्षद माता मंदिर आभानेर (दौसा)

3- विष्णु मंदिर मंडोर (जोधपुर)

4-वराह मंदिर आहड़ (गुर्जर प्रतिहार राजाओं के कुल देवता)

5- नारायणी माता मंदिर राजगढ़

6-हरिहर मंदिर व महावीर मंदिर ओसियां

7-कामेश्वर महादेव मंदिर,सुमाली माता मंदिर आउवा

8- सिद्धेश्वर महादेव मंदिर जोधपुर

9- आशावरी माता मंदिर राजौर गढ।

गुर्जर प्रतिहार राजाओं ने जहां तीन सो वर्षों तक भारत की अरबी हमलावरों से रक्षा की,वही दूसरी ओर एक उल्लेखनीय कार्य शानदार जल प्रबंधन और सिंचाई प्रणाली के रूप में किया। उन्होंने पश्चिमी और उत्तरी पश्चिमी उपमहाद्वीप के शुष्क क्षेत्रों में भी एक समृद्ध और शक्तिशाली साम्राज्य का निर्माण किया।

सन् 1090 में गुर्जर प्रतिहार राजाओं के सामंत रहे चन्द्र देव गहरवाल ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया।

गुर्जर प्रतिहार राजाओं के पतन के बाद से भारत की आज़ादी सन् 1947 तक एक समीक्षा देखें-

परिशिष्ट नंबर-4

 समाप्त

परिशिष्ट नंबर-1

आइए सबसे पहले हम प्रतिहार शब्द की विवेचना करते हैं।बंधुओ प्रतिहार शब्द का अर्थ प्रहरी से जुडा हुआ है। भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण जब वनवास में राम जी के साथ गये,तब अपने भाई राम व माता सीता की सुरक्षा हेतु एक प्रहरी के रूप में जो सेवा लक्ष्मण जी ने प्रदान की,उस कारण लक्ष्मण जी को राम जी का प्रतिहार कहा गया। परंतु जिस कालखंड की घटना के बारे में हम लिख रहे हैं उस समय मांडखेत (वर्तमान सोलापुर- महाराष्ट्र)के राष्ट्रकूट राजा अपने देश की रक्षा हेतु जो सामंत नियुक्त करते थे ,वो उनको प्रतिहार नामक पद से सुशोभित करते थे, अतः आठवीं शताब्दी के प्रारंभ में महाराष्ट्र से उज्जैन और वर्तमान राजस्थान के क्षेत्र में जो राष्ट्रकूट राजाओं के सामंत दुर्गों में विराजमान थे वो प्रतिहार कहलाते थे। आठवीं शताब्दी के राष्ट्रकूट शासक दन्ती दुर्ग ने उज्जैन में पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ किया था,इस समय नागभट प्रथम उज्जैन के प्रतिहार थे।इस तरह तत्तकालीन समय में 6 जगह के प्रतिहार प्रसिद्ध हुए हैं,1- मंडोर (वर्तमान राजस्थान में जोधपुर),2-मेडता,3-राजौर गढ़/राजगढ़ (अलवर),4-जालौर,5-उज्जैन,6-कन्नौज। इनमें उज्जैन और कन्नौज के प्रतिहार एक ही है।सत्रहवी सदी के लेखक मुहणोत नेन्सी ने प्रतिहारो की 26 शाखाओं का उल्लेख किया।जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि प्रतिहार एक पद का नाम है और भारतीय समाज में उस समय भी जातियां विद्यमान थी, अतः ये सभी प्रतिहार भी किसी ना किसी जाति के अवश्य होगे।

सातवीं शताब्दी में मांडव्यपुर (मंडोर) के प्रतिहार हरिश्चंद्र ने अपना पहला प्रतिहार राज्य स्थापित किया,जो वर्तमान राजस्थान में था।राजा हरिश्चंद्र की दो उपाधियां थी एक रोहिल्लादि तथा दूसरी विप्र राजन्य। यहां विप्र का अर्थ विद्वान से है, परन्तु आधुनिक ब्राह्मण जाति के इतिहासकारों ने अपने जातिय प्रेम के कारण राजा हरिश्चंद्र को ब्राह्मण जाति का बताने का प्रयास किया। परन्तु राजा हरिश्चंद्र ने अपने आपको क्षत्रिय कहा है।यदि वो ब्राह्मण जाति से होते तो अपने आप को भगवान् परशुराम जी से जोडते।

परिशिष्ट नंबर-2

इतिहासकारों का एक वर्ग जिनमे ए. एम. जैक्सन, जेम्स केम्पबेल, वी. ए. स्मिथ, विलयम क्रुक, डी .आर. भंडारकार, रमाशंकर त्रिपाठी, आर. सी मजूमदार और बी एन पुरी आदि सम्मिलित हैं प्रतिहारो को गुर्जर (आधुनिक गूजर) मूल का मानते हैं


सज्जन ताम्र पत्र, बड़ौदा ताम्र पत्र,माने ताम्र पत्र में प्रतिहार वंश को गुर्जर कहा गया है।

1-नीलकुण्ड,2-राधनपुर,3-देवली,4-करहड के राष्ट्रकूट अभिलेखों में गुर्जर कहा है।

राजौर के अभिलेखों में उज्जैन/कन्नौज के प्रतिहार वंश को गुर्जर कहा है।

ऐहोल व नवसारी के शिलालेखो में इन्है गुर्जरेश्वर कहा है।

चंदेल शिलालेखो में गुर्जर प्रतिहार कहा है।

अरब यात्रियों ने इनको जुर्ज कहा है।

जिनसेन सूरि का हरिवंश पुराण, उद्योतन सूरि(सन् 778) का कुवलय माला तथा कल्हण की राजतरंगिणी(बारहवीं शताब्दी) तथा जयानक की पृथ्वीराज विजय(बारहवीं शताब्दी) में गुर्जर राज और मरू गुर्जर कहा है।

राष्ट्रकूट शासक इंद्र III के 915 ई. के बेगुमरा प्लेट अभिलेख में कृष्ण II के ‘गर्जद गुर्जर’ के साथ युद्ध का उल्लेख हैं| इतिहासकार ने ‘गर्जद गुर्जर’ प्रतिहार शासक महीपाल के रूप में की हैं|

पम्पा द्वारा लिखित विक्रमार्जुन विजय में तत्तकालीन गुर्जर प्रतिहार सम्राट महिपाल (सन् 912-944) को गुर्जर राजा कहा है।

अरब लेखक अबू ज़ैद और अल मसूदी के अनुसार उत्तर भारत में अरबो का संघर्ष ‘जुज्र’ (गुर्जर) शासको से हुआ| इतिहासकारों के अनुसार जुज्र गूजर शब्द का अरबी रूपांतरण हैं| अरब यात्री सुलेमान (851 ई.), इब्न खुरदादबेह (Ibn Khurdadaba), अबू ज़ैद (916 ई.) और अल मसूदी (943ई.) ने गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य को जुर्ज़ अथवा जुज्र (गूजर) कहा हैं| अबू ज़ैद कहता हैं कि कन्नौज एक बड़ा क्षेत्र हैं और जुज्र के साम्राज्य का निर्माण करता हैं| उस समय कन्नौज प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी थी, अतः यह साम्राज्य जुज्र अर्थात गूजर कहलाता था| सुलेमान के अनुसार बलहर (राष्ट्रकूट राजा) जुज्र (गूजर) राजा के साथ युद्धरत रहता था| अल मसूदी कहता हैं कन्नौज के राजा की चार सेनाये हैं जिसमे दक्षिण की सेना हमेशा मनकीर (मान्यखेट) के राजा बलहर (राष्ट्रकूट) के साथ लडती हैं| वह यह भी बताता हैं कि राष्ट्रकूटो का क्षेत्र कोंकण जुज्र के राज्य के दक्षिण में सटा हुआ हैं| इस प्रकार यह भी स्पष्ट होता हैं कि राष्ट्रकूटो के अभिलेखों में जिन गुर्जर राजाओ का उल्लेख किया गया हैं वो कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार हैं|


अल इदरीसी (1154 ई,) के अनुसार के अनुसार प्रतिहार शासको उपाधि ‘गुर्जर’ थी तथा उनके साम्राज्य का नाम भी ‘गुर्जर’ था| गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य उत्तर भारत में विस्तृत था| 

राजोर गढ़ के गुर्जर प्रतिहार- मथनदेव के 960 ई. के ‘राजोर अभिलेख’ के चौथी पंक्ति में उसे ‘गुर्जर प्रतिहारानवय’ कहा गया हैं| इसी अभिलेख की बारहवी पंक्ति में गुर्ज्जर जाति के किसानो का स्पष्ट उल्लेख हैं| बारहवी पंक्ति में “गुर्जरों द्वारा जोते जाने वाले सभी पडोसी खेतो के साथ” शब्दों में स्पष्ट रूप से गुर्जर जाति का उल्लेख हैं अतः इतिहासकारों के बड़े वर्ग का कहना हैं कि चौथी पंक्ति में भी गुर्जर शब्द जाति के लिए प्रयुक्त हुआ हैं न की किसी स्थान या भोगोलिक इकाई के लिए नहीं| इस कारण से इतिहासकारो ने ‘गुर्जर प्रतिहारानवय’ का अर्थ गुर्जर जाति का प्रतिहार वंश बताया हैं| मथनदेव गुर्जर जाति के प्रतिहार वंश का हैं| इस अभिलेख से इतिहासकार इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्रतिहार गुर्जर जाति का एक वंश था, अतः कन्नौज के प्रतिहार भी गुर्जर जाति के थे|

बूढी चंदेरी के प्रतिहार- दसवी शताब्दी के अंत में ‘कड़वाहा अभिलेख’ में बूढी चंदेरी के प्रतिहार शासक हरिराज को ‘गरजने वाले गुर्जरों का भीषण बादल’ कहा गया हैं तथा उसका गोत्र प्रतिहार बताया गया हैं|


परिशिष्ट नंबर-3

जब इस्लाम का झंडा लेकर अरब के खलीफा के आदेशानुसार इस्लामी सेना दुनिया को दारुल हरब से दारुल इस्लाम में बदलने के लिए निकल पड़ी तथा सन् 637 से 647 ईसवी के बीच हुए सैन्य अभियानों में सीरिया, ईरान, ईराक और मिश्र पर मदीना का नियंत्रण स्थापित हो गया। कुछ ही दशकों में अरबी साम्राज्य मिश्र स्थित नील नदी से लेकर भारत की सीमा तक फेल गया।

दूसरी तरफ अरबों द्वारा सन् 666 ईसवी में पश्चिमोत्तर भारत विजय अभियान को काबुल शाही द्वारा प्रतिरोध कर अरबों के काबुल जितने के प्रयास को असफल कर दिया।

इधर मुल्तान के दक्षिण में स्थित निचला सिंधु घाटी क्षेत्र जो सिंध कहलाता हैं, चचनामा के अनुसार आठवीं शताब्दी के प्रारम्भ में इस स्थान पर राजा दाहिर अपनी राजधानी ब्रहमना बाद से सिंध पर शासन करता था। देबल सिंधु उसका मुख्य शहर था। सीलोन (श्री लंका) के राजा ने कुछ कीमती उपहार समुद्र के रास्ते एक जहाज से ईरान के अरबी गवर्नर हज्जाज के लिए भिजवाए थे। जिन्हें रास्ते में देबल में लूट लिया गया, अरब के खलीफा ने इसके लिए राजा दाहिर को जिम्मेदार ठहराया। इस घटना का बहाना लेकर ईरान के गवर्नर हज्जाज के सेनापति मुहम्मद बिन कासिम ने सन् 712 में सिंध स्थित देबल बंदरगाह पर हमला कर दिया तथा राजा दाहिर को हराकर उसका क्षेत्र अपने कब्जे में ले लिया। सन् 723 में मुल्तान पर विजय प्राप्त कर इस्लामी सेना ने अपनी सिंधु विजय पूर्ण कर ली।

मुहम्मद बिन कासिम ने ही जोगरफिकल व कल्चरल रूप से सिंध नदी के दूसरी ओर के भूभाग को हिंदुस्तान व यहां रहने वाले लोगों को हिन्दू कहा।

सिंध विजय के बाद अरबों ने उत्तर भारत की विजय के लिए अभियान आरंभ कर दिए। अरब खलीफा हिशाम (सन् 724 से 743 ईसवी) ने जुनैद को सिंध का गवर्नर नियुक्त किया।

जुनैद के सेनापति मातीन ने सिंध को पार कर तत्तकालीन समय के गुर्जर देश की राजधानी भीनमाल (जालौर) के चावड़ा शासक मामा चौहान तथा चित्तौड़ के शासक मान मोरय व मांड (वर्तमान जैसलमेर)के देवराज भाटी, सांभर के अजयपाल चौहान पर अति तीव्र हमले किए।इस हमले में भीनमाल (जालौर)के मामा चौहान वीर गति को प्राप्त हो गये,मामा चौहान आज भी वर्तमान राजस्थान में लोक देवता के रूप में पूजे जाते हैं। चित्तौड़ के मान मोरय दुर्ग तो बचा ले गये परंतु अत्याधिक कमजोर हो गए।अरब हमलावार जुनैद ने सोमनाथ के प्रसिद्ध मंदिर को भी तोड दिया। स्थति को भांप कर नागदा (वर्तमान उदयपुर में) के शासक कालभोज/ बप्पा रावल ने आगे बढ़ कर चित्तौड़ दुर्ग को अपने अधिकार में ले लिया।अरब हमले की गम्भीरता को देखते हुए उज्जैन के प्रतिहार नागभट प्रथम ने आगे बढ़कर भीनमाल (जालौर) और भड़ौच पर अधिकार कर भीनमाल (जालौर) के दुर्ग को निर्मित कर शक्तिशाली बना लिया।बप्पा रावल और नागभट प्रथम ने संयुक्त रूप से एक गठबंधन बनाया तथा अपने साथ मांड (वर्तमान जैसलमेर) के देवराज भाटी तथा सांभर के अजयपाल चौहान को मिला लिया तथा इस संयुक्त सेना ने जुनैद की सेना को मारवाड़ के क्षेत्र में हुए युद्ध मे हरा दिया तथा अपने क्षेत्र से मारकर सिंधु नदी के पार भगा दिया।अरब हमलावरों की इस हार की जानकारी हमें तत्तकालीन समय के मुसलमानों के  फारसी ग्रंथ फुतुहलबदाना से प्राप्त होती है।मेवाडी ग्रंथों में भी हमें इस युद्ध के विषय में जानकारी प्राप्त होती है,मेवाडी ग्रंथ के अनुसार बप्पा रावल ने ईरान खुरासान को विजित कर लिया तथा वहां की राजकुमारी से विवाह किया तथा वर्तमान पाकिस्तान में स्थित रावलपिंडी नगर को बसाया।यहा जब हम ईरान का जिक्र देखते हैं तो हमारा ध्यान वर्तमान समय के ईरान पर जाता है। परंतु सही जानकारी के लिए हमें तत्तकालीन समय के ईरान के क्षेत्र को देखना होगा। ईरान के शासक डेरियस प्रथम जिसे भारतीय  दारा कहते थे, के समय आज का पंजाब ईरान के अधिकार में था तथा पंजाब ईरान का 20 वां प्रांत था। अतः बप्पा रावल ने आज का पंजाब, जो तत्तकालीन समय में ईरान के क्षेत्र के रुप में प्रचलित  था, तक अपना सैन्य अभियान किया,इसी क्षेत्र के राजा की राजकुमारी से विवाह किया तथा रावलपिंडी नगर बसाया।

भारतीयों का अरब हमलावरों के विरूद्ध गुर्जर प्रतिहार नागभट प्रथम,बप्पा रावल, देवराज भाटी, अजयपाल चौहान के इस सैन्य अभियान की तुलना यूरोप(फ्रांस) के सेनापति चार्ल्स सेसेवियर के यूरोप और ईसाई धर्म को अरब हमलावरों से  बचाने के लिए किए गए सैन्य अभियान से की गई है। जिस तरह चार्ल्स सेसेवियर ने अरब हमलावरों से यूरोप में ईसाई धर्म को सुरक्षित किया ,उसी प्रकार गुर्जर प्रतिहार नागभट प्रथम ने गठबंधन बनाकर भारत की सनातन संस्कृति को अरब के मुस्लिम हमलावरो से बचा लिया। नागभट प्रथम के इस महान कार्य में उनके सबसे बडे सहयोगी बप्पा रावल थे,यह भारत का सोभाग्य ही था कि उस समय नागभट प्रथम और बप्पा रावल जैसे दूरदर्शी और बहादुर व्यक्ति मौजूद थे, जिन्होंने अपने क्षेत्र की सभी भारतीय शक्तियों को एकत्रित कर अरब हमलावरों को भारत में घुसने से रोक दिया। यहां हम थोडा सा बप्पा रावल के विषय में अपने पाठकों को जानकारी देना चाहेंगे-

बप्पा रावल के पूर्वज गुहिल ने सन् 566 में गुहिल वंश की स्थापना की जिनके सहयोगी आगे चलकर गहलौत तथा और आगे चलकर सिसोदिया कहलाये।गुहिल को वर्तमान राजस्थान के भील अपना शासक मानते थे,वो भीलो में ही रहते थे, अतः सामान्य तौर पर देखा जाए तो वह भील समाज के राजा थे,राजा गुहिल की आंठवी पीढी में नागादित्य नामक एक शासक हुए,बप्पा रावल इन्ही नागादित्य के पुत्र थे।नागादित्य के समय में भील समुदाय में आपस में किसी विषय को लेकर संघर्ष हो गया,इस संघर्ष में नागादित्य की मृत्यु हो गई। अतः गहलोत अर्थात राजा गुहिल के समर्थक और विरोधी दो फाड़ हो गये।बप्पा रावल ने बडे होकर गहलोत राज्य की स्थापना की।बप्पा रावल भगवान् एकलिंग (शिव शंकर) के भक्त थे।बप्पा रावल ने वर्तमान उदयपुर के पास भगवान् एकलिंग का भव्य मंदिर बनवाया,बप्पा रावल भगवान् एकलिंग को ही अपने राज्य का स्वामी मानते थे तथा खुद को उनका दीवान कहते थे।बप्पा रावल ने जो अपनी मुद्रा सोने के सिक्के के रुप में चलाई,उस पर शिव लिंग,गाय और सूर्य तथा एक नतमस्तक आदमी का चित्र है,वह नतमस्तक आदमी बप्पा रावल का प्रतिक है,वो गौ भक्त थे। बचपन में अपने शिक्षाकाल में अपने श्रृषि के आश्रम में वह आश्रम की गाय भी चराते थे।बप्पा रावल ने सन् 753 में संन्यास ले लिया तथा अपने पुत्र खुम्माण   प्रथम को शासन की बागडोर सोप कर , उसे देश हित के संघर्ष के लिए नागभट प्रथम के साथ कर दिया। नागभट प्रथम ने मेड़ता (वर्तमान जोधपुर)को अपनी राजधानी बनाया। नागभट प्रथम की एक उपाधि नाहड़ तथा दूसरी नागावलोक थी। नागभट प्रथम ने ही प्रतिहार साम्राज्य की नींव रखी। नागभट प्रथम (सन् 730-756) के बाद उनका भतीजा कुकुस्थ शासक बना तथा कुकुस्थ के बाद कुकुस्थ का छोटा भाई देवराज शासक बना। इन दोनों शासकों की कोई विशेष उपलब्धि नहीं रही। देवराज के बाद देवराज का पुत्र वत्सराज (सन् 783-816)शासक बना। वत्सराज के समय में ही कन्नौज को लेकर गुर्जर प्रतिहार,पाल और राष्ट्रकूट में तिकोना संघर्ष प्रारंभ हुआ। कन्नौज जिसका एक नाम कान्यकुब्ज तथा दूसरा नाम महोदया नगर भी है,इस संघर्ष के कारण ही कन्नौज को सम्राटों की रण भूमि भी कहा जाता है।वत्स राज की एक उपाधि एकलिंग क्षत्रिय पुंगल थी जिसका अर्थ है क्षत्रिय राजाओं में श्रेष्ठ। दूसरी उपाधि अवंति राज थी।वत्स राज को अपने समय में चार मोर्चों पर लडना पड़ा।पाल, राष्ट्रकूट और अरब हमलावरों से तथा चौथा जो किसी भी शासक को लडना पडता है, अपने आंतरिक विरोधियों से।

वत्स राज गुर्जर प्रतिहार राजाओं में पहले सम्राट थे।वत्सराज के बाद नागभट द्वितीय (सन् 816-833) शासक बने। नागभट द्वितीय ने अपने शासन काल में कई महत्वपूर्ण सफलताएं अर्जित की। नागभट द्वितीय ने चित्तौड़ के गहलोत व सौराष्ट्र के बाहकधवल के सहयोग से उणियारा (वर्तमान में टांक राजस्थान में)नामक स्थान पर पाल शासक धर्मपाल को पराजित कर दिया तथा सांभर के चौहान राजा गुवक प्रथम की सहायता से मत्स्य देश (वर्तमान अलवर राजस्थान में) के निकुंभ राजा को भी पराजित कर दिया। नागभट द्वितीय ने प्रसन्न होकर चौहान राजा गुवक प्रथम को "वीर" की उपाधि से विभूषित किया। राजा हर्षवर्धन के बाद नागभट द्वितीय को एक शक्तिशाली सम्राट माना जाता है, जिसके राज्य की सीमा हिमालय से लेकर नर्मदा नदी के तट तक थी। नागभट द्वितीय की एक उपाधि नागावलोक तथा दूसरी उपाधि"परमेश्वर परमभट्टारक महाराजाधिराज"थी।नागभट द्वितीय भगवती के उपासक थे, उन्होंने जुनैद के द्वारा तोड़ दिए गए सोमनाथ के मंदिर का विस्तृत निर्माण कर भव्यता प्रदान की।नागभट द्वितीय ने अपने बेटे रामभद्र को शासन सौंपकर हरिद्वार में हर की पैड़ी पर जलसमाधि ले ली।

परिशिष्ट नंबर- 4

गुर्जर प्रतिहारो के पतन के बाद चौहान राजाओं ने भारत की रक्षा का भार संभाला तथा अजमेर को राजधानी बनाकर गजनवी के हमलों को विफल कर दिया। चौहानों के शासक पृथ्वीराज चौहान जिन्हें भारत का अन्तिम हिन्दू सम्राट भी कहा जाता है। चित्तौड़ के गहलोत और दिल्ली के तंवर जिनके सामंत थे, ने सन् 1192 तक भारत की रक्षा की। इन्हीं पृथ्वीराज चौहान के दरबारी जयानक ने पृथ्वीराज विजय में पृथ्वीराज चौहान को गुर्जर राज और मरू गुर्जर लिखा है। सन् 1192 में दिल्ली पर मोहम्मद गोरी का अधिकार हो गया। 

सन् 1200 तक गुर्जर प्रतिहार वंश के पराक्रम की छांव में संघर्ष हुआ, परन्तु पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद दिल्ली में सल्तनत काल प्रारंभ हो गया और जो गुर्जर नाम का छत्र एक तरह से समाप्त हो गया। सन् 1300 तक भारतीय रजवाड़े अपने नये शत्रुओं का सामना करते रहें। परन्तु अलाउद्दीन खिलजी ने इन भारतीय रजवाड़ों पर घातक हमले किए। उसमें सब कुछ बिखर कर रह गया। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद चौदहवीं सदी के प्रारम्भ में इन भारतीय रजवाड़ों के राजाओं को मुस्लिम शासकों द्वारा राजपूत नाम से पुकारा। मेवाड़ के सिसोदिया इनके नेता थे।राणा कुम्भा ने कुछ सफलताएं अर्जित की तथा चित्तौड़ में विजय स्तम्भ बनवाया। सन् 1300 से सन् 1562 यानि अकबर के समय तक इन भारतीय राजाओं से किसी भी मुस्लिम शासक ने सम्बन्ध नही बनाया,इनको अपने शासन की केबिनेट में स्थान नही दिया। अकबर एक पहला शासक था जिसने भारतीय खासतौर पर हिंदूओं को शासन में भागेदारी दी। अकबर के साथ संधि में राजपूत राजा दो हिस्सों में बट गये,एक वो राजा थे जिन्होंने अकबर से वैवाहिक संधि नही की, मेवाड़ के सिसोदिया, बूंदी के चौहान और बड गूजर इनमें प्रमुख थे। दूसरे वो राजा थे जिन्होंने अकबर से मनसबदारी प्राप्त करने के लिए वैवाहिक संधि कर ली।इन दूसरे दर्जे के राजाओं के नेता आमेर के कछवाहे तथा जोधपुर के राठौड़ थे।इन दोनों ने भारतीय जनता तथा भारत के लिए संघर्ष करने वाले लोगों को सर्वाधिक कष्ट पहुचाये।ये अकबर के फरजंद (पुत्र) बने,ये मिर्जा बने अर्थात भाई। इन्होने ही छत्रपति शिवाजी महाराज को मुगलो के दरबार तक पहुचाया।

मुगलों के समर्थक इन राजाओं ने ही जो वर्षों तक मेवाड़ के सामंत रहें थे, ने राणा प्रताप का साथ ना देकर मुगलों का साथ दिया।एक समय ऐसा भी आया कि जब मेवाड़ के महाराणा प्रताप और जोधपुर के राव चंद्र सेन राठौड़ तो अरावली के जंगलों में भटक रहे थे, बाकि सभी रजवाड़ों के राजा अकबर के साथ संधि कर अपने महलों में आनंद ले रहे थे। 

मेवाड़ के साथ मुगलों की सन्धि सन् 1615 में हुई। मेवाड़ के साथ संधि होते ही मुगल शासकों ने भारतीयों को प्रताड़ित करना प्रारंभ कर दिया।क्योकि अब कोई रोकने वाला भारत में नहीं था। परंतु सन् 1636 में ही आगरा के आसपास भारत के गेर राजपूत किसानों ने जाटों के नेतृत्व में संघर्ष प्रारंभ कर दिया।

दूसरी ओर दक्षिण में छत्रपति शिवाजी ने मुगलों के विरोध में मोर्चा खोल दिया।

मुगलों के विरूद्ध यह संघर्ष गोकुला जाट, राजाराम जाट व राजा सूरजमल के बलिदान दिसम्बर सन् 1763 तथा उसके पश्चात् राजा जवाहर सिंह की मृत्यु सन् 1768 तथा भरतपुर राज्य के राजा नवल सिंह (1771-76ई’) के समय मुगल साम्राज्य और भरतपुर राज्य के बीच 15 सितम्बर 1773 को हुए दनकौर युद्ध में भरतपुर राजा नवल सिंह के अलीगढ़ (कोल) प्रांत के सूबेदार चंद्र सिंह गुर्जर के दनकौर युद्ध में हुए बलिदान तक चला। गुर्जर प्रतिहार राजाओं की तरह ही जाटों ने 137 वर्षों तक संघर्ष करके मुगलो की राजधानी दिल्ली,आगरा और फतेहपुर सीकरी में से आगरा और फतेहपुर सीकरी को मुगलों से छीन लिया। विदेशी मुगल सत्ता को लाल किले के अंदर तक सिमित कर दिया। दक्षिण में छत्रपति शिवाजी महाराज ने मराठा साम्राज्य को स्थापित कर दिया। मराठा पेशवा के समय मुगल बादशाह नाम मात्र के ही शासक थे।

इसके बाद अंग्रेज आ गये, सन् 1857 की प्रसिद्ध क्रांति हुई, लाखों भारतीयों ने बलिदान दिये। 

 इस क्रांति में नाना साहब पेशवा,मेरठ के कोतवाल धन सिंह, चौधरी शाहमल सिंह,राव कदम सिंह, ठाकुर नरपत सिंह,रानी लक्ष्मीबाई,बाबू कुंवर सिंह आदि हजारों लाखों लोग शहीद हो गए। सन् 1857 के बाद भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से निकलकर रानी विक्टोरिया के हाथ में आ गया।अब आंदलनों के माध्यम से भारत की आज़ादी का संघर्ष प्रारंभ हो गया। स्वामी दयानंद सरस्वती,स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी,संघ के संस्थापक डा हेडगेवार तथा डा अम्बेडकर, सुभाषचन्द्र बोस तथा किसान आंदोलन के प्रसिद्ध नेता विजय सिंह पथिक एवं सरदार पटेल जैसे विचार शील व्यक्तियों के संघर्ष के कारण सन् 1947 में देश आजाद हुआ।

ऐसा विद्वानों का मत है कि इस्लाम और ईसाई शासक जहां 25 वर्ष तक रहै, वहां इनके अलावा कोई दूसरा नहीं बचा। यह हमारे पूर्वजों का पराक्रम और बलिदान ही था जो सैकड़ों वर्षों तक इन दोनो की तलवार के नीचे से भारतीय संस्कृति सकुशल बच गई।

 सन् 730 के समय के मीणा, भील तथा जाट, गुर्जर , राजपूत और मराठा जातियों में गोत्र के रूप में राठोड़, चौहान,तोमर,बड़गुर्जर जैसे तमाम समूह पहले की तरह ही सत्ता और सम्पत्ति पर सन् 1947 में आजादी के समय भी काबिज थे।जाट, गुर्जर और राजपूत जातियों में से कुछ समूह मुस्लिम बन गए थे।

26 जनवरी सन् 1950 को भारत का संविधान बना।भील और मीणा जाति जो सत्ता से बाहर हो गई थी को अनुसूचित जनजाति के रूप मेें आरक्षण देकर सत्ता में भागीदारी दी गई। आजाद भारत के प्रत्येक नागरिक को एक वोट,एक वैल्यू,एक नागरिक के रूप में समान अधिकार दे दिए गए। भारत पुनः एकरूप हुआ।

संदर्भ ग्रंथ

1- मनोज सिंह (यू ट्यूब)- राजस्थान गुर्जर प्रतिहार राजवंश पार्ट 1, 2

https://youtu.be/k2xzChbGlrM

https://youtu.be/RhrPVNf9YR0

2- रमन भारद्वाज (यू ट्यूब)- मेवाड़ रियासत-1।

https://youtu.be/fODUh0JFKX4

3- डां सुशील भाटी- श्रीमद् आदिवराह मिहिरभोज की राजनैतिक एवं सैन्य उपलब्धियां।

4- डा सुशील भाटी- पूर्व मध्यकालीन प्रतिहार वंश की शाखाओ का गुर्जर सम्बन्ध