बुधवार, 16 मार्च 2022

जजिया

इस्लामिक कानून में चार प्रकार के टैक्स होते हैं।खिराज,खोस, जजिया और जकात।
खिराज हारा हुआ राजा जीते हुए राजा को अदा करता है।
खोस बादशाह द्वारा किसानों से लिया जाने वाला टैक्स है।
जकात मुस्लिमों पर गरीबों की मदद के लिए दिया जाने वाला टैक्स है।
जजिया वो टैक्स है जो इस्लामिक शासन में रहने वाले गैर मुस्लिम से उसकी सम्पत्ति, सम्मान और धर्म के संरक्षण के बदले में लिया जाता है। जजिया देने वाले को जिम्मी भी कहा गया है। इस्लाम की सुन्नी शाखा में विधि शास्त्र की चार शाखाओं की रचना है।जो निम्न हैं -
1- हनफी
2- हनबली
3- गालीकि
4- शफिई
इन चारों शाखाओं की रचना आंठवी और नो वी सदी में की गई है।इन शाखाओं में हनबली सबसे कठोर और हनफी सबसे उदारवादी शाखा है।हनफी शाखा में ही जजिया का कानून है। जिसमें एक निश्चित टैक्स देकर गैर मुस्लिम अपने धन धर्म,मान सम्मान को सुरक्षित रख सकता है।
वर्तमान भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश से लेकर अफगानिस्तान ईरान ईराक में हनफी शाखा के अनुसार ही इस्लामिक शासन का संचालन हुआ है। जजिया सबसे पहले यहूदी तथा ईसाई धर्म के मानने वालों से इस्लामिक शासकों ने वसूल किया है।भारत में जजिया कर लगाने का प्रथम साक्ष्य मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के बाद देखने को मिलता है। सर्वप्रथम उसने ही (सन् 712) में सिंध प्रान्त के देवल में जजिया कर लगाया था। इसके बाद जजिया कर लगाने वाला दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक था।
जजिया मानसिक रूप से स्वस्थ पुरुष से वसूला जाता था।औरते, भिक्षुक,दिव्यांग,साधु संत तथा और गैर मुस्लिम जो सुल्तान को सैनिक सहायता देते थे जजिया से बाहर थे। भिक्षुक,साधु संत की आड़ में ब्राह्मणों ने अपने को जजिया से मुक्त करवा लिया था। परन्तु फिरोज शाह तुगलक ने ब्राह्मण जाति पर जजिया लगा दिया था।जो ब्राह्मण भिक्षुक नही थे,साधु या संत भी नहीं थे।उनसे जजिया वसूला जाने लगा था।
 फिरोज तुगलक ने  जजिया को खराज (भूराजस्व) से पृथक कर अलग से वसूला। फिरोज तुगलक के ऐसा करने के विरोध में दिल्ली के ब्राह्मणों ने भूख हड़ताल कर दी। फिर भी फिरोज तुगलक  ने इसे समाप्त करने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। अन्त में दिल्ली की जनता ने ब्राह्मणों के बदले स्वयं जजिया देने का निर्णय लिया। इसके बाद लोदी वंश के शासक सिकंदर लोदी ने जज़िया कर लगाया।
दिल्ली सल्तनत के फैलने के साथ जजिया कर का क्षेत्र भी बढ़ा। अलाउद्दीन खिलजी ने जजिया और खरज न दे पाने वालों को गुलाम बनाने का कानून बनाया। उसके कर्मचारी ऐसे लोगों को गुलाम बनाकर सल्तनत के शहरों में बेचते थे जहाँ गुलाम श्रमिकों की भारी मांग रहती थी। मुस्लिम दरबारी इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि बयानह के काजी मुघिसुद्दीन ने अलाउद्दीन को सलाह दी थी कि इस्लाम की जरूरत है कि हिन्दुओं पर जजिया लगाया जाय ताकि हिन्दुओं के प्रति निरादर दिखाया जा सके और उन्हें अपमानित किया जा सके। उसने यह भी सलाह दी थी कि जजिया लगाना सुल्तान का मजहबी फर्ज है। 
सल्तनत के बाहर के मुसलमान शासकों ने भी हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया। कश्मीर में सर्वप्रथम जजिया कर सिकंदर शाह द्वारा लगाया गया। यह एक धर्मान्ध शासक था और उसने हिन्दुओं पर भारी अत्याचार किये। उसके बाद इसका पुत्र जैनुल आबदीन (1420-70 ईo) शासक बना और सिकन्दर द्वारा लगाए गए जजिया को समाप्त कर दिया। जजिया कर को समाप्त करने वाला यह पहला शासक था। गुजरात में जजिया सर्वप्रथम अहमदशाह (1411-42 ईo) के समय लगाया गया। उसने इतनी कड़ाई से जजिया वसूला कि बहुत से हिन्दू मजबूर होकर मुसलमान बन गए।
शेरशाह के समय जजिया को 'नगर-कर' की संज्ञा दी गयी।
जजिया कर को समाप्त करने वाला पहला मुगल शासक अकबर था। अकबर ने 1564 ईo में जज़िया कर समाप्त किया, लेकिन 1575 ईo में पुनः लगा दिया। इसके बाद 1579-80 ईo में पुनः समाप्त कर दिया। औरंगजेब ने 1679 ईo में जजिया कर लगाया। उसके राज्य में जजिया कर के विरुद्ध हिन्दुओं ने विद्रोह भी किया जिससे बीच-बीच में कुछ स्थानों पर जजिया हटा लिया गया। औरंगजेब ने मुगलों को सैनिक सहायता देने वाले मेवाड़ के हिंदू राजा से सन् 1680 में जजिया वसूला तथा दो परगने जजिया मे ले लिए।
 सन् 1712 ईo में जहाँदारशाह ने अपने मंत्री जुल्फिकार खां व असद खां के कहने पर जजिया को विधिवत रूप से समाप्त कर दिया। इसके बाद फर्रूखशियर ने 1717 ईo में  जजिया पुनः लगा दिया। अन्त में 1720 ईo में मुहम्मद शाह रंगीला ने जयसिंह के अनुरोध पर जजिया कर को सदा के लिए समाप्त कर दिया।
जजिया की कोई दर निश्चित नही थी,वह बादशाह की मर्ज़ी पर निर्भर करता था। लेकिन फिर भी सल्तनत काल में जजिया की तीन श्रेणी मिलती है।
1- प्रथम श्रेणी 48 दिरहम
2- दूसरी श्रेणी 24 दिरहम
3- तिसरी श्रेणी 12 दिरहम 
आज दुनिया के किसी भी इस्लामिक देश में जजिया नही है। तालिबान के प्रभावित क्षेत्रों में हो सकता है।
संदर्भ ग्रंथ
1- https://youtu.be/IQHUgqoi7WI


शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2022

आऊआ का सन् 1857 की क्रांति में योगदान - लेखक अशोक चौधरी मेरठ

10 मई सन् 1857 को मेरठ से अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति की शुरुआत हो गई थी।इस क्रांति ने भारत के अधिकांश हिस्से को अपनी गिरफ्त में ले लिया था।आज का राजस्थान जो सन् 1857 में उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रांत कहलाता था,जिसका मुख्यालय आगरा था। अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट कांलविन इस क्षेत्र के अधिकारी थे।इस समय ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से भारत के गवर्नर जनरल लार्ड केनिंग थे, लार्ड केनिंग की ओर से उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रांत के एजीजी/एजेंट टू दा गवर्नर जनरल जार्ज पेट्रिक लारेंस थे,इस क्षेत्र में 19 रियासत तथा 3 ठिकाने थे।इस क्षेत्र की दो राजधानी थी, जिसमें शीतकालीन राजधानी अजमेर तथा ग्रीष्म कालीन राजधानी वर्तमान सिरोही जिले में स्थित आबू थी। जोधपुर रियासत के पोलिटिकल एजेंट माक मेशन, सिरोही रियासत के पोलिटिकल एजेंट जेजी हांल, कोटा रियासत के पोलिटिकल एजेंट वार्टन, उदयपुर रियासत के पोलिटिकल एजेंट शावर्स, भरतपुर के मोरिसन तथा जयपुर के ईडन पोलिटिकल एजेंट थे। रियासत के पोलिटिकल एजेंट एजीजी से तथा एजीजी भारत के गवर्नर जनरल से अटैच थे। अजमेर मे अंग्रेजों का गोला बारूद और बहुत सा धन रहता था, कर्नल डिक्सन नाम के अंग्रेज अधिकारी अजमेर में तैनात थे।
राजस्थान/उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रांत में ब्रिटिश सेना की 6 सैनिक छावनी थी।
1- नसीराबाद (सन् 1818 में बनी)
2- ब्यावर (अजमेर)
3- एरिनपुरा (पाली, सन् 1835 में बनी)
4- खेरवाड़ा (उदयपुर)
5- देवली (टांक)
6- नीमच (वर्तमान में मध्यप्रदेश में शिवपुरी जिले के पास)
23 अगस्त सन् 1857 को एरिनपुरा की छावनी में बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के सिपाहियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष की शुरुआत कर दी।इन भारतीय सिपाहियो का नेतृत्व मोती खां,तिलक राम तथा शीतल प्रसाद नाम के तीन सिपाही कर रहे थे।ये क्रांति कारी सैनिक पाली के खेरखा गांव पहुंचे,वहा पर इन सैनिकों की मुलाकात आऊआ नाम की जागीर के जागीरदार ठाकुर खुशाल सिंह चम्पावत, जिनकी जागीर जोधपुर के राजा तख्त सिंह ने जब्त कर ली थी, से हुई। क्रांतिकारी सैनिकों ने ठाकुर खुशाल सिंह से नेतृत्व करने का आग्रह किया, परन्तु खुशाल सिंह ने नेतृत्व करने से इंकार कर दिया। दोबारा आग्रह करने पर ठाकुर खुशाल सिंह ने क्रांतिकारी सैनिकों का आग्रह स्वीकार कर लिया।
बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के सैनिकों से अलग भी ठाकुर खुशाल सिंह ने मारवाड़/जोधपुर तथा मेवाड़/उदयपुर के अपने मित्र जागीरदारों से अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में सहायता करने का आग्रह किया। जिसमें जोधपुर रियासत के आसोया के जागीरदार ठाकुर शिवनाथ सिंह, आलनियावास के जागीरदार ठाकुर अजित सिंह,गूलर के जागीरदार ठाकुर बिशन सिंह तथा लांबिया,देतावास और दूदावास के जागीरदारो ने सैनिक सहायता दी। मेवाड़ रियासत के आसींद,लखानी, कोठारिया,रूप नगर तथा सलूम्बर के जागीरदारों ने आर्थिक सहायता दी।
इस घटनाक्रम के अनुसार आऊआ जागीर के पदच्युत जागीरदार ठाकुर खुशाल सिंह क्षेत्र की जनता की नजरों में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक नेता के रूप में प्रकट हो गए।
जहां ठाकुर खुशाल सिंह क्षेत्र की जनता की नजरों में एक नायक का स्थान ले चुके थे, परंतु दूसरी ओर ठाकुर खुशाल सिंह अपनी जागीर प्राप्त करने के लिए इस अवसर का लाभ उठाना चाहते थे। जोधपुर के राजा तख्त सिंह उनके घोर विरोधी थे,अब ठाकुर खुशाल सिंह ने 31 अगस्त सन् 1857 को जोधपुर के पोलिटिकल एजेंट को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि उन पर अंग्रेज सरकार  सदा से ही दयालु रही है और मैं (खुशाल सिंह) भी आपका (अंग्रेज) सेवक रहा हूं। यदि आप मेरी जागीर राजा तख्त सिंह से वापस दिला दे तो मैं (खुशाल सिंह) क्रांतिकारियों का समर्पण या दमन करवा सकता हूं ।
जहां एक ओर स्थानीय जनता और क्रांतिकारी सैनिक तथा क्रांतिकारियों का साथ देने वाले जागीरदार ठाकुर खुशाल सिंह को अपना महानायक मान कर जान हथेली पर लिए खड़े थे,वही दूसरी ओर ठाकुर खुशाल सिंह अपने इन वफादार साथियों के सिरों का सौदा अपनी जागीर के बदले में करने का प्रयास कर रहे थे।उस समय ठाकुर खुशाल सिंह का यह देशद्रोही प्रयास कामयाब नही हो सका तथा 8 सितंबर सन् 1857 को बिथौरा नामक स्थान पर राजा तख्त सिंह एवं अंग्रेजों की संयुक्त सेना का युद्ध क्रांतिकारी सेना के साथ हो गया।राजा तख्त सिंह की सेना के भारतीय सैनिकों की हमदर्दी भी क्रांतिकारी सेना के साथ थी,इस युद्ध में क्रांतिकारी सेना विजयी हुई।जब अंग्रेज अधिकारियों को इस हार की सूचना पहुंची तो वो भौंचक्के रह गए। तुरंत दोबारा हमले की तैयारी की गई।18 सितंबर सन् 1857 को चेलावास नामक स्थान पर दूसरा युद्ध हुआ।इस युद्ध में भी अंग्रेजों की सेना बुरी तरह हारी। क्रांतिकारी सेना ने अंग्रेजों की सेना से 12 तोपें छीन ली।एक अंग्रेज अधिकारी हीटकोट मारा गया। जोधपुर रियासत का पोलिटिकल एजेंट मोकमेसेस का क्रांतिकारी सैनिकों ने सिर काटकर आऊआ के किले के दरवाजे पर टांग दिया।एजीजी पेट्रिक लारेंस युद्ध के मैदान से जान बचाकर भाग गया।
10 अक्टूबर सन् 1857 को आऊआ से क्रांतिकारी सेना का बडा हिस्सा ठाकुर शिवनाथ सिंह, ठाकुर बिशन सिंह तथा ठाकुर अजीत सिंह के नेतृत्व में दिल्ली की ओर चल दिया।16 अक्टूबर सन् 1857 को नारनौल (वर्तमान हरियाणा) में अंग्रेजों की सेना से भयंकर युद्ध हुआ।इस युद्ध में क्रांतिकारी सेना हार गई।  ठाकुर शिवनाथ सिंह, ठाकुर बिशन सिंह तथा ठाकुर अजीत सिंह की जागीर राजा तख्त सिंह ने जब्त कर ली।20 जनवरी सन् 1858 को कर्नल हेम्स के नेतृत्व में एक ब्रिटिश सेना आऊआ पहुंच गई।24 जनवरी सन् 1858 को अंग्रेजों की सेना का किले पर अधिकार हो गया। क्रांतिकारी सेना हार गई।
ठाकुर खुशाल सिंह चम्पावत मेवाड़ के कोठारिया के ठाकुर रावत जोधा सिंह के यहा जाकर छुप गए।करीब दो वर्ष 6 माह बाद 8 अगस्त सन् 1860 को ठाकुर खुशाल सिंह ने नीमच में अंग्रेजों के सम्मुख आत्म समर्पण कर दिया।जब ठाकुर खुशाल सिंह ने अपने को अंग्रेजों का वफादार बताया, अंग्रेजों ने ठाकुर खुशाल सिंह की बात की सत्यता को जांचने के लिए एक आयोग का गठन किया, जिसे टेलर आयोग कहा गया।तब आयोग के समक्ष जोधपुर के नये पोलिटिकल एजेंट निक्सन तथा एजीजी पेट्रिक लारेंस ने गवाही दी कि ठाकुर खुशाल सिंह सत्य कह रहे हैं वो अंग्रेजों के ही आदमी है,वह पत्र भी पेश किया गया।इस तरह 10 नवम्बर सन् 1860 को ठाकुर खुशाल सिंह को निर्दोष करार दे दिया गया।राजा तख्त सिंह से ठाकुर खुशाल सिंह की जागीर वापस देने के लिए कहा गया। परंतु राजा तख्त सिंह ठाकुर खुशाल सिंह से अत्यधिक क्रोधित थे। उन्होंने ठाकुर खुशाल सिंह को जागीर वापस नही दी, ठाकुर खुशाल सिंह उदय पुर में रहें, जहां जुलाई सन् 1864 में उनकी मृत्यु हो गई। ठाकुर खुशाल सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र को राजा तख्त सिंह ने जागीर दे दी।ठाकुर शिवनाथ सिंह, ठाकुर बिशन सिंह तथा ठाकुर अजीत सिंह को बागी/डकैत घोषित कर दिया गया।वो बर्बाद हो गये तथा बिहडों में ही मर गए।
ठाकुर खुशाल सिंह इतिहास में एक खलनायक परन्तु आऊआ की जनता की नजरों में एक नायक ही रहें।आज भी ठाकुर खुशाल सिंह की प्रतिमा लगी हुई है,उनकी याद में मैला लगता है,वो आऊआ की क्रांति के नायक हैं जनता की नजर में।ठाकुर शिवनाथ सिंह, ठाकुर बिशन सिंह तथा ठाकुर अजीत सिंह का नाम भी लोग भूल गए।
ठाकुर शिवनाथ सिंह, ठाकुर बिशन सिंह तथा ठाकुर अजीत सिंह तथा उनके साथ मिलकर अंग्रेजों से संघर्ष करने वाले सभी क्रान्तिकारियों को शत-शत नमन।
संदर्भ ग्रंथ
1- रमन भारद्वाज https://youtu.be/XJPp23mB0xw

रविवार, 19 दिसंबर 2021

मेरी मां मेरे परिवार की नेता- अशोक चौधरी मेरठ

यू तो प्रकृति ने नेतृत्व का अधिकार माता को ही दिया है, परंतु मानव ने अपने शक्ति को आधार बनाकर उससे यह अधिकार छीनने का असफल प्रयास किया तथा यह अवधारणा स्थापित करने की कोशिश की कि एक नारी बचपन में पिता के,उसके बाद भाई के,उसके बाद पति के और वृद्ध अवस्था में पुत्र के संरक्षण में रहेगी।जिस प्रकार एक राजा की सुरक्षा उसके सेना नायक करते हैं,उसी प्रकार परिवार की नारी की सुरक्षा भी उसका पिता, पुत्र,पति और भाई करते हैं।इस सुरक्षा चक्र के कारण कभी कभी ऐसा आभास समाज को हुआ कि ये सुरक्षा करने वाले सेनापति ही मानव समाज के नेतृत्व कर्ता है, परंतु ऐसा है नही।
यदि पृथ्वी से सम्पूर्ण मातृशक्ति की हत्या कर दी जाय तो पुरुष मे इतनी सामर्थ्य नही कि वो अपने वंश को चला सके। लेकिन यदि पृथ्वी से सम्पूर्ण पुरुषों की हत्या कर दी जाय,तब भी नारी में वंश को चलाने की शक्ति बची रहती है। क्योंकि कुछ महिलाएं गर्भवती अवश्य बचेगी,जिनसे उत्पन्न संतान पुनः आने वाली पीढ़ी के रूप में प्राप्त हो जायेगी। इसलिए भयानक संकट उत्पन्न होने पर पुरूष ने अपने को समाप्त करके भी अपनी महिलाओं को बचाने का प्रयास किया है।
मेरे परिवार में  भी मेरी माता श्रीमती श्यामकली देवी ही मेरे परिवार की नेता थी।हम तीन भाई बहन तथा मेरे पिता मुज्जफर नगर जिले के खतोली ब्लाक के भटौडा नाम के एक छोटे से गांव से सम्बंध रखते हैं, लेकिन मेरी माता ने सन् 1972 में मेरठ की नेहरू नगर कालोनी में एक प्लाट खरीद कर हमे एक ग्रामीण से शहरी नागरिक के रूप में स्थापित करने का साहसिक कदम उठाया।माता जी के इस प्रयास में उनके पिता अर्थात मेरे नानाजी श्री रामचन्द्र जी और नानी श्रीमती प्रह्लादो (ग्राम भडोली) जो गढ रोड पर स्थित हसनपुर कलां गांव के निवासी थे,का भरपूर सहयोग और संरक्षण रहा।
माता जी के अथक प्रयासों तथा हमारे पिताजी, नानाजी व नानाजी के सहयोग के कारण हम तीनों भाई बहन अपनी माता जी सहित सन् 1977 में मेरठ में निवास करने के लिए गांव से शहर में आ गए।
माता जी एक साहसी और कठीन परिश्रम करने वाली उच्च नेतिक आदर्शों का पालन करने वाली तथा स्वभाव से कठोर महिला थी।हम तीनों भाई बहिन बड़े होते गए, शादी शुदा हो गये, हमारे भी बच्चे बडे हो गये,मेरे बच्चे (बेटी पायल और कोमल) और मेरी बडी बहन कृष्णा कुमारी के बच्चे (शालिनी और विशाल) भी शादी शुदा होने के बाद और एक-एक संतान के पिता भी हो गये, मेरे छोटे भाई महेश के दोनों बच्चे (लोकेंद्र और शिवांगी) अभी अविवाहित है,कि 5 दिसम्बर सन् 2021(रविवार का दिन  मार्गशीर्ष मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि ) प्रात: 9 बजे माता जी इस नश्वर संसार को छोड़कर चली गई।
माता जी की जीवटता,उनका अपने जीवन के अंत तक परिश्रम करने का प्रयास सदा मन में समाया रहेगा।
हम सब भाई बहन जब भी अपने को एक जागरूक शहरी व सभ्य नागरिक के रूप में पायेंगे या समाज के लोग हमको ऐसा मानेंगे तो उसमें हमारा कुछ नहीं, वह हमारी माता जी का प्रतिबिंब और परिश्रम की ही झलक मात्र है।
भगवान उन्हें अपने चरणों में स्थान दे।

रविवार, 10 अक्टूबर 2021

संवाद गुर्जर और राजपूत विषय सम्राट मिहिरभोज

गुर्जर- भीलवाड़ा स्थान का नाम है, क्योंकि वहा भील जाति के लोग बहुतायत में हैं, राजपूताना स्थान का नाम था क्योंकि राजपूत जाति वहां बहुतायत मे थी, बुंदेलखंड स्थान का नाम है क्योंकि बुंदेला जाति के लोग बहुतायत में हैं, जटवाड़ा(उत्तर भारत के दिल्ली, भरतपुर,धोलपुर, बीकानेर,चुरू, झुंझुनूं,आगरा, मथुरा,मेवात,मेरठ, पलवल, फरीदाबाद, अलीगढ़ तथा दक्षिण में चम्बल नदी के तट के पास गोहद तक का क्षेत्र जाट किसानों की बहुलता के कारण जटवाड़ा कहलाता था) स्थान का नाम रहा है क्योंकि जाट जाति के लोग बहुतायत में थे,एक गुर्जर देश भी था, क्योंकि  गुर्जर/गूजर जाति के लोग बहुतायत में थे।
राजपूत-  ...ना ना ना ना ये तो स्थान वाचक है, इससे गुर्जर जाति का क्या लेना देना। बाकी सब ठीक है, परन्तु ये नही।
राजपूत- नागौद रियासत के राजा सम्राट मिहिरभोज के समय के प्रतिहार है,वो आज अपने को पडियार/परिहार कहते हैं।
 गुर्जर - उस समय का गुर्जर,  आज अपने आपको गुर्जर/ गूजर/गुज्जर/गुजर अलग-अलग स्थानों पर कहता है।
राजपूत-...ना ना ना , गुर्जर का गूजर/गुज्जर/गुजर से क्या नाता एक मे र ऊपर है।
गुर्जर- नागौद का वारिस अपने आप को हरिश्चंद्र प्रतिहार का वंशज बता रहा है जो मंडौर के प्रतिहार थे, राजौर गढ/अलवर के प्रतिहार बडगूजर थे, उज्जैन के प्रतिहार गुर्जर प्रतिहार थे जो उज्जैन से जालौर, जालौर से मेड़ता तथा मेड़ता से कन्नौज चले गए। नागौद का राजा अपने को मंडौर का प्रतिहार बता रहा है,जो गुर्जर प्रतिहार नही है।
राजपूत-   क्या बात है? अजी प्रतिहार तो है भले ही पडिहार/परिहार हो, चाहें उज्जैन की जगह मंडौर के ही हो।कैसे तो गुर्जर प्रतिहार बनें।
गुर्जर-सम्राट मिहिरभोज की यदि सभी उपाधि नाम से पहले लगा दी जाय तो उनका नाम   रघुवंश तिलक रघुग्रामिणी  रघुवंश मुकुट मणि आदिवराह प्रभास क्षत्रिय गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज हो जाता है। इसमें कही राजपूत तो है ही नहीं।
राजपूत-  क्षत्रिय तो लिखा है। 
गुर्जर- क्षत्रिय तो एक वर्ग है जिसमें कई जातियां समाहित है। किसी भी विद्वान से पूछ लो। राजपूत अकेले का क्षत्रिय से क्या मतलब?
राजपूत- अजी  राजपूत और क्षत्रिय एक ही बात है, इसमें विद्वान क्या करेगा?जब हम कह रहे हैं। गुर्जर- राजपूत तो सन् 1200 तक कही इतिहास में पाता ही नहीं।
राजपूत-  कोई बात नहीं क्षत्रिय तो मिल जाता है,इसी से काम चला लेंगे।
गुर्जर- अजी तो राजपूत नाम जब किसी काम का ही नही तो राजपूत रेजीमेंट का नाम क्षत्रिय रेजिमेंट करवा दो,हम गुर्जर और अहीर दोनों रेजिमेंट की मांग केंसिल कर देंगे, क्षत्रिय रेजिमेंट में ही गुजारा कर लेंगे तीनों।
राजपूत- अरे क्या बेकार की बात कर दी? दूसरे के बाप को अपना बाप बनाते घूम रहे हो।
गुर्जर- अजी मान सिंह कछवाहे ने अकबर को अपना बाप बना लिया, अकबर का फरजंद/पुत्र बन गया, जबकि उसका बाप भारमल जिंदा था,राजा जय सिंह कछवाह जो मान सिंह कछवाह का पोत्र व जगत सिंह कछवाह का पुत्र था, वो शाहजहां का सन् 1639 में मिर्जा/भाई बन गया, उसने शाहजहां के बाप जहांगीर को अपना बाप बना लिया।इनके बारे में आपके क्या विचार है?
राजपूत-  अरे कोई ढंग की बात नहीं रही करने को।भैंस चोर कही के।दुखी करके रख दिया।

शनिवार, 2 अक्टूबर 2021

प्रार्थना पत्र ग्वालियर

सेवा में
श्री आशीष सक्सेना संभागायुक्त
कक्ष क्रमांक - 209, कार्यालय श्री अनिल बनबारिया अनुविभागीय दंडाधिकारी लश्कर  कलेक्ट्रेट उच्च न्यायालय खण्डपीठ ग्वालियर।
विषय -  गुर्जर सम्राट मिहिरभोज के नाम के प्रमाण हेतु प्रेषित तथ्य।
मान्यवर भारत को अरब हमलावरों से करीब 300 वर्षों तक बचाने वाले गुर्जर प्रतिहार वंश के सम्राट को उनकेे समकालीन ग्रंथों, शिलालेखो व ताम्रपत्रों में जिन उपाधियो से विभूषित किया गया है वही उनके नाम के आगे लग सकता है,लगता रहा है।उन उपाधियों का वर्णन निम्न है -
प्रतिहार-   
 तत्तकालीन समय में 6 जगह के प्रतिहार प्रसिद्ध हुए हैं,जो निम्न है -
1- मंडोर (वर्तमान राजस्थान में जोधपुर)
2-मेडता
3-राजौर गढ़/राजगढ़ (अलवर)
4-जालौर
5-उज्जैन
6-कन्नौज
इनमें उज्जैन और कन्नौज के प्रतिहार एक ही है।इनको ही गुर्जर प्रतिहार कहा गया है।  
गुर्जर- 
 ताम्रपत्र - 
निम्न मे गुर्जर कहा है-
1 - सज्जन ताम्र पत्र
2 - बड़ौदा ताम्र पत्र
3 - माने ताम्र पत्र
शिलालेख - 
निम्न में गुर्जर कहा है -

(क) राष्ट्रकूट अभिलेखों में-

1-नीलकुण्ड,

2-राधनपुर,

3-देवली

,4-करहड

(ख)राजौर के अभिलेखों में उज्जैन/कन्नौज के प्रतिहार वंश को गुर्जर कहा है।

(ग) ऐहोल, नवसारी शिलालेखो में इन्है गुर्जरेश्वर कहा है।

(घ) चंदेल शिलालेखो में गुर्जर प्रतिहार कहा है।

ग्रंथ -

(1) जिनसेन सूरि का हरिवंश पुराण

( 2) उद्योतन सूरि(सन् 778) का कुवलय माला (3) कल्हण की राजतरंगिणी(बारहवीं शताब्दी) (4) जयानक की पृथ्वीराज विजय(बारहवीं शताब्दी) में गुर्जर राज और मरू गुर्जर कहा है।

(5) पम्पा द्वारा लिखित विक्रमार्जुन विजय में तत्तकालीन गुर्जर प्रतिहार सम्राट महिपाल (सन् 912-944) को गुर्जर राजा कहा है।

(6) अरब यात्री अलमसूदी अपनी भारत यात्रा के दौरान सम्राट महिपाल के दरबार में रहा। उसने एक ग्रंथ जिसका नाम मजरुल- जुहाब तथा अंग्रेजी नाम मिडोज आफ गोल्ड है,को लिखा है। जिसमें महिपाल को वोरा और इस वंश को अल गुर्जर कहा है।

लक्ष्मण से सम्बंध- 
सम्राट मिहिर भोज (सन् 836-885) की ग्वालियर प्रशस्ती में प्रतिहार वंश के राजाओं को राम जी के भाई लक्ष्मण का वंशज बताया गया है।
रघुग्रामणी व रघुवंश तिलक -
सम्राट मिहिर भोज के दरबारी विद्वान राजशेखर जो मिहिरभोज के पुत्र महेन्द्र पाल (सन् 885-910) के गुरू थे, ने महेंद्र पाल को रघुग्रामिणी और रघुवंश तिलक कहा है।

रघुवंश मुकुट मणि - 
राजशेखर ने ही महेंद्र पाल के पुत्र महीपाल को रघुवंश मुकुट मणि कहा है।
क्षत्रिय- भगवान राम क्षत्रिय वंश के थे। लक्ष्मण से सम्बंध मानने के कारण इनको क्षत्रिय माना गया।
सम्राट मिहिर भोज की दो उपाधियां और थी,एक आदि वराह  (ग्वालियर प्रशस्ती) ,दूसरी प्रभास(दौलतपुर अभिलेख जोधपुर)।
उपरोक्त तथ्यों के आधार पर सम्राट मिहिरभोज का नाम यदि तय किया जाय तो वह निम्न हो जाता है-
रघुवंश तिलक रघुग्रामिणी  रघुवंश मुकुट मणि आदिवराह प्रभास क्षत्रिय गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज
भारत में भिन्न-भिन्न विचारों के लोग बसते हैं। सम्राट या शासक किसी एक का नही होता वह सम्पूर्ण समाज का होता है। उपरोक्त तथ्यों में सम्राट मिहिरभोज के वंश के लिए सर्वाधिक शब्द गुर्जर 18 (ताम्रपत्रों,शिलालेखो, ग्रंथों में) बार प्रयोग मे आया है। इसलिए गुर्जर सम्राट मिहिरभोज  सबसे न्यायकारी नाम है।
लेकिन सभी भारतीयों को इस नाम पर आपत्ति हो तो अपने समाज व क्षेत्र की सुविधा अनुसार गुर्जर सम्राट मिहिरभोज, प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज, क्षत्रिय सम्राट मिहिरभोज,  रघुवंश तिलक रघुग्रामिणी, रघुवंश मुकुट मणि सम्राट मिहिरभोज, आदिवराह सम्राट मिहिरभोज नाम का प्रयोग किया जा सकता है।
आपसे निवेदन है कि आप इस विषय को सुलझाने के लिए मेरे द्वारा दिए गए तथ्यों व सुझाव पर गम्भीरता पूर्वक विचार कर जल्द निर्णय देंगे।ताकि समाज में आपसी भाईचारा स्थापित हो सके।
संलग्न तथ्य -
1- डा कनक सिंह राव- गुर्जर प्रतिहार वंश
https://youtu.be/G7SA9aA-yHg
2- कुछ लिखित तथ्य

                भवदीय 

  अशोक चौधरी/अशोक कुमार

स्वतंत्र लेखक एवं विचारक

108/1 नेहरू नगर गढ रोड मेरठ (उत्तर प्रदेश)

मो - 9837856146



      

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शनिवार, 11 सितंबर 2021

भारत की न्याय व्यवस्था कल और आज - अशोक चौधरी मेरठ।

दुनिया में राज्य व्यवस्था की आवश्यकता के दो ही कारण दिखाई देते हैं।पहला सुरक्षा और दूसरा कमजोर के लिए न्याय।जब मानव समूह के रूप में रहने लगा तथा अपनी अपनी रूचि से कार्य करके उदर पूर्ति करने लगा तो उन परिस्थितियों में कुछ मानव इस मानसिकता के भी मिलने लगें जो स्वयं तो कोई कार्य करने से बचते थे लेकिन उदर पूर्ति तथा अपनी मानसिक संतुष्टि के लिए दूसरो पर आघात करने लगे थे।इनसे बचने के लिए एक ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता हुई जो अपने कार्य में लगे लोगों को सुरक्षा तथा यदि आपस में मतभेद के कारण किसी प्रकार का संघर्ष हो जाय तो उसका निर्णय कर सके।इस जरूरत की पूर्ति के लिए एक राजा,उसकी सेना तथा न्यायालय बने।
भारत में यह व्यवस्था पंचायत के रूप में पनपी तथा इसकेे नियम कानून के रूप में मनु स्मृति नामक ग्रंथ में है जिसका जिक्र आज भी हो जाता है।जब इस्लाम के मानने वालों का शासन दुनिया में आया तो शरियत के रूप में एक किताब का जिक्र आता है जिसमें समाज के क्रिमिनल और सीविल दोनों तरह के मसलों का हल तथा उसकी न्याय व्यवस्था दी गई है।
लेकिन आधुनिक भारत में जो यूरोपियन के आगमन से माना जाता है,का भारत की न्यायपालिका पर विशेष प्रभाव है।
इसको दो समयांतराल में विभाजित किया जा सकता है।एक सन् 1764 से लेकर आजाद भारत के संविधान लागू होने तक (26 जनवरी सन् 1950) तथा दूसरा सन् 1950 से लेकर आज तक।
आज भारत में कोलेजियम की व्यवस्था के अनुसार हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजो की नियुक्ति होती है।इस लेख के माध्यम से हम अपने पाठकों को सन् 1764 से लेकर आज तक की आधुनिक भारत की न्यायिक यात्रा से परिचित कराने का प्रयास करेंगे।
सन् 1764 में अंग्रेजों और मुगलों के बीच हुए बक्सर के युद्ध में अंग्रेजो की विजय के पश्चात मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के मध्य हुए समझौते के अनुसार बंगाल प्रांत (वर्तमान का बिहार बंगाल और उड़ीसा) के वित्त एवं प्रशासनिक कार्य अंग्रेजों के हाथ में आ गए तथा क्रिमिनल  के फैसले शरियत के अनुसार ही होते रहें। 
सन् 1773 में रेगुलेटिंग एक्ट नाम का कानून अंग्रेजो द्वारा भारत में लागू किया गया।अब बंगाल की जुडिशरी भी अंग्रेजों के हाथ में आ गई। 
सन् 1774 में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना कलकत्ता में अंग्रेजों द्वारा की गई, जिसमें 4 जज थे।यह आधुनिक भारत में अंग्रेजों द्वारा न्यायालय व न्यायिक व्यवस्था हेतु उठाया गया पहला कदम था।
 सन् 1834 में फर्स्ट ला कमिशन आफ ब्रिटिश इंडिया बनाया गया जिसके अध्यक्ष लार्ड मैकाले बनाये गये।
 सन् 1835 में लार्ड मैकाले की सलाह पर अंग्रेजी भाषा को भारत की आफिशियल भाषा बना दिया गया।
सन् 1862 में कलकत्ता बोम्बे और मद्रास में हाई कोर्ट बनाये गये।
इस प्रकार भारत में अंग्रेजों के द्वारा सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों की स्थापना हो गई। सन् 1935 में भारत में एक संविधान अंग्रेजों द्वारा लागू किया गया, आजाद भारत के अपने संविधान लागू होने तक अर्थात 26 जनवरी सन् 1950 तक सन् 1935 के संविधान से ही भारत का शासन चलता रहा।
 आजाद भारत के संविधान के अनुसार भारत के न्यायालयों (सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट) में जजो की नियुक्ति करने के लिए संविधान की धारा 124 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय के गठन की प्रक्रिया दी गई है। जिसमें कहा गया है कि भारत का एक उच्चतम न्यायालय होगा जो 7 से अधिक जजों से मिलकर बनेगा अर्थात एक मुख्य न्यायाधीश तथा 7 न्यायाधीश होंगे। यदि न्यायाधीशों की संख्या बढानी हो तो उसका अधिकार भारत की संसद को होगा।आज भारत के सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या 34(1+33) है।
जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जायेगी। मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति भी राष्ट्रपति ही करेंगे। राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के जजों से परामर्श करेंगे, परन्तु राष्ट्रपति उनका परामर्श मानने के लिए बाध्य नहीं है। अतः एक तरह से भारत की कार्यपालिका राष्ट्रपति के माध्यम से भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करेंगी।
सुप्रीम कोर्ट के अन्य जज भी भारत के राष्ट्रपति ही नियुक्त करेंगे। अन्य जजों की नियुक्ति के लिए भारत के राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश से अनिवार्य परामर्श करेंगे, राष्ट्रपति चाहें तो अन्य न्यायधीशों से भी परामर्श कर सकते हैं। परंतु वह परामर्श मानने के लिए बाध्य नहीं होगे। अतः भारत का संविधान सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति का अधिकार भारत की संसद को देता है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने यह परम्परा डाली की भारत का मुख्य न्यायाधीश वरिष्ठता के क्रम से बनते थे, जवाहर लाल नेहरू के सम्पूर्ण कार्यकाल में सिर्फ एक बार ऐसी परिस्थिति बनी, जिसमें वरिष्ठ जज के स्थान पर उनसे नीचे के नम्बर के जज भारत के मुख्य न्यायाधीश बनें। सन् 1964 में जफर इमाम नाम के एक जज का मुख्य न्यायाधीश बनने का नम्बर था, परन्तु वह बहुत लम्बे समय से बीमार थे,उनके स्वास्थ्य के कारण उनके स्थान पर दूसरे जज को मुख्य न्यायाधीश बनाया गया।
भारत में मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की प्रक्रिया प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्यकाल में विवादो में घिर गई। इंदिरा गांधी जी ने सन् 1973 में भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में वरिष्ठता क्रम को तोड दिया, जिसमें नियुक्त का आधार राजनीतिक बताया गया। हुआ यह कि 1971 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी को 352 सीट मिली । इंदिरा गांधी ने संविधान में 6 संशोधन (24से29) किये। जिस कारण पूरे देश में ऐसा संदेश जाने लगा कि इंदिरा गांधी पूरे संविधान को ही बदलना चाहती है। ऐसे अवसर पर 24 अप्रैल सन् 1973 में केशवानंद भारती केस का फैसला आया,इस केस की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की 13 जजों की बेंच कर रही थी। फैसला 7-6 के बहुमत से आया। फैसले में कहा गया कि भारत की संसद को संविधान में संशोधन का अधिकार है, परंतु संसद संविधान के मूल ढांचे में परिवर्तन नही कर सकती।मूल ढांचे में क्या आता है या मूल ढांचे का जिक्र भारत के संविधान में नही है।जब माननीय सुप्रीम कोर्ट से यह पूछा गया कि मूल ढांचा क्या है?इसमे क्या आता है? तब माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जब भी कोई ऐसा अवसर आयेगा, सुप्रीम कोर्ट मूल ढांचे को बताता रहेगा।
इस फैसले से कार्यपालिका की संविधान संशोधन की शक्ति पर एक विराम तो लगा ही।इस फैसले के आने के अगले ही दिन 25 अप्रैल सन् 1973 को भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की गई।जिनका नाम ए.एन.रे था।इस नियुक्ति से बनाये गये मुख्य न्यायाधीश, वरिष्ठता के क्रम में चौथे नम्बर पर थे,जब इस फैसले की समीक्षा भारत के बुद्धिजीवी वर्ग ने की तो पाया कि वरिष्ठता के क्रम में ऊपर के तीन जज केशवानंद भारती के फैसले में उन 7 जजों मे शामिल थे, जिन्होंने मूल ढांचे के फेवर में फैसला दिया था, मुख्य न्यायाधीश बनने वाले जज उन 6 जजों मे थे जो मूल ढांचे को नही चाहतें थे। श्रीमती इंदिरा गांधी की पूरे भारत के बौद्धिक जगत में इस फैसले की निंदा की गई तथा इस नियुक्ति को भारत की न्यायपालिका में एक राजनैतिक हस्तक्षेप के रुप में देखा गया।
दूसरा केस ए डी एम जबलपुर के नाम से सन् 1976 में आया,यह एक रिट है, जो संविधान की धारा 32 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट में तथा धारा 226 के अंतर्गत हाईकोर्ट में डाली जाती है। यदि किसी व्यक्ति को गैर कानूनी तरीके से बंदी बना लिया जाय तो वह व्यक्ति या उसको आधार बनाकर कोई भी अन्य व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट जा सकता है। क्योंकि भारत के संविधान में स्वतंत्रता का अधिकार मौलिक अधिकार मे आता है।25 जून सन् 1975 को भारत में आपातकाल की घोषणा कर दी गई थी। बहुत से नागरिक जेल में बंद कर दिए गए थे।उनके लिए ही यह रिट डाली गई थी।इस केस में 5 जजों की बैंच बैठी। जिसमें 4-1 से यह फैसला हुआ कि सुप्रीम कोर्ट इन गिरफ्तारियों को रोकने या बिना किसी चार्ज के बंदी बनाये गये लोगों को छोड़ने का कोई आदेश नहीं देगा। सन् 1977 में पुनः मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति होनी थी।इस समय एच आर खन्ना वरिष्ठता के क्रम में सबसे ऊपर थे। परन्तु खन्ना जी के स्थान पर बैग नाम के कनिष्ठ जज को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया गया। क्योंकि खन्ना जी वो एक जज थे जिनका यह कहना था कि आपातकाल के समय बिना चार्ज के गिरफ्तार किए गए नागरिकों को छोड़ने का आदेश सुप्रीम कोर्ट को देना चाहिए।इस नियुक्ति की भी निंदा हुई। क्योंकि खन्ना जी को राजनीति के तहत पद से वंचित कर दिया गया था।
उपरोक्त सन् 1973 और सन् 1977 की मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के कारण सन् 1973 में वरिष्ठ तीन जज तथा 1977 में वरिष्ठ एक जज को स्तीफा देकर अपने पद और वरिष्ठता की गरिमा की रक्षा करनी पडी थी।
अतः सन् 1981 में एस पी गुप्ता बनाम भारत सरकार के नाम से एक केस सुप्रीम कोर्ट मे आया।इस केस में पूछा गया कि संविधान की धारा 124 में जो परामर्श शब्द है क्या उसका अर्थ सहमति के रुप में लिया जा सकता है। क्योंकि यदि परामर्श का अर्थ सहमति माने तो राष्ट्रपति न्यायाधीश के परामर्श को मानने के लिए बाध्य है।इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि परामर्श का अर्थ सहमति नही है। अतः राष्ट्रपति न्यायाधीश के परामर्श को मानने के लिए बाध्य नहीं है।इसको फस्ट जजी केस के नाम से भी जाना जाता है।
इसके बाद सन् 1993 में जब पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे। सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट आन रिकार्ड एसोसिएशन बनाम भारत सरकार के नाम से फिर सुप्रीम कोर्ट में एक केस डाला गया जिसमें फिर यही पूछा गया कि क्या परामर्श का अर्थ सहमति है।अब इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने सन् 1981 के फैसले से यू टर्न ले लिया और कहा कि परामर्श का अर्थ सम्मति है। अतः राष्ट्रपति न्यायाधीश से जो परामर्श लेंगे, उसे मानने के लिए बाध्य है।यही से कोलेजियम प्रणाली की शुरुआत हो गई।इस फैसले में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति तो राष्ट्रपति ही करेंगे, परन्तु मंत्री परिषद की सलाह पर नही बल्कि मुख्य न्यायाधीश तथा दो वरिष्ठतम न्यायाधीश के परामर्श पर करेंगे तथा जब इस प्रकार का परामर्श दिया जायेगा तो फैसला प्राईमेशी प्रिंसिपल के आधार पर होगा।यानि मुख्य न्यायाधीश की राय ही न्यायपालिका की राय मानी जायेगी। मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति वरिष्ठता के आधार पर की जायेगी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से जो आजादी के बाद से वरिष्ठता एक प्रथा थी,अब वह एक कानून बन गया।इस प्रकार सन् 1993 से कार्यपालिका जजों की नियुक्ति से अलग हो गई तथा जजों की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश के हाथ में आ गई।
आगे चलकर सन् 1998 में प्रेसिडेंट रेफरेंस एक्ट-143 के तहत जिसमें भारत का राष्ट्रपति न्यायालय से परामर्श मांग सकता है।
इस समय भारत के राष्ट्रपति के आर नारायणन थे। सन् 1998 में भारत के प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल तथा अटल बिहारी वाजपेई रहे थे। राष्ट्रपति जी ने न्यायपालिका से पूछा कि परामर्श का अर्थ सहमति की व्याख्या ने व्यवहारिक असंतुलन पैदा कर दिया है। यदि परामर्श का अर्थ सब जगह सहमति हो गया तो कोई किसी से परामर्श ही नहीं करेगा।क्या हमारा संविधान इसकी इजाजत देता है कि एक ही व्यक्ति जजों की नियुक्ति करें जो खुद भी एक जज ही है।इस पर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि परामर्श का अर्थ सहमति ही है और कोलेजियम व्यवस्था सही है। परन्तु अब सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था का विस्तार कर दिया।कहा गया कि अब
1- जजों की नियुक्ति की कमेटी 5 सदस्य की होगी। जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश तथा 4 वरिष्ठतम न्यायाधीश होंगे।
2- यदि आगे बनने वाला मुख्य न्यायाधीश इन चार जजो में नही है तो वह भी इसका एक सदस्य होगा।सम्यक प्रक्रिया का पालन करते हुए यह कमेटी किसी नाम की सिफारिश करेगी तो राष्ट्रपति जी उसका पालन करने के लिए बाध्य होंगे।
सम्यक प्रक्रिया
1- मुख्य न्यायाधीश की सहमति के बिना कोई भी नाम सुप्रीम कोर्ट में जज बनने के लिए प्रस्तावित नही किया जायेगा।
2- कोलेजियम सर्व सम्मति से निर्णय लेगा। यदि सहमति नही बनी तो बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।जो मुख्य न्यायाधीश+2 होंगे। मुख्य न्यायाधीश की सहमति अनिवार्य होगी।
3- जब किसी व्यक्ति का नाम सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में पेश किया जाएगा तो उसके केंद्र में मैरिट होगी। वरिष्ठता का पर्याप्त ध्यान रखा जायेगा। परंतु मैरिट बनाम वरिष्ठता में से यदि किसी एक का चयन करना हो तो मैरिट को वरियता दी जाएगी।
4- यदि हाई कोर्ट के जज को सुप्रीम कोर्ट में ले जाया जा रहा हो तथा उसी प्रदेश का जज पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में हो तो उसकी सलाह भी ली जायेगी।
इसे थर्ड जजी केस कहा गया।इस केस में सुप्रीम कोर्ट में जजो की नियुक्ति और पारदर्शी हो गई।
कोलेजियम व्यवस्था की आलोचना भी खूब हुई। इसके विषय में कहा गया-
1- यह संविधान की बेतुकी व्याख्या है। क्योंकि परामर्श का अर्थ सहमति लेना नही हो सकता। यदि यह मान लिया जाए तो कोई किसी से परामर्श ही नहीं लेगा। परन्तु धारा 132 के अंतर्गत भारत का सर्वोच्च न्यायालय संविधान का सर्वोच्च व्याख्याकार है।इस बात को नकारा भी नहीं जा सकता।
2- कोलेजियम की व्यवस्था पूरे विश्व में नही है।एपोइंटमेंट पावर हमेशा प्रशासनिक शक्ति है।जिसका प्रयोग कार्यपालिका के द्वारा होना चाहिए। ब्रिटेन और अमेरिका में भी ऐसा नहीं है।कही भी जजों की नियुक्ति जज नही करतें। ब्रिटेन में जजों की नियुक्ति एक संस्था जिसका नाम जुडिशरी एपाइंटमेंट कमीशन है कि सिफारिश पर ब्रिटेन का सम्राट करता है।इस संस्था मे 15 सदस्य होते हैं।केवल 3 सदस्य न्यायपालिका के होते हैं।
अमेरिका में राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति करता है। फिर वह नाम सिनेट (राज्यसभा) में जाते हैं।सिनेट में एक नियुक्ति समिति होती है।जिसे एपोइंटमेंट कमीशन कहा जाता है।वह नामो पर विचार कर सीनेट को भेज देती है।अब सीनेट 2/3 के बहुमत से पास कर देता है।
यह भी कहा जाता है कि कोलेजियम भाई भतीजावाद तथा भ्रष्टाचार को बढ़ाव
 देता है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में 52% जज आपस में रिश्तेदार है।
यह प्रक्रिया संविधान की धारा 50 के भी विरूद्ध है। जिसमें कहा गया है कि प्रशासनिक व न्याय की नियुक्ति अलग अलग होनी चाहिए।
परन्तु सन् 1998 में एक तरह से कोलोजियम व्यवस्था भारत में लागू हो गई। सन् 2014 में मोदी जी की पूर्ण बहुमत की सरकार आयी।मोदी जी की सरकार ने कोलेजियम व्यवस्था को समाप्त करने के लिए 99 वे संशोधन के माध्यम से प्रयास किया ताकि जजों की नियुक्ति कार्यपालिका के माध्यम से हो सकें।
संविधान में धारा 124A,124B,124C के द्वारा NGAC आयोग नाम की एक व्यवस्था दी गई।इस व्यवस्था के अनुसार एक 6 सदस्यों की संस्था होगी। जिसमें एक अध्यक्ष तथा 5 सदस्य होंगे। अध्यक्ष भारत का मुख्य न्यायाधीश होगा।दो सदस्य सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जज होंगे।एक सदस्य भारत का कानून मंत्री होगा।2 ख्याति प्राप्त सदस्य होंगे।
दो ख्याति प्राप्त सदस्यों की नियुक्ति मनोनयन के द्वारा होगी।इनकी नियुक्ति एक तीन सदस्य समिति करेगी।इस नियुक्ति समिति में एक भारत के मुख्य न्यायाधीश,एक देश के प्रधानमंत्री तथा एक विपक्ष का नेता अथवा सबसे बडे विपक्षी दल का नेता होगा। ये तीनों लोग दो ख्याति प्राप्त सदस्यों को नामित करेंगे,इन दो सदस्यों में से एक सदस्य एससी-एसटी ओबीसी महिला अथवा अल्पसंख्यक समुदाय से होगा।जब यह समिति जजों के नाम प्रस्तावित करेंगी, यदि दो या अधिक सदस्य असहमत है तो नाम प्रस्तावित नही होगा।यानि 6 में से 5 व्यक्ति सहमत होने चाहिए। प्रस्तावित नाम राष्ट्रपति जी के लिए मानने के लिए बाध्य कारी होगा।
इस क़ानून को संसद के विशेष बहुमत के साथ पास किया गया तथा आधे से अधिक राज्यों से पास करवाकर राष्ट्रपति महोदय को भेज दिया गया।
लेकिन कानून लागू होने से पूर्व ही इस कानून की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गई।
इसे ही फोर्थ जजी केस कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट आन रिकार्ड एसोसिएशन बनाम भारत सरकार-2015
सुप्रीम कोर्ट ने इस संशोधन को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया। जिसमें तर्क दिए गए कि
1- भारत का संविधान न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है। परन्तु यह कानून स्वतंत्रता को कम कर रहा है।
2- दो ख्याति प्राप्त व्यक्ति व कानून मंत्री की कोई शैक्षिक योग्यता तय नही है। फिर वो कैसे सलाह देंगे की कौन न्यायाधीश किस मैरिट का है। कौन जज बने।
इस प्रकार 99 वा संविधान संशोधन रद्द हो गया। वर्तमान समय में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में कोलेजियम व्यवस्था है।जो पांच सदस्यीय है।
हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति धारा 217 के अन्तर्गत भारत का राष्ट्रपति करेगा।
भारत का राष्ट्रपति तीन लोगों से सलाह करेगा।एक भारत का न्यायाधीश,दूसरा प्रदेश का राज्यपाल,तिसरा हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश
लेकिन सन् 1993 व 1998 से नियुक्त कोलोजियम से होने लगी है। इसलिए अब भारत का मुख्य न्यायाधीश व दो सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जज आपस में परामर्श कर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए नाम राष्ट्रपति जी को प्रस्तावित करेंगे। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की राय हाई कोर्ट के जज की नियुक्ति के लिए महत्वपूर्ण होगी।
संविधान की धारा 222 के अंतर्गत हाईकोर्ट के जज का स्थानांतरण भी कोलेजियम के माध्यम से होगा।चीफ जस्टिस आफ इंडिया+4 तथा दोनों हाई कोर्ट (जिस कोर्ट से जिस कोर्ट में) के चीफ जस्टिस के परामर्श से करेगा।
संदर्भ ग्रंथ-
भारतीय न्यायपालिका और कोलेजियम प्रणाली - डा मुकेश कुमार
https://youtu.be/WiyC2vyV2yo

बुधवार, 4 अगस्त 2021

आधुनिक भारत के कुछ महत्वपूर्ण कानून (सन् 1498-1947)- संकलन कर्ता अशोक चौधरी मेरठ।

यूरोपियन वास्कोडिगामा पुर्तगाली
1- 17 मई सन् 1498 को कालिकट/ कोचिकोट (केरल) में एक गुजरात के व्यापारी अब्दुल मजीद की सहायता से पहुंचा।
2- सन् 1502 में पुर्तगालियों ने सबसे पहली फैक्ट्री कोचीन/कोची में लगाई तथा कोचीन को ही अपना केंद्र बनाया।
3- सन् 1510 में  विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय की सहायता से बीजापुर के सुल्तान से गोवा को छीन लिया।
4- सन् 1530 में  अपना केंद्र कोचीन से बदल कर गोवा कर लिया।जब गोवा पर पुर्तगालियों का राज्य हो गया,तब यहां पर सती प्रथा को बंद कर दिया गया।
5- सन् 1535 में दीप व सन् 1559 में दमन पर पुर्तगालियों ने कब्जा कर लिया।उस समय बोम्बे दमन के अन्तर्गत आता था।
6- सन् 1582 में ब्रिटेन से एक अंग्रेज़ अधिकारी भारत में सम्राट अकबर के दरबार में आया,इस अधिकारी का भारत आने का उद्देश्य यह जानकारी प्राप्त करना था कि भारत में ब्रिटेन के व्यापार करने पर लाभ की क्या सम्भावनायें है?
7- ब्रिटिश अधिकारी की सकारात्मक रिपोर्ट प्राप्त होने पर सन् 1599 में ब्रिटिश क्वीन एलिजाबेथ प्रथम ने एक कानून रायल चार्टर के नाम से पास किया, जिसके परिणामस्वरूप सन् 1600 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई।
8- सन् 1602 में डच (नीदरलैंड,हांलेंड) ईस्ट इंडिया कंपनी भारत पहुच गई।इस कम्पनी पर धन की कमी होने के कारण आम आदमी को अपने व्यापार में साझेदार बनाकर व्यापार किया,यह दुनिया की पहली कम्पनी थी जिसने दुनिया को शेयर बाजार अर्थात (आईपीओ)का कंसेप्ट दिया।
9- सन् 1605 में डच ने सबसे पहली फैक्ट्री मसूलीपटनम/मछली पटनम (आंध्र प्रदेश) में लगाई।डच ने अपना केंद्र पुलिकट (तमिलनाडु)को बनाया।
10- सन 1609  में ब्रिटेन से अंग्रेज़ भी भारत के सूरत में हैक्टर नामक पानी के जहाज से भारत पहुंचे तथा भारत में व्यापार करने की आज्ञा लेने के लिए एक अंग्रेज़ अधिकारी जिसका नाम कैप्टन विलियम हांकिंस था मुगल बादशाह जहांगीर के दरबार में सन् 1611 तक प्रयास रत रहा। लेकिन आज्ञा नही मिली।
11- सन् 1612 में कैप्टन मिडिलटन सम्राट जहांगीर के दरबार में पुनः पहुंचे तथा भारत में फैक्ट्री लगाने की आज्ञा प्राप्त कर ली।अब अंग्रेजों ने भारत में तीन फैक्ट्री लगाने की आज्ञा प्राप्त कर ली।
12- सन् 1613 में वेस्ट में सूरत (गुजरात) में एक फैक्ट्री लगाई।
13- सन् 1616 में डेनिस (डेनमार्क) ईस्ट इंडिया कंपनी भी भारत आ गई। इन्होंने अपनी फैक्ट्री सीरामपुर (बंगाल) में लगाई तथा अपना केंद्र टरोंकेबार (तमिलनाडु) में बनाया।
14- सन् 1631 में साऊथ में मसूलीपटनम(आंध्र प्रदेश) में दूसरी फैक्ट्री लगाई।
15- सन् 1633 में हरिहर पुर (बालासोर उड़ीसा) में ईस्ट मे तिसरी फैक्ट्री लगाई।
ब्रिटिश अधिकारियों ने जो टैक्स भारत सरकार को देना था उसका दस गुना टैक्स सरकार को दिया।जिस कारण सरकार की नजरों में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का एक विशेष स्थान बन गया।
16- सन् 1637 में मद्रास  जो उस समय बंजर पडा हुआ था, ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत सरकार से लीज पर ले लिया तथा वेयर हाउस बनाने के बहाने से मद्रास में सन् 1639 में एक किले का निर्माण कर लिया। जिसमें ब्रिटेन से चोरी-छुपे हथियार एकत्रित करने प्रारंभ कर दिए।
17- बोम्बे में बंदरगाह था जो पुर्तगाल के अधिकार मे था, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को बोम्बे बंदरगाह को प्रयोग में लिये जाने के बदलें मे 10 किलोग्राम सोना प्रति वर्ष टैक्स के रूप में पुर्तगाल को देना पडता था। लेकिन सन् 1661 में ब्रिटेन के राजा चार्ल्स द्वीतिय ने पुर्तगाल के राजा की बहन से शादी कर बोम्बे को दहेज में प्राप्त कर लिया तथा सन् 1668 में भी एक किले का निर्माण कर लिया।
18- सन् 1664 में फ्रेंच भारत आ गये। फ़्रेंच ने अपनी फैक्ट्रियां वही लगाई जहा ब्रिटेन ने लगा रखी थी। फ़्रेंच ने सन् 1668 में सूरत में, सन् 1669 में मसूलीपटनम (आंध्र प्रदेश) में तथा सन् 1673 में पांडिचेरी पर कब्जा कर,यही पर अपना केंद्र बना लिया।
19- ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी की नजर शुरू से ही बंगाल के उपजाऊ मैदान पर थी, अंग्रेज नील, अफीम तथा चाय की खेती करके विश्व बाजार में भारी लाभ कमाना चाहते थे, परन्तु उनको बंगाल में घुसने का अवसर नही मिल रहा था। परंतु संयोग वश मुगल बादशाह औरंगजेब ने ब्रिटिशर्स को आदेश दिया कि वो बंगाल में भी अपनी फैक्ट्री लगाये। अंग्रेजों की बिन मांगे ही मुराद पूरी हो गई। सन् 1690 में अंग्रेजों ने सूटानूटी गांव में एक मैं अपनी फैक्ट्री लगाई।सूटानूटी गांव के पास ही कालीकटा तथा गोविन्द पुर दो गांव थे। फैक्ट्री लगने के कारण ये तीनों गांव आपस में मिल गये। अंग्रेजों ने कालीकटा को अपना केंद्र बनाया तथा सन् 1698 में कालीकटा (कलकत्ता) में एक किले का निर्माण कर लिया। मुगल बादशाह औरंगजेब इस समय दक्षिण में मराठाओं से संघर्ष में उलझा हुआ था। सन् 1707 में मुगल बादशाह औरंगजेब की मृत्यु हो गई।नये सम्राट के लिए मुगलों मे गृहयुद्ध शुरू हो गया। अंग्रेजों ने इस अवसर का भरपूर फायदा उठाया तथा सम्राट को टैक्स देना बंद कर दिया।
20- सन् 1717 में मुगल बादशाह फरुखशियर से अंग्रेजों ने पूरे भारत में बिना किसी टेक्स दिये फ्री ट्रेड करने का आदेश प्राप्त कर लिया।
यह वह समय था जब मुगल सत्ता डगमगाने लगी थी। मुगलों के बड़े सामंत धीरे धीरे अलग होते जा रहे थे।
(क)चिनकुलिज खां (निजामुल मुल्क) हैदराबाद को लेकर अलग हो गया।
(ख) मुर्शीद कुली खां बंगाल को लेकर अलग हो गया।
(ग)सद्दत खां अवध (लखनऊ) को लेकर अलग हो गया।
मुगल बादशाह नाम का ही बादशाह था।
21- सन् 1746-48 तक इंग्लैंड और फ्रांस के बीच प्रथम युद्ध हुआ।
22- सन् 1749-54 में दूसरा युद्ध इंग्लैंड और फ्रांस के बीच हुआ,इसका कोई परिणाम नहीं आया। पांडिचेरी की संधि हो गई।
23- सन् 1756-63 के बीच इंग्लैंड और फ्रांस के बीच तिसरा युद्ध हुआ जिसमें इंग्लैंड जीत गया।
24- सन् 1756 में बंगाल के नबाब सिराजुद्दौला ने अंग्रेजों पर कलकत्ता में हमला कर दिया तथा 100 अंग्रेज सिपाहियो को मार डाला।
25- अब सन् 1757 मे प्लासी का युद्ध हुआ, जिसमें अंग्रेजों ने बंगाल के नबाब सिराजुद्दौला के रिश्तेदार मीर जाफर को रिश्वत व बंगाल की नबाबी का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया।मीर जाफर युद्ध के मैदान में सेना लेकर अंग्रेजों की ओर हो गया,यह युद्ध कुल डेढ़ घंटा चला और अंग्रेजों ने युद्ध जीत लिया। अंग्रेजों की ओर से राबर्ट क्लाइव इस युद्ध का नेतृत्व कर रहे थे।
26- सन् 1759 में डच और अंग्रेजों के बीच युद्ध हुआ।इस युद्ध में डच हार गए। संधि हो गई जिसमें यह तय हुआ कि मलेशिया और इंडोनेशिया मे डच व्यापार करेंगे। श्रीलंका और भारत इंग्लैंड पर रहेगा।
27- सन् 1763 में इंग्लैंड और फ्रांस के बीच पेरिस में समझौता हुआ कि पांडिचेरी फ्रांस की ही रहेगी, लेकिन पांडिचेरी से बाहर बाकी भारत से फ्रांस का कोई मतलब नहीं।
28- मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय इस समय अवध में रह रहा था, अतः बंगाल के मीर कासिम,अवध के नवाब शुजाऊद्दोला ने मिलकर अंग्रेजों से बक्सर नामक स्थान पर युद्ध किया। इसमें भी अंग्रेज विजयी हुए। मुगल बादशाह और अंग्रेजों की बीच इलाहबाद की संधि हुई। जिसमें बंगाल (बिहार उड़ीसा व पूर्वी तथा पश्चिमी बंगाल) का वित्त (फाइनैंस),शासन (एडमिस्टरेशन) अंग्रेजों के हाथ आ गया, जुडिशली मुगल बादशाह के पास ही रही।
29- ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से बंगाल का शासन सम्भालने के लिए गवर्नर जनरल आफ बंगाल का पद सृजित हुआ तथा इस पद पर वारेन हेस्टिंग्स नाम के अंग्रेज अफसर को नियुक्त किया गया।
30- सन् 1767-69 में अंग्रेजों ने अपने साथ हैदराबाद के निजाम और मराठाओं को लेकर मैसूर पर हमला किया, परन्तु मैसूर के शासक हैदर अली ने मराठाओं को अपनी ओर मिला लिया। इसमें अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा और हैदर अली के साथ मद्रास समझोता हुआ।
31- सन् 1773 में रेगुलेटिंग एक्ट नाम का कानून अंग्रेजो द्वारा भारत में लागू किया गया।अब बंगाल की जुडिशरी भी अंग्रेजों के हाथ में आ गई। अंग्रेज बंगाल के सम्पूर्ण स्वामी हो गय।
32- सन् 1774 में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना कलकत्ता में अंग्रेजों द्वारा की गई। जिसमें 4 जज थे।
33- सन् 1775-82 में प्रथम अंग्रेज और मराठा युद्ध हुआ, जिसमें अंग्रेज हार गए,सलवाई की संधि हुई।
34- सन् 1780 में भारत में पहला अखबार प्रारंभ हुआ,जिसे बंगाल गजट कहते हैं। अंग्रेज जेम्स हिक्की द्वारा।
35- सन् 1780-84 में द्वीतिय मैसूर युद्ध हुआ, जिसमें हैदर अली मारा गया। परन्तु हैदर अली के पुत्र टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। सन् 1782 में बैंगलुरू की संधि हुई।
36- सन् 1784 में अंग्रेज अधिकारी विलियम जोन्स ने एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल बनाई। जिसमें भारत के साहित्य का अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। चार्ल्स विलिकिंस ने गीता का अंग्रेजी में अनुवाद किया। गीता और उपनिषद का फारसी में अनुवाद औरंगजेब का बडा भाई दारा शिकोह पहले ही कर चुका था।
37- सन् 1784 में ही लंदन में पिट्स इंडिया एक्ट के नाम से एक कानून पास किया गया, जिसमें यह निश्चित कर दिया गया कि ईस्ट इंडिया कंपनी ब्रिटिश सरकार की भारत में एक प्रतिनिधि है, भारत का ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा जो शासन बनाया गया है वह ब्रिटिश सरकार का है ईस्ट इंडिया कंपनी का नही।
38- सन् 1785 में वारेन हेस्टिंग्स रिश्वत लेते पकड़े गए।इनको गवर्नर जनरल के पद से हटा दिया गया।
अगले गवर्नर जनरल आफ बंगाल लार्ड कार्नवालिस आयेे
39- सन् 1786 में क्लर्क एवं एडमिशटरेशन में भारतीयों की जरूरत महसूस की गई। इसलिए भारतीय युवाओं के लिए आईसीएस की परिक्षा में बैठने की अनुमति दे दी गई,जिसका पेपर लंदन में तथा आयु 21 वर्ष रख दी गई।
40- सन् 1789-92 तक तृतीय मैसूर युद्ध हुआ, जिसमें टीपू सुल्तान को श्रीरंगपटनम में घेर लिया गया।इस युद्ध में संधि हो गई, मैसूर का 50% हिस्सा अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान से छीन लिया।
41- सन् 1793 में अंग्रेजों ने किसानों से टैक्स वसूली के लिए परमानेंट सैटलमेंट सिस्टम का कंसेप्ट दिया, जिसके अन्तर्गत राजा या जमींदार टैक्स की वसूली करेगा तथा जो टैक्स मिलेगा उसके 11 हिस्से होगे, जिनमें 10 हिस्से अंग्रेजों को मिलेंगे तथा एक हिस्सा जमींदार या राजा को।यह तरिका बंगाल बिहार उड़ीसा तथा वाराणसी में प्रयोग मे लाया गया।
अब लार्ड वेलेजली गवर्नर जनरल बन कर आये। ये नेपोलियन बोनापार्ट को हराकर आये थे।
42- सन् 1798 में कानून बनाकर प्रेस पर बेन लगा दिया गया।
43- सन् 1798 में ही हैदराबाद के निजाम के साथ अंग्रेजों ने संधि की।
44- सन् 1799 में चतुर्थ मैसूर युद्ध हुआ जिसमें टीपू सुल्तान मारा गया तथा पूरे मैसूर पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया।
45- सन् 1802 में पूना में युद्ध हुआ जिसमें मराठा शक्ति आपस में ही लड गई ,भसीन की संधि हुई बाला बाजीराव द्वितीय पेशवा बन गए।
46- सन् 1803-05 में अंग्रेजों और मराठाओं में द्वितीय युद्ध हुआ।
जार्ज बरलो गवर्नर जनरल बन कर आये।
47- सन् 1806 में बैल्लौर में ड्रेस कोड के विवाद में भारतीय सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। गवर्नर जनरल जार्ज बरलो हटा दिए गए।
अब लार्ड मिंटो प्रथम गवर्नर जनरल बन कर आये।
48- सन् 1809 में महाराजा रणजीत सिंह और अंग्रेजों के मध्य अमृतसर की संधि हुई, जिसमें महाराजा रणजीत सिंह ने कोहिनूर हीरा अंग्रेजों को उपहार स्वरूप दिया।
49- सन् 1813 में चार्टर एक्ट पास हुआ, ईस्ट इंडिया कंपनी की भारत में व्यापार की मोनो पोली समाप्त कर दी गई।अब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में चाय और अफीम तथा चीन में व्यापार कर सकती थी,बाकि अन्य व्यापार में दूसरी कम्पनी भी व्यापार कर सकती थी।
50- सन् 1814-16 में चीन में जाने के लिए नेपाल के रास्ते के प्रयोग को लेकर अंग्रेजों और नेपाल में युद्ध हुआ, जिसमें गोरखो ने बडी बहादुरी दिखाई, संगोली की संधि हुई तथा नेपाल का 1/3 भाग अंग्रेजों ने कब्ज़ा लिया।
51- सन् 1816-19 में तिसरा मराठा युद्ध हुआ जिसमें अंग्रेजों ने मराठा शक्ति को हरा दिया।
अब लार्ड हैस्टिंग्स गवर्नर जनरल बन कर आये।
52- सन् 1820 में लार्ड मुनरो के द्वारा प्रस्तुत की गई निती के आधार पर किसानों से टैक्स वसूली की निती बनाई गई।इस निती के अंतर्गत किसानों से असिंचित भूमि से 50% और सिंचित भूमि से 60% टैक्स लिया गया।इसे रैयत वाडी सिस्टम कहा गया।यह निती मद्रास, बोम्बे,आसाम और कुर्ग में के किसानों पर अपनाई गई।
अब लार्ड एमरेस्ट गवर्नर जनरल बनकर आए।
52- सन् 1824-26 प्रथम बर्मा और अंग्रेजों के बीच युद्ध हुआ। अंग्रेजों ने बर्मा से आसाम, मणिपुर और अराकांज नामक क्षेत्र छीन लिए।यंडावो की संधि हुई।
अब लार्ड विलियम बेलेरिक गवर्नर जनरल आये।
53- सन् 1829 में सती प्रथा पर पूरे भारत में प्रतिबंध लगा दिया गया।
54- सन् 1830 में ठगी को रोकने के लिए संप्रेषण आफ ठग नाम का कानून बनाया गया।
55- सन् 1833 में किसानों से टैक्स वसूलने के लिए महलवाडी सिस्टम अपनाया गया, ग्राम स्तर पर किसानों से टैक्स वसूलने के लिए व्यक्ति नियुक्त किए गए,इस व्यक्ति के अधिकार में आने वाले क्षेत्र को महल कहा गया।यह सिस्टम पंजाब,अवध (लखनऊ), आगरा और मध्य प्रदेश में लागू किया गया।
सन् 1833 में एक और चार्टर एक्ट पास हुआ, जिसके अन्तर्गत ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापार पर से आधिपत्य समाप्त कर दिया गया। सन् 1833 में ही गवर्नर जनरल आफ बंगाल का पद समाप्त कर गवर्नर जनरल आफ इंडिया का पद सृजित कर दिया गया।
56- सन् 1834 में फर्स्ट ला कमिशन आफ ब्रिटिश इंडिया बनाया गया जिसके अध्यक्ष लार्ड मैकाले बनाये गये।
57- सन् 1835 में लार्ड मैकाले की सलाह पर अंग्रेजी भाषा को भारत की आफिशियल भाषा बना दिया गया।
अब चार्ल्स मेडकाल भारत के गवर्नर जनरल बन कर आये।
58- सन् 1836 में वरनाचुअल प्रेस एक्ट पास कर प्रेस पर से प्रतिबंध हटा दिया गया।
इन गवर्नर जनरल को वापस बुला लिया गया।
अगले गवर्नर जनरल लार्ड आकलैंड बन कर आये।
59- सन् 1839-42 के बीच अफगान और अंग्रेजों के मध्य युद्ध हुआ,इस युद्ध में अंग्रेज हार गए,इस युद्ध को आकलैंड फाली भी कहा जाता है।
अगले गवर्नर जनरल हैनरी हार्डिंग बनकर आए।
60- सन् 1845-46 में पहला अंग्रेज सिक्ख युद्ध हुआ, लाहौर की संधि हुई,आधा क्षेत्र अंग्रेजों ने कब्ज़ा लिया।
अगले गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी बन कर आये।
61- सन् 1848 में रियासत हड़पने की निती के अंतर्गत सतारा, जैतापुर,सम्भल पुर, उदयपुर, झांसी, नागपुर को हडप लिया गया तथा अवध को कमजोर प्रशासन का बहाना करके हडप लिया गया।
62- सन् 1849 में द्वितीय अंग्रेज़ सिक्ख युद्ध हुआ,अब सम्पूर्ण भारत पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया।
63- सन् 1852-53 में द्वितीय बर्मा युद्ध हुआ जिसमें लोअर बर्मा पर अंग्रेजों ने कब्ज़ा कर लिया।
64- सन् 1853 में पहली रेल गाड़ी चली, जिसे साहिब,सिंध और सुल्तान नाम के तीन इंजनों ने खींचा। बोम्बे से थाणा। सन् 1853 में ही पहली टेलीग्राम लाइन बिछाई गई कलकत्ता से आगरा के बीच।
65-(क) सन् 1854 में पहली पोस्टल सर्विस की शुरुआत हुई।
(ख) सन् 1854 में PWD डिपार्टमेंट की शुरुआत हुई।
(ग) सन् 1854 में भारत की दूसरी राजधानी शिमला बनाई गई।
(घ) सन् 1854 में प्राइमरी एजुकेशन के लिए एजुकेशन कमीशन बुड्स डिस्पेच के नाम से भारत आया।
66- सन् 1856 में वीडो मेरिज एक्ट पास किया गया।
अब लार्ड कैनिंग भारत आए
67- (क)सन् 1857 में तीन यूनिवर्सिटी खोली गई, कलकत्ता, बोम्बे और मद्रास में।
(ख) सन् 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हुआ।
68- सन् 1858 में लंदन में गवर्मेंट आफ इंडिया एक्ट 1858 पास हुआ, भारत से ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त होकर सीधा ब्रिटिश ताज के हाथों मे।
भारत का गवर्नर जनरल अब वायसराय हो गया।
69- सन् 1859 में पश्चिम बंगाल के नादिया जिले में दो किसान भाई दिगम्बर विश्वास और विष्णु चरण विश्वास के नेतृत्व में नील का विद्रोह हुआ।
70-(क) सन् 1860 में IPC (इंडियन पेनल कोड) बना।
(ख) सन् 1860 में भारत में पहली बार बजट पेश हुआ,इस बजट को जेम्स विल्सन नाम के अर्थ शास्त्री ने पेश किया।
अब वायसराय लार्ड एल्गिन आये
71- सन् 1862 में कलकत्ता बोम्बे और मद्रास में हाई कोर्ट बनाये गये।
अब वायसराय लॉर्ड मांओं
72- सन् 1871-72 में भारत में सैंसस की शुरूआत हुई।
73-(क) सन् 1872 में भारत के राजकुमार और राजकुमारियों को पढ़ाने के लिए अजमेर और राजकोट में कालिज खोले गए।
(ख) सन् 1872 में काला पानी की जेल का निरीक्षण करने गए वायसराय लॉर्ड मांओं का शेर अफरिदी नामक कैदी ने कत्ल कर दिया।
अब लार्ड लिटन वायसराय आये
74- सन् 1876 में सूखा पड़ा, भारत में सूखा आयोग का गठन,लगान माफ किया गया रिचर्ड स्टेच अधिकारी द्वारा।
75- सन् 1878 में तीन कानून बनाये गये-
(क) आर्म्स एक्ट बना
(ख) वरनाकूल प्रेस एक्ट (प्रेस से पाबंदी समाप्त)
(ग) सिविल सर्विस में आयु 19 वर्ष की गई,सीविल सर्विस में 1/6 सीटें अमीर और राजा महाराजाओं के लिए आरक्षित की गई।
अब लार्ड रिपोन वायसराय बन कर आये
76- सन् 1881 में प्रथम फैक्ट्री एक्ट पास हुआ जिसमें बच्चों द्वारा मजदूरी करने पर रोक लगी।
77- सन् 1882 में लोकल सेल्फ गवर्मेंट एक्ट बना (पंचायत राज व्यवस्था)
78- सन् 1883 में इलबरड बिल पास हुआ, इसके अंतर्गत भारतीय जज अंग्रेजों को सजा सुना सकते थे।
अंग्रेजों के विरोध के कारण यह कानून वापस ले लिया गया।
79- (क) सन् 1885 में तिसरा बर्मा युद्ध हुआ और सम्पूर्ण बर्मा पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया।
(ख) सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई जिसमें एओ हृयूम, दादाभाई नौरोजी और दिनशो वाचा का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
अब लार्ड लैंसडाउन वायसराय आये
80- सन् 1891 में द्वितीय फैक्ट्री एक्ट पास हुआ, जिसमें मजदूर के काम का समय निर्धारित हुआ तथा सप्ताहिक छुट्टी निर्धारित हुई।
81- सन् 1893 में डूरांड कमीशन द्वारा ब्रिटिश इंडिया और अफगानिस्तान के मध्य एक विभाजक रेखा खींच दी गई।
82- सन् 1894 में पहला इंडियन बैंक पंजाब नेशनल बैंक के नाम से लाहौर में खुला तथा इस बैंक में पहला खाता लाला लाजपत राय जी का खुला।
अब लार्ड कर्जन वायसराय आये
83- सन् 1899 में ब्रिटिश क्वीन की मृत्यु हो गई तथा जार्ज पंचम किंग बने।
84- सन् 1901 में रानी विक्टोरिया की याद में कलकत्ता में विक्टोरिया मेमोरियल बनाया गया।
85- सन् 1904 में इंडियन यूनिवर्सिटी एक्ट बना,इस कानून से पहले 10 वी पास करने के बाद ग्रेजुएशन कर लेते थे परन्तु इस कानून के बन जाने के बाद 12 वी पास करने के बाद ग्रेजुएशन हों गयी।
86-(क) सन् 1905 में प्राचीन इमारतों के रखरखाव के लिए एशियाटिक मेमोरियल एक्ट बना।
(ख) 16-10-1905 को बंगाल का विभाजन हुआ। जिसमें एक भाग में वेस्ट बंगाल, बिहार उड़ीसा, दूसरे भाग में पूर्व
 बंगाल और आसाम था।
(ग) सन् 1905 में एग्रिकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट पूसा बना, दिल्ली करोलबाग के पास
(घ) सन् 1905 में लाल बाल पाल के द्वारा स्वदेशी आंदोलन का प्रारंभ, वंदेमातरम आंदोलन, बंगाल विभाजन के विरोध में।
87- सन् 1906 में आल इंडिया मुस्लिम लीग का गठन नबाब समीउल्लाह खां के द्वारा किया गया तथा मुस्लिमो के लिए आरक्षण की मांग की गई।
88- सन् 1907 में कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस नरम दल (गोपाल कृष्ण गोखले) व गरम दल (बाल गंगाधर तिलक) मे बंट गई,इस समय कांग्रेस के अध्यक्ष रास बिहारी घोष थे।
89- सन् 1908 में खुदीराम बोस ने मात्र 13 वर्ष की आयु में मुज्जफर पुर के अंग्रेज़ अधिकारी के काफिले पर बम फैंक दिया,खुदी राम बोस को 18 वर्ष की आयु में फांसी हो गई।
90- सन् 1909 में मार्ल
 मिंटो रिफार्म पास हो गया जिसे इंडिया काउंसिल एक्ट के नाम से जाना जाता है। इसमें कम्यूनल इलेक्ट्रो स्टेट के तहत मुस्लिमों को आरक्षण दिया गया।
अब लार्ड हार्डिंग वायसराय आये
91-(क) सन् 1911 में किंग जॉर्ज पंचम ने अपना राज्याभिषेक भारत में करने की इच्छा जताई। इसके लिए ग्रांड दिल्ली दरबार का आयोजन किया गया। जार्ज पंचम के आने की याद में गेट वे ऑफ इंडिया बनवाया गया।
(ख) सन् 1911 में ही कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में जार्ज पंचम की उपस्थिति में पहली बार जन गण मन गाया गया।
(ग) सन् 1911 में बंगाल का विभाजन रद्द कर दिया गया।
(घ) सन् 1911 में ही अंग्रेजो ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ट्रांसफर कर दी गई।
92- सन् 1912 में लार्ड हार्डिंग पर दिल्ली में रास बिहारी बोस के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने बम फैंक दिया।
93- सन् 1915 में गांधी जी भारत आये गोपाल कृष्ण गोखले व चार्ल्स फीदर एंडस्टा ने गांधी जी को भारत भ्रमण करने की सलाह दी, जनवरी से दिसम्बर तक गांधी जी ने भारत भ्रमण किया।
94- सन् 1915 में हिंदू महासभा का गठन मदन मोहन मालवीय द्वारा किया गया।
95- सन् 1916 में साबरमती आश्रम अहमदाबाद में बनवाया गया।
96- सन् 1916 में कांग्रेस का अधिवेशन लखनऊ में हुआ जिसमें लखनऊ पेक्ट (कांग्रेस+ मुस्लिम लीग) हुआ।
97- सन् 1916 में बालगंगाधर तिलक द्वारा बोम्बे मे तथा एनी बेसेंट द्वारा पूरे भारत में होम रूल के नाम से आंदोलन चलाया गया।
लार्ड चेम्सफोर्ड वायसराय आये
98- सन् 1917 में चम्पारण सत्याग्रह में गांधी जी ने भागेदारी की।
99- सन् 1918 में खेडा सत्याग्रह तथा अहमदाबाद में मिल स्टाइक में गांधी जी ने भागेदारी की।
100- सन् 1919 में रोलेक्ट एक्ट का कानून अंग्रेजो द्वारा बनाया गया। जिसके विरोध में 13 अप्रैल सन् 1919 को अमृतसर में जलियांवाला बाग में अंग्रेजों ने 1581 नागरिको को मार डाला।
101- सन् 1919-1921 के मध्य खिलाफत आन्दोलन हुआ।
102- सन् 1920 को गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन शुरू किया गया।
अब लार्ड रीडिंग वायसराय आये
103- सन् 1921 में मोपला विद्रोह हुआ मुस्लिम किसानों द्वारा केवल में।
104- चार फरवरी सन् 1922 को चोराचोरी कांड में 22 पुलिस कर्मी मारे गए। असहयोग आंदोलन स्थगित।
105- (क)सन् 1924 बालसेविक केस हुआ, जिसमें कम्युनिस्ट नेता एम एन राय,एस ए डांगे,सैयद उस्मानी पकड़ गए।
(ख) सन् 1924 में असहयोग आंदोलन समाप्त होने पर एच आर ए (हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन)का गठन किया, जिसमें एस एन सान्याल, चंद्र शेखर आजाद आदि थे।
106-  09-08- 1925 को चंद्रशेखर आजाद,रोशन सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां ने लखनऊ के निकट काकोरी में ट्रेन को लूट लिया, जिसमें 325000 की राशि लूट ली गई।
107-(क) सन् 1928 में एच आर ए के स्थान पर एच एस आर ए (हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन)का गठन भगत सिंह द्वारा किया गया।
(ख) साईमन कमिशन के विरोध में लाला लाजपतराय की मौत हो गई।भगत सिंह ने लाहौर में पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या कर दी।
108- सन् 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पं जवाहरलाल नेहरू ने पूर्ण स्वराज्य की मांग रखी।
109- गांधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की,जिसे नमक सत्याग्रह भी कहते हैं। साबरमती से दांडी अर्थात 450 किलोमीटर पैदल यात्रा की।
110-(क) सन् 1930-31-32 में गोलमेज सम्मेलन हुआ, जिसमें तीनों सम्मेलन में अम्बेडकर जी ने भाग लिया तथा दूसरे सम्मेलन में गांधी जी और सरोजिनी नायडू ने भी भाग लिया।
(ख) सन् 1932 में गांधी जी और अम्बेडकर जी के बीच पूना पैक्ट हुआ।
111- सन् 1940 में लाहौर में मुस्लिम लीग ने अपने अधिवेशन में पाकिस्तान की मांग रखी।
112- (क)सन् 1942 में क्रिप्स इंडिया मिशन भारत आया, जिसने भारत के नेताओं से द्वीतिय विश्व युद्ध में इंग्लैंड की सहायता करने के लिए कहा, बदलें मे भारत की आज़ादी का वादा किया।
(ख) सन् 1942 गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ किया तथा करो या मरो का नारा दिया।इस आंदोलन के परिणाम स्वरूप चिंटू पांडे ने बलिया में,वाई वी चव्हाण ने सतारा में समानांतर सरकार का गठन किया। आजाद हिंद फौज का गठन केप्टन मोहन सिंह द्वारा किया गया
113- सन् 1943 में सुभाष चन्द्र बोस द्वारा दिल्ली चलो का नारा दिया गया तथा तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा।नारा देकर अंग्रेजों से संघर्ष किया गया।
114- सन् 1945 में भालू भाई देसाई एडवोकेट द्वारा आजाद हिंद फौज के सिपाहियों का केस लडा गया।
115- सन् 1947 भारत की आज़ादी
संदर्भ ग्रंथ-
Modern Indian history(1498-1947)
https://youtu.be/MB57uCq4gcI